भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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२८० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

प्रत्यक्ष अनुभव को ही यदि प्रमाण मानकर भारत की प्राचीन अवस्था का अनुसन्धान किया जाय तो भारतीय सभ्यता ही सबसे प्राचीन प्रतीत होती है। महेञ्जोदारो के भूगर्भ से भी बहुत सी अत्यन्त प्राचीन देवताओं की मूर्तियां उपलब्ध हुई हैं। इनमें ब्रह्मा, विष्णु तथा महादेव की सम्मिलित त्रिमूर्ति, हस्ति, व्याघ्र, खड्गि (गेंडा) तथा मृग सहित शिव की मूर्ति तथा स्त्री देवताओं की मूर्तियां भी मिलती हैं। स्त्री देवता (Mathi Gods) की मूर्तियां सिन्धु नदी के किनारे बालुकामयस्थान में, इलाम, पर्शिया, एशिया माइनर, सीरिया, फिलस्तीन, साइप्रस, एजीएन्सीतट, बाल्कन तथा मिश्र देश में भी मिलती हैं। ग्रीस देश के क्रेटाद्वीप में अग्र तथा पृष्ठ भाग पर सिंह तथा व्याघ्र से युक्त Minoan नामक देवी की मूर्ति, एलोनिया देश में सिंह के वाहन वाली Cybele नामक प्राचीन देवी की मूर्तियां मिलती है। इस प्रकार महेञ्जोदारो के विवरण वाली पुस्तक के अनुसार भारत^१ तथा अन्य देशों में एक समान सूत्र का परिचय मिलता है।

(सेवानौकरी) रूप चारों विभागों वर्णभेद की छाया मिलती है। वहां के प्राचीन इतिहास में भारतीय इतिहास के समान जलप्लावन (समुद्रयात्रा) का वर्णन तथा प्रजापति स्थानीय 'क' देवता का उल्लेख मिलता है। उस देश की भाषा के मात-इवु-आत्म्-पुष्-उषा-आप-अपूप-ब्रा आदि शब्दों में क्रमशः थोड़े या सम्पूर्ण रूप से माता-इभ-आत्मा-पुष-उषा-आप-अपूप तथा नर आदि शब्दों का शब्द एवं अर्थ से सादृश्य मिलता है। इस विषय में श्री ध्यानचन्द्र (Quarterly Journal of Mythic Society Vol XXI No. 3. P. 250) तथा श्रीअविनाशचन्द्र ने (Rigvedic India Vol I P. 245) में बहुत कुछ लिखा है। अन्य मन्त्रों की तरह शाखाभेद के द्वारा पाठभेद के बिना ही एक परम्परा से ही भारत में व्याप्त हुए वैदिक सावित्री मन्त्र के ज्ञान से तथा ऋग्वेद के सौर मन्त्रों द्वारा प्रतिपाद्य सूर्य देवता की उपासना भारतीयों का प्राचीन असाधारण धर्म समझा जाता है। भारत में सुदूर पश्चिम में स्थित प्राचीन एवं विशाल तथा नष्टभ्रष्ट मार्तण्ड (सूर्य देवता) का मन्दिर भी भारतीयों की चिरकाल से चली आने वाली सूर्य की उपासना को सूचित करता है। मिश्रदेश के प्राचीन नगर में अप्रचलित सूर्योपासना के बाद में किसी राजा के समय जनता द्वारा प्रतिरोध करने पर भी बलपूर्वक उसके पुनः प्रवर्तन का इतिहास तथा पांच हजार वर्ष प्राचीन उसके समाधिशव के साथ वैदिक उक्तियों की छाया (समानता) वाला सूर्यस्तोत्र खुदा हुआ मिलता है। मिश्र देश में उपलब्ध पांच हजार वर्ष प्राचीन बर्तन आदि की शिल्पकला के विषय में आजकल गवेषणा करने पर महेञ्जोदारों तथा हरप्पा के भूगर्भ से निकली हुई प्राचीन भारतीय शिल्पकला के साथ तुलना करने पर न केवल दोनों में समानता ही है अपितु मिश्रदेश की अपेक्षा भी भारतीय कलाओं की श्रेष्ठता के कारण विद्वान् लोग मिश्र की अपेक्षा भी भारत को अधिक प्राचीन मानते हैं।
(ख) रोम देश की इटुस्कन (Etruscan) नामक प्राचीन जाति के धार्मिक विषय में सात तथा पांच पीढ़ियों में वैवाहिक संबन्ध के निषेध के विषय में 'बध्वा वरस्य वा तातः कूटस्थाद्यदि सप्तमः' इस प्राचीन स्मृतिनियम की समानता के मिलने से, प्राचीन रोम तथा ग्रीस देश के सम्प्रदायों में मिलने वाले लिङ्गपूजन, नन्दिपूजन, पितृश्राद्ध, अग्निशाला, अन्नहोम, गुरुकुलशिक्षाप्रणाली, जातसंस्कार, पुनर्जन्म तथा अध्यात्मवाद आदि में भारतीय विषयों का असाधारण रूप से प्रतिबिम्ब मिलने से तथा अंग्रेज जाति की पूर्व अवस्था रूप केल्ट (Celtic) जाति के धर्माचार्य रूप ड्रूइड (Druid) जाति के धार्मिक नियमों में बीस वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य धारण, अन्तिम अवस्था में वानप्रस्थप्रणाली, उच्चकुल में विद्यादान तथा आत्मा के अमरत्व इत्यादि विषयों में भारतीय धर्मच्छाया के मिलने से यह कहा जा सकता है कि भारतीय सभ्यता का सम्बन्ध न केवल अत्यन्त प्राचीन मूलशाखाओं में ही था अपितु उसके बाद विभक्त हुई उपजातियों तथा उपशाखाओं में भी मिलता है।


१. ब्रह्मा, विष्णु तथा महादेव की भारत में प्राचीन काल से ही उपासना की जाती रही है। देश एवं काल के अनुसार भिन्न-भिन्न देवताओं के उपासना में उत्पन्न हुए मतभेदों को दूर करने के लिये उमामहेश्वर, हरि (विष्णु) तथा हर (महादेव) जी की एकता के समान ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर के अभेद को प्रकट करने के लिये सम्मिलित रूप से इनकी त्रिमूर्ति की उपासना प्रचलित हुई। देवी पुराण (अ. ६०) में भी राजा दिलीप के द्वारा कामिकाचल पर त्रिमूर्ति की उपासना का उल्लेख मिलता है। ये अत्यन्त प्राचीन काल से प्रसिद्ध भारत के असाधारण देवता है। इसलिये महेञ्जोदारो में भी त्रिमूर्ति तथा शिव की मूर्ति का मिलना उचित ही है। इन मूर्तियों के साथ मिलने वाली स्त्रीमूर्ति भी भारतीयों द्वारा प्राचीन