भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २७९

के शिलालेखों में दिये हुए प्राचीन व्यावहारिक नियमों में मनु के नियमों की समानता दृष्टिगोचर होती है। सुमेरियन प्रदेश के नाम, वस्तु तथा लेखों में भारतीयता की समानता के विषय में श्री वैडेल¹ नामक पाश्चात्य विद्वान् ने भी बहुत कुछ लिखा है।

इस प्रकार दोनों देशों के राजाओं में जो आनुक्रमिक समानता मिलती है वह सुमेरियन् राजाओं का भारत पर शासन अथवा भारतीय राजाओं का सुमेरियन प्रदेश पर शासन का परिणाम हो सकता है अर्थात् ये दोनों बातें संभव हो सकती हैं। क्योंकि एक देश के राजाओं द्वारा दूसरे देश पर शासन करना सर्वथा संभव है।

सुर तथा असुरों के पारस्परिक प्राकृतिक विरोध को दृष्टि में रखते हुए ही पुराणों तथा ऋग्वेद में स्थान-स्थान पर असुरों का उल्लेख मिलता है। असीरियन् तथा बेबिलोनियन् जाति के प्रधान उपास्य देवता भी असुर तथा अहुर नाम से मिलते हैं। असीरियन शब्द भी प्राचीन भारतीयों द्वारा विशेषरूप से परिचित असुर शब्द से ही बना प्रतीत होता है।

आजकल श्री सिटान लायड तथा डाक्टर हेनरी फ्रोङ्कफोर्ड की अध्यक्षता में इराक देश के टयल अगर नामक स्थान में जो भूगर्भ का अन्वेषण हुआ है उसमें एक भग्नावशेष प्राचीन मन्दिर तथा उसके अन्दर के कमरे में अनेक महत्त्वपूर्ण प्राचीन वस्तुओं तथा महेञ्जोदारो की खुदाई में मिली हुई वस्तुओं से मिलती-जुलती कुछ वस्तुओं के मिलने से इराक देश की पांच हजार वर्ष प्राचीन सभ्यता में भारतीय सभ्यता का प्रभाव दिखाई देता है। तथा सर आरेलष्टीन के अन्वेषण में बलोचिस्तान तथा दक्षिण इरान में उपलब्ध प्राचीन वस्तुओं के कारण उनका यह भी मत है कि भारत तथा प्राचीन सुमेरिया (आजकल के इरान) का भी प्राचीन काल में परस्पर समान सभ्यता का संबन्ध था।

मैथिक² सोसायटी के लेख के अनुसार फिलस्तीन (Palestine) देश की भूगर्भ से मिली सभ्यता का अन्वेषण करने पर उस देश के समय-समय पर विभिन्न देशों द्वारा आक्रान्त होने के कारण उन-उन स्थानों में उन-उन देशों के पूर्व चिह्न मिलने पर भी एक स्थान पर महेञ्जोदारो की खुदाई में मिली हुई प्राचीन भारतीय सभ्यता के अनुरूप चिह्नों के मिलने से यह कहा जा सकता है कि वहां भारतीय सभ्यता का प्रकाश ही सर्वप्रथम पहुंचा था।

आजकल यातायात की व्यवस्था के अत्यन्त परिष्कृत होने पर भी मिर्जापुर आदि के सुन्दर मिट्टी के वर्तनों को समीप के शहर में भी ले जाने के लिये लोगों को बहुत अधिक सावधानी बरतनी पड़ती है। तब अत्यन्त घने, दुर्गम तथा कंकडीले और पथरीले प्रदेशों से घिरे हुए मिश्र, फिलस्तीन, इराक तथा भारत में परस्पर सुदृढ़ अलंकार आदि के लेजाने की सुविधा होने पर भी अत्यन्त नाजुक (Delicate) मिट्टी के बरतनों की भी कारीगरो में समानता देखकर यह कहा जा सकता है कि उनका परस्पर असाधारण परिचय था।

इतना ही नहीं अपितु पाश्चात्यों की प्राचीन शाखाओं तथा भारतीयों की प्राचीन परिस्थिति में मिलने वाले धार्मिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक आदि बहुत से विषयों में समानता के द्योतक सभ्यता के चिह्न ऐतिहासिकों³ के भिन्न-भिन्न लेखों के द्वारा अनेक स्थानों पर मिलते हैं।


१. आजकल वैडल (L. A. Waddell) नामक विद्वान् ने महेञ्जोदारो तथा हरप्पा के भूगर्भ से निकले हुए तथा मैसेपोटेमिया और सुमेरियन प्रदेश में मिले हुए मुद्राओं तथा इतिहास आदि का अनुसन्धान करके उन-उन देशों में मिले हुए मुद्रा आदि में एक दो व्यक्तियों के साथ भी प्राचीन भारतीय राजाओं की नामों में तथा कहीं-कहीं अक्षरों, संकेतों, वस्तुओं तथा शिल्पकला आदि में समानता देखकर उन्होंने दोनों देशों के प्राक्तन सम्बन्धों के विषय में ‘मेकर्स आफ सिविलिजेशन इन रेस एण्ड हिस्ट्री’ नामक पुस्तक में अपने विचार प्रकट किये हैं।
२. इसकी टि. उपो. संस्कृत पृ. १०२ देखें।
३. (क) मिश्रदेश के पूर्व सम्प्रदाय में अपरिवर्तनीय तथा कुलपरम्परागत पुरोहितता, सेनावृत्ति, शिल्पव्यापार तथा दासता

१९ का.सं.