काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 300, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| २८६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् |
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भारत के पारस्परिक घनिष्ठ सम्बन्ध में वहां भारतीय वैद्यों की भी उपस्थिति होने से वहां भारतीय वैद्यों का विशेषरूप से प्रभाव प्रतीत होता है। इरान देश की पर्शु भारतीय¹ (Pehlavi) भाषा में भिषज, भेषज तथा मन्त्र आदि शब्दों से सादृश्यता रखनेवाले क्रमशः वेषज (Baeshaza, Beshaj) भिजिष्क (Bejishka) तथा माथ्र आदि शब्द भी मिलते हैं। अर्मीनियन (Armenian) भाषा में भी इन शब्दों के समान ही शब्द (Bzhishk, Bzhshkel) मिलते हैं। ईरानी भाषा में भी वैद्यवाचक भिजिष्क शब्द तथा ओषधिवाचक वेषज शब्द भारतीय भिषग् तथा भेषज शब्दों के ही उच्चारण भेद से रूपान्तर हैं। इस अवस्था में अथर्ववेद तथा ऋग्वेद में आये हुए ये प्रधान शब्द भी यदि वहां भारत से ही पहुँचे हों तो भारतीय आयुर्वेद का प्रभाव इससे भी बहुत कुछ अनुमान किया² जा सकता है। पारसी मत के प्रवर्तक जरथुष्ट्र से भी प्राचीन उस देश की मागी जाति द्वारा भारतीय ब्राह्मणों से इस गुप्त वैद्यक विद्या को प्राप्त करने विषयक चतुर्थ शताब्दी के रोम के इतिहासलेखक, अमीनस् तथा सीनस् आदि के लेखों के मिलने से तथा इरान देश में अत्यन्त प्राचीन काल से ही भारतीय वैद्यक के स्पष्ट प्रभाव तथा भारतीय वैद्यों के वृत्तान्त मिलने से वहां भारतीय आयुर्वेद का प्रकाश चिरकाल से स्पष्ट प्रतीत होता है। आयुर्वेद के चरक तथा वृद्धजीवकीय आदि ग्रन्थों में बाह्लीकभिषक् के रूप में काङ्कायन का उल्लेख मिलता है। प्राचीन काल में बहुत देर तक इरान के आधिपत्य में आया हुआ बलख् देश बाह्लीक शब्द से कहलाता था। सुश्रुतसंहिता की व्याख्या में काङ्कायन को जो सुश्रुत का सतीर्थ्य कहा है उसे प्रामाणिक मानकर वहां दिये हुए 'बाह्लीकभिषजां वरः' द्वारा निर्दिष्ट काङ्कायन द्वारा बाह्लीक देश में प्रचलित वैद्यक विद्या भी भारतीय ही सिद्ध होती है। इसके अतिरिक्त भारतीय आचार्यों के साथ पक्ष प्रतिपक्ष रूप में संवाद करनेवाले काङ्कायन को आचार्यों के साथ सम्मान देने से निबन्ध संग्रह आदि ग्रन्थों में संस्कृत भाषा में लिखे हुए उसके वचनों का उल्लेख मिलने से उसका चिकित्सा सम्प्रदाय भी अन्यदेशीय न होकर भारतीय ही प्रतीत होता है। बुद्ध सामयिक जीवक के गुरु रूप में निर्दिष्ट आत्रेय तथा कश्यप द्वारा निर्दिष्ट बाह्लीकभिषक् काङ्कायन काक समय ग्रीक वैद्यों के सम्पर्क में आये हुए पूर्वोल्लिखित ईरानी राजाओं के समय से कम से कम भी एक दो शताब्दी पूर्व का मिलने से वहां भारतीयों का संबन्ध तथा प्रभाव प्राचीन ही सिद्ध होता है। यद्यपि निश्चयपूर्वक कुछ न कह सकने पर भी 'इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका' नामक³ बृहत्कोश में लिखा है कि इरान तथा भारत से कुछ वैद्यक विषय ग्रीसवैद्यक में गये हुए दिखाई देते हैं।
इस प्रकार अत्यन्त दूर-दूर देशों में शाखा तथा उपशाखारूप अनेक प्राचीन जातियों में भी न्यूनाधिक रूप से भारतीय प्राचीन व्यवहृतियों, अथर्ववेद के समान मान्त्रिक प्रयोग तथा औषधप्रयोग द्वारा चिकित्सा सम्प्रदाय के सूचक अनेक लक्षण मिलते हैं। अनावश्यक विस्तार के डर से इनका केवल संकेतमात्र ही किया है। इन उदाहरणों से भारत तथा अन्य देशों का प्राचीन काल में परिचय, सम्पर्क, व्यवहार तथा विद्याविज्ञान के परस्पर विनिमय का निश्चय होता है।
१. औषध, विरोपण (घाव भरना), औषधोपचार, वैद्य इन सबके लिये एक सामान्य शब्द बेशग् है। तुलना कीजिये— संस्कृत भिषज्-भेषज् : पहलवी में यह शब्द बेशज् रूप में मिलता है। इसीके अत्यधिक विकृत रूप आधुनिक फारसी का बेजिशक शब्द, आरमीनियन भाषा के बेजिश्क (वैद्य) बेज्शकेल (विरोपण-घाव भरना) है। By. L.C. Casartelli, E.R.E. Vol 4, P. 757.
२. प्राचीन इरान के प्रचलित चिकित्सा विज्ञान पर ग्रीकों का बिलकुल भी प्रभाव नहीं है। ईरानियों के अवेस्ता नामक ग्रन्थ में (Bhaesaj) शब्द प्रयुक्त हुआ है जो कि निश्चित रूप में गाथाओं की अपेक्षा ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में प्रयुक्त हुए भारतीय शब्द भेषज या भैषज्य से निकला हुआ प्रतीत होता है। इस शब्द का मूल इन्डो-यूरोपियन नहीं है तथा ग्रीक लोग भी इसे प्रयुक्त नहीं करते थे। इस शब्द का ईरानी भाषा में होना इस बात को प्रकट करता है कि ईरानियों ने चिकित्सा विज्ञान ग्रीकों से नहीं, अपितु हिन्दुस्तानियों से ग्रहण किया है। यदि हम यह मान भी लें कि अथर्ववेद तथा अवेस्ता एक ही काल के हैं तो भी यह निःसन्देह है कि ऋग्वेद इन दोनों से प्राचीन है तथा यह शब्द ऋग्वेद में भी पाया जाता है।
३. इसकी टि. सं. उपो. पृ. १०८ में देखें।