भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २८७

प्राचीन भारतयी सभ्यता के अन्य विषयों की तरह आयुर्वेद भी प्राचीन ही है। आध्यात्मिक विचारों तथा बाह्य कलाकौशल आदि में उन्नति के शिखर पर पहुँचा हुआ भारत सबसे मुख्य शरीरयात्रा के लिये उपयोगी चिकित्साविज्ञान में किस प्रकार उदासीन रह सकता था। आयुर्वेदीय संहिताओं में तो इस सृष्टि की उत्पत्ति के साथ ही ब्रह्मा से आयुर्वेद का उद्गम बतलाया गया है। अन्य विद्याओं की तरह वैद्यक विषय भी ऋक्, यजु, साम, तैत्तिरीय तथा अथर्ववेद में विशेषरूप से पाये जाते हैं।

वैदिक काल से ही आयुर्वेद का सन्मान होने से इसे उपवेद नाम दिया गया है। वैदिक काल में अन्य विद्याओं की तरह आयुर्वेद में भी बहुत से विचारशील तथा तत्त्वदर्शी ऋषि हुए हैं। उस समय सैकड़ों वैद्यों, हजारों ओषधियों, अनेक रोगों तथा उनके उपायों के होने का प्रतिपादन पहले ही किया जा चुका है। उसके बाद भी आधुनिक विचारों के अनुसार लगभग तीन हजार वर्ष प्राचीन माने जानेवाले ऐतरेय, शतपथ तथा कौषीतकि आदि ब्राह्मण ग्रन्थों में छान्दोग्य तथा गर्भोपनिषत् में श्रौत एवं गृह्यसूत्रों में और रामायण^१ महाभारत^२ तथा पुराण आदियों में भी अङ्ग-प्रत्यङ्ग, शारीरिक रोग, उसके परिहार के उपाय, ओषधि आदि आयुर्वेद के विषय, उनके इतिहास तथा उपाख्यान आदि का उल्लेख मिलता है। महाभारत^३ के युद्ध में भी स्थान-स्थान पर योद्धाओं के साथ वैद्यों का जाना, सब उपकरणों से युक्त तथा शास्त्रों में पारङ्गत अनेक चिकित्सकों का युद्धशिविरों में उपस्थित होना तथा उनके द्वारा आहत (घायल) रोगियों की चिकित्सा का उल्लेख मिलता है। मत्स्य^४ ने भी इस विषय का निर्देश किया है। रामायण में सुषेण वैद्य की कथा प्रसिद्ध ही है।

कौटिलीय अर्थशास्त्र के युद्ध^५ प्रकरण में शस्त्र, यन्त्र, अगद, स्नेह, वस्त्र तथा हस्तिचिकित्सक और स्त्रीचिकित्सक आदियों के भी सेना के पृष्ठ भाग में होने का निर्देश मिलता है। पुराण-इतिहास आदि में भी यह विषय पर्याप्त मिलता है।

महाभारत में आता है कि गालब ऋषि गुरुदक्षिणा में देने के लिये घोड़ों की प्राप्ति के लिये जब काशीराज दिवोदास के पास पहुंचा तो उसे हिमालय की तलहटी में वायव्यदिशा में मारीच कश्यप का आश्रम बतलाया गया। इस प्रकार दिवोदास के कुछ पूर्व अथवा उसके साथ ही आश्रम बनाकर रहने वाले मारीच कश्यप का उल्लेख, मारीच कश्यप का ऋक्सर्वानुक्रम सूत्र तथा बृहद्देवता में भी उल्लेख है, आत्रेय के समकालीन के रूप में मारीच कश्यप का उल्लेख, वार्योविद का मारीचकश्यप तथा आत्रेय पुनर्वसु के साथ सहभाव, कृष्णात्रेय तथा पुनर्वसु आत्रेय का समानाधिकरण (एक व्यक्तित्व), चिकित्साविज्ञान के प्रवर्तक के रूप में कृष्णात्रेय का महाभारत में निर्देश, आत्रेय के शिष्यरूप में भेड का उल्लेख, भेड के सहभावी तथा आत्रेय पुनर्वसु के शिष्य के रूप में गान्धार के राजा नग्नजित् का उल्लेख, नग्नजित् तथा दारुवाह का एक ही होना, दारुवाह का काश्यप संहिता में निर्देश, गान्धार के राजा नग्नजित् का ऐतरेय में तथा गान्धार के प्राणवित् नग्नजित् तथा उसके पुत्र स्वर्जित् का शतपथ ब्राह्मण में कीर्तन, दिवोदास का कौषीतकिब्राह्मण, कौषीतकि उपनिषत्, काठकसंहिता के ब्राह्मण अंश तथा महाभारत में उल्लेख तथा दिवोदास के पूर्वपुरुष के रूप में धन्वन्तरि का उल्लेख इत्यादि उदाहरणों को दृष्टि में रखकर विचार करने पर प्रतीत होता है कि मारीच कश्यप, पुनर्वसु आत्रेय, भेड, नग्नजित् दारुवाह तथा वार्योविद आदि चिकित्सा शास्त्र के आचार्य, ऐतरेय, कौषीतकि, शतपथ, काठक तथा अन्य ब्राह्मण ग्रन्थों से पूर्व तथा धन्वन्तरि और दिवोदास के समान ही ब्राह्मण ग्रन्थ तथा उपनिषदों के काल में थोड़े बहुत पौर्वापर्य सम्बन्ध के साथ विद्यमान थे, जैसा कि पहले भी निर्देश किया जा चुका है। आत्रेय तथा काश्यप आदि द्वारा भी बहुत से पूर्वाचार्यों के मत तथा नामों का निर्देश मिलता है। इन आत्रेय आदियों द्वारा संहिताओं के निर्माता होने पर भी पूर्वाचार्यों के विप्रकीर्ण विषय भी संगृहीत किये गये प्रतीत होते हैं।

इस प्रकार वैदिक काल से परम्परापूर्वक आया हुआ तथा क्रमशः विकास के द्वारा वृद्धि को प्राप्त हुआ चिकित्सा विज्ञान प्राचीन ग्रन्थों के लुप्त हो जाने के कारण यद्यपि आजकल उपलब्ध नहीं होता है तथापि उपलब्ध आत्रेय, सुश्रुत


१. १-३ की टि. सं. उपो. पृ. १०८-१०९ में देखें।
२. ४-५ की टि. सं. उपो. पृ. १०९ में देखें।