काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
तथा काश्यप आदि के ग्रन्थों में आये हुए विषयों को देखने से यह कहा जा सकता है कि उस समय वह विज्ञान अत्यन्त उन्नत अवस्था में था। कायचिकित्सा (Medicine) के विद्वान् आत्रेय, कश्यप तथा भेड आदि द्वारा भी शल्यक्रिया (Surgery) का निर्देश करने से ज्ञात होता है कि शल्यविद्या भी प्राचीन थी तथा उस समय पृथक् प्रस्थान (विज्ञान) के रूप में प्रसिद्ध थी। इन आत्रेय आदि द्वारा उल्लिखित शालाक्य आदि अन्य ६ विभागों के विषय में भी विचारपूर्ण एवं प्रौढ़ ग्रन्थ होंगे। कालवश ये ग्रन्थ भी लुप्त हो चुके हैं, यह भी खेद का विषय है।
आश्विन, भारद्वाज, जतूकर्ण, पराशर, हारीत, क्षारपाणि, भानुपुत्र, भोज १ तथा कपिलबल आदि आचार्यों के भूततन्त्र के मूल ग्रन्थों के आजकल न मिलने पर भी उनके वचन प्राचीन ताडपत्रीय ज्वरसमुच्चय में तथा इनके और इनके अतिरिक्त अन्य भी कुछ आचार्यों के वचन बाद के तन्त्रसार, चरक की व्याख्याओं तथा निबन्धग्रन्थों में उद्धृत मिलते हैं। इनसे स्पष्ट ज्ञात होता है कि उस समय तक भी उन आचार्यों के ग्रन्थ उपलब्ध थे तथा उनका परिशीलन भी किया जाता था।
प्राचीन आत्रेय, कश्यप आदि, काम्पिल्य तथा गङ्गाद्वार आदि में तथा भिन्न-भिन्न स्थानों में रहने वाले आचार्य उन-उन स्थानों पर अपने शिष्य सम्प्रदाय में उपदेश परम्परा द्वारा ही केवल अपने विचारों को प्रकट नहीं करते थे अपितु जिसप्रकार आजकल के वैद्य भिन्न-भिन्न संस्थाओं तथा विद्यापीठों के प्रतिनिधि रूप में भिन्न-भिन्न संस्थाओं तथा विद्यापीठों के प्रतिनिधि रूप में भिन्न-भिन्न स्थानों में एकत्र होकर उसे सम्मेलन का रूप देकर उनमें नवीन एवं प्राचीन विषयों के सम्बन्ध में विचार करते हैं उसी प्रकार प्राचीन काल में भी समय-समय पर भिन्न-भिन्न देशों के तत्कालीन विद्वान् एवं प्रसिद्ध आचार्य भिन्न-भिन्न २ स्थानों में एकत्र हो कर तथा परिषत् की स्थापना करके परस्पर विचार विमर्श किया करते थे। इस प्रकार विमर्श के बाद कसौटी पर कसे हुए उज्ज्वल रत्नों के समान वे सिद्धान्त, नवीन-नवीन विचार तथा उनके अभिप्राय आदि उनकी संहिताओं में स्थान पाते थे।
पाणिनि द्वारा भी 'गर्गादिभ्यो यञ्' (४-१-१०५) सूत्र के गर्गादि गण में जतूकर्ण, पराशर, अग्निवेश आदि शब्दों का उल्लेख किया होने से, 'कथादिभ्यष्ठक्' (४-४-२) सूत्र के कथादि गण में आयुर्वेद शब्द से 'साधु' अर्थ में 'आयुर्वेदिक' पद को सिद्ध किया होने से प्रतीत होता है कि उस समय भी आयुर्वेद विद्या उन्नत अवस्था में थी तथा उस विद्या के कुशल विद्वान् भी बहुत से थे। 'मन्त्रायुर्वेद प्रामाण्यवच्चतत्प्रामाण्यमाप्तप्रामाण्यात्' । (२-१-६७) इस सूत्र द्वारा सूत्रकार गौतम ने जिस प्रकार उन-उन ओषधियों के उपयोग तथा उपदेश के अनुसार उन-उन रोगों की निवृत्ति से आयुर्वेद तथा विषभूत अशनि (बिजली) के प्रतिषेध के लिये मन्त्रों के फलों को देखकर उनकी प्रामाणिकता को स्वीकार किया है उसी प्रकार सब वेदनाओं के लिये आयुर्वेद को प्रामाणिक मानकर उसकी व्यवस्था करने से इन प्राचीन आचार्यों के समय भी आयुर्वेद विद्या का प्रचार, उसका सन्मान तथा प्रामाणिकता ज्ञात होती है। न्यायमञ्जरी ३ के रचयिता जयन्तभट्ट ने भी इस विषय में बहुत कुछ लिखा है।
महावग्ग आदि पालीग्रन्थों में कालाञ्जन, रसाञ्जन, स्रोतोञ्जन तथा गैरिक आदि ओषधियों, भगन्दर आदि रोगों, त्रिदोष, स्वेदन, बस्तिकर्म आदि बहुत से भारतीय आयुर्वेदिक विषयों के उन्हीं शब्दों में मिलने से तथा जीवक के चिकित्सा वृत्तान्त से बुद्ध के समय (६०० ईस्वी पूर्व) भी आयुर्वेद का प्रचार स्पष्ट प्रकट होता है।
१. यह भोज धारानगरी का राजा नहीं है अपितु सुश्रुत का समकालीन प्राचीन आचार्य है।
२. हिमालय के पार्श्व, चैत्ररथ वन, जनपद मण्डल, पाञ्चाल क्षेत्र, काम्पिल्य की राजधानी तथा पञ्चगङ्गा नामक स्थानों पर आयुर्वेदीय विषयों पर विचार करने के लिये महर्षियों के एकत्र होने का चरक संहिता में स्थान-स्थान पर उल्लेख मिलता है। विमानस्थान में परिषदों का निर्देश भी है। काश्यपसंहिता में भी जातिसूत्रीय अध्याय में 'इति परिषद् (पृ. ७९) भूयांस (पृ. १५२) इत्यादि द्वारा परिषत् तथा विद्वानों के समवाय का उल्लेख मिलता है।
३. इसकी टि. सं. उपो. पृ. ११० में देखें।