भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद

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महावग्ग में आये हुए जीवक के चरित्र का अनुसन्धान करने पर गुरु द्वारा ओषधियों की आलोचना करने के लिये नियुक्त किये गये जीवक द्वारा एक भी अनुपयोगी अषोधि के प्राप्त न कर सकने के उल्लेख तथा भेषज प्रयोग द्वारा अनेक तीव्र रोगों की चिकित्सा का इतिवृत्त मिलने से उसका कायचिकित्सा में तथा अन्त्रभेदन कपालभेदन आदि द्वारा चिकित्सा का उल्लेख मिलने से शल्यक्रिया में भी इसके असाधारण ज्ञान का परिचय मिलता है। महावग्ग, तिब्बतीय कथाओं तथा जातकों में उसके द्वारा बुद्ध तथा तत्कालीन राजाओं की चिकित्सा का निर्देश होने से उसका बुद्ध सामयिक होना तथा उन्हीं लेखों के अनुसार उसका तक्षशिला में अध्ययन का भी निश्चय होता है। परन्तु महावग के अनुसार उसका किसी प्रसिद्ध आचार्य द्वारा ही विद्याध्ययन का उल्लेख मिलता है। कुछ लोग कहते हैं कि तिब्बतीय गाथाओं (Tibetan Tales P. 94) के अनुसार आत्रेय द्वारा उसका विद्याध्ययन मिलता है। इस प्रकार वास्तविकता का निश्चय न कर सकने के कारण यह नहीं कहा जा सकता कि यह आत्रेय ही चरक संहिता का मूल आचार्य पुनर्वसु आत्रेय है। चरकसंहिता के अनुसार भी उस समय पुनर्वसु आत्रेय, भिक्षुरात्रेय तथा कृष्णात्रेय आदि तीन पृथक् आत्रेयों का वैद्यक विद्या के आचार्य के रूप में ज्ञान होता है। वस्तुतः आत्रेय केवल गोत्रनाम ही है। उस गोत्र में उत्पन्न हुए अनेक व्यक्ति पूर्वापर सम्बन्ध से आत्रेय नाम से कहे जा सकते हैं। जीवक के आचार्यरूप में मिलने वाला आत्रेय इनमें कौनसा है, इसका निश्चय न होने से केवल आत्रेय शब्द की समानता से इस पुनर्वसु आत्रेय को ही जीवक का गुरु कहना कठिन है। आत्रेय द्वारा त्रिस्त्रेषणीयाध्याय में तीन प्रकार की ओषधियों के वर्णन में 'शस्त्रप्रणिधानं पुनश्छेदनभेदनव्यधनदारणलेखनोत्पाटनप्रच्छन्नसीवनैषण-क्षारजलौकसश्च' (पृ. ५७८) द्वारा शल्यचिकित्सा का केवल नाममात्र उल्लेख किया है तथा वह भी उस अध्याय के विषय के अन्त में कृष्णात्रेय के नाम से दिये होने से कृष्णात्रेय का ही मत प्रतीत होता है। काश्यपसंहिता में 'परतन्त्रस्य समयम्' द्वारा शल्यविद्या का परतन्त्र के रूप में उल्लेख होने के समान आत्रेय ने भी 'धान्वन्तरीयाणाम्' तथा 'एके' इत्यादि शब्दों द्वारा धन्वन्तरि सम्प्रदाय का निर्देश किया है। चिकित्सा स्थान के द्विव्रणीय अध्याय में शल्यविद्या द्वारा उपचारों का भी निर्देश है। परन्तु वह निर्देश पीछे से दृढ़बल द्वारा पूरित अंश में ही मिलता है। टीकाकारों के विभिन्न मतों के द्वारा उस अंश के आत्रेय अथवा अग्निवेशीय होने का संवाद मिलने पर भी उसी अध्याय में 'इति षड्विधमुद्दिष्टं शस्त्रकर्ममनीषिभिः' (श्लोक ६१) तथा 'तेषां चिकित्सा निर्दिष्टा यथास्वं स्वे चिकित्सिते' (श्लोक ११९) इत्यादि वचनों के मिलने से इसका प्रस्थानान्तरीय तथा परकीय सम्प्रदाय के रूप में निर्देश किया गया है। उससे पूर्व अर्शचिकित्सा के प्रकरण अ. १२) में उपचारार्थक नाना प्रकार की ओषधियों का प्रथम निर्देश करके निम्न श्लोक द्वारा शस्त्र क्षार तथा दाह (Canterisation) प्रक्रिया को दूसरे आचार्यों के मत के रूप में दिया है तथा अल्प ज्ञान के कारण हानि की सम्भावना होने से पूर्णज्ञान की आवश्यकता दिखलाकर इस विषय में आत्रेयाचार्य ने अपने को तटस्थ ही रखा है—

तत्राहुरेके शस्त्रेण कर्तनं हितमर्शसाम् । दाहं क्षारेण चाप्येके दाहमेके तथाग्निना ।।
अस्येतद्भूरितन्त्रेण धीमता दृष्टकर्मणा । क्रियते त्रिविधं कर्म भ्रंशस्तत्र सुदारुणः ।।
(चि. अ. १२ श्लोक ३३)

सुश्रुतसंहिता में आठों प्रस्थानों में से किस विषय में उपदेश करूं, दिवोदास की इस उक्ति के समान आत्रेय पुनर्वसु की इस प्रकार की किसी उक्ति के न मिलने से, आत्रेयसंहिता में विषतन्त्र आदि अन्य विषयों का प्रवेश होने पर भी शल्यविद्या के विषय में उपदेश न मिलने से, आत्रेय के छओं शिष्यों के कायचिकित्सा विषयक ग्रन्थों के ही निर्माण करने से, तथा शल्यचिकित्सा के विषय में उसके किसी भी शिष्य का उल्लेख न मिलने से आजकल कायचिकित्सा तथा शस्त्रचिकित्सा में असाधारण योग्यता वाले चिकित्सकों (Physician and Surgeons) की पृथक् प्रसिद्धि के समान उस समय पुनर्वसु आत्रेय के कायचिकित्सा के विषय में ही असाधारण पाण्डित्य तथा आचार्यभाव की प्रतीति होती है। महावग्ग में निर्दिष्ट जीवक की तो कायचिकित्सा के समान शस्त्रचिकित्सा में भी असाधारण विद्वत्ता का परिचय मिलता है। यदि यह जीवक पुनर्वसु आत्रेय का शिष्य होता तो उस आत्रेय के अग्निवेश आदि अन्य छओं शिष्यों द्वारा इस