भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 304

२९० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

असाधारण योग्यता वाले अपने सहपाठी का नामोल्लेख अवश्य होना चाहिये था। आत्रेय पुनर्वसु से पूर्व अत्रि परम्परा वाले किसी अन्य आत्रेय का जीवक शिष्य हो, यह कल्पना भी नहीं की जा सकती। क्योंकि उस अवस्था में चरकसंहिता के उपक्रम तथा मध्य में जहा प्राचीन एवं प्रसिद्ध आयुर्वेदाचार्यों का निर्देश किया है वह इतने प्रसिद्ध तथा आयुर्वेद के विद्वान् जीवक का नाम क्यों नहीं दिया गया है। यदि आत्रेय पुनर्वसु को बुद्धकालीन जीवक के गुरु आत्रेय से भी अर्वाचीन माना जाय तो वायोर्विद, वामक आदि काशीनरेश तथा वैदेह निमि के समकालीन वर्णन करते हुए आत्रेय पुनर्वसु ने जातक के अनुसार वैद्यक का अध्ययन करनेवाले काशीपति ब्रह्मदत्त के नाम का भी उल्लेख क्यों नहीं किया है? उसके समकालीन कश्यप ने भी इसका नाम क्यों नहीं दिया? अग्निवेश के आचार्य आत्रेय का आत्रेय पुनर्वसु तथा काम्पिल्य निवासी के रूप में निर्देश मिलता है। बुद्धसामयिक जीवक के आचार्य आत्रेय का तक्षशिला में निर्देश मिलता है। काम्पिल्य वैदिककाल से प्रसिद्ध है तथा तक्षशिला की प्रसिद्धि तो पीछे हुई है, जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है। यदि आत्रेय पुनर्वसु को अर्वाचीन माना जाय तो इतने प्रसिद्ध तक्षशिला तथा पाटलिपुत्र का उसने निर्देश क्यों नहीं किया। इस प्रकार आत्रेय पुनर्वसु का काल अर्वाचीन नहीं हो सकता है। संभवतः इसके बाद तक्षशिला में वसिष्ठ आदि शब्दों की तरह आत्रेय गोत्रवाला कायचिकित्सा तथा शल्यचिकित्सा दोनों का विद्वान् कोई अन्य ही व्यक्ति हो। उसी आत्रेय से ही बुद्धकालीन जीवक ने संभवतः विद्याध्ययन किया हो। इसलिये केवल आत्रेय शब्द मात्र को ही लेकर आत्रेय पुनर्वसु को जीवक का गुरु सिद्ध करना उचित नहीं है। इन सब बातों का पहले भी निर्देश किया गया है। वृद्धजीवक तथा जीवक नाम से पृथक्-पृथक् प्रसिद्धि होना भी दोनों के भेद तथा पूर्वापर भावको प्रकट करता है। इस प्रकार सब बातों पर विचार करने पर तिब्बतीय गाथाओं में निर्दिष्ट आत्रेय भी पुनर्वसु आत्रेय से भिन्न तथा पश्चात् का प्रतीत होता है।

यदि पूर्वोक्त विवरण के आधार पर इस तन्त्र के आचार्य वृद्धजीवक और महावग्ग आदि बौद्ध ग्रन्थों में निर्दिष्ट प्रसिद्ध वैद्य जीवक के जन्मस्थान, गुरुकुल (शिक्षास्थान) तथा चिकित्सा के इतिवृत्तों में परस्पर विपरीत संवादों के मिलने पर भी विशेष दृष्टियों से लिखे गये इतिहासों में जो इससे विपरीत उल्लेख मिलता है वह संभवतः प्रमेय अंश मात्र को लेकर ही लिखा गया है। महावग्ग में उसके पूर्व चरित्र के अनुसार उसका कुमारभृत्य नाम उचित होने पर भी कुमारभच्चो इस विशेषण से तथा राजकुमार अभय द्वारा पालन किये जाने का निर्देश होने से उसकी सङ्गति नहीं बैठती। पालीग्रन्थों के अनुसार उसका कौमारभृत्य के ज्ञाता के रूप में ही निर्देश है। पूर्व सम्प्रदायों के अनुसार कुमारभृत्य शब्द से बालचिकित्सा का ही बोध होता है। कालिदास¹ ने भी इसी अर्थ में इस शब्द का प्रयोग किया है। इतने प्रसिद्ध उस वैद्य का बालचिकित्सा का उल्लेख न होने पर भी, उस विषय में ज्ञान हो सकता है। प्राचीन इतिहासों में कहीं-कहीं नैसगिक विषयों के उपस्थित होने पर किसी दैवीय शक्ति अथवा किसी कौतुक (Misrcle) का स्थान-स्थान पर उल्लेख मिलता है। इसका अर्न्तदृष्टि से मनन करने पर वह रहस्य किसी दूसरे रूप में प्रतीत होता है। इस ग्रन्थ में निर्दिष्ट पांच वर्ष वाले जीवक के गङ्गा के कुण्ड में डुबकी लगाकर क्षणभर में वलिपुलित (झुर्रियों एवं सफेद बालों से) युक्त होकर वृद्धभावको प्राप्त करने में कुछ कौतुक है। बौद्ध ग्रन्थोक्त जीवक का भी उत्पत्ति संबन्धी बालवृत्तान्त असाधारण है। इस प्रकार दोनों में कुछ बालरहस्य विद्यमान है। पञ्चनद, गान्धार आदि पश्चिम विभाग में अनेक आचार्यों द्वारा वैद्यक विद्या की की वृद्धि, वैद्यक के ग्रन्थों के बनाने वालों के आचार्य के रूप में आत्रेय का उल्लेख तथा महावग्ग में आत्रेय के नाम का उल्लेख न होने पर भी तिब्बतीय गाथाओं में तक्षशिला में जीवक का आत्रेय द्वारा वैद्यविद्या के ग्रहण का उल्लेख मिलता है। चरकसंहिता में आत्रेय द्वारा मारिचि कश्यप का उल्लेख होने पर भी प्रसिद्ध जीवक का उल्लेख न होने से संहिताकार मारीचकश्यप की अपेक्षा जीवक बाद का प्रतीत होता है। वृद्धजीवकीय ग्रन्थ में प्राचीन कश्यप के साथ जीव के प्रश्नों तथा प्रतिप्रश्नों का निर्देश भी अपने ग्रन्थ की मौलिकता का प्रदर्शन करने के अभिप्राय से ही प्रतीत होती है। इस अवस्था में उसकी लेखनी द्वारा भी उस समय के उत्सर्पिणी, अवसर्पिणी, निर्ग्रन्थ आदि लोकप्रसिद्ध शब्दों का प्रवेश संभव है। इस प्रकार


१. इसकी टि. संस्कृत उपो. पृ. १११ में देखें।

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