काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २९१
स्थालीपुलाक न्याय¹ से नाम तथा देश की समानता मात्र से जबरदस्ती इस आत्रेय को भी वही माना जाय तथा वृद्धजीवक को भी बौद्ध ग्रन्थोक्त जीवक ही माना जाय तो भी आत्रेय तथा जीवक का समय बुद्धकालीन सिद्ध होता है, न कि उसके बाद का इस प्रकार भी ये २६०० वर्ष से अर्वाचीन सिद्ध नहीं होते हैं।
बुद्ध सामयिक जीवक भी शल्यप्रक्रिया तथा अनेक प्रकार के असाधारण औषधप्रयोगों से प्रसिद्धि पाने के कारण उस समय दोनों प्रस्थानों में (शल्य तथा कायचिकित्सा विभाग) विशेषरूप से प्रसिद्ध था। उस समय अच्छे गुरुओं के कारण अध्ययन तथा अध्यापन की प्रणाली गौरवयुक्त होने के कारण अन्य भी सैकड़ों व्यक्तियों के आयुर्वेद के विज्ञान कायचिकित्सा तथा शास्त्रचिकित्सा दोनों में पूर्ण यौवन पर पहुंचा हुआ था।
आत्रेय के शिष्यरूप में उल्लेख होने से जीवक ने, उसके वर्णन में आये हुए उसके क्रिया कौशल तथा उसके परिणामों को दृष्टि में रखते हुए प्रतीत होता है कि कायचिकित्सा के ज्ञान के लिये चरकसंहिता की प्राचीन अप्रतिसंस्कृत अवस्थावाली आत्रेयसंहिता का तथा शल्यप्रस्थान के ज्ञान के लिये आत्रेयसंहिता में भी सम्मानपूर्वक धन्वन्तरि का उल्लेख होने से प्राचीनकाल में असाधारण रूप से प्रसिद्ध सुश्रुतसंहिता अथवा उसकी पूर्व अवस्थारूप धन्वन्तरि संहिता का ही अध्ययन किया था। यह जीवक वही हो, चाहे दूसरा हो, उसने बालतन्त्र के ज्ञान के लिये भी उस समय प्रसिद्ध काश्यपसंहिता का ही अध्ययन किया प्रतीत होता है। इनके साथ ही उससमय परम्परागत आश्विन, भारद्वाज आदि की उपलब्ध संहिताओं को भी उसने विशेषज्ञान के लिये संभवतः देख लिया हो। उस समय उपस्थित इन आर्ष ग्रन्थों की और प्राचीन काल में प्रसिद्ध तथा इतिहास में भी मिलने वाले आत्रेय आदि आचार्यों को छोड़कर अनुपस्थित विदेशी आचार्यों द्वारा अध्ययन की कल्पना करना सगत प्रतीत नहीं होता। यदि ऐसा होता तो आत्रेय का उल्लेख करनेवाले तिब्बतीय गाथाओं तथा जातक आदि ग्रन्थों में इस आशय का निर्देश भी अवश्य होता।
प्राचीन काल से ही भिन्न-भिन्न विद्याओं के सम्प्रदायों द्वारा उन्नत भारतीय पश्चिम विभाग में तक्षशिला के आसपास का प्रदेश बुद्धकाल से पूर्व पाणिनि, व्याडि सदृश अन्य भी सैकड़ों वेद वेदाङ्गों तथा आयुर्वेद के पण्डितों द्वारा प्रतिष्ठित था। इस विषय में राइस डेविड नामक विद्वान् का मत भारती नामक मासिक पत्रिका (वर्ष ४८ पृ. ७०४) में दिया हुआ है कि तक्षशिला विश्वविद्यालय में आयुर्वेद, धनुर्वेद गान्धर्व विद्या, अर्थशास्त्र, रसायन, धर्मशास्त्र आदि बहुत सी विद्याओं का अध्ययन तथा अध्यापन होता था। आयुर्वेद शास्त्र का विशेष रूप से अध्ययन होता था। उस विश्वविद्यालय में बेबिलोनियन, मिशर, फिनिशियन, सीरियन, अरब तथा चीन देश के भी बहुत से पण्डित वैद्यक की शिक्षा के सबन्ध में एकत्रित होते थे। इस प्रकार तक्षशिला की महिमा का वर्णन किया है। किन्तु उपर्युक्त वर्णन करते हुए उसने जे यह लिखा है कि उस समय ग्रीक लोग भी आयुर्वेद की चिकित्सा के लिये तक्षशिला में आते थे तथा वहीं जाकर जीवक ने भी आयुर्वेद शास्त्र का अध्ययन किया था। यह संभवतः बाद में बौद्ध काल के प्रसार के समय को दृष्टि में रखते हुए लिखा गया है। जातक ग्रन्थों में भी तक्षशिला विश्वविद्यालय में भारत के भिन्न-भिन्न प्रदेशों से आये हुए विद्यार्थियों का भारतीय अध्यायों द्वारा भारतीय पूर्व-सम्प्रदाय के स्मृति, आयुर्वेद, धनुर्वेद, अर्थशास्त्र आदि ग्रन्थों के ही अध्ययन का उल्लेख मिलता है। आत्रेय द्वारा जीवक के अध्ययन का काल प्राचीन है। इस प्रकार जीवक के अध्ययन संबन्धी विषयों तथा बाद के बौद्ध सामयिक विषयों को परस्पर एक सूत्र में मिला देने से भ्रम उत्पन्न हो गया है। महावग्ग में निर्दिष्ट जीवक के अध्ययन के समय मगध में भी बौद्ध धर्म की प्रारंभिक अवस्था उत्पन्न हो गई थी। बुद्ध के इतिवृत्त के द्वारा
१. स्थालीपुलाकन्याय—हाडी में एक चावल को पका हुआ देखकर शेष के पकने का भी जिस प्रकार अनुमान कर लिया जाता है उसी प्रकार किसी वस्तु के एक अंश को देखकर जब शेष का अनुमान कर लिया जाता है तब यह व्यवहृत होता है। (अनुवादक)