भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 306
२९२काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

भी उस समय मगध, साकेत, कपिलवस्तु आदि आसपास के प्रदेशों में ही उसके प्रभाव की प्रतीति होती है। मज्झभुनिकाय आदि पालीत्रिपिटक ग्रन्थों का अनुसन्धान करने पर यमुना के पश्चिम विभाग में बुद्ध के जाने तथा उसके धर्मप्रचार का उल्लेख नहीं मिलता है। तक्षशिला के वर्णन करने वाले महावग्ग में भी उस प्रदेश में बौद्धधर्म के प्रभाव का निर्देश नहीं है। अलेक्जेण्डर (सिकन्दर ३२६ ईस्वी पूर्व) के आगमन के समय भी अन्य किसी राजा द्वारा अधिष्ठित तक्षशिला में बौद्धधर्म का प्रभाव प्रतीत नहीं होता है। बाद में अशोक के समय (ईस्वी पूर्व २६२ से २३२) अथवा मिलिन्दर द्वारा बौद्धधर्म के ग्रहण के बाद बौद्धधर्म का प्रचार होने से तक्षशिला विश्वविद्यालय में भी उसका प्रभाव आ सकता है। यदि ग्रीक वैद्यों का वहां आना हुआ हो तो वह बाद में बौद्धधर्म के प्रचार के समय ही संभव हो सकता है। बुद्ध सामयिक जीवक के अध्ययन के समय तो ग्रीक वैद्यक के पिता हिपोक्रिटस (Hippocrates) का जन्म भी नहीं हुआ था इसलिये उसका आना संभव ही नहीं है। तथा न उसके बाद के अन्य लोगों का वहां अध्यापक होना संभव है। उस समय ग्रीक वैद्यक के अध्ययन के लिये भारतीयों का उनके देश में जाने का तथा यहां भारत में आकर भारतीय वैद्यक में प्रवीण होकर किसी ग्रीक वैद्य का भारत में अध्यापक होने का वर्णन भारत तथा ग्रीक किसी भी देश के इतिहास में नहीं मिलता है। भारत में राजदूत बनकर आये हुए स्वयं वैद्य मेगस्थनीज (Megasthenes) द्वारा भी ग्रीक वैद्यों का भारत में अध्यापक होने तथा प्रभाव का उल्लेख नहीं किया गया है अपितु इसके विपरीत चन्द्रगुप्त के राज्य में रहने वाले विदेशियों की चिकित्सा भी ¹भारतीय वैद्यों द्वारा किये जाने का उल्लेख किया है। इस प्रकार स्पष्ट प्रतीत होता है कि भारत में चिकित्सा विज्ञान भारतीयों के ही हाथ में था। इसमें विदेशियों का नाम मात्र भी प्रभाव नहीं था।

हिपोक्रिटस संबन्धी विचार

पाश्चात्य ग्रीक वैद्यक में प्रधान आचार्य के रूप में हिपोक्रिटस का निर्देश मिलता है। उसका जन्म कास² (cos) नामक स्थान में ४६० ईस्वी पूर्व अथवा दूसरे मत से ४५० ईस्वी पूर्व में हुआ था। इसने अपने पिता (Heraclides) तथा (Herodicus) से विद्याग्रहण की थी। विद्याध्ययन के लिये दूर विदेशों में भी वह गया था। ८५ से ११० वर्ष की अवस्था में उसके जीवन काल के विषय में अनेक मतभेद दिखाई देते हैं। ³प्लेटो (Plato ई. पू. ४२८-३४८) नामक विद्वान् ने हिपोक्रिटस के भैषज्य विद्या के अध्यापन की वृत्ति का उल्लेख प्रोटागोरस (Protagorus) ग्रन्थ तथा दर्शन विषय फेड्रस (Phaedrus) ग्रन्थ में दो बार किया है। टिमियस (Timaeus) नामक इन्द्रियविज्ञान विषयक ग्रन्थ


१. विदेशियों के लिये भी ऐसे भारतीय अधिकारियों की नियुक्ति की जाती थी जिनकी ड्यूटी पर देखना होता था कि कोई विदेशी बीमार न हो जाय। यदि उनमें से कोई बीमार हो जाता था तो वे अधिकारी उसकी चिकित्सा के लिये चिकित्सक को भेज देते थे तथा अन्य प्रकार से भी उसकी देखभाल करते थे।
(M'crindlis Megasthenes and Arrian P. 42)
२. Suidas, (सुइदास), Tzetzes (जोलजस) तथा Soranus (सोरानस्) लेखकों द्वारा लिखित हिपोक्रिटस के प्राचीन जीवन चरित्रों से ज्ञात होता है कि हिपोक्रिटस कास (cos) नामक स्थान में ४६० ईस्वी पूर्व में उत्पन्न हुआ था।
(Hippocrates Vol I P. XLII)
३. पूर्व ग्रन्थ (Protagorus) से हमें ज्ञात होता है कि हिपोक्रिटस (Cos) देश का रहने वाला एवं (Asclepiad) था तथा उसका व्यवसाय चिकित्सा शास्त्र के विद्यार्थियों को पढ़ाना था। इस ग्रन्थ (Protagorus) से हमें इसके अतिरिक्त कुछ विशेष ज्ञात नहीं होता कि वह हिपोक्रिटस फीस (शुल्क) लेकर विद्यार्थियों को पढ़ाता था।
(Plato's Protagorus 311 B. C.)
(Hippocrates Vol I P. XXXIII)
(See also Plato's Phaedrus. Ibid Vol I P. XLIII)