भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २९३

में उसने इसके नाम का उल्लेख नहीं किया है। अपने नैतिक ग्रन्थ में अरिष्टाटल १ (Aristotle ई. पू. ३८४-३२२) नामक विद्वान् ने इसके नाम का केवल एक बार ही उल्लेख किया है। इसके द्वारा हिपोक्रिटस के भेषज्यविद्या के अध्यापन की वृत्ति करने का समर्थन होता है। ग्रीक इतिहास लेखक हिरोडोटस (Herodotus ई. पू. ४८४-४२५) द्वारा पाथागोरस आदि विद्वानों का उल्लेख किया जाने पर भी अपनी पिछली अवस्था में विद्यमान हिपोक्रिटस का वर्णन न करने से प्रतीत होता है कि उस समय तक इसकी इतनी प्रसिद्धि नहीं थी। कास नामक स्थान के पूर्व इतिहास के अन्वेषक २हरजोग (Herzog) नामक विद्वान् को भी कास के बहुत से लेखों में भी इसके विषय में कुछ विशेष उपलब्ध नहीं हुआ है। अन्य प्राचीन ग्रन्थों में भी इसके विषय में विशेष निर्देश नहीं मिलता है।

Galen ३ (C. ई. प. १३०-२००) का मत है कि ईस्वी पूर्व ४२७ से ४०० समय से पहले ही इसने अपने ग्रन्थ का संपादन किया था। तथा Littre ४ का मत ईस्वी पूर्व ४३० से ४२० तक का है। छान्दोग्य, व्याकरण तथा लेखशैली का अनुसन्धान करने पर किसी ५ का मत है कि अलेक्जेण्डर के बाद ईस्वी पूर्व ३०० वर्ष में हिपोक्रिटस के ग्रन्थ की रचना हुई थी। उसके नाम से बहुत से ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं। इसमें परस्पर विरोध तथा लेखशैली की भिन्नता दिखाई देने से ६थ्रेमर (E Thramer) का मत है कि ये सब ग्रन्थ हिपोक्रिटस के ही हैं-यह पूर्ण विश्वास के साथ नहीं कहा जा सकता। ७ड्रेपर (Draper) का मत है कि इन ग्रन्थों में कुछ हिपोक्रिटस के होने पर भी सब उसके नहीं हैं अपितु बहुत से ग्रन्थ उसके किसी वंशवाले, उसके शिष्य अथवा उसके किसी अनुयायी द्वारा लिखे गये प्रतीत होते हैं। पी. सी. राय तथा अन्य भी विद्वानों की ऐसी ही राय है। हिपोक्रिटस से प्राचीन डेमोकेडिस ८के ग्रन्थों का भी हिपोक्रिटस


१. अरिष्टाटल के ग्रन्थों से हमें ज्ञात होता है कि हिपोक्रिटस पहले से ही महान् हिपोक्रिटस (The Great Hippocretes) कहलाता था। (Ibid Vol I P. XLIV)
२. कास (cos) में किये गये Herozog के अथक अन्वेषणों से भी हिपोक्रिटस के विषय में किसी तथ्य का ज्ञान नहीं होता है। (E. R. E. Vol VI P. 544. E. Thramer.)
३. ग्रन्थों की शैली कई बार उसके काल निर्णय का अभ्रान्त साधन होती हैं, कई बार नहीं भी होती है। अलंकार शास्त्र का वशवर्ती होना इसी प्रकार की पहचान है। यह जिन ग्रन्थों में पाया जाता है वे प्रायः ४२७ ई. पू. से पुराने नहीं होते और न ४०० ई. पू. पीछे के होते हैं क्योंकि इसी समय से एटिक व्याख्याताओं के प्रभाव से इस शैली में परिवर्तन प्रारम्भ हो गया था। (Hippocrates vol I Introduction PXXXII)
४. इन सब प्रमाणों से उसका काल ४३०-४२० ई. पू. ठहरता है और यह सिद्ध होता है कि लेखक या तो स्वय हिपोक्रेटस था या उसी वैद्यकप्रस्थान (School) का अनुयायी और उसका समकालीन दूसरा ही कोई योग्य विद्वान् था। (Hippocrates Vol I P. V.)
५. कुछ अंशों में व्याकरण और शब्दरचना सबसे अधिक निश्चित प्रमाण हैं। यदि निषेधवाची Un उपसर्ग के स्थान पर On. का प्रयोग हो तो यह निश्चित रूप से उत्तर सिकन्दरिया (जिसका संस्थापक सिकन्दर महान् था) काल का निश्चित चिह्न है। ३०० ई. पू. के. परवर्ती लेखों की एक अन्य सूक्ष्म विशेषता अस्वाभाविक शब्दाडम्बर और अभिव्यक्ति की वक्रता है जो उतनी ही असंदिग्ध है जितनी कि यह अनुभवातीत है। हिपोक्रिटस की कुछ रचनाएं यह विशेषता स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करती हैं। (Hippocrates Vol I Introduction P. 32).
६. Corpus Hippokr में लगभग ७० से अधिक लेख हैं परन्तु उनमें से किसी को भी पूर्णनिश्चय के साथ हिपोक्रिटस का नहीं कहा जा सकता। तथा उनमें से कुछ तो निश्चित ही हिपोक्रिटस के नहीं है। (E. R. E. Vol VI P. 543. E. Thramer)
७. उन ग्रन्थों में से बहुत से निःसन्देह उसके परिवार के किसी व्यक्ति अनुयायियों अथवा शिष्यों द्वारा लिखे गये हैं-जो कि उसकी रचना माने जाते हैं। (Draper-P. C. Ray. History of Hindu Chemistry Vol I P. XVIII)
८. परन्तु हिपोक्रिटस के जन्म से पूर्व ही डेमोकेडिस नामक विद्वान् की मृत्यु हो चुकी थी जिसके समय में बहुत से मुख्य लेख तैयार हुए थे जिनका कि यहां अनुवाद किया गया था। (Hippocrates Vol III P. XVI)