काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
२५४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
है तथापि पूर्व तथा अपर ग्रन्थ के भाग में लेख की एक ही शैली के औचित्य को दृष्टि में रखते हुए पूर्वभाग में सुश्रुत शब्द तथा उत्तर भाग में भिन्न ही सौश्रुत शब्द से निर्देश होने के कारण पूर्व भाग सुश्रुत-लिखित है तथा उत्तर भाग उसी के वंश वाले किसी अन्य (सौश्रुत) व्यक्ति द्वारा लिखित प्रतीत होता है। निघण्टु भाग के उपक्रम में दिवोदास के उपदेश का उल्लेख होने पर भी मूल आचार्य के एक होने से यह ग्रन्थ भी मूल ग्रन्थ ही है, इसको सिद्ध करने के लिये संभवतः दिवोदास का निर्देश किया हो तथा निघण्टु भाग में आये हुए लेख में कुछ विकसित अवस्था होने से तथा उत्तर भाग के शब्दों के विशेष रूप से मिलने से यह निघण्टु भाग भी संभवतः सौश्रुत का है। अपूर्ण अंश को पूर्ण करने की दृष्टि से इसमें उत्तरतन्त्र सम्मिलित करने वाले सौश्रुताचार्य ने पूर्वभाग में भी संभवतः कुछ संस्करण किया हो। महाभाष्यकार द्वारा सौश्रुतशब्द से युक्त उदाहरण के देने से सौश्रुतों की भी पहले से प्रसिद्धि का बोध होता है। सुश्रुत के वंश वाले शल्यविद्या के पण्डित सौश्रुतों का राजाओं के साथ सम्बन्ध होने के कारण ही अत्यन्त प्राचीन काल से 'सौश्रुतपार्थिवाः' उदाहरण प्रसिद्ध है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि सुश्रुत के वंश वाले या उसके किसी शिष्य (सौश्रुताचार्य) ने पूर्वभाग का संस्करण करके उत्तरतन्त्र और निघण्टु भाग उसमें पीछे से सम्मिलित कर दिया है।
पूर्व आचार्य की संहिता के उपलब्ध होने पर भी अन्य आचार्यों के ग्रन्थों में मिलने वाली विशेषताओं को लेकर पूर्व संहिता की कमियों को दूर करके उसे सर्वाङ्ग पूर्ण बनाने की दृष्टि से पीछे से पूर्ववर्ती दिवोदास की संहिता को लेकर उसमें अन्य ग्रन्थों के विषयों की संस्कर्ता ने उत्तरतन्त्र के रूप में सम्मिलित किया प्रतीत होता है। स्वयं ग्रन्थ कर्ता की उक्ति से स्पष्ट है कि उत्तरतन्त्र का विषय विदेहाधिप आदि के शालाक्यतन्त्र से संबन्धित है। सुश्रुतसंहिता के उत्तरभाग में कौमारभृत्य के प्रकरण में अन्य आचार्यों का निर्देश करते हुए मूल में यद्यपि 'कुमाराबाधहेतुभिः' द्वारा सामान्य उल्लेख होने पर भी टीकाकारों द्वारा पार्वतक बन्धक जीव आदि का निर्देश किया जाने से तथा जीवक के इस कौमारभृत्य विषयक ग्रन्थ के मिल जाने से संभवतः उस प्रकरण में काश्यप तथा जीवक के विषयों को भी उत्तरतन्त्र में सम्मिलित कर दिया गया है।
सुश्रुत के उत्तरतन्त्र में रसभेद विषयक ६४ अध्याय तथा दोषभेदविषयक अन्तिम (६६) अध्याय के बीच में ६५ वां तन्त्रयुक्तियों का अध्याय है। कौटिलीय अर्थशास्त्र में तन्त्रयुक्तियों का अन्तिम अध्याय है। इनकी तुलना करने पर हम देखते हैं कि दोनों में अधिकरण से प्रारंभ करके ऊह्य पर्यन्त ३२ युक्तियां दी हुई है। तथा बीच में भी उद्देश, निर्देश, उपदेश, अपदेश, प्रदेश, अतिदेश आदि तथा अन्य ग्रन्थों में न आये हुए भेदों तथा अन्य भी पदार्थों में (अपने-अपने वैद्यक तथा नैतिक विषयों को छोड़कर) परस्पर समानता को देखकर एक की दूसरे पर छाया प्रतीत होती है। इनमें किसकी किस पर छाया है इस विषय में परस्पर विचार करने पर हम देखते हैं कि कौटिलीय अर्थशास्त्र में औपनिषदाधिकरण की समाप्ति पर ग्रन्थ के अन्त में तन्त्रयुक्तियां दी हुई हैं। इसी प्रकार सुश्रुत के उत्तरतन्त्र में भी साथ-साथ दिये जाने योग्य रसभेद तथा दोषभेद प्रकरण के बीच में तन्त्रयुक्तियों के अध्याय के दिये होने से पूर्वापर सङ्गति को देखकर यह कहा जा सकता है कि यह किसी दूसरे ग्रन्थ को देखकर किया गया है अथवा संस्करण के समय भी यह अनुप्रवेश संभव है। चरक संहिता में भी ग्रन्थ के अन्त में ही तन्त्रयुक्तियों का विषय दिया हुआ है, जो कि दृढ़बल द्वारा पूरित भाग में है। बाद में मिलाये हुए उत्तरतन्त्र में भी पूर्वभाग की तरह इसकी प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिये धन्वन्तरि की उक्तिरूप 'यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः' वाक्य लेखक ने संभवतः स्वयं जोड़ दिया है। इस प्रकार सुश्रुत संहिता में पीछे सम्मिलित किये हुए विषयों को मूलग्रन्थ के आगे उत्तरतन्तरूप में पृथक् जोड़ दिया गया है। चरक के समान मूल ग्रन्थ के साथ ही विषय को मिलाकर परस्पर एकाकार नहीं कर दिया गया है। इससे संहिता में संग्रह किये हुए नवीन तथा प्राचीन विषयों में परस्पर सुगमता से भेद किया जा सकता है। मुद्रित सुश्रुतसंहिता में प्रथम अध्याय के अन्त में 'सविंशमध्यायशतं पञ्चसु स्थानेषु संविभज्य उत्तरे तन्त्रे शेषानर्थान् व्याख्यास्यामः' इस पाठ के मिलने से
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पूर्वसंहिता के समय उत्तरतन्त्र की भी उपस्थिति प्रतीत होने से दोनों भाग एक ही समय के होने चाहिये। परन्तु मेरे संग्रहालय में विद्यमान प्राचीनताडपत्र पर लिखे हुए सुश्रुत में स्थान-स्थान पर बहुत से पाठभेद मिलते हैं। यहां भी '..... संविभज्य उत्तरे व्याख्यास्याः' यह पाठ मिलता है। इस पाठ के अनुसार १२० अध्यायों को पांच स्थानों में विभक्त करके फिर आगे व्याख्या करेंगे, इतना ही ग्रन्थ का आशय है। इससे उत्तरतन्त्र का निर्देश नहीं मिलता है। तृतीय अध्याय के प्रारंभ में अध्यायों की गणना करते हुए मुद्रित पुस्तक में दिया हुआ 'तदुत्तरं षट्षष्टिः' यह पाठ भी ताडपुस्तक में नहीं मिलता है। किन्तु उत्तरतन्त्र के अध्यायों के विषयों को सूचित करने वाले 'अतः परं स्वनाम्नैव तन्त्रमुत्तरमुच्यते' से प्रारंभ करके 'विधिनाऽधीत्य युञ्जाना भवन्ति प्राणदा भुवि' इत्यादि श्लोक तो ताडपुस्तक में भी मिलते हैं। पीछे उत्तरतन्त्र के जोड़ने के बाद उसके विषयों की सूची वाले ये श्लोक भी संभवतः पीछे से अनुप्रविष्ट हो गये हों।
वृद्धजीवकीय तन्त्र के विषय में तो यह कहा जा सकता है कि प्राचीन काश्यप संहिता के बहुत विस्तृत होने से वृद्धजीवक द्वारा उसको संक्षिप्त करके तन्त्र बनाने का उल्लेख संहिता के कल्पाध्याय में मिलता है इसलिये जिस रूप में काश्यपसंहिता थी उसी रूप में वृद्धजीवकीय तन्त्र नहीं है अपितु अन्य संक्षिप्त रचना के कारण स्पष्टरूप से उसका रूपान्तर हो चुका है। परन्तु वृद्धजीवक ने भी संक्षेप करते हुए मूलसंहिता की उपेक्षा करके स्वतन्त्र रचना नहीं की हैं अपितु उसीके उपदेशरूप वाक्यों तथा विषयों को ही लेकर विस्तृत अंशों को छोड़कर उसी का केवल संक्षिप्तंरूप कर दिया है जैसा कि उसके लेख से प्रतीत होता है।
काश्यपसंहिता के पूर्वभाग तथा खिलभाग में भी आदि से अन्त तक प्रत्येक अध्याय में इत्याह भगवान् कश्यपः' 'इति ह स्माह भगवान् कश्यपः' इत्यादि वाक्यों के समान रूप से मिलने पर भी ग्रन्थ के अन्दर आये हुए सब विषय कश्यप के ही हों, ऐसी बात नहीं है अपितु सिद्धान्त तथा उपदेश वाक्य ही केवल कश्यप के है तथा बीच में उस विषय के लिये दिये हुए पूरणिका रूप से उपक्रम तथा उपसंहार वाक्य पीछे से वृद्धजीवक द्वारा तन्त्र बनाते समय भी संभवतः दे दिये गये हों। सब अध्यायों के आदि तथा अन्त में 'इत्याह कश्यपः' यह पद तो जीवक ने संभवतः इसलिए दे दिया है कि लोग इस सारे विषय को उसकी कपोलकल्पना न समझकर काश्यपसंहिता के साररूप में ही जानकर इसे प्रामाणिक मानें। काश्यपसंहिता के पूर्वभाग में 'साहसादतिबालस्य सर्वं नेच्छन्ति कश्यपः' 'मज्जवस्योस्तु मण्डं सर्वेषां कश्यपः पूर्वम्' 'अथ कश्यपोऽब्रवीत् सर्वमप्येतदसम्ब्यक्, इत्यादि स्थलों में तथा खिलभाग में भी 'पाययेदिति कश्यपः' 'यथास्वमिति कश्यपः' 'पेय इति ह स्माह कश्यपः' इत्यादि स्थलों में पुनः कश्यप शब्द का उल्लेख होने से प्रतीत होता है कि जीवक द्वारा कश्यप के सिद्धान्तों का अर्थानुवाद किया गया है अथवा वृद्धजीवक के उपदेशक मारीच कश्यप ने भी प्राचीन कश्यपपरम्परा को सूचित करने के लिये स्थान-स्थान पर 'इति कश्यपः' पद दिया है। अस्तु, 'प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति' के अनुसार इसमें आई हुई सब सिद्धान्त आदि उक्तियां कश्यप की ही प्रतीत होती हैं। मनुस्मृति आदि प्राचीन ग्रन्थों में शिष्य भृगु ने मनु के तथा सामश्रव आदि ने याज्ञवल्क्य के उपदेशों को शब्दरूप तथा भावरूप में ग्रहण करके तथा उसे पूर्ण करके बनाई हुई संहिताओं के मनुसंहिता तथा याज्ञवल्क्यसंहिता आदि नाम रखे हैं। यहां भी इसी प्राचीन आर्ष शैली का अनुसरण किया गया प्रतीत होता है। पूर्वसम्प्रदायों का उल्लेख करते हुए कश्यप के समान उसके पुत्र काश्यपों का निर्देश होने पर भी प्रत्येक अध्याय के उपक्रम तथा उपसंहार में 'इति ह स्माह कश्यपः' तथा ग्रन्थ के मध्य में भी स्थान-स्थान पर 'कश्यपोऽब्रवीत्' 'इति कश्यपः' आदि द्वारा कश्यप शब्द से ही आचार्य का उल्लेख किया है।
इस संहिता में दो भाग हैं। कल्पस्थान तक पूर्वभाग तथा उसके बाद खिलभाग। दोनों ही भागों में प्रत्येक अध्याय के उपक्रम तथा उपसंहार में कश्यप के उपदेश रूप में 'इत्याह कश्यपः' पद मिलता है। ज्वरसमुच्चय में कश्यप नाम से दिये हुए वचन इस संहिता के पूर्वभाग तथा उत्तर भाग दोनों में मिलते हैं। पूर्वभाग में सर्वत्र कश्यप के शिष्य रूप
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में जीवक का तथा उत्तरभाग में भी अधिकांश रूप में जीवक का तथा कहीं-कहीं किसी अन्य व्यक्ति का भी उल्लेख मिलता है। इसमें पूर्व तथा उत्तर भाग में एक ही उपदेश को सूचित करने वाले परस्पर संयोजक वाक्य दोनों भागों में मिलते$^१$ हैं।
इस प्रकार पूर्व एवं उत्तर दोनों भागों के परस्पर संबद्ध होने से एक से एक शरीर रूप से बना हुआ यह ग्रन्थ आपाततः कश्यसंहिता रूप ही प्रतीत होता है। परन्तु पूर्वभाग के अन्त में पूर्वग्रन्थ के उपसंहार रूप में ग्रन्थ की समाप्ति का निर्देश करने वाला कल्पाध्याय दिया हुआ है। उपसंहार को ग्रन्थ के अन्त में होना चाहिये। आत्रेय तथा भेड की प्राचीन संहिताएँ सूत्र, निदान आदि आठ स्थानों तथा १२० अध्यायों में पूर्ण हुई मिलती हैं। उसी के अनुसार यहां काश्यपसंहिता में भी पूर्वभाग में ही आठ स्थान तथा १२० अध्याय पूरे हो जाते हैं। इस संहिता के कल्पाध्याय के निम्न श्लोक के अनुसार भी इसके आठ विभाग दृष्टिगोचर होते हैं—
सूत्रस्थाननिदानानि विमानान्यात्मनिश्चयः । इन्द्रियाणि चिकित्सा च सिद्धिः कल्पाश्च संहिता ।।
इसके बाद अन्त में 'समाप्ता चेयं संहिता, अतः परं खिलस्थानं भविष्यति' यह संहिता की समाप्ति का सूचक पुष्पिकावाक्य भी दिया हुआ मिलता है। इस प्रकार आठ स्थानों तथा १२० अध्यायों वाला यह पूर्वभाग ही वृद्धजीवक द्वारा संक्षिप्त की हुई काश्यपसंहिता प्रतीत होती है।
उसके बाद पूर्वभाग में अनुक्त विषयों को (तथा पूर्वभाग में आये हुए विषयों को भी विकसित रूप में) इधर-उधर से कुछ आवश्यक एवं प्रकीर्ण विषयों को संग्रह करके पूर्वभागोक्त क्रम को विना ध्यान में रखे ही, सुश्रुत में १२० अध्याय वाली पूर्वसंहिता के बाद उत्तरतन्त्र के समान ८० अध्याय वाला खिलभाग पीछे से जोड़ा गया प्रतीत होता है।
मेघदूत आदि कुछ ग्रन्थों में, स्वयं लेखक द्वारा कथांश को दो भागों में विभक्त करके पूर्व एवं उत्तर भाग के दिये होने से सब जगह यद्यपि ऐसा नियम नहीं बनाया जा सकता तथापि कादम्बरी और दशकुमारचरित आदि में पूर्व एवं उत्तरभाग में रचना का भेद तथा कहीं-कहीं लेखक के भी भेद का स्पष्ट उल्लेख किया है। इन ग्रन्थों में उसके बाद में पूरे किये हुए भाग का केवल उत्तरभाग नाम से ही निर्देश किया गया है। ग्रन्थ का नाम तो सम्पूर्ण ग्रन्थ के अनुसार, कादम्बरी, दशकुमारचरित आदि एक ही है। कुछ विद्वानों का विचार है कि रामायण में भी राम के घर पर कुश तथा लव द्वारा गाये हुए भाग के पश्चात् का अंश बाद में पूरा करके जोड़ा गया है। उस भाग का उत्तरकाण्ड नाम से पृथक् व्यवहार होने पर भी सम्पूर्ण ग्रन्थ का कतो एक ही नाम से व्यवहार मिलता है। ऐसे स्थानों में जहां उत्तरभाग में लेखशैली की भिन्नता प्रतीत होती हो वहां कर्ता एवं समय के भेद से निर्माण के भेद का भी अनुमान किया गया है। सुश्रुत के पूर्वभाग में भी कौमारभृत्य तथा शालाक्य आदि विषयान्तरों के विकसित अवस्था में मिलने के कारण एक ही लेखक की रचना होने से उनका विस्तृत वर्णन मिलना चाहिये परन्तु शल्यतन्त्र की प्रधानता की रक्षा के लिये ये विषय बहुत संक्षेप से दिये गये हैं। उत्तरतन्त्र के रूप में पुनः मिलने वाले विस्तृत प्रसङ्गान्तरीय विषयों का बाद में सम्मिलित किया जाना प्रकट करने के लिये उत्तरतन्त्र नाम से निर्देश किया गया है। लेख की रचना में भेद के द्वारा निर्माण में भी भेद मालूम हो सकता है। इसी प्रकार काश्यपसंहिता का खिलभाग भी यदि पूर्वभाग के साथ ही बनाया गया होता तो पूर्वभाग में दिये हुए ज्वर आदि विषयों के साथ खिलभाग में दिये हुए ज्वर आदि विषयों की समानता को दृष्टि में रखते हुए उसी के अनुसार वर्णन किया जाता परन्तु खिलभाग में पुनः उन्हीं विषयों के देने से तथा उपदेश स्थान, समय और उपदेश्य व्यक्ति का भी भेद दिखाई देने से पूर्वभाग तथा खिलभाग में ग्रन्थ कर्ता, समय तथा रचना का भी भेद प्रतीत होता है। विद्वान् लोग ऋग्वेद में भी खिलरूप से सम्मिलित किये हुए भाग का समय भिन्न मानते हैं। यहां भी खिल नाम से निर्देश
१. इसकी टि. उपो. संस्कृत पृ. ८१ देखें।
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किया जाना ही समय तथा कर्ता के भेद को प्रकट करता है। काश्यपसंहिता के कल्पाध्याय में आए हुए 'तन्त्रं सखिलमुच्यते' वाक्य के अनुसार खिलस्थान भी इसी वृद्धजीवकीय तन्त्र का भाग प्रतीत होता है। तथा खिलभाग में आये हुए विषयों के भी काश्यप के ही उपदेश रूप होने से खिलभाग सहित ग्रन्थ ही काश्यपसंहिता प्रतीत होती है। परन्तु इस संहिता के पूर्वभाग के निम्न श्लोक से दारुवाह द्वारा प्रेरित वृद्धजीवक को कश्यप का उपदेश दिया जाना प्रतीत होता है—
उपास्यमानमृषिभिः कश्यपं वृद्धजीवकः । चोदितो दारुवाहेन वेदनार्थेऽभ्यचोदयत् ।।
इस प्रकार पूर्वभाग में प्रायः बहुत से अध्यायों में जीवक का प्रश्न तथा कश्यप द्वारा उत्तर दिया जाना मिलता है। वत्स के भृगु की सन्तान होने से वात्स्य के पूर्वपुरुष के रूप में निर्दिष्ट जीवक को भार्गव शब्द द्वारा सम्बोधन किया जाना उचित होने पर भी “भार्गवास्थीनि” द्वारा केवल एक स्थान पर भार्गव शब्द से सम्बोधन किया गया है। अन्यत्र सब स्थानों पर जीवक शब्द द्वारा ही सम्बोधन किया गया है। इसके विपरीत उत्तरभाग (खिलस्थान) में दारुवाह का उल्लेख नहीं मिलता है तथा जीवक शब्द द्वारा संबोधन भी कहीं-कहीं ही है। प्रायः सब स्थानों पर भार्गव शब्द से ही संबोधन मिलता है। अन्तर्वत्नीचिकित्सा तथा कुक्कुणक आदि अध्याय में भी कहीं-कहीं जीवक तथा भार्गव शब्द द्वारा सम्बोधन तथा जीवक द्वारा प्रश्न न करके 'नृप, नराधिप, विशाम्पते, इत्यादि राजा के सम्बोधन दिये हुए हैं तथा एक स्थान पर 'इति वार्योविदायेदम्' द्वारा वार्योविद को कश्यप के उपदेश का उल्लेख मिलता है। लेख की रचना का अनुसन्धान करने पर पूर्वभाग में प्रायः लेख की प्रौढ़ता आर्षभाव का प्राचुर्य तथा विषय की गम्भीरता दीखती है तथा उत्तरभाग में प्रायः विकसित विषय तथा निरूपण शैली भी स्पष्ट एवं सुन्दर प्रतीत होती है। रेवतीकल्प, चर्मदल, जातकर्मोत्तरीय तथा शूलचिकित्सा आदि अध्यायों में कही-कहीं पूर्वभाग के समान प्रौढ़ एवं आर्ष रचना तथा विषय की गंभीरता दिखाई देती है। उपर्युक्त वर्णन के अनुसार प्रतीत होता है कि मुख्यरूप से दारुवाह द्वारा प्रेरित जीवक ने कश्यप द्वारा दिये गये उपदेशों को लेकर पूर्वभाग का निर्माण किया है जिसमें कि रचना शैली भी प्रौढ़ है तथा अन्यत्र जीवक, वार्योविद तथा अन्य भी व्यक्तियों को समय-समय पर दिये गये कश्यप के उपदेशों को लेकर उत्तरभाग की रचना की गई है जिसमें कि विकसित अवस्था दिखाई देती है। इन उपर्युक्त स्थलों को देखने से दोनों भागों में लेखनी एवं समय का भेद स्पष्ट दिखाई देता है। संहिता के कल्पाध्याय में वृद्धजीवकतन्त्र के कुछ समय तक लुप्त रहने के बाद वात्स्य द्वारा प्राप्ति एवं संस्करण के निर्देश के बाद दिया हुआ निम्न श्लोक भी वात्स्य द्वारा ही कहा जा सकता है—
स्थानेष्वष्टसु शाखायां यद्यन्नोक्तं प्रयोजनम् । तत्तद्भूयः प्रवक्ष्यामि खिलेषु निखिलेन ते ।।
इस प्रकार यह प्रतीत होता है कि अष्टस्थानात्मक पूर्वतन्त्र ही काश्यपसंहिता का संक्षिप्तस्वरूप वृद्धजीवकीय तन्त्र है। इस पूर्वभाग में न आये हुए आवश्यक विषयों को कश्यप की उपदेश परम्परा तथा अन्य आचार्यों के ग्रन्थों से संग्रह करके वात्स्य द्वारा ही खिलभाग के रूप में अन्त में जोड़ दिया गया प्रतीत होता है। वात्स्य द्वारा ही इस भाग के जोड़े जाने पर भी कश्यप के कुछ उपदेशों को साक्षात् ग्रहण करके तथा कुछ इधर-उधर के ग्रन्थों से एकत्रित करके दिया जाने के कारण ही ग्रन्थ में कहीं प्रौढ़ और कहीं साधारण शैली दृष्टिगोचर होना स्वाभाविक ही है। इसमें वार्योविद, काङ्कायन, भारद्वाज, दारुवाह, हिरण्याक्ष, वैदेह तथा अन्य आचार्यों के मत देकर वृद्धजीवक का मत भी दिया हुआ है। अपने सामयिक एवं शिष्य होने के कारण वृद्धजीवक का मत कश्यप द्वारा अथवा स्वयं जीवक द्वारा भी पूर्वपक्ष के रूप में देकर अन्त में चरम सिद्धान्त रूप में कश्यप का मत दिया जाना यद्यपि संभव हो सकता है परन्तु बाद में वमनविरेचनाध्याय में कौत्स, पाराशर्य, वृद्धकाश्यप, वैदेह, वार्योविद तथा उस समय के अन्य भी आचार्यों के मतों का पूर्वपक्ष के रूप में निर्देश करने के बाद चरमसिद्धान्त के रूप में कश्यप के मत के स्थान पर वात्स्य का मत दिया हुआ है। परन्तु पूर्ववाद
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के कारण बहुत पीछे होनेवाले प्रतिसंस्कर्ता वात्स्य का कश्यप तथा वृद्धजीवक द्वारा निर्देश किया जाना सम्भव न होने से वात्स्य ही इस ग्रन्थ का संस्कर्ता प्रतीत होता है। यहां दिये हुए कौत्स, पाराशर्य आदि सब प्राचीन ही आचार्य हैं। इसलिये उनके समकक्ष आया हुआ वात्स्य भी प्राचीन आचार्य ही होना चाहिये। शतपथ वंश ब्राह्मण में भरद्वाज, पाराशर्य, आग्निवेश्य, हारीत, काप्य, गालव, जातूकर्ण तथा आत्रेय आदि बहुत से प्राचीन ऋषियों का उल्लेख मिलता है। उन्हीं के साथ वात्स्य का भी उल्लेख है। आयुर्वेद के ग्रन्थों से इन नामों वाले आयुर्वेद के आचार्यों का सत्व भी प्रकट होता है। यद्यपि यहाँ ब्रह्मविद्या का निर्देश होने से इनका आयुर्वेदाचार्यत्व सिद्ध नहीं होता है, समान नाम वाले ये अन्य व्यक्ति भी हो सकते हैं तथापि यह नहीं कहा जा सकता कि ये केवल ब्रह्मविद्या के ही ज्ञाता थे, आयुर्वेद के नहीं। इन्हीं आचार्यों की पूर्वश्रेणी में स्वर्विद्य के रूप में प्रसिद्ध अश्वियों का उल्लेख होने से उसी परम्परा में होने से ये भी आयुर्वेद के आचार्य हो सकते हैं। आयुर्वेद के ग्रन्थों में पूर्वाचार्यों के रूप में दिये हुए बहुत से नामों का इस वंश ब्राह्मण में प्रायः साथ-साथ मिलने से संभवतः ये वे ही व्यक्ति प्रतीत होते हैं।
प्रतिसंस्कर्ता वात्स्य ने केवल खिलभाग ही नहीं जोड़ा है अपितु कल्पाध्याय के 'संस्कृतं तत्पुनस्तन्त्रं वृद्धजीवकनिर्मितम्' इस निर्देश के कारण पूर्वभाग में भी वात्स्य द्वारा संस्करण किया जाना स्पष्ट प्रतीत होता है। परन्तु वात्स्य द्वारा अपने विचारों को मिलाकर अनेक विषयों से युक्त खिलभाग को पृथक् रूप से जोड़ने से प्रतीत होता है कि उसने पूर्वभाग में मूल ग्रन्थ के विपर्यास रूप कोई विशेष प्रतिसंस्कार नहीं किया है अपितु पूर्वग्रन्थ में ही केवल कहीं-कहीं पूरणिका वाक्य, कहीं अपना विशेष वक्तव्य तथा तात्कालिक विषयों को देकर प्रायः उसी रूप में ही रखा है।
प्रतिसंस्कार का उद्देश्य जिस किसी भी वस्तु अथवा निबन्ध में गुणाधान द्वारा उसे उज्ज्वल करना होता है। इस उपर्युक्त प्रक्रिया द्वारा संस्कार करने से उन प्राचीन संहिताओं के लेख अथवा विषय को संक्षिप्त एवं विस्तृत करके नये विषयों के प्रवेश करने से तथा अनुपयोगी अंश को परिवर्तित करके तथा निकाल करके उनका रूपान्तर कर देने का प्रतिसंस्कर्ताओं का प्रयत्न संभवतः उचित हो परन्तु इस प्रकार पुनः संस्करण होकर प्राचीन संहिता के लेख तथा प्रतिसंस्कर्ताओं के लेख परस्पर नीर-क्षीर (दूध और पानी) की तरह मिल जाने से प्राचीन संहिता के लेखों का प्रतिसंस्कर्ताओं के लेखों में ही अन्तर्भाव हो गया है। इसीलिये प्राचीन आत्रेय संहिता का अग्निवेश द्वारा विस्तार तथा उस अग्निवेश संहिता के चरक द्वारा किये गये प्रतिसंस्करण में तथा इसी प्रकार काश्यपसंहिता के वृद्धजीवक द्वारा किये गये संक्षेप तथा उसके वात्स्य द्वारा किये गये प्रतिसंस्करणों में यह कहना कठिन है कि इनमें कितना अंश किसका है। जिस प्रकार प्राचीन मूल नावनीतक ग्रन्थ में नवीन विषयों के प्रवेश द्वारा अपूर्ण विषयों को पूर्ण करके लाहौर से प्रकाशित करवाकर प्रतिसंस्कर्ता ने बहुत उपकार किया है तथा यह भी सन्तोष का विषय है कि वाग्भट, नागेन्द्रनाथ आदि बहुत से अर्वाचीन विद्वानों के अनुभव सिद्ध ओषधियों को इसमें प्रविष्ट करके इसे और विस्तृत कर दिया है। परन्तु इस प्रकाशन में यदि नवीन पूरित (प्रतिसंस्कृत) अंश को लिपि के भेद द्वारा अथवा कोष्ठक में देकर पृथक् प्रकाशित कर दिया जाता तो यह मालूम करने में सुविधा रहती कि ग्रन्थ का कितना अंश प्राचीन (मूल ग्रन्थ) है तथा कितना अंश प्रतिसंस्कार में नया प्रविष्ट किया गया है। इस समय लाहौर तथा यूरोप से मूल नावनीतक पृथक् मुद्रित हुआ उपलब्ध होता है इसलिये उन दोनों (मूल तथा प्रतिसंस्कृत) ग्रन्थों की तुलना करने पर प्राचीन एवं अर्वाचीन अंश में यद्यपि भेद किया जा सकता हैं, परन्तु कालक्रम से यदि कभी मूल ग्रन्थ की उपलब्धि न हो सके तो केवल प्रतिसंस्कृत पुस्तक को देखकर यह भेद करना संभव नहीं होगा। इसमें वाग्भट तथा नागेन्द्रनाथ आदि का उल्लेख होने से कभी बाद में यह सन्देह हो सकता है कि नागेन्द्रनाथ के बाद में मूल नावनीतक ग्रन्थ का निर्माण हुआ है। इसी प्रकार किसी समय चरक तथा वात्स्य द्वारा प्रतिसंस्कृत ग्रन्थों से काश्यपसंहिता, आत्रेयसंहिता, वृद्धजीवकीय तन्त्र तथा अग्निवेश तन्त्रों की पृथक् स्थिति अवश्य रही होगी। रूपान्तर प्रतिसंस्कारों के प्रचार के कारण प्राचीन ग्रन्थों का प्रचार कम हो गया और इसीलिये पीछे से वे लुप्त
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हो गये। प्रतिसंस्करणों में कुछ अंश छोड़ दिया जाता है, कुछ नवीन अंश प्रविष्ट कर दिया जाता है तथा कुछ अंश का रूपान्तर हो जाता है। इस प्रकार ग्रन्थ के उस-उस अंश के साथ आचार्य के काल का निर्णय करना भी कठिन हो जाता है।
मस्तिष्क में उदय होनेवाले नाना प्रकार के विचारों तथा अन्य आचार्यों के उपदेशों के अनुसन्धान से नये-नये विचार उत्पन्न हो जाते हैं। प्रतिसंस्करण के अवसर पर प्राचीन आचार्यों के सिद्धान्तों का भी अर्वाचीन आचार्यों के विचारों से सामंजस्य न होने पर रूपान्तर हो सकता है तथा उनको बिलकुल निकाला भी जा सकता है। कहीं-कहीं बिलकुल निर्मल सिद्धान्त भी पुरुष सुलभ दोषों के कारण संस्करण के समय दूषित हो जाते हैं। चरकसंहिता में चिकित्सास्थान के अन्तिम १७ अध्याय तथा सिद्धि और कल्पस्थान के लुप्त हो जाने से पुनः दृढ़बल द्वारा पूरित किया जाने से उतना अंश यदि दृढ़बल की ही रचना मानी जाय तो उसमें आत्रेय, अग्निवेश तथा चरक में से किसी की भी लेखनी का प्रवेश न होने से उस भाग की अच्छाई या बुराई का उत्तरदायित्व दृढ़बल पर ही होना चाहिये। इस प्रकार यदि अग्निवेश और चरक ने भी पूर्वग्रन्थ के अन्त में परिच्छेद के रूप से अपने-अपने विचार पृथक् दिये होते अथवा आजकल अग्निवेश तन्त्र पृथक् उपलब्ध होता तो उन-उन ग्रन्थों में उस-उस भाग में आये हुए अच्छे या बुरे विचारों का उत्तरदायित्व उन-उन पर हो सकता था। परन्तु इसके विपरीत प्राचीन एवं अर्वाचीन आचार्यों के लेख गङ्गा-यमुना की तरह परस्पर मिले हुए होने से तथा पूर्व ग्रन्थों के पृथक् उपलब्ध न होने से स्थान-स्थान पर आये हुए अच्छे या बुरे विचारों का उत्तरदायित्व किस पर है यह नहीं कहा जा सकता। इस अवस्था में अर्वाचीन आचार्य के समय सम्मिलित हुई त्रुटियों का दोष भी प्राचीन आचार्यों पर पड़ सकता है। यह बात केवल चरक के विषय में ही नहीं है अपितु सुश्रुतसंहिता तथा काश्यपसंहिता में भी बाद में संस्करण के समय प्रविष्ट हुए कुछ विकार तथा अर्वाचीन विषयों के सम्बन्ध में निश्चयपूर्वक यह नहीं कहा जा सकने के कारण कि ये किसके हैं, मूलसंहिता के आचार्यों के विषय में भी अर्वाचीनता तथा उन विकारों की शङ्का उत्पन्न हो जाती है। किस प्रकार भारत के विस्तृत होकर महाभारत का रूप धारण कर लेने पर अथवा पुनः-पुनः हुए संस्करणों के अवसर पर प्रविष्ट हुए शब्दों के प्रवेश के समय का निश्चय न होने से मूलमहाभारत को भी लोग अर्वाचीन सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं। चरकसंहिता में आया हुआ विकसित निग्रहस्थान आदि का विषय भी आत्रेय, अग्निवेश अथवा चरक में से किसी की लेखनी द्वारा प्रविष्ट किया गया है इसका निश्चय न होने से आत्रेय के विषय में भी अर्वाचीनता की शंका उत्पन्न हो जाती है। इसी प्रकार काश्यपसंहिता में आये हुए उत्सर्पिणी, अवसर्पिणी आदि शब्दों का भी वात्स्य के प्रतिसंस्करण में ही होना सम्भव होने पर भी, निश्चय न होने से प्राचीनता के साधक बहुत से प्रमाणों के जागरूक होने पर भी कश्यप तथा वृद्धजीवक की अर्वाचीनता की शंका उत्पन्न कर देते हैं।
प्राचीन ग्रन्थों में ही नये विचारों को पीछे से प्रविष्ट करके पुनःसंस्करण करने की प्रथा केवल भारतीय ग्रन्थों में ही नहीं मिलती है अपितु अन्य देशों में भी यही प्रक्रिया विद्यमान थी। ग्रीस देश की प्राचीन चिकित्सा के आचार्य हिपोक्रिटस के ग्रन्थ में भी इसी प्रकार प्राचीन एवं नवीन विषयों को एकत्र तिलतण्डुल रूप से मिलाकर पुनः पुनः संस्करण होने से उसके विषय में भी कुछ विवेचन नहीं किया जा सकता है। इसी प्रकार मिश्र देश में भी एवर्टसप्येयिरस¹ नामक प्राचीन ग्रन्थ के भी अनेक संस्करण हो चुके हैं। पूर्व ग्रन्थों में ही नवीन विचारों के उदय होने पर उन विचारों का भी उसीके अन्दर अनुप्रवेश, कहीं पुस्तक के एक प्रान्त पर देना तथा कहीं टीका टिप्पणी के रूप में सम्पूर्ण नये विचारों को ग्रन्थ के मध्य में भी संस्करण के समय दिया जा सकता है। प्राचीन ग्रन्थों का सारांश भी वहां दिया जा सकता है। तथा स्थान भेद से मिले हुए पाठ भेद भी उसी में दिये जा सकते हैं। इस प्रकार यह भेद करना कठिन हो जाता है कि प्राचीन ग्रन्थ
१. इसकी टि. उपो. संस्कृत पृ. ८३ देखें।
२६० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
में कितना अंश प्राचीन है तथा कितना अंश सस्करण के समय प्रविष्ट किया गया है। समय-समय पर नये-नये विचारों के एकत्र अनुप्रवेश होते जाने से पूर्वापर ग्रन्थलेख में कहीं-कहीं परस्पर विरोध तथा व्याघात भी दृष्टिगोचर होता है। इस प्रकार प्राचीन एवं अर्वाचीन विचारों के परस्पर एकत्र सम्मिलित करने से समयान्तर में सब जगह गड़बड़ी होती आई है। पूर्वोक्त युक्तियों तथा महावग्ग, पालीजातक और तिब्बतीय गाथाओं के आधार पर भी प्राचीन सिद्ध किए हुए धन्वन्तरि, कश्यप, जीवक तथा उसी न्याय से आत्रेय सुश्रुत आदि के ग्रन्थों में भी संस्कार के कारण आये हुए अर्वाचीन विषयों के सूचक किसी-किसी पद, वाक्य या विषय, के दर्शन मात्र से ही यदि मूलग्रन्थ को अर्वाचीन सिद्ध करने का प्रयत्न किया जाय तो २३०० वर्ष पूर्व अशोक द्वारा सब स्थानों पर उद्घाटित सर्वसाधारण के चिकित्सालयों में सुविचार पूर्ण तथा सर्वाङ्ग सम्पन्न ग्रन्थों, उनके ज्ञाता चिकित्सकों, अनुभूत ओषधियों तथा सुन्दर चिकित्साप्रणालियों के होने का जो उल्लेख मिलता है उसका क्या आधार हो सकता है। कश्यप, आत्रेय, सुश्रुत आदि प्राचीन प्रौढ़ विद्वानों तथा उनके ग्रन्थों को यदि अर्वाचीन सिद्ध करें तो इनमें पूर्व के ग्रन्थ उस समय प्रसिद्ध नहीं थे। ४०१ ईस्वी पूर्व में मेयून नामक पारसी राजा का राजवैद्य टी. सी. यस. नामक एक यूनानी वैद्य था। इस प्रकार के उसके इतिहास के समान भारत में उस समय किसी भी विदेशी चिकित्सक के यहां के चिकित्सालय में आने का वृत्तान्त नहीं मिलता है। ईसा से पूर्व का महावग्ग नामक प्राचीन बौद्ध वैद्यक ग्रन्थ भी आत्रेय आदि के सिद्धान्त के अनुसार ही होने से इससे पृथक् प्रतीत नहीं होता। सर्वप्रथम रूप में मिलने वाले, कश्यप, आत्रेय, सुश्रुत आदि के ग्रन्थों तथा उनके आचार्यों को यदि छोड़ दिया जाय तो शिलालेख में दिये हुए सर्वसाधारण चिकित्सालय किन अनुपस्थित व्यक्तियों की कल्पना के आधार पर माने जायेंगे। यदि ये आत्रेय आदि आचार्य अशोक के चिकित्सालयों के उद्घाटन के बाद के माने जांय तो लोकोपकार की दृष्टि से अत्यन्त उपादेय इन साधारण औषधालयों का इन आत्रेय आदियों ने उल्लेख क्यों नहीं किया है। इनके अतिरिक्त आत्रेय आदि का कोई भी लेख इनसे प्रभावित नहीं प्रतीत होता।
इसी प्रकार सुश्रुतसंहिता आदि में भी आये हुए कुछ स्थूल सिद्धान्त, गलत सिद्धान्त अथवा अपूर्ण अंशों को देखकर कुछ लोगों को इसके विषय में अश्रद्धा उत्पन्न हो जाती है। यह भी मूललेख तथा प्रतिसंस्कार के परस्पर नीर-क्षीर के रूप में मिले होने से ही है। कालक्रम से विज्ञान, अन्य विद्याओं तथा यन्त्रों के उत्तरोत्तर विकास एवं परिष्कार हो जाने से नये-नये सिद्धान्तों के प्रकट होते जाने से प्राचीन ऋषियों के पूर्व सिद्धान्त सम्भवतः हमें स्थूल एवं कुण्ठित भले ही प्रतीत हों परन्तु उनका विचार करने का ढंग (दृष्टिकोण) सीमित नहीं कहा जा सकता। एक व्यक्ति द्वारा अच्छी समझी जाने वाली वस्तु का दूसरे द्वारा भी वैसा ही समझा जाना आवश्यक नहीं है। एक दिन उचित प्रतीत होने वाली वस्तु अगले ही दिन इसमें विपरीत भी मालूम हो सकती है। जिस प्रकार भारत में अत्यन्त प्राचीन काल से प्रचलित शोधित धातुओं एवं रसौषधियों के उपयोग की पद्धति को अन्यदेशीय विद्वान् अनेक शताब्दियों तक अनुपयोगी एवं अहितकर समझते रहे। वे ही लोग आजकल उसको उपादेय एवं हितकर कहकर उसका व्यवहार करते हैं। इसी प्रकार हमारे प्राचीन आचार्यों के बहुत से सिद्धान्त पाश्चात्त्यवैज्ञानिक प्रगति के कारण बहुत समय तक अन्यथा माने जाने के बाद अब पुनः दृष्टि के परिष्कृत हो जाने के कारण समुचितरूप में माने जाने लगे हैं। प्राचीन समय में किसी विज्ञान के अनुसन्धान के लिये क्या-क्या साधन थे? इस विषय में कुछ उल्लेख न मिलने पर भी यह कहा जा सकता है कि प्राचीन सम्प्रदाय परम्परा, अनुभव, निरन्तर लगन एवं तपस्या के आलोक से उज्ज्वल प्राचीन ऋषियों के हृदयों में प्रकट हुए बहुत से सिद्धान्त निर्मल एवं सुन्दर भी हो सकते हैं।
एक ही विषय पुनः विचार करने पर अत्यन्त परिमार्जित हो जाता है। स्वयं ग्रन्थकर्ता ही अपने पूर्वलेख का पुनः परिमार्जित विचारों के उदय होने पर आवापोद्वाप प्रक्रिया द्वारा बिलकुल विपरीत संस्कार कर सकता है। उस अवस्था में अपने ही हृदय में बार-बार उदय हुए विचारों के परस्पर सम्पर्क से मुख्य प्रमेय (ज्ञातव्य विषय) तथा तात्कालिक विषयों
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद
२६१
के अनुप्रवेश द्वारा किये गये संस्कार से गुणों में वृद्धि ही होती है। समयान्तर से इसमें गड़बड़ की संभावना नहीं होती। विद्वान् लोग निम्न प्रकार का संस्करण उचित समझते हैं—
आवापोद्धरणे तावद्यावद्दोलायते मनः । पदस्य स्थापिते स्थैर्ये हन्त सिद्धा सरस्वती ।।
(अर्थात् जब तक मन स्थिर नहीं होता तब तक आवाप और उद्वाप होते रहते है परन्तु पद के स्थिर होने पर अर्थात् पद-पदार्थ के संबन्ध के सम्यक् ज्ञान हो जाने पर सरस्वती सिद्ध हो जाती है अर्थात् अपने वश में हो जाती है)।
किन्तु बाद में आलोचना करते हुए प्राचीन महर्षियों के उपदेशात्मक ग्रन्थों में अभिप्राय भेद से पूर्वग्रन्थ के गंभीर वाक्यों के अन्यथा प्रतीत होने से तथा तात्कालिक नये विचारों के द्वारा पूर्व विचारों के अन्यथा (विपरीतरूप में) प्रकट होने से पूर्व ग्रन्थ में नवोदित विचारों को प्रविष्ट करके आवापोद्वाप प्रक्रिया द्वारा परिवर्तन, विकास एवं संक्षेप के द्वारा पूर्व ग्रन्थ का रूपान्तर युक्त प्रतिसंस्करण करने में अर्वाचीन लोगों की जो मनोवृत्ति है, वह उचित प्रतीत नहीं होती। प्राचीन सिद्धान्त एवं लेखों के विपरीत हो जाने से उनका स्वरूप ही बदल जाता है अथवा दोषों की शङ्का से वे मलिन प्रतीत होने लगते हैं। प्राचीन सूत्र, भाष्य आदि में उक्त, अनुक्त एवं द्विरुक्त आदि दोषों को दूर करने के लिए अन्य विद्वानों ने सूत्र आदियों को उसी प्रकार रखकर अपने विचारों को वार्तिक के रूप में पृथक् प्रकट किया है। इससे सूत्र भाष्य आदि में आये हुए पद एवं वाक्य आदि में अन्यथा दृष्टि उत्पन्न नहीं हो पाती। इसी प्रकार समयान्तर से नये विचारों के उदय और विकसित हो जाने से तथा पूर्वसिद्धान्तों को अन्यथासिद्ध करने की दृष्टि से प्रतिसंस्कार करने के इच्छुक व्यक्ति यदि मूलग्रन्थ को उसी रूप में रखकर अपने विशेष विचार एवं व्याख्यानों से युक्त समालोचनात्मक अन्य ग्रन्थ को खिलरूप में पृथक् जोड़ दें तो परस्पर मिश्रित न होने से प्राचीन एवं अर्वाचीन विषयों का पृथक्-पृथक् भेद, विचारों के विकास का ज्ञान तथा पूर्वापर लेख एवं विचारों की अच्छाई और बुराई का भी ज्ञान ठीक-ठीन हो जाने से कोई गड़बड़ न हो। इसके विपरीत कुछ लोग प्राचीन ग्रन्थों में भी किन्हीं सन्देहास्पद शब्दों के मिलने से ही समस्त ग्रन्थ को अर्वाचीन बतलाने लगते हैं। परन्तु प्राचीन ग्रन्थों में संस्कार के न होने पर भी उन शब्दों का अनुप्रवेश संभव होने से केवल उन शब्दों को देखकर ही ग्रन्थ को अर्वाचीन कहना संगत नहीं प्रतीत होता। कुछ विद्वान् इस प्रकार के शब्द तथा अन्य ऐसे ही विषयों को उन ग्रन्थों में दिखाकर अपने अभिप्राय को विना प्रमाणों के सिद्ध किये ही उन ग्रन्थों का आनुमानिक समय बतलाते रहते हैं। परन्तु उनके उन विचारों में क्या प्रमाण हैं, यह नहीं कहा जा सकता। इस प्रकार अव्यक्त प्रमाणों से ही विचार किया जाता है। उनके मन में आये हुए असाधारण प्रमाणों का स्पष्ट ज्ञान होने पर ही तथ्य के निर्धारण में सुविधा हो सकती है।
इस ग्रन्थ का संहितात्व तथा तन्त्रत्व
इस ग्रन्थ के संहिताकल्पाध्याय में 'संहिताकल्पं व्याख्यास्यामः' द्वारा प्रारम्भ करके निम्न श्लोक दिये हैं। जिनमें इसका तन्त्र के रूप में उल्लेख किया गया है—
स पृष्टोऽन्येन वैद्येन .... (मूल उपोद्घात पृ. ६२ देखें)।
इसके बाद 'समाप्ता चेयं संहिता' द्वारा इसका उपसंहार किया गया है। इस प्रकार मूल और पुष्पिका वाक्यों में संहिता एवं तन्त्र दोनों रूप में इसका उल्लेख किया गया है। इस ग्रन्थ के उपक्रम तथा उपसंहार के खण्डित होने से उसके द्वारा ज्ञातव्य विषय के संबन्ध में कुछ नहीं कहा जा सकता।
२६२ कश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
परन्तु संहिता शब्द का व्यवहार तन्त्र शब्द के व्यवहार की अपेक्षा प्राचीन है। प्राचीन आर्षयुग में बनाये हुए ग्रन्थ प्रायः संहिता नाम से तथा उसके बाद प्राचीन आचार्यों द्वारा बताये हुए ग्रन्थ तन्त्र नाम से व्यवहृत होते थे। संहिता शब्द का अर्थ ऋषियों के प्रतिभा एवं ज्ञान बल से प्राप्त प्रकीर्ण (भिन्न-भिन्न विषयों से सम्बन्धित) उपदेशों को सामूहिक रूप से एकत्र करके ग्रन्थ का रूप दे देना है। तथा तन्त्र शब्द भिन्न-भिन्न विषयों को भिन्न-भिन्न प्रकरण एवं सन्दर्भ सहित शास्त्र का रूप दे देने के अर्थ में प्रयुक्त होता है। इस प्रकार आत्रेय, धन्वन्तरि तथा कश्यप आदि द्वारा मूल उपदिष्ट ग्रन्थों का संहिता नाम से व्यवहार होना चाहिये। तथा इन मूलसंहिता में अग्निवेश, सुश्रुत, वृद्धजीवक आदि द्वारा प्रकरण के अनुसार विषयों को ठीक करके शास्त्र का रूप देने के बाद तैयार हुए ग्रन्थों का तन्त्र नाम दिया जाना चाहिये चरकसंहिता के प्रारम्भ में—
तन्त्रप्रणेता प्रथममग्निवेशो यतोऽभवत्। अथ भेदादयश्चक्रुः स्वं स्वं तन्त्रं .......'।।
इत्यादि द्वारा अग्निवेश आदियों को जो तन्त्रकर्ता के रूप में उल्लेख किया है, वह उपर्युक्त परिभाषा के अनुसार ही है।
संहिताओं का निर्माण ऋषियों द्वारा स्वयं अथवा उनके उपदेशों को शब्दशः अथवा अर्थशः (भावार्थ) ग्रहण करके शिष्यों द्वारा किये जाने की प्रायः प्रथा है। शिष्यों द्वारा निर्माण किये जाने पर भी केवल उनके भावों को प्रकट करने के कारण संहिताओं का नाम मूल आचार्य के अनुसार ही रखा जाता है। तन्त्रकर्ता मूल संहिता के उपक्रम तथा उपसंहार में प्रश्नोत्तर रूप में अपने तथा दूसरों के मतों को देकर उसे तन्त्र का रूप दे देते हैं। अन्य विशेषताओं को प्रविष्ट करके प्रतिसंस्कर्ता मूलसंहिता को विशालरूप में उपस्थित कर देते हैं। इस प्रकार प्रतिसंस्कर्ता के लेख में तन्त्र का तथा तन्त्र में संहिता का अन्तर्भाव होता है।
जिस प्रकार उपलब्ध चरक तथा सुश्रुत में क्रमशः आत्रेय तथा धन्वन्तरि की उक्तियां गुरु सूत्र के रूप में, अग्निवेश सुश्रुत आदियों की पूरितोक्तियां शिष्य सूत्ररूप में, अन्य आचार्यों की उक्तियां एकीय सूत्ररूप में तथा चरक, दृढबल आदि की उक्तियां प्रतिसंस्कर्तृ सूत्र के रूप में एकत्र¹ मिलती हैं, उसी प्रकार काश्यपसंहिता में भी काश्यप की उक्तियां गुरुसूत्र के रूप में, वृद्धजीवक की उक्तियां शिष्य सूत्र के रूप में, अन्य आचार्यों की उक्तियां एकीयसूत्र के रूप में तथा वात्स्य की उक्तियां प्रतिसंस्कर्तृ सूत्र के रूप में एकत्रित मिलती हैं।
जिस प्रकार पुनर्वसु आत्रेय द्वारा सर्वप्रथम उपदिष्ट संहिता को लेकर बनाये हुए अग्निवेश के तन्त्र को ही चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत करके प्रकाशित किया जाने से, आत्रेयसंहिता ही अग्निवेश तन्त्र के रूप को प्राप्त करके आजकल चरक संहिता के रूप में दृष्टिगोचर होती है। अथवा जिस प्रकार धन्वन्तरि के अष्टप्रस्थानात्मक उपदेश को लेकर दिवोदास द्वारा अन्य प्रस्थानों के उपदेशों के लुप्त हो जाने पर भी केवल शल्य प्रस्थान के विषय में उपदिष्ट संहिता को सुश्रुत ने अपने तन्त्र का रूप दिया तथा उसी का समयान्तर से संस्कार हुआ, इसलिये धन्वन्तरिसंहिता (विशेषकर शल्यसम्बन्धी विषय) ही, आजकल सुश्रुतसंहिता के रूप में मिलती है। उसी प्रकार संहिताकल्पाध्याय के लेख के अनुसार काश्यपसंहिता ही संक्षिप्त वृद्धजीवकीयतन्त्र का रूप धारण करके तथा समयान्तर से वात्स्य द्वारा प्रतिसंस्कृत होकर इस ग्रन्थ के रूप में हमारे सामने विद्यमान है। ज्यों-ज्यों उत्तरकक्षा आती है त्यों-त्यों पूर्वकक्षा पृथक् रहती हुई भी, आवापीद्वाप, विवर्धन एवं संस्कार से अन्य स्वरूप के उदय एवं प्रचार के कारण विलुप्त हो जाती है अथवा उत्तरकक्षा में अन्तर्निहित होकर एक शरीर हो जाती है (परस्पर मिल जाती है) इस प्रकार तृतीय संस्कार से युक्त होकर ये संहिताएं तन्त्र तथा प्रतिसंस्कार
१. इसकी टि. उपो. संस्कृत पृ. ८६ देखें।
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २६३
हमारे दृष्टिगोचर होते हैं। यद्यपि इन ग्रन्थों के पूर्वापर पर्यालोचन करने पर कहीं प्राचीन एवं प्रौढ लेखशैली तथा कहीं साधारण शैली के दिखाई देने से विवेचकों को इनके विषय में कुछ प्रकाश मिल सकता है तथापि वर्तमान चरकसंहिता में कितना अत्रेय का तथा कितना अंश अग्निवेश और चरक का है, सुश्रुत संहिता में भी कितना अंश मूल धन्वन्तरि का तथा कितना अंश दिवोदास, सुश्रुत तथा प्रतिसंस्कर्ता का है, इसी प्रकार काश्यपसंहिता में भी कितना अंश मूलकाश्यपसंहिता का है और कितना अंश वृद्धजीवक एवं वात्स्य का है तथा वृद्धजीवक द्वारा किये गये संक्षेप का क्या स्वरूप है इत्यादि बातों का ठीक-ठीक ज्ञान होना संभव नहीं है।
कश्यप, आत्रेय, भेड तथा सुश्रुत के ग्रन्थों की परस्पर तुलना
प्राचीन संहिताओं में पूर्व उपलब्ध चरक, भेड तथा सुश्रुतसंहिता और नवीन उपलब्ध काश्यपसंहिता के स्थान, अध्याय, प्रकरण, ग्रन्थ रचना तथा विषयों की परस्पर तुलना करने पर निम्न समानताएँ एवं विषमताएँ दृष्टिगोचर होती हैं। इस काश्यपसंहिता के प्रकरण एवं अध्यायों का स्वयं ग्रन्थकार ने कल्पस्थान के अन्तिम अध्याय में इस प्रकार वर्णन किया है—
‘अष्टौ स्थानानि वक्ष्यानि........तन्त्रं सखिलमुच्यते’ (मूल उपोद्घात पृ. ६२-६३ देखें)।
काश्यप, चरक, भेड तथा सुश्रुत संहिताओं के स्थान एवं अध्यायों की तुलना निम्न प्रकार से की जा सकती है—
| स्थान | वृद्धजीवकीय तन्त्र | चरक | भेडतन्त्र | सुश्रुत |
|---|---|---|---|---|
| सूत्रस्थान अध्याय | ३० | ३० | ३० | ४६ |
| निदानस्थान अध्याय | ८ | ८ | ८ | १६ |
| विमानस्थान अध्याय | ८ | ८ | ८ | × |
| शारीरस्थान अध्याय | ८ | ८ | ८ | १० |
| इन्द्रियस्थान अध्याय | १२ | १२ | १२ | × |
| चिकित्सास्थान अध्याय | ३० | ३० | ३० | ४० |
| सिद्धिस्थान अध्याय | १२ | १२ | ९ (१२ ?) | × |
| कल्पस्थान अध्याय | १२ | १२ | ८ (१२ ?) | ८ |
| योग | १२० | १२० | १२० | १२० |
| खिलभाग | ८० | — | — | ६६ |
उपर्युक्त चारों ग्रन्थों में से चरक, भेड तथा काश्यपसंहिता आदि तीनों में खिल स्थान को छोड़कर स्थान, अध्याय तथा अध्यायों की कुल संख्या में भी समानता¹ है। काश्यप एवं चरक संहिता में केवल सिद्धि एवं कल्पस्थान के पूर्वापर का ही भेद है। ग्रन्थों के अवयवों का विभाजन करने पर हम कह सकते हैं कि काश्यपसंहिता की चरक और भेडसंहिता में छाया दिखाई देती है अथवा उपर्युक्त तीनों ग्रन्थकारों ने किसी एक ही आचार्य का अनुसरण किया प्रतीत होता है। इन सब आचार्यों के पश्चिमप्रदेश के निवासी होने के कारण इनके ग्रन्थों में समान छाया का होना उचित भी है। इनमें से भी चरक तथा भेडसंहिता में एक ही चिकित्सा का विषय होने से तथा एक ही आत्रेय के उपदेशों को ग्रहण करके
१. भेडसंहिता के अध्याय भी अन्य स्थानों में समान है परन्तु सिद्धि एवं कल्पस्थान के खण्डित होने पर भी चरक तथा काश्यप संहिता के अनुसार कुल १२० अध्याय प्रतीत होते हैं।
१८ का.सं.
२६४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
अग्निवेश तथा चरक द्वारा तन्त्रों के निर्माण का उल्लेख मिलने से नामों के निर्देश तथा विषयों के निरूपण में विशेषरूप से समानता मिलती है। चरक तथा भेडसंहिता दोनों में निदान-स्थान में आठ प्रधान रोग दिये गये हैं। चिकित्सा स्थान में भी दोनों में उन्हीं पूर्वोद्दिष्ट आठ रोगों काही पहले वर्णन करके फिर आगे अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार बहुत से रोगों की चिकित्सा दी गई है। दोनों के सूत्रस्थान में आये हुए समान नाम एवं तुल्य विषय वाले अध्यायों का उल्लेख पहले किया ही जा चुका है। इस प्रकार आगे भी बहुत से स्थानों पर समानता दिखाई देती है। भेड केवल इतना ही है कि भेड की रचना संक्षिप्त, साररहित तथा साधारण है, परन्तु इसके विपरीत स्वयं आत्रेय अथवा अग्निवेश की रचना में तो प्रौढता एवं विषयगाम्भीर्य है ही अपितु पीछे से चरक तथा दृढबल द्वारा किये गये संस्करण में भी गूढ भाव एवं रहस्यपूर्ण तथा असाधारण रचना दिखाई देती है।
इस काश्यपसंहिता के कौमारभृत्य का ग्रन्थ होने से इसमें बालकों के तथा धात्री, गर्भिणी और सूतिका के विषय होने से अनेक विशेष विषय, ग्रहरोग तथा भैषज्यप्रक्रियाओं का भेद होने पर भी उपलब्ध भाग में स्नेहाध्याय आदि समान नाम वाले साधारण विषय थोड़े बहुत अन्तर के साथ निम्नरूप में मिलते हैं—
| काश्यपसंहिता | आत्रेय (चरक) संहिता |
|---|---|
| २२ वां स्नेहाध्याय | १३ वां स्नेहाध्याय |
| २३ वां स्वेदाध्याय | १४ वां स्वेदाध्याय |
| २४ वां उपकल्पनीयाध्याय | १५ वां उपकल्पनीयाध्याय |
| २५ वां वेदनाध्याय | १६ वां चिकित्साप्राभृतीयाध्याय |
| २६ वां चिकित्सासांपदीयाध्याय | १७ वां कियन्तःशिरसीयाध्याय |
| २७ वां रोगाध्याय | १८ वां त्रिशोथाध्याय |
| १९ वां अष्टोदरीय रोगाध्याय | |
| २० वां महारोगाध्याय | |
| २१ वां अष्टौ निन्दितीयाध्याय |
आत्रेय तथा काश्यपसंहिता में कहीं-कहीं शब्दों तथा रचना में भेद होने पर भी विषय तथा कहीं-कहीं लेख की शैली में परस्पर समानता मिलती है।
१. काश्यपसंहिता के खिलभाग हैं—
यथा विषं यथा शस्त्रं यथाऽग्निरशनिर्यथा। तथौषधमविज्ञातं विज्ञातममृतोपमम्।।
आत्रेय (चरक) संहिता के सूत्रस्थान के प्रथम अध्याय में—
यथा विषं यथा शस्त्रं यथाऽग्निरशनिर्यथा। तथौषधमविज्ञातं विज्ञातममृतोपमम्।।
यह ^१समान श्लोक दोनों में इसी रूप में मिलता है। इस प्रकार के श्लोक को देखकर प्रतीत होता है कि एक पूर्व आचार्य द्वारा उद्धृत श्लोक को दूसरे अर्वाचीन आचार्य ने ग्रहण किया हो अथवा किसी एक ही पूर्व आचार्य का यह श्लोक किन्हीं बाद में होने वाले दोनों आचार्यों ने ग्रहण कर लिया हो यह भी संभव है।
१. इसी प्रकार निम्न श्लोक भी दोनों संहिताओं के इन्द्रियस्थानों में एक ही रूप में मिलता है—
यस्य गोमयचूर्णाभं चूर्णं मूर्धनि जायते। सस्नेहं भ्रश्यते चैव मासान्तं तस्य जीवितम्।। (अनुवादक)
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २६५
२. काश्यप संहिता में—
औषधं चापि दुर्युक्तं .... (मूल उपोद्घात पृ. ६३)
आत्रेय संहिता में—
औषधं ह्यनभिज्ञातं .... (मूल उपो. पृ. ६३)
इसी प्रकार काश्यपसंहिता के खिलस्थान के ज्वर चिकित्सा में—
सर्पिः पित्तं शमयति .... (मूल उपो. पृ. ६३)
आत्रेयसंहिता के ज्वरनिदान प्रथम अध्याय में—
स्नेहाद् वातं शमयति .... (मूल उपो. पृ. ६३)
काश्यपसंहिता में—
मज्जावसे वसन्ते .... (मूल उपो. पृ. ६३)
आत्रेय (चरक) संहिता में—
सर्पिः शरदि पातव्यं .... (मूल उपो. पृ. ६४)
इस प्रकार रचनाभेद से दोनों ग्रन्थों में एक ही विषय मिलता है।
३. काश्यपसंहिता के रोगाध्याय में रोग के विषय में एक से लेकर आठ तक भेद देकर अन्त में असंख्येयवाद दिया है। इसी प्रकार आत्रेय संहिता के सूत्रस्थान २६ अध्याय में रस के विषय में भी एक से प्रारंभ करके पहले आठ तक भेद देकर अन्त में असंख्येयवाद दिया होने से दोनों में समान शैली दृष्टिगोचर होती है।
४. रोगों के विषय में काश्यपसंहिता में (पृ. ४१) जो ८० वातिक, ४० पैत्तिक तथा २० श्लैष्मिक रोग दिये हैं। चरकसंहिता के सूत्रस्थान के २० वें अध्याय में भी वे ही रोग उतनी संख्या में तथा लगभग उन्हीं नामों से दिये हैं। इस प्रकार इस विषय में बहुत समानता है।
५. काश्यपसंहिता के लक्षणाध्याय (पृ. ५१) में सात्विक राजस तथा तामस सत्त्वों के जो अवान्तर भेद दिये हैं, आत्रेयसंहिता के शारीरस्थान के सातवें अध्याय में भी केवल सात्त्विक भेदों में एक भेद कम है, अन्य सब भेद समान हैं। दोनों की लेखशैली को देखन पर भी गम्भीर विचार एवं नये-नये विषयों से युक्त प्रौढ शैली दृष्टिगोचर होती है।
सुश्रुतसंहिता में तो खिलस्थान से पूर्वभाग में अध्यायों की कुल संख्या में १२० की समानता होने पर भी विमान, इन्द्रिय तथा सिद्धिस्यान नहीं हैं, शेष पांच स्थान ही हैं तथा उनमें भी अध्यायों की संख्या में समानता नहीं है। गर्भावक्रान्ति अध्याय में बालक तथा धात्री आदि से संबद्ध विषयों के भी होने से कर्णवेध, स्तन्यपरीक्षा, सामुद्रिक लक्षण तथा सत्त्वभेद इत्यादि कुछ विषयों में प्रायः वृद्धजीवकीयोक्त विषयों से समानता दिखाई देती है। शल्य-प्रधान सुश्रुत में शल्य से संबन्धित विषय पूर्वभाग में हैं तथा—शालाक्य आदि अन्य विषय उत्तरतन्त्र में दिये हुए हैं। खिलभाग में ६६ अध्याय हैं। वृद्धजीवकीयतन्त्र में बालकोपयोगी प्रधान विषयों का पूर्वभाग में पहले संक्षेप में निर्देश करके फिर खिलभाग में भी प्रायः वे ही कुछ पूर्वभाग में आये हुए धात्री आदि से संबन्धित विषय विस्तार से दिये हैं। इसमें खिल भाग में ८० अध्याय हैं। इस दृष्टि से कुछ समानता है तथा भिन्न विषय होने से, उनके भागानिरूपणशैली तथा रोगों के निर्देश आदि में विषमता दिखाई देती हैं।
२६६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
इन प्राचीन आर्ष ग्रन्थों की आलोचना करने पर हम देखते है कि शारीर, विमान, इन्द्रिय तथा सिद्धि स्थान आदि के विषयों को अन्य स्थानों में देकर सुश्रुत में कहीं-कहीं उस स्थान के पृथक् दिया होने पर भी अन्य ग्रन्थों के समान यहाँ भी अष्टस्थानीय विषयों के होने से अवान्तर अध्यायों में कहीं-कहीं विषमता होने पर भी बहुत से स्थानों में समानता भी है। अध्यायों की कुल संख्या में सर्वत्र समानता है। प्रतिपात्र विषयों में भी अपने-अपने ग्रन्थ के प्रधान विषयों के मिलने पर भी साधारण विषय सबमें मिलते हैं। उन-उन अध्यायों में उन-उन विषयों के निरूपण की समानता तथा न्यूनाधिक रूप में बहुत से अध्यायों के नामों में भी समानता मिलती है। इससे इन सबका किसी एक ही प्राचीन सम्प्रदाय का अनुसरण किया जाना अथवा समकाल में प्रचलित एक लेखशैली प्रतीत होती है।
कश्यप, आत्रेय तथा धन्वन्तरि के सम्प्रदाय भिन्न होने पर भी इनमें परस्पर परिचय एवं आदर था। काश्यपसंहिता में नामनिर्देशपूर्वक आत्रेय पुनर्वसु का मत दिया हुआ है। द्विव्रणीयाध्याय (पृ. १२३) में शल्यक्रिया को लक्ष्य करके कहा है—
परतन्त्रस्य समयं.....(मूल उपो. पृ. ६४)
इस प्रकार शल्य विद्या की उपादेयता का निर्देश करके अत्यन्त छोटे बालकों के व्रण के उपक्रम के विषय में कहा है कि—
‘तेषामुपक्रमं....संशमनं बन्धनमुत्क्लिन्नप्रक्षालनं, कल्कप्रणिधानं, शोधनं, रोपणं, सवर्णीकरण-मित्येतैः.....शमयेत्, स्स्रावणपाटनदहनसीवनैषणसाहसादीन्यतिबालेषु न कुर्यात्’
रोगाध्याय में व्रण के बन्धन, रोपण आदि के निम्न प्रयोग देकर उचित शल्यक्रिया का भी निर्देश किया है—
वैसर्पणं चात्र वदन्ति सिद्धं......(मूल उपो. पृ. ६४)।
अश्मरी के प्रकरण में निम्न श्लोकों में अश्मरी के उद्धरण का निर्देश करके अत्यन्त छोटे बालकों में इसका निषेध किया गया है—
शल्यवत्यश्मरी बस्तौ ........ (मूल उपो. पृ. ६४)।
इस प्रकार कश्यप द्वारा शल्यक्रिया का आदरपूर्वक परिचय एवं उसके प्रयोग तथा अप्रयोग का वर्णन मिलता है। आत्रेयसंहिता में भी कश्यप का मत तथा धान्वन्तर धृत आदि का उपयोग मिलता है।
दाहे धान्वन्तरीयाणामत्रापि भिषजां मतम् । (च.चि.अ. ५)
इत्यादि वाक्यों में अनेक स्थानों में धान्वन्तरीय प्रक्रिया का निर्देश करने से आत्रेय के भी इस विषय में ज्ञान का परिचय मिलता है।
भेडसंहिता में भी चरकसंहिता में निर्दिष्ट आत्रेय के मत तथा कश्यप के मत का उल्लेख मिलता है—
पिवेकल्याणकं सर्पिः ........ (मूल उपो. पृ. ६४)।
इत्यादि वाक्यों में धान्वन्तर औषधों का उपयोग दिया है। तथा छिद्रोदर (पृ. १६८) और अर्शरोग (पृ. १८२) में शस्त्रक्रिया का निर्देश है। इस प्रकार भेड द्वारा भी कश्यप, आत्रेय तथा धन्वन्तरि सम्प्रदायों का आदर किये जाने का वर्णन मिलता है।
सुश्रुतसंहिता के अश्मरी प्रकरण (चि. अ. ७) में निम्न श्लोकों द्वारा शल्यतन्त्र का आचार्य सुश्रुत भी कायचिकित्सा के प्रति आदर प्रकट करता है—
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २६७
घृतैः क्षारैः कषायैश्च.......(मूल उपो. पृ. ६४)।
अष्टप्रस्थानाचार्य धन्वन्तरि के प्रस्थानान्तर (अन्य विषय संबन्धी) निबन्धों में कौमारभृत्य आदि विशेष विषयों का विशेषरूप में सम्भवतः निर्देश हो। इस शल्यसम्बन्धी निबन्ध (सुश्रुतसंहिता) के भी पूर्वभाग में शारीर स्थान में गर्भिणी के प्रकरण में (पृ. ३०३) प्रसङ्गवश कौमारभृत्यसम्बन्धी विषयों का भी संक्षेप में निर्देश किया गया है। यहां पर अन्य आचार्यों के नामनिर्देश के बिना ही जो इस प्रकार के कौमारभृत्य विषय का वर्णन किया है, वह कश्यप के मत को देखकर लिखा गया है अथवा स्वयं उसका ही मत है यह तो नहीं कहा जा सकता परन्तु इतना अवश्य कहा जा सकता है कि कौमारभृत्य के विषय में भी उसका प्रवेश अवश्य था। ये स्वयं एक-एक विषय के आचार्य होते हुए अन्य विषयों में उन-उन आचार्यों का सम्मान करते थे। आजकल भी भिन्न-भिन्न अंगों की चिकित्सा में विशेष निपुण (Specialist) पाश्चात्य चिकित्सक अन्य अंगों की चिकित्सा में उस-उस अंग के रोगों के विशेषज्ञों का आदर करते हैं। कायचिकित्सकों (Physicians) को शस्त्रचिकित्सकों (Surgeons) की तथा शस्त्रचिकित्सकों को कायचिकित्सकों की उस-उस विषय में अपेक्षा होती है। तथा यह उचित भी है। किन्तु आत्रेय, भेड आदि ने कश्यप आत्रेय आदि का नामपूर्वक निर्देश किया है, किन्तु सुश्रुत ने कायचिकित्सकों के नाम नहीं दिये हैं अपि तु केवल उनके विषयों का ही निर्देश किया है। कश्यप द्वारा आत्रेय के नाम का निर्देश होने पर भी शिष्योपक्रमणीय अध्याय में ‘धन्वन्तरये स्वाहा' द्वारा देवता रूप में धन्वन्तरि के नाम के निर्देश के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं भी उपलब्ध ग्रन्थ में आचार्य रूप में धन्वन्तरि के नाम का उल्लेख नहीं किया है, अपितु केवल शल्यसम्प्रदाय का ही उल्लेख किया है। वह सम्प्रदाय धन्वन्तरि, दिवोदास अथवा अन्य किसी प्राचीन आचार्य का है, यह नहीं कहा जा सकता है। वेदों में भी शल्यविद्या के मिलने से यह कहा जा सकता है कि वैदिककाल से ही धाराप्रवाह रूप में आने वाली यह शल्यविद्या आत्रेय, कश्यप आदि से पूर्व भी विद्यमान एवं आदृत थी। आत्रेय पुनर्वसु ने भी केवल धन्वन्तरि का ही उल्लेख किया है, दिवोदास तथा सुश्रुत का नहीं। यह नहीं कहा जा सकता है कि धान्वन्तरीय शब्द से सुश्रुत आदि का अभिप्राय है अथवा धान्वन्तर शल्य सम्प्रदाय के अन्य प्राचीन आचार्यों का ग्रहण किया जाता है। उस लेख से केवल शल्यसम्प्रदाय के पूर्व आचार्यों का ही ज्ञान होता है।
इस ग्रन्थ का विषय
इस ग्रन्थ का विषय कौमारभृत्य है। इसका प्रयोजन सुश्रुत ने ‘‘कौमारभृत्यं नाम कुमारभरण.....’’ (मू. उपो. पृ. ६५)। (सू. अ. १) बतलाया है। अर्थात् बालकों के पालनपोषण, धात्री के क्षीरदोष (दूषितदूध) के संशोधन तथा दूषित दूध एवं ग्रहों से उत्पन्न होने वाले रोगों की शान्ति के लिये कौमारभृत्य का प्रयोजन है। सुश्रुत ने अपने ग्रन्थ के शल्यप्रधान होने से सूत्र स्थान¹ के अनुसार उत्तरतन्त्र में २७ से ३८ तक के १२ अध्यायों में कौमारभृत्य विषय का वर्णन किया है। किन्तु वहां पर विशेष रूप से ग्रह, स्कन्द, पूतना आदि के प्रतिषेध तथा उनके लिये कुछ उपयोगी ओषधियों का ही उल्लेख किया है। इस प्रकार इसमें बहुत से ज्ञातव्य विषयों का उल्लेख न होने से सुश्रुत का कौमारभृत्य पूर्ण न होकर आंशिक रूप में ही प्रतीत होता है। चरकाचार्य ने अपने ग्रन्थ में मुख्य रूप से कायचिकित्सा का ही विषय होने के कारण आयुर्वेद के आठ अङ्गों में से कौमारभृत्य का केवल नाम मात्र ही उल्लेख किया है।
इस काश्यपसंहिता में तो बालकों की उत्पत्ति, रोग, निदान, चिकित्सा, ग्रह आदि का प्रतिषेध तथा उससे संबन्धित अन्तर्वत्नी (गर्भिणी) तथा दुष्प्रजाता तथा धात्री आदि के दोषों के निर्हरण के उपयोगी विषयों तथा उसके साथ ही शारीर, इन्द्रिय तथा विमानस्थान आदि में आने वाले विषयों को मुख्यरूप से देकर बीच-बीच में प्रासङ्गिक एवं विषयान्तरों से
१. इसकी टि. उपो. संस्कृत पृ. ९१ देखें।
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उसकी पूर्ति की है। इस प्रकार ग्रन्थ के आदि से अन्त तक मिलने वाले इस कौमारभृत्य विषय के उपलब्ध भाग की तरह खण्डित भाग में भी मिलने की संभावना होने से इस ग्रन्थ का विषय सर्वाङ्गसम्पन्न कौमारभृत्य प्रतीत होता है। तथा यही बात ग्रन्थ में स्थान-स्थान पर आये हुए बालसंबन्धी प्रश्नोत्तरों, ‘कौमारभृत्यमष्टानां तन्त्राणामाद्यमुच्यते (पृ. ६१) कौमारभृत्यमतिवर्धनमेतदुक्तम्’ (पृ. ९२), इत्यादि ग्रन्थान्तर्गत वाक्यों तथा कहीं-कहीं पुष्पिकावाक्यों में आये हुए ‘कौमारभृत्ये’ (पृ. ९२, १४५ सं. क.) इत्यादि पदों से भी प्रकट होती है।
प्राचीन नावनीतक नामक ग्रन्थ के कौमारभृत्य विषयक चौदहहवें अध्याय में कश्यप तथा जीवक के नामोल्लेख सहित नाना औषध प्रयोगों के मिलने से तथा अष्टाङ्गहृदय के उत्तरतन्त्र में कौमारभृत्य विषयक तीन अध्यायों में कश्यप के नाम से दिये हुए दन्तरोग भैषज्य तथा ग्रहहर दशाङ्गधूप तथा काश्यपसंहिता के अनुरूप स्तन्यदोष परीक्षा आदि के मिलने से ये दोनों लेखक भी कौमारभृत्य के विषय में इसे प्रामाणिक मानते हैं। सुश्रुतसंहिता के कौमारभृत्य प्रकरण में ‘ये च विस्तरतो दृष्टाः कुमाराबाधहेतुभिः’ द्वारा सामान्य निर्देश होने पर भी उसकी व्याख्या में डल्लन द्वारा ‘पार्वतकजीवकबन्धकप्रभृतिभिः’ में उल्लिखित कौमारभृत्य के तीन आचार्यों में से दो का तो केवल नाम ही शेष बचा हुआ है, इस ग्रन्थ के मिलने से जीवक अवश्य हमारे सामने पुनः आ जाता है—
कौमारभृत्यास्त्वपरे जङ्गमस्थावराश्रयात्। द्वियोनिं ब्रुवते धूपं कश्यपस्य मते स्थिताः ॥
(क.स्थान. धू.क.)
काश्यपसंहिता के उपर्युक्त उल्लेख से प्रतीत होता है कि कौमारभृत्य के विषय में अन्य भी प्राचीन आचार्य हुए हैं। कश्यप के अन्य भी अनुयायी थे तथा कौमारभृत्य के विषय में कश्यप प्रधान आचार्य था, यह भी ज्ञात होता है।
कौमारभृत्य के विषय में, शारीरिकप्रकृति के विपरीत हो जाते से, स्कन्दरेवती आदि बालग्रहों की विकृति से तथा स्तन्य आदि के दूषित होने से उत्पन्न होने वाले बालकों के रोगों का उल्लेख करके नाना ओषधियां, बालग्रहप्रतिकार तथा अन्य भी इससे संबन्धित विषय दिये होते हैं। कायचिकित्सा तथा भूतविद्या के बालभैषज्यसंबन्धी तथा गर्भ, धात्री एवं सूतिकासबन्धी विषयों को प्रधानरूप से लेकर तथा उसे ही बढ़ाकर पृथक् प्रस्थान के रूप में इस कौमारभृत्य का उदय होता है। इस प्रकार इस कौमारभृत्य में चिकित्सा के समान के समान भूतविद्या के विषयों का भी प्रवेश है। भैषज्य विद्या के समान भूतग्रहादि प्रतिषेध विद्या वैदिक अवस्था में भी थी। छान्दोग्य उपनिषद् के सप्तम अध्याय में ‘नक्षत्रविद्यांभूतविद्यां सर्पजनविद्याम्’ द्वारा प्राचीन विद्याओं में भूतविद्या का भी निर्देश किया गया है। अथर्ववेद में भी यह विद्या तथा इसके उपयोगी मन्त्र बहुत से मिलते हैं, इसका पहले भी उल्लेख किया जा चुका है। इसीलिये इसे आथर्वणविद्या भी कहा जाता है। इतिहास की दृष्टि से भी यह भूतविद्या प्राचीन काल में सर्वत्र मिलने से अपनी सत्ता को अत्यन्त प्राचीन कालीन सिद्ध करती है।
कौमारभृत्य के विषय में आजकल क्रियाकालगुणोत्तरतन्त्र मिलता है। उसमें बालकों के रोगों को उत्पन्न करने वाले ग्रह, उस-उस दिन, मास तथा वर्ष के भेद से पीडा पहुंचाने वाले विशेष बालग्रह तथा उनके निवारक मन्त्रप्रयोग, कल्प, कुछ ओषधियां तथा धातु आदियों का वर्णन किया गया है। इसमें शकुनी, रेवती, पूतना आदि के अतिरिक्त अन्य भी सैकड़ों बालग्रह दिये हैं। मन्त्रों में भी पौराणिक छाया मिलती है तथा विधानमाला से उद्धृत स्कन्द तथा मार्कण्डेय पुराण के वाक्य दिये हुए हैं। आजकल बालतन्त्र के विषय में बालचिकित्सामृत¹ कल्याणवर्मा कृत, बालतन्त्र तथा योगसुधानिधि आदि अर्वाचीन ग्रन्थ भी मिलते हैं। इनमें भी वर्ष, मास तथा दिनों के भेद से विभिन्न बालग्रह दिये हुए हैं। इस प्रकार
१. बालचिकित्सामृत नाम की ताडपत्र पर लिखित जीर्णप्राय पुस्तक नेपाल के राजकीय पुस्तकालय में है जिसमें अपने तथा दूसरों के बनाये हुए पद्यों में बालरोगों की ओषधियों का संग्रह किया गया है।
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद
२६९
इन ग्रन्थों में तथा क्रियाकालगुणोत्तर तन्त्र में समान छाया मिलती है। इस काश्यपसंहिता में तो ग्रह पूतना आदि थोड़े ही ग्रह दिये हैं तथा वर्ष, मास एवं दिन के भेद से विभिन्न ग्रह भी नहीं दिये हैं, स्कन्द रेवती तथा पूतना आदि प्राचीन नामों से ही इनका उल्लेख किया गया है। इसमें मन्त्रों में भी प्रायः वैदिक छाया मिलती है। कहीं-कहीं (मातङ्गीविद्या के प्रकरण (पृ. २०० में) प्राकृतिक शब्दों से युक्तमन्त्र मिलते हैं तथा भैषज्य विषय भी भिन्न ही है। इस प्रकार इन दोनों में विभिन्न प्रक्रिया दिखाई देती है। दोनों ग्रन्थों के विषयों की तुलना करने पर क्रियाकालगुणोत्तर तन्त्र में विकसित अवस्था दिखाई देती है तथा काश्यपसंहिता में उसकी अपेक्षा अत्यन्त प्राचीन सम्प्रदाय का आश्रय मिलता है। सुश्रुत में दिये हुए बालग्रहों में भी विकसित अवस्था नहीं मिलती है।
रावणकृत¹ बालकुमारतन्त्र, कुमारतन्त्र अथवा दशग्रीवबालतन्त्र नामक एक प्राचीन बालतन्त्र मिलता है। ऐसा भी सुना जाता है कि इस तन्त्र का छठी-सातवीं शताब्दी में चीनीभाषा में किया गया अनुवाद भी है। इस ग्रन्थ के विषय में ‘बिब्लियोथीक नेशनल पेरिस’ नामक पुस्तक में विशेष विवरण दिया हुआ है। उस प्राचीन काल में तथा इतनी दूर अनुवाद के होने से ग्रन्थ को इससे भी प्राचीन होना चाहिये। इस ग्रन्थ में भी वर्ष मास तथा दिनों के भेद के अनुसार ग्रह पूतना आदि के भेदों का उल्लेख होने से विकसित अवस्था को भी अर्वाचीन नहीं कहा जा सकता, तब अविकसित अवस्था को तो इससे भी अवश्य प्राचीन होना चाहिये।
बालग्रह रूप से स्कन्द का उल्लेख तथा उसकी आराधना विधि इस संहिता में मिलती है। स्कन्द की उपासना प्रणाली प्राचीन है। छान्दोग्य² उपनिषद्, गीता³ तथा महाभारत⁴ में भी स्कन्द का उल्लेख मिलता है। महाभारत के वनपर्व में स्त्रियों के गर्भनाशक तथा बालकों के रक्षाकर रूप में स्कन्द का उल्लेख है। स्कन्द आदियों का बालग्रह के रूप में महाभारत तथा सुश्रुत में प्रायः समानरूप से वर्णन किया गया है। पारस्कर गृह्यसूत्र में भी नवजात बालक के विनाश के हेतुरूप में स्कन्द का उल्लेख किया गया है। इसका श्रीयुत मन्मथ⁵ नाथ मुखोपाध्याय ने विशेषरूप से वर्णन किया है।
इस काश्यप संहिता में स्थान-स्थान पर मिलने वाले अनेक नवीन विषय, विचार, सुन्दर निरूपण शैली तथा विशेष दृष्टिकोण इस निबन्ध के विषय में प्राचीन ऋषियों के विचारों की उच्चता को प्रकट करते हैं।
उदाहरण के लिये
दन्तजन्माध्याय (पृ. ११) में दांतों के भेद, उनके सम्पक् एवं असम्पत् (गुण और दोष), बालक तथा बालिकाओं के दांतों में भेद इत्यादि दांतों के विषय में अनेक कई बातें मिलती हैं जो अन्यत्र उपलब्ध नहीं होती हैं।
स्वेदाध्याय (पृ. २६) में स्वेद के विषय में अनेक ज्ञातव्य विषयों का निरूपण किया है। आधुनिक बाष्पस्वेद (Steam bath) आदि की प्रक्रियाओं से इसमें कोई कमी दिखाई नहीं देती। बालकों के स्वेदन के विषय में मार्मिक प्रक्रिया का वर्णन मिलता है।
लक्षणाध्याय (पृ. ५७) में सामुद्रिक लक्षणों का विशेष वर्णन किया है परन्तु के अन्त में खण्डित हैं। लक्षणप्रकाशोद्धृत पाराशरसंहिता में भी इसी प्रकार के प्रौढ़ सामुद्रिक लक्षण दिये हैं। इस ग्रन्थ के खण्डित अंश के विषय को भी वहीं से देखना चाहिये।
१. इस बालतन्त्र में नन्दा, सुनन्दा, पूतना, मुखमण्डिका कटपूतना, शकुनिका, शुष्करेवती, अर्यका, सूतिका, निर्ऋतिका, पिलिपिच्छिका तथा कामुका इन १२ मातृकाओं का निर्देश है। ग्रन्थलेख निम्न प्रकार से है—
प्रथमे दिवसे मासे वर्षे वा....(मूल उपोद्घात पृ. ९२ देखें)।
(१) २-५ की टि. उपो. संस्कृत पृ. ९३ देखें।
२७० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
रोगों में अन्य उपद्रवों के उत्पन्न हो जाने पर पूर्व रोग या उपद्रव की पृथक्-पृथक् चिकित्सा के सिद्धान्त को न मानकर दोनों की साथ-साथ चिकित्सा के विषय में अपनी सम्मति दी है। (पृ. ३९)।
प्रसव के विलम्ब होने में (Delayed delivery) अन्य आचार्यों के व्यायाम तथा मुसल आदि के द्वारा आघात करने के पक्ष का युक्तिपूर्वक खण्डन किया गया है (पृ. ८५)।
अत्यन्त छोटे बालकों में अश्मरी के उद्धरण तथा तीक्ष्ण ओषधियों के प्रयोग का विशेष रूप से निषेध किया गया है (पृ. १२२)।
बालकों में बस्तिकर्म के अच्छी प्रकार प्रयुक्त किये जाने पर वैद्य बालक तथा उसके पिता आदि सबके लिये वह श्रेयस्कर है तथा ठीक प्रकार से प्रयुक्त न की जाने पर अनर्थ करती है, इस लिये बालकों में किस समय से लेकर बस्तिकर्म करना चाहिये, इस विषय में अनेक आचार्यों तथा अपने मत को देकर विशेष विचार किया गया है (पृ. १४७)।
बालकों के फक्कारोग में तीन पहियों के रथ के निर्माण का उल्लेख मिलता है (पृ. १४१)
एकनाभिकयोः कस्मात् तुल्यं मरणजीवितम् । रोगारोग्यं सुखं दुःखं न तु तृप्तिः समानजा ।।
(पृ. १९४)
इत्यादि वाक्यों द्वारा यमल (जुडवां बालक-Twins) के विषय में विचित्र प्रश्न तथा युक्तिपूर्वक उत्तर दिया है विषमज्वर के निर्देश में तृतीयक, चातुर्थिक आदि ज्वरों के उस-उस दिन होने के कारणों का वर्णन किया है (पृ. २२९)।
अन्य सब आचार्यों द्वारा बालकों के छठे मास में अन्नप्राशन का विधान देने पर भी इस संहिता के आचार्य ने उस संस्कार का निर्देश करके छठे मास में केवल फलों के सेवन तथा १२ मास के बाद अन्न चाहने पर थोड़ा-थोड़ा अन्न देने का विधान दिया होने से, क्षीण अग्निबल वाले अत्यन्त छोटे बालक को मृदु पाकवाले फलों के रस तथा एक वर्ष के बाद अन्न का उपयोग लिखा है। आधुनिक पाश्चात्य विद्वान् भी इसी प्रकार अत्यन्त छोटे बालकों को फलों का उपयोग कराते हैं तथा १२ मास के बाद ही वे अन्न के उपयोग के पक्ष में हैं (खि. स्था. अ. १३)।
वेदनाध्याय में वाणी के द्वारा अपनी वेदना को प्रकट करने में असमर्थ बालकों की भिन्न-भिन्न चेष्टाओं के द्वारा अमुक-अमुक रोग तथा अमुक-अमुक अङ्गों की वेदनाओं के आनुमानिक ज्ञान का वर्णन मिलता है (पृ. ३३)।
आप्ततश्रोपदेशेन प्रत्यक्षकरणेन च । अनुमानेन च व्याधीन् सम्यग् विद्याद्विचक्षणः ।।
चरकसंहिता विमान स्थान के चतुर्थ अध्याय के उपर्युक्त श्लोक द्वारा निदान, पूर्वरूप तथा रूप (लक्षण) आदियों को जानने के लिये प्रत्यक्ष आदि उपाय दिये हैं। सुश्रुत ने भी दर्शन, स्पर्शन तथा प्रश्न आदि उपायों का उल्लेख किया है। इस प्रकार प्राचीन सम्प्रदाय में दर्शन, स्पर्शन तथा प्रश्न आदियों के द्वारा निदान आदि पञ्चरूपों की विवेचना करके रोगज्ञान का निर्देश किया है। नाडीविज्ञान का उल्लेख चरक, सुश्रुत आदि प्राचीन ग्रन्थों तथा इस काश्यपसंहिता में भी नहीं मिलता है। नाडीपरीक्षा का उल्लेख अर्वाचीन ग्रन्थों में ही मिलने से यह विषय पीछे से प्रचलित हुआ प्रतीत होता है। नाडीविज्ञान के भारत से चीन में जाने के कारण यह विज्ञान भारतीय ही प्रतीत होता है। यह विज्ञान भारत में ही आविर्भूत हुआ है अथवा किसी दूसरे देश से यहां आकर प्रचलित हुआ है, यह विषयान्तर होने से इसके विषय में हम अधिक विचार नहीं करेंगे। अस्तु, प्राचीन ग्रन्थों में इस विषय के न मिलने से इसे प्राचीन कहना कठिन है। अत्यन्त छोटे बालकों में अपने कष्ट को दूसरों को यथावत् समझाने के लिये वाक्शक्ति के उदय न होने से उसकी भिन्न-भिन्न चेष्टाओं से रोगों को पहचानने की प्रक्रिया इस काश्यपसंहिता के वेदनाध्याय (पृ. ३३) में तथा अन्यत्र भी स्थान-स्थान पर मिलती है।
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २७१
सूक्ष्म विचार शक्ति से विस्तृत दृष्टिकोण वाले प्राचीन आचार्य जिस-जिस विषय में भी प्रवृत्त होते हैं उस-उस विषय के अन्तस्तल तक प्रवेश करके यथावत् ज्ञान कराते हैं। कौमारभृत्य के विषय में प्रवृत्त हुए आचार्य कश्यप ने अन्य आचार्यों द्वारा सर्वसाधारण विषयों की तरह बालकों (विशेषकर अत्यन्त छोटे बालकों) के सम्बन्ध में अनेक उपयोगी विषयों का संकेत किया है।
वात, पित्त कफ आदि तीनों दोषों का निर्देश वैदिक साहित्य में भी मिलता है। ऋग्वेद में 'त्रिधातु शर्म वहतं शुभस्पती' द्वारा त्रिधातु शब्द का उल्लेख किया है। इस शब्द की सायन ने वात, पित्त, कफ रूप त्रिदोषपरक व्याख्या की है। ब्लूमफील्ड नामक विद्वान् ने भी उसी व्याख्या को स्वीकार किया है। जीमर आदि कुछ विद्वानों ने इसका दूसरा ही अर्थ किया है। किन्तु पी. सी. राय¹ महोदय लिखते हैं कि अथर्ववेद में आये हुए वातगुल्म तथा 'वातीकृता' इत्यादि पदों में दूसरे अर्थ की सङ्गति न होने से तथा सर्वत्र एक ही रूप के औचित्य के कारण यह शब्द त्रिदोषपरक ही होना चाहिये। इसका दूसरा अर्थ करना सङ्गत नहीं है। यह त्रिदोषपद्धति ग्रन्थों में भी आत्रेय, कश्यप तथा सुश्रुत आदि से लेकर आज तक धाराप्रवाह रूप से चली आ रही है। सुश्रुतसंहिता में अनेक स्थानों पर वात, पित्त कफ आदि तीनों दोषों अथवा धातुओं को देहसंभव तथा रोगोत्पत्ति में कारण माना गया है। सुश्रुत में कहीं-कहीं त्रिदोष² के साथ रक्त को भी चतुर्थ कारण माना है। प्राचीन महावग्ग के प्राचीन बौद्ध वैद्यक ग्रन्थ तथा ब्रावर द्वारा उपलब्ध नावनीतक आदि ग्रन्थों में भी त्रिदोषपद्धति का ही अवलम्बन किया प्रतीत होता है। महावग्ग तथा विनयपिटक में जीवक की चिकित्सापद्धति में भी यही त्रिदोषप्रक्रिया मिलती है। कात्यायन के वार्तिक में भी वात, पित्त तथा कफ का व्यवहार दिखाई देता है। ४६० वर्ष ईस्वी पूर्व प्राचीन हिपोक्रिटस नामक पाश्चात्त्य चिकित्सक के जन्म से पहले भी भारत में त्रिदोषपद्धति विद्यमान थी। उसके चिकित्सा विज्ञान में पित्त, कफ, रक्त तथा जल आदि चारों को जो दोष के रूप में दिया है, वह भी उसका हृदय भारतीय प्राचीन त्रिदोषपद्धति से अनुरक्त होने के कारण सुश्रुत के विचारों की विकसित अवस्था प्रतीत होती है।
प्राचीन विज्ञान में अग्नि³ तथा सोम अथवा उष्ण⁴ और शीत ये दो मौलिक तत्त्व माने गये हैं जो कि स्पष्टरूप से सब पदार्थों में ओतप्रोत हैं। जिससे वैदिक यज्ञप्रक्रिया में प्रारम्भ से ही अग्नि तथा सोम की उपासना की परिपाटी चली आ रही है। शारीरिक परिस्थिति में भी शीत तथा उष्ण के प्रतिनिधि सोम तथा अग्निरूप शुक्र तथा शोणित को शरीर की उत्पत्ति का कारण माना है इसीलिये सुश्रुत में गर्भ को 'अग्नीषोमीय' कहा है। प्राचीन आयुर्वेदाचार्यों ने वात के योगवाही होने से पित्त अथवा कफ के साथ मिल जाने पर भी अर्थ तथा क्रिया की विकसित दृष्टि के कारण सत्त्व, रज तथा तम की तरह अग्नि, वायु तथा सोमरूप वात, पित्त, कफ तीनों धातु देह की धारक तथा विकृत होने पर दोषरूप होकर रोगों के कारण के रूप में मानी है, इसी सिद्धान्त के अनुसार स्थापित त्रिदोष-पद्धति को ही कश्यप आत्रेय तथा भेड आदि प्राचीन आचार्यों ने ग्रहण किया था। ज्यों-ज्यों क्रमशः विचारों में प्रगति आती है त्यों-त्यों नये-नये सिद्धान्त उदित होते जाते हैं। इसीलिये सुश्रुत ने पहले वात, पित्त, कफ इन तीन दोषों को ही प्रधानरूप से रोगों का कारण बतलाकर भी पुनः विकृत रक्त के द्वारा भी बहुत से अनर्थों (रोगों) को देखकर तीनों दोषों के समान चतुर्थ रक्त को भी प्रधान कारण स्वीकार किया है। हिपोक्रिटस के चिकित्सा विधान में भी पित्त, कफ, रक्त तथा जल इन चारों को जो दोषरूप में माना है, वह भी उसका हृदय भारतीय प्राचीन त्रिदोषपद्धति से अनुरक्त होने के कारण सुश्रुत के विचारों की विकसित अवस्था प्रतीत होती है। इस प्रकार ये विकसित हुए विचार कालक्रम से प्राचीन पद्धति के ही परिष्कृत रूप प्रतीत होते हैं।
काश्यपसंहिता के कल्पस्थान (पृ. १७४) में में अद्भुत एवं विस्तृत लशुन कल्प का प्रयोग किया हुआ है। चीन देश के कासगर नामक स्थान में बावर नामक पाश्चात्त्य अन्वेषक को भूगर्भ से बौद्ध स्तूप के साथ सात ग्रन्थ उपलब्ध
१. १-४ की टि. उपो. संस्कृत पृ. ९४-९५ देखें।
२७२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
हुए हैं जिनमें से तीन ग्रन्थ वैद्यक के है। इनमें से प्रथम नावनीतक है। दूसरे ग्रन्थ में विस्तारपूर्वक लशुन के गुण दिये हैं तथा तीसरा एक ७२ पृष्ठ का ग्रन्थ है जिसमें अनेक ओषधियों के योग दिये हुए हैं। यह पहले ही कहा जा चुका है कि इनकी लिपि के प्राचीन होने से इनका निर्माण काल और प्राचीन होना चाहिये। मुद्रित नावनीतक में भी प्रारम्भ से ही विस्तारपूर्वक काशिराज द्वारा सुश्रुत को लशुन के विधान का उपदेश दिया गया है। उसमें लशुन की उत्पत्ति तथा कुछ प्रयोगों में भेद होने पर भी बहुत अंशों में काश्यपीय लशुन कल्प की छाया मिलती है। भाषा की रचना को देखने पर भी नावनीतक की अपेक्षा काश्यप के लेख में प्राचीनता झलकती है। चरकसंहिता में भी लशुन का प्रयोग दिया है। इस प्रकार प्राचीनकाल के चिकित्साग्रन्थों में भी मिलनेवाले लशुन के उपयोग को देखकर अर्वाचीनता की शंका उत्पन्न नहीं होनी चाहिये। लशुन के गुणों की अधिकता के कारण 'रसेन ऊनम्' (केवल एक रस की कमी) इस व्युत्पत्ति के अनुसार इसे 'रसोन' कहते हैं। चिकित्सा में यह विशेष उपयोगी है। धार्मिक दृष्टि से यद्यपि स्मृतिग्रन्थों में इसे ब्राह्मणों (द्विजों) के लिये अवश्य गर्हित माना है किन्तु चिकित्सा के ग्रन्थों में इसकी बहुत महिमा बतलाई है। इस काश्यपसंहिता के कल्पाध्याय में महर्षि कश्यप ने अमृत के उद्गार (डकार) से इसकी उत्पत्ति को बतलाकर केवल स्थान दोष से दुर्गन्धित होने के कारण धर्मशास्त्र की मर्यादा के अनुसार द्विजों द्वारा स्पष्टरूप से अग्राह्य होने पर भी लोकोपकार की दृष्टि से इसकी गुणमहिमा तथा कल्प का वर्णन किया है। जातिविशेष द्वारा निषिद्ध सुरा आदि तथा सबके लिये अभक्ष्य हस्तिमांस तथा गदहे के मूत्र आदि के भी गुणों को दृष्टि में रखते हुए आर्षग्रन्थों में भी भिन्न-भिन्न रोगों में इनका उल्लेख किया गया है। गुणों के वर्णन मात्र से हम यह कभी नहीं कह सकते कि वे उपदेशक बिलकुल धर्मभावना से शून्य थे। तथा इसका यह भी कभी अभिप्राय नहीं है कि धर्मपरायण व्यक्तियों को भी इसका सेवन अवश्य करना चाहिये, क्योंकि कहा भी है—
न शास्त्रमस्तीत्येतावत् प्रयोगे कारणं भवेत् । रसवीर्यविपाका हि श्वमांसस्यापि वैद्यके ।।
(वात्स्यायनीये कामसूत्रे सां. अ. अ. २)
(अर्थात् केवल शास्त्र में वर्णित होने से ही किसी वस्तु का उपयोग करना आवश्यक नहीं क्योंकि वैद्यक में तो कुत्ते के मांस के भी रस, वीर्य, विपाक आदि गुणों का वर्णन मिलता है) यद्यपि श्येनयाग हिंसा की दृष्टि से अनुपादेय है इस दोष को स्वीकार करके भी इस लोक के उत्तम फलों को चाहने वालों की इष्टसिद्धि के लिये 'श्येनेनाभिचरन् यजेत' यह वैदिक विधान मिलता ही है। 'यो हि हिंसितुमिच्छेत् तस्यायमभ्युपायः' द्वारा मीमांसा भाष्य के टीकाकार शवरस्वामी ने भी इसका समर्थन किया है। लशुन का उल्लेख गौतमधर्म सूत्र (१५-३०), मनुस्मृति (५-५-१९), याज्ञवल्क्य स्मृति (१. १७६) तथा महाभारत (८. २०३४, १३. ४३६३) आदि में भी मिलता है।
हिंगु (हींग-Asafoetada) को देखकर भी अर्वाचीनता की शंका उत्पन्न नहीं हो सकती। क्योंकि हींग का अत्यन्त प्राचीन काल से भारतीय ग्रन्थों में उपयोग मिलता है। धार्मिक ग्रन्थों में भी श्राद्ध आदि में हींग का पितृप्रिय (पितरों को प्रिय) के रूप में उल्लेख मिलता है। चरक, सुश्रुत तथा काश्यप संहिता में भी स्थान-स्थान पर ओषधियों के साथ इसका उपयोग मिलता है। काश्यपसंहिता आदि में हींग के लिये बाह्लीक शब्द का भी प्रयोग किया गया है। इसलिये संभवतः बाह्लीक देश (बलख-अफगानिस्तानका प्रदेश) बालों से भारतीयों ने इसका उपयोग एवं परिचय प्राप्त किया हो। इसीलिये उस देश के नाम के अनुसार ही इसका नाम प्रतीत होता है। परन्तु आत्रेय तथा कश्यप आदि द्वारा बाह्लीक भिषक् कांसायन तथा बाह्लीकों के पुनः-पुनः उल्लेख से प्रतीत होता है कि भारत तथा बाह्लीक देश का परस्पर सम्पर्क तथा इन देशों के वैद्यों का परस्पर परिचय अत्यन्त प्राचीन काल से था। बाह्लीकप्रदेश यवनों (यूनानियों) के आक्रमण से पूर्व भी ईरानियन जाति के साम्राज्य में प्रतिष्ठित बलख नामक प्रदेश था। उस इरानजाति की उन्नति के समय उस जाति के वैद्य तथा उनकी ओषधियों का भारत के प्राचीन ग्रन्थों में मिलना संगत ही है।
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २७३
भावप्रकाश में पारसीक यवानी (खुरासानी अजवायन) के उल्लेख द्वारा अन्य देशों की वस्तुओं के मिलने पर भी चरक, सुश्रुत तथा काश्यप संहिता आदि प्राचीन ग्रन्थों में इसका उल्लेख नहीं मिलता है। किन्तु केवल यवानी शब्द का ही निर्देश है। यवानी शब्द न तो यवन शब्द से ही बना है और न यह यवन के संबन्ध को प्रकट करता है। 'इन्द्रवरुणभवशर्वरुद्रमृडहिमारण्ययवयवनमातुलाचार्याणामानुकू' (पा. सू. ४-१-४९) इस सूत्र में पाणिनि ने यव शब्द से यवानी शब्द बनाया है। वार्त्तिककार कात्यायन ने 'यवाद्दोषे' द्वारा दुष्ट (कुत्सित) यव के अर्थ में स्त्रीलिङ्ग में यवानी शब्द बनाया है। इस प्रकार यह प्राचीन यवानी शब्द भी भारतीय ही है। इससे अन्य शंकाएं नहीं होनी चाहिये।
इस ग्रन्थ में आये हुए देशों का वर्णन
इस पुस्तक के उपलब्ध अन्तिम पृष्ठ पर आये हुए देशसात्म्याध्याय (खिल स्था.) में देश विशेष के अनुसार रोग विशेषों का वर्णन करने के लिये उस समय इस विद्या (आयुर्वेद) की उन्नति की दृष्टि से प्रसिद्ध कुरुक्षेत्र को मध्य (Center) मानकर उसी के अनुसार पूर्व आदि दिशाओं के देशों का उल्लेख मिलता है। यदि यह अध्याय सम्पूर्ण रूप में मिलता तो उस समय के अन्य भी बहुत से देशों का परिचय मिल सकता था। परन्तु इस अध्याय के यहीं बीच में खण्डितरूप में ही समाप्त हो जाने से भूखे व्यक्ति के मुंह से बलात् आधा ग्रास छीन लिये जाने के समान उत्कण्ठा को बीच में ही रोकना पड़ता है। अन्तिम भाग के लुप्त हो जाने के कारण पश्चिम तथा उत्तर दिशा के देशों का परिचय न मिलने पर भी पूर्व एवं दक्षिण दिशा के कुछ देशों का परिचय मिलता है। पूर्व एवं दक्षिण दिशा के भी सब प्राचीन देशों का उल्लेख नहीं है, अपितु केवल रोगोचित कुछ देशों का ही उल्लेख है। इनमें से प्रियङ्गुनवधान-वानसी-कुमुद-विदेह तथा घट आदि देशों का अन्य उपलब्ध ग्रन्थों में संवाद के न मिलने से निश्चय न हो सकने पर भी इन साथ आये हुए निम्नलिखित देशों के नाम प्राचीन प्रतीत होने के कारण उपर्युक्त सब देशों के नाम भी प्राचीन काल से व्यवहृत किये जाते प्रतीत होते हैं। निम्नलिखित देशों के नामों का प्राचीन परिचय सहित उल्लेख श्रीयुत् कनिङ्घाम नामक विद्वान् (Ancient geography of india), श्री नन्दलाल महोदय (Geographical dictionary) तथा E. J. Rapson (Ancient India cambridge (History of India vol I) आदि प्राचीन भौगोलिक ग्रन्थों में किया है।
मध्य में—कुरुक्षेत्र प्रदेश जो कि १०० योजन के घेरे में था। यह सर्वत्र प्रसिद्ध ही है।
पूर्व दिशा के देश—
कुमारवर्तिनी—महाभारत (सभा. अ. २९) में कुमार देश का उल्लेख मिलता है। यह रीवा के पास का कुमार देश कहलाता है।
कटीवर्ष—बङ्गाल के वर्धमान प्रान्त में आजकल कटवा प्रदेश नाम से प्रसिद्ध है।
मगध—ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में भी मगध देश का उल्लेख मिलने से प्राचीन समय से ही इसकी इसी नाम से प्रसिद्धि मिलती है। मागध का उल्लेख तैत्तिरीय ब्राह्मण (३-४-१-१) तथा जैमिनीय ब्राह्मण (१६५) में भी है।
ऋषभ द्वीप—महाभारत (वनपर्व अ. ८५) में ऋषभ का उल्लेख है। बृहत्संहिता में भी दक्षिण में ऋषभ का निर्देश है। कुछ लोग इसे मदुरा के समीपस्थ ऋषभ पर्वत का प्रदेश मानते हैं। परन्तु पूर्व दिशा में स्थित ऋषभ देश से ही इसका अभिप्राय होना चाहिये।
पौण्ड्रवर्धनक—इसे पुण्ड्रवर्धन भी कहते हैं। यह पुण्ड्र देश की राजधानी थी। हरिवंश, पद्म तथा ब्रह्माण्डपुराण में वासुदेव नामक राजा की राजधानी के रूप में इसका निर्देश है। आजकल यह मालदा प्रान्त में स्थित पाण्डुवा प्रदेश कहलाता है। महाभारत में भीमदिग्विजय में पूर्व दिशा में पुण्ड्र देश का उल्लेख है तथा बराहसंहिता में पौण्ड्रदेश का