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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

२४६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

कि ११-१२ वीं शताब्दी में अरब देश में भी रसायन शास्त्र उन्नत अवस्था में था। इसलिये यह कहना निरर्थक है कि पारद के शोधन आदि का ज्ञान भारत ने अरब से सीखा। पी.सी. राय आदि इतिहास लेखक लिखते हैं कि यूरोप आदि पाश्चात्य देश वालों ने रसायन शास्त्र की उपादेयता न जानकर कई शताब्दी तक उसे ग्रहण नहीं किया। पीछे कालक्रम से उसके गुणों को जानने पर बहुत अर्वाचीन काल में ही पाश्चात्य देशों में इसका प्रचलन हुआ है।

रक्तपारद के भारत से ग्रीस तथा रोम में जाने का वर्णन मिलता है। उसके विषय में विवेचन करते हुए जायसवाल जी ने रक्तपारद, शब्द रससिन्दूर के लिये व्यवहृत हुआ बतलाया है। परन्तु रक्तपारद शब्द रससिन्दूर के लिये न मिलकर हिंगुल के पर्यायों में मिलने से रक्तपारद से संभवतः हिंगुल (शिंगरफ) का ग्रहण किया गया है।

^१प्रथमशताब्दी वाले भर्तृहरि के ‘उत्खातं निधिशङ्कया क्षितितलं ध्माता गिरेर्धातवः’ वचन से कुछ^२ लोग कहते हैं कि भारत में रसविद्या के प्राचीन होने की कल्पना दृढ़ होती है।

धातुविज्ञान पहले से ही था यह बात तो आत्रेय, सुश्रुत तथा कश्यप आदि के द्वारा धातुओं का उल्लेख किया होने से स्पष्ट है। कश्यप ने भी सद्योजात शिशु के लिये स्वर्णप्राशन तथा उसके अवलेहनरूप फलों को दिया है। श्रुति एवं स्मृतियों में धातुओं तथा रत्नों के धारण आदि से आयु, आरोग्य एवं श्रेयस् की प्राप्ति का उल्लेख मिलने से प्रतीत होता है कि भारतीयों को इस विद्या के उपयोग का ज्ञान अत्यन्त प्राचीन काल से था। यजुर्वेद में ‘प्रथमो दैव्यो भिषक्’ द्वारा रुद्र को भी प्रधान (आदि) वैद्याचार्य बतलाया है। आत्रेय आदि ने ब्रह्मा के प्राथमिकता दी है, वहां रुद्र का उल्लेख नहीं है। नाथ सम्प्रदाय तथा तर्कशास्त्र में भी स्थान-स्थान पर रसवैद्यक का विषय मिलता है। तन्त्रशास्त्र तथा नाथ सम्प्रदाय में शिव का परम आचार्य के रूप में निर्देश किया है। इसप्रकार तान्त्रिक आदि प्रचलित रसवैद्यक के ग्रन्थों में रुद्र का मूल (प्रधान) आचार्य होना संभव हैं। रसविद्या के प्राचीन तन्त्र ग्रन्थों में मिलने से तथा चरक, सुश्रुत और काश्यप आदि के ग्रन्थों में भी लेशरूप में मिलने से इसे अर्वाचीन नहीं कहा जा सकता। यह भी कहा जा सकता है कि जिस प्रकार अरबदेश में सातवीं शताब्दी में प्रचलित हुए भी रसायन शास्त्र को यूरोप वालों ने सोलहवीं (१६वीं) शताब्दी में ग्रहण किया था उसी प्रकार पूर्व प्रचलित तन्त्रोक्त रसशास्त्र को वैदिक सम्प्रदाय वाले आत्रेय आदि महर्षियों ने भी अपने समय में लेशरूप में ग्रहण करना प्रारम्भ किया हो।

धातुओं के शोधन एवं योग आदियों के द्वारा तन्त्रोक्त भारतीय रसौषधनिर्माण प्रक्रिया भी प्राचीन काल में गुप्त, अप्रचलित अथवा आंशिकरूप में वर्तमान थी। पीछे से उस विद्या को नागार्जुन आदि भारतीय रसविद्या के आचार्यों ने प्रकाश में लाकर विकसित किया प्रतीत होता है। इसीलिये सम्भवतः प्राचीन ग्रन्थों में रसविद्या का विशेष विवरण नहीं मिलता है।

(३) संस्करणों की तुलना तथा तत्सम्बन्धी विषय

प्रतिसंस्करण

प्राचीन आचार्यों के नाम से मिलने वाली संहिताओं में वृद्धजीवकीय तन्त्ररूप काश्यपसंहिता, चरकसंहितारूप आत्रेय एवं अग्निवेशसंहिता, सुश्रुतसंहितारूप धन्वन्तरि संहिता तथा भेडसंहिता–ये सब प्राचीन संहिताएं हैं। उनमें जहां कहीं अर्वाचीनता का सन्देह उत्पन्न करने वाले पद, वाक्य तथा प्रबन्ध इत्यादि मिलते हैं, वे संभवतः पीछे से संस्करण के समय अनुप्रविष्ट हुए प्रतीत होते हैं।


१. यह विचारणीय प्रश्न है कि भर्तृहरि प्रथम शताब्दी में था या नहीं।
२. इसकी टि. उपो. संस्कृत पृ. ७२ देखें।

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २४७

इनमें से काश्यपसंहिता के संक्षिप्तस्वरूप वृद्धजीवकीय तन्त्र के वात्स्य द्वारा प्रतिसंस्करण का उल्लेख इस संहिता के कल्पाध्याय में स्वयं किया हुआ है। आत्रेयसंहितात्मक अग्निवेशतन्त्र के चरक द्वारा प्रतिसंस्करण का निर्देश चरकसंहिता के ‘अग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते’ इत्यादि श्लोक द्वारा स्पष्ट है। सुश्रुतसंहिता के प्रतिसंस्करण का यद्यपि ग्रन्थ (सुश्रुतसंहिता) में स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है तथापि डल्लन आदि टीकाकार इसे नागार्जुन द्वारा प्रतिसंस्कृत मानते हैं। अस्तु, नागार्जुन इसका प्रतिसंस्कर्ता को चाहे न हो परन्तु यह तो सब विद्वान् स्वीकार करते हैं कि स्थान-स्थान पर अन्य विषयों के मिलने के कारण सुश्रुतसंहिता का वर्तमानरूप प्रतिसंस्कृत ही है। भेड संहिता में ‘चक्षुरिति कश्यपः’ द्वारा दिये हुए कश्यप का चक्षुर्निर्वृत्तिवाद तथा काश्यपसंहिता में भेड के नाम से दिया हुआ ६ वर्ष के बाद विरेचन देने सम्बन्धी मत उपलब्ध भेडसंहिता में न मिलने का उल्लेख पहले किया जा चुका है। ज्वरसमुच्चय में उद्धृत भेड के वचनों में से पचास से अधिक भेड के श्लोकों के मुद्रित भेडसंहिता में आंशिक¹ रूप में मिलने से ज्वर प्रकरण की तरह अन्य प्रकरणों का भी स्थान-स्थान पर खण्डित एवं अधूरा होना, बीच-बीच में अन्य विषयों का होना तथा पुनः किया गया प्रतिसंस्करण स्पष्ट प्रतीत होता है। इस गड़बड़ से सन्देह उत्पन्न होता है। आत्रेय रूप एक ही आचार्य के उपदेश को ग्रहण करके पृथक्-पृथक् ग्रन्थों का निर्माण करने वाले अग्निवेश तथा भेड के ग्रन्थों में अनेक समानताओं एवं संवादों के मिलने से पुनः मतिविभ्रम हो जाता है। इस प्रकार भेडसंहिता में दीखने वाले दोष (कमियां) समय के कारण प्रतीत होते हैं। यद्यपि यहां भी प्रतिसंस्करण का कहीं उल्लेख नहीं मिलता है तथापि इसमें प्रतिसंस्करण का होना स्पष्ट है।

आत्रेय आदि की संहिताओं को लेकर बनाये हुए अग्निवेशतन्त्र आदि का चरक आदि आचार्यों ने जो संस्करण किया है उसके स्वरूप के विषय में विचार करने पर हम देखते हैं कि दृढ़बल ने चरक द्वारा किये संस्करण का निम्न स्वरूप बताया है—

विस्तारयति² लेशोक्तं संक्षिपत्यति विस्तरम् । संस्कर्ता कुरुते तन्त्रं पुराणं च पुनर्नवम् ।।

अर्थात् संक्षिप्त भाव को विस्तार से कह देना तथा विस्तृत रूप में दिये हुए भावों को संक्षेप में कह देना यह चरक के संस्करण की शैली है। पूर्वोक्त संस्करण आवापोद्वाप अथवा संग्रह-विग्रह प्रक्रिया में से किसी एक द्वारा संभव है। आवापोद्वाप प्रक्रिया का यह अभिप्राय है कि संक्षिप्त पूर्वग्रन्थ के स्थान में दूसरा ही विस्तृत लेख तैयार कर दिया जाय तथा विस्तृत पूर्वग्रन्थ के स्थान में अन्य संक्षिप्त लेख बना दिया जाय। तथा संग्रहविग्रह प्रक्रिया का अभिप्राय यह है कि पूर्व ग्रन्थ में संक्षेप के कारण विषय के स्पष्ट न होने से उसे स्पष्ट करने के लिये विस्तार से दे दिया जाय, तथा,अत्यन्त विस्तार से दिये हुए विषय को सरलतापूर्वक ग्रहण एवं धारण कर सकने के लिये उसके सारांश को लेकर पुनरुक्ति के रूप में संक्षेप से कह दिया जाय। इनमें से यदि प्रथम (आवापोद्वाप) प्रक्रिया द्वारा संस्करण किया गया होता तो आत्रेय एवं अग्निवेश तन्तरूप मूल ग्रन्थ का अधिकांश रूप में स्वरूप ही बदल जाता तथा नई ही रचना बन जाती। तथा उस अवस्था में चरकसंहिता में बीच-बीच में आत्रेय तथा अग्निवेश के प्रतिवचन, प्रश्न आदि नहीं दिये होने चाहिये। परन्तु चरकसंहिता में वक्तव्य विषयों को सामान्य तथा विशेष रूप से न कहकर उसी विषय को संक्षेप एवं विस्तार से तथा वाक्यभेद से बार-बार कहा गया है। इस प्रकार चरकसंहिता का आवापोद्वाप प्रक्रिया द्वारा नवनिबन्धनात्मक संस्करण नहीं किया गया है अपितु मूलग्रन्थ में संक्षेप में आये हुए विषयों को स्पष्ट करने के लिये विस्तार से दे दिया गया है तथा कहीं-कहीं विस्तृत विषयों को ग्रहण एवं धारण के उपयोगी बनाने के लिये संक्षिप्त कर दिया गया है। इस प्रकार चरकाचार्य ने पौनरुक्तय प्रक्रिया द्वारा भी इसका संस्करण किया प्रतीत होता है।


१. १ से २ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ७३-७४ देखें।

१७ का.सं.

२४८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

चरकाचार्य उपलब्ध संहिता का स्वतन्त्र रूप से लेखक न होकर आत्रेयसंहितारूप अग्निवेश तन्त्र का प्रतिसंस्कर्ता ही है। इस विषय में निम्न प्रमाण दिये जा सकते हैं।

आत्रेय संहिता के निदान, चिकित्सा आदि स्थानों में प्राय: विषयों के अनुसार ही अध्यायों के नामों का निर्देश किया गया है। इसके विपरीत सूत्र, विमान, शारीर आदि स्थानों में कहीं-कहीं विषयों के अनुसार नाम होने पर भी अध्याय के आदि वाक्य के प्रतीक के अनुसार दीर्घञ्जीवितीय, अपामार्गतण्डुलीय, आरग्वधीय, कतिधापुरुषीय तथा अतुल्यगोत्रीय इत्यादि नाम प्राय: मिलते हैं। आदि-प्रतीक के अनुसार दिये नामों में कई नाम विभक्ति सहित हो दे दिये गये हैं। उन-उन अध्यायों के उपसंहार के संग्रह श्लोकों में भी उन अध्यायों का उन्हीं नामों से उल्लेख किया होने से यह कहा जा सकता है कि इन अध्यायों के नाम पीछे से केवल शिष्य सम्प्रदाय द्वारा ही नहीं रखे गये हैं अपितु मूलग्रन्थकर्ता की लेखनी द्वारा ही लिखे गये हैं। भेडसंहिता में भी सूत्र, विमान, शारीर तथा इन्द्रिय आदि स्थानों में आदिप्रतीक के अनुसार दिये हुए नाम स्वल्प से भेद के साथ इससे समानता रखते हैं। उदाहरणार्थ—

अध्याय के आदि प्रतीक

अध्याय का नामचरकभेड
न वेगान्धारणीयःन वेगान्धारयेद्धीरःन वेगान्धारयेद्धीमान
मात्राशितीयःमात्राशी स्यादाहारमात्रामात्राशी स्याद्विप्रकाशी
आत्रेयभद्रकाप्यीयःआत्रेयो भद्रकाप्यश्चआत्रेयः खण्डकाप्यश्च
यस्य श्यावनिमित्तीयःयस्य श्यावे परिव्रस्तेयस्य श्यावे उभे नेत्रे
अवाक् शिरसीयःअवाक्शिरा वा जिह्वा वाअवाक्शिरा वा जिह्वा बा

इसी प्रकार आत्रेय तथा भेडसंहिता में इन्द्रियोपक्रमणीय, तिस्रैषणीय, वातकलाकलीय, विधिशोणितीय, दशप्राणायतनीय, दशमूलीय, अष्टोदरीय, रसविमान पुरुषनि(वि)चय, खुड्डिकागर्भाविक्रान्ति तथा जातिसूत्रीय इत्यादि अध्यायों के समान नाम मिलते हैं।

स्नेहन, स्वेदन तथा निदान और चिकित्सा सम्बन्धी अध्यायों के विषयों के अनुसार दिये हुए नामों में अपने आप ही समानता के संभव होने पर भी दोनों ग्रन्थों में एक ही प्रतीक के द्वारा अध्याय के प्रारम्भ होने, विभक्ति युक्त प्रतीक के अनुसार ही अध्यायों के नाम तथा समान नाम वाले अध्यायों में विशेष विषय की समानता होने से एक ही सूत्र के अनुसार (अर्थात् एक ही आचार्य के उपदेश को ग्रहण करके) दो विभिन्न व्यक्तियों द्वारा इनका लिखा जाना संभव है। यदि उन दोनों में परस्पर कोई संबन्ध न हो तथा उन्हें एक ही आचार्य का उपदेश न मिला हो तो दो स्वतन्त्र लेखों में इस प्रकार की समानता सहज नहीं प्रतीत होती। इसलिये ऐसा प्रतीत होता है कि आत्रेय द्वारा उन्हीं प्रतीकों से प्रारम्भ करके उपदिष्ट अध्यायों के वाक्यों एवं विषयों को लेकर अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार उसे बढ़ाकर तथा दूसरे विषयों को सम्मिलित करके भेड तथा अग्निवेश ने पृथक्-पृथक् तन्त्रों का निर्माण किया है। इसीलिये इनमें परस्पर इतनी समानता है। कहीं-कहीं आत्रेय तथा भेडसंहिता में अध्यायों के आदि प्रतीकों के भिन्न होने पर भी अध्यायों के नाम समान ही मिलते हैं। जैसे—

भेड तथा चरकसंहिता में अध्यायों के नामचरक का प्रतीकभेड का प्रतीक
व्याधितरूपीयम्द्वौ पुरुषौ व्याधितरूपौ भवतःगुरुव्याधिनरः कश्चित्

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद | २४९

शरीरविचयःशरीरविचयःशरीरोपकारार्थइह खल्वोजस्तेजः
शरीरसंख्या'शरीरख्यामभवयवशःइह खलुशरीरे षट् त्वचः
पूर्वरूपीयम्पूर्वरूपाण्यसाध्यानांअन्तर्लोहितकायस्तु
गोमयचूर्णीयम्यस्य गोमयचूर्णाभंचूर्णं शिरसि यस्यैव

इनको देखने से प्रतीत होता है कि अग्निवेश ने आत्रेयसंहिता में उन-उन आदि प्रतीकों के अनुसार दिये हुए नाम तथा प्रतीकों को उसी रूप में रखा है तथा भेड ने भी अपने ग्रन्थ में आदि प्रतीक की विभिन्नता होने पर भी अध्यायों के वे ही पूर्वपरम्परागत नाम रखे हैं। दोनों संहिताओं में अध्यायों के नामों या आदि प्रतीकों में जहां समानता मिलती है वह आत्रेय द्वारा दोनों का समान उपदेश दिया जाने के कारण उचित ही है। अग्निवेश संहिता में आये हुए अध्यायों के नाम तथा प्रतीक यदि स्वयं अग्निवेश द्वारा दिये गये हों तो सतीर्थ्य भेड द्वारा उनके अनुसरण किये जाने का कोई कारण प्रतीत नहीं होता है। और यदि चरकाचार्य ने ही उन प्रतीकों द्वारा प्रारंभ करके चरकसंहिता का स्वयं निर्माण किया हो तो भी उससे प्राचीन समय वाले भेड ने उसका अनुसरण किस प्रकार किया होगा। भेड तथा अग्निवेश दोनों संहिताओं में आठ स्थानों तथा १२० अध्यायों द्वारा संख्या की समानता भी यही प्रकट करती है। भेड संहिता के चतुष्पाद अध्याय में (पृ. १५) 'सिध्यति प्रतिकुर्वाण इत्यात्रेयस्य शासनम्' द्वारा अप्रतीकारवाद का खण्डन करते हुए नामपूर्वक दिये हुए आत्रेय के मत का वर्तमान चरकसंहिता के महाचतुष्पाद अध्याय (सू.अ. १०) में विस्तारपूर्वक मिलने से भी इसकी पुष्टि होती है। इस प्रकार आत्रेय मत के दोनों ग्रन्थों में समानरूप से मिलने से आत्रेय के उपदेश की पूर्वस्थिति स्पष्ट है। चरक तथा भेड दोनों में खुड्डाक चतुष्पाद अध्याय में समानरूप में मिलने वाले मृद्दण्ड चक्र इत्यादि सिद्धान्त श्लोक भी आत्रेय संहिता के ही होने चाहिये। इस प्रकार इन दोनों संहिताओं में समानरूप से मिलने वाले अध्यायों के नाम तथा विषयों को देखकर यह कहा जा सकता है कि इन दोनों में ओतप्रोतरूप में विद्यमान आत्रेयसंहिता इनसे पूर्व ही विद्यमान थी। उसी आत्रेय संहिता तथा उसके विषयों को लेकर आवश्यकतानुसार अपने विचारों से उसे परिवर्धित करके संक्षेपप्रिय भेड ने संक्षिप्त रूप से तथा विस्तारप्रिय अग्निवेश ने विस्तृत रूप से पृथक्-पृथक् तन्त्रों के रूप में उपस्थित किया। भेडसंहिता में चतुष्पाद के विषय में एक ही अध्याय दिया है। इसमें पहले आत्रेय तथा शौनक के विप्रतिपत्तिवाद को देकर आत्रेय के ज्ञानवैशिष्ठ्य का वर्णन किया है। तथा पीछे चतुष्पादों के वर्णन के बाद सिद्धान्तरूप में संक्षेप से भिषक्प्राधान्यवाद का उल्लेख किया है। इसके विपरीत आत्रेयसंहिता में इस विषय में दो अध्याय हैं। इसमें पहले खुड्डाकाध्याय में चतुष्पादों का वर्णन करके भिषक्प्राधान्यवाद को सिद्धान्तरूप से देकर अगले अध्याय (महाचतुष्पाद अध्याय) में मैत्रेय (शौनक) तथा आत्रेय के मतों का पक्ष-प्रतिपक्षरूप से निर्देश किया है। इस प्रकार एक ही विषय एक (भेडसंहिता) में संक्षिप्त रूप में तथा दूसरे (अग्निवेशसंहिता) में विस्तार से दृष्टिगोचर होते हैं। इसी प्रकार अग्निवेश तथा भेडसंहिता में अन्य भी अनेक स्थानों पर कई विषय क्रमशः विस्तार तथा संक्षेप से मिलते हैं।

काश्यप, चरक, भेड तथा सुश्रुत-इस सब संहिताओं में गद्य एवं पद्य दोनों मिलते हैं। टीकाकारों ने क्षारपाणि, जातूकर्ण, पराशर आदि के वाक्यों के भी जहां-जहां उद्धरण दिये हैं वे भी गद्य एवं पद्यमय होने से उनके ग्रन्थ भी गद्य-पद्यमय प्रतीत होते हैं। ज्वरसमुच्चय में केवल एक ज्वर के विषय में काश्यप, आत्रेय, सुश्रुत, हारीत तथा अन्य भी प्राचीन आचार्यों के केवल पद्यमय वाक्य मिलते हैं। इनमें दिये हुए हारीत, क्षारपाणि, जातूकर्ण तथा भेड आदि सतीर्थ्य आचार्यों के वाक्यों को देखने पर प्रतीत होता है कि शब्दों का भेद होने पर भी उनमें एक ही आचार्य का उपदेश समान रूप से झलकता है। भेडसंहिता के समान आत्रेय के अन्य शिष्य जातूकर्ण, हारीत, क्षारपाणि आदियों के भी सम्पूर्ण तन्त्र यदि उपलब्ध हो जायें तथा भेड का भी सम्पूर्ण तन्त्र अखण्डित रूप में मिल जाय तो उन सबकी तुलना करने पर जो अंश एक आचार्य के उपदेशरूप से सब में समान रूप में मिलता हो उतना अंश प्राचीन एवं आत्रेय का समझना चाहिये।

२५० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

तथा इनमें परस्पर जितना भिन्न अंश है वह उनके अपने-अपने विचार एवं दृष्टिकोण को प्रकट करता है। अथवा संस्कार के कारण प्रतीत होता है। उस अवस्था में अग्निवेश के तन्त्र तथा चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत अंश में भेद करने में भी सुविधा हो जायेगी। इस प्रकार ज्वरसमुच्चय में आये हुए कुछ विषयों में परम्पर समानता को देखकर भी यही प्रतीत होता है कि साथ-साथ अध्ययन करने वाले भिन्न-भिन्न शिष्यों के हृदयों में एक ही आत्रेयरूप आचार्य का उपदेश उन्हें प्रेरणा दे रहा है।

चरकसंहिता के विषय में कुछ लोग कहते हैं कि चरक नाम से प्रसिद्ध संहिता चरकाचार्य की अपनी ही कृति (रचना) है। कुछ लोगों का विचार है कि संक्षेप से विद्यमान पूर्वतन्त्र को पूर्णरूप से परिवर्तित एवं परिवर्धित करके चरकाचार्य ने एक नई ही रचना बना दी है तथा कुछ लोगों का यह भी मत है कि आयुर्वेद के ज्ञाता ऋषियों द्वारा परस्पर एकत्रित होकर किये गये संभाषणों एवं संवादों के सारांश को लेकर चरकाचार्य ने उसे चरकसंहिता के रूप में उपस्थित किया (वसुमती वर्ष ९ पृष्ठ ३७८)—इत्यादि अनेक विभिन्न मत दिखाई देते हैं। परन्तु पूर्वोक्त वर्णन के अनुसार मूलभूत आत्रेयसंहिता तथा उसी के आधार पर बनाये हुए अग्निवेश-तन्त्र की पूर्व स्थिति का स्पष्ट ज्ञान होने से, तथा 'अग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते' चरक की इस स्पष्टोक्ति के आधार पर यह कहा जा सकता है कि तन्त्र का रचयिता अग्निवेश ही है तथा चरक ने तो दूसरे तन्त्रों तथा अपने विचार के अनुसार कुछ अन्य उपयोगी विषयों द्वारा उसे बढ़ाकर तथा अन्य भी संस्कारोपयोगी विशेषताओं को उसमें मिलाकर इस अग्निवेशतन्त्र का प्रतिसंस्कार ही किया है। यदि चरक ही स्वयं इस तन्त्र का रचयिता होता तो वह उस रूप में अपने नाम का उल्लेख क्यों न करता। ग्रन्थ में संबोधन आदि के रूप में अग्निवेश का नाम अनेक स्थानों पर मिलता है, परन्तु चरक का नाम 'चरकप्रतिसंस्कृते' इस उल्लेख के अतिरिक्त ग्रन्थ में और कहीं नहीं मिलता है। चरक के उत्तर भाग को पूर्ण करने वाले दृढ़बल ने भी निम्न श्लोक के द्वारा चरक का केवल संस्कर्ता के रूप में तथा द्वादशसाहस्रसंहिता का अग्निवेश की कृति के रूप में स्पष्ट निर्देश किया है—

अतस्तन्त्रोत्तममिदं चरकेणातिबुद्धिना । संस्कृतं तत्तु संसृष्टं विभागेनोपलक्ष्यते ।।
यस्य द्वादशसाहस्री हृदि तिष्ठति संहिता । चिकित्सा वह्निवेशस्य स्वस्थातुरहितं प्रति ।।

यदि चरक ही इस ग्रन्थ का रचयिता होता तो उसके बाद का तथा उसके ग्रन्थ को पूर्ण करने वाला दृढ़बल भी अग्निवेश को ही ग्रन्थकर्ता तथा चरक को संस्कर्ता के रूप में क्यों निर्देश करता। संभवतः सब जगह घूमने फिरने की प्रकृति के कारण अन्वर्थ चरक संज्ञा वाले किसी आचार्य द्वारा इस ग्रन्थ का संस्करण करके उसका प्रचार, प्रवचन, प्रयोगकुशलता तथा लोकोपकार के लिये प्रवृत्त होने के कारण उस संहिता की चरक नाम से प्रसिद्धि हो गई होगी। इसी प्रसिद्धि के कारण चरकाचार्य के विषय में ग्रन्थ का कर्ता होने की भ्रान्ति उत्पन्न हो गई प्रतीत होती है।

इस प्रकार दृढ़बल की संस्करण की पूर्वोक्त परिभाषा के अनुसार स्थान-स्थान पर कुछ पद, वाक्य तथा सन्दर्भ चरकाचार्य की लेखनी से भी अनुप्रविष्ट हो सकते हैं। चरकसंहिता का सामान्यरूप से अनुसन्धान करने पर कुछ इस प्रकार के विषय चरकाचार्य की लेखनी से लिखे गये प्रतीत होते हैं। उदाहरण के लिये चरकसंहिता में निर्दिष्ट वाद-विवाद के विषय में दिखाई देनेवाली अर्वाचीन विकसित अवस्था चरक के समय की प्रतीत होती है जैसा कि पूर्व निर्देश किया जा चुका है।

स्वेदप्रकरण में भेडसंहिता में सङ्करस्वेद, प्रस्तरस्वेद आदि आठ स्वेदों का ही उल्लेख किया गया है। उपलब्ध चरकसंहिता में भेडोल्लिखित आठ भेदों के अतिरिक्त पांच भेद और मिलाकर १३ (तेरह) स्वेदों का निर्देश मिलता है। यदि ये तेरह भेद आत्रेय द्वारा ही उपदिष्ट होते तो आत्रेय की अनुगामी भेडसंहिता में भी ये तेरह भेद ही मिलने चाहिये।

उपपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २५१

काश्यपसंहिता में भी आठ ही भेदों के मिलने से प्रतीत होता है कि प्राचीन समय में आठ विभाग ही थे। प्राचीन आठ विभागों के साथ जोड़े हुए दूसरे भेदों में जेन्ताक तथा होलाक शब्द के सर्वथा भिन्न प्रतीत होने से पूर्वोक्त आठ भेदों के साथ अन्य पांच भेदों को मिलाकर तेरह भेदों का वर्णन करना चरकाचार्य की विकासदृष्टि को प्रकट करता है।

भेडसंहिता में खुड्डीकागर्भावक्रान्ति के विषय में एक ही अध्याय है। उसमें गर्भ को मातृज तथा पितृज न मानने रूप भरद्वाज के मत का खण्डन करके उस मत की स्थापना करते हुए आत्रेय के मत का निर्देश किया है। चरक के खुड्डीकाध्याय में भी वही विषय है। इस प्रकार दोनों में समानता देखकर यह कहा जा सकता है कि अग्निवेश संहिता में आया हुआ यही आत्रेय का मत है। परन्तु चरक में उसके बाद दूसरा महागर्भावक्रान्त्यध्याय है। उसमें गर्भ संबन्धी अन्य विषयों का निरूपण किया गया है। इन विषयों के भेडसंहिता में न मिलने से इसे बाद में चरक के समय का विकास कहा जा सकता है। अथवा यह भी सम्भावना हो सकती है कि खुड्डीका पद के दिये होने से महागर्भावक्रान्ति अध्याय भी पहले से ही अग्निवेश संहिता में हो तथा भेडसंहिता में वह कालक्रम से खण्डित (लुप्त) हो गया हो।

वर्तमान चरकसंहिता के उपक्रम में ऋषियों के समुदाय में इन्द्र द्वारा प्राप्त आयुर्वेद विद्या के भरद्वाज द्वारा प्रकाशन से तथा आत्रेय द्वारा उस विद्या को भरद्वाज से प्राप्त करने का उल्लेख न होने पर भी आत्रेय के शिष्य अग्निवेश आदि द्वारा तन्त्र के निर्माण तथा उन अग्निवेश आदि के तन्त्रों की लोक में प्रसिद्धि का निर्देश अग्निवेश की अपेक्षा अपने संस्करण की उत्कृष्टता दिखाने के लिये चरक द्वारा अधिक उचित प्रतीत होने से, अग्निवेश द्वारा बाद में कहीं भी भारद्वाज से इस विद्या की प्राप्ति का निर्देश न होने से, प्रत्युत भारद्वाज के मत का खण्डन करने से तथा भारद्वाज के विषय में विशेष कुछ भी निर्देश न करने से प्रतीत होता है कि ‘अथातो दीर्घञ्जीवितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः, इति ह स्माह भगवानात्रेयः’ इन दो वाक्यों के बाद सीधा ‘हिताहितं सुखं दुःखम्’ से अग्निवेशतन्त्र का प्रारम्भ हुआ है तथा इनके बीच का अवतरणिकांश सम्भवतः चरकाचार्य ने पूरा किया है। ‘हिताहितम्’ इत्यादि वाक्य में दीखने वाली प्राचीन ग्रन्थ की प्रौढता का इससे पूर्व के वाक्यों में न मिलना भी इसी बात को प्रकट करता है।

वर्तमान चरकसंहिता तथा भेडसंहिता के ‘नवेगान्नधारणीय’ अध्यायों की तुलना में हम देखते हैं कि चरकसंहिता में वेगों के निरोध के औचित्य एवं अनौचित्य सम्बन्धी विषय को ही दिया है। इसके विपरीत भेडसंहिता में अध्याय के आदि तथा अन्त में उस विषय के होने पर भी बीच में दन्ताधावन, धूमवर्ती आदि अन्य विषय दिये हुए हैं। इस प्रकार अग्निवेश संहिता में सन्दर्भशुद्धि तथा भेडसंहिता में लेख, रचना अथवा उपलब्ध ग्रन्थ की विकृति के कारण अशुद्धि प्रतीत होती है।

नावनीतक नामक ग्रन्थ में आत्रेय के नाम से दिये हुए बहुत से योग एवं ओषधियों के चरकसंहिता में मिलने पर भी दो तीन ओषधियों के न मिलने से तथा चक्रपाणि शिवदास आदि द्वारा अग्निवेश के नाम से उद्धृत कुछ श्लोकों का चरकसंहिता में न मिलने से अग्निवेश संहिता में से संस्करण के अवसर पर कुछ अंश निकाल दिया गया प्रतीत होता है।

इसी प्रकार भेडसंहिता तथा अग्निवेशतन्त्र को सामने रखकर प्रत्येक विषय में तुलना करने पर अन्य भी बहुत से स्थलों पर विभेद दृष्टिगोचर होते हैं।

चरकसंहिता में अध्यायों के बीच-बीच में भी स्थान-स्थान पर आये हुए गद्यवाक्यों के संक्षेप एवं विस्तार के लिये कहीं पद्य तथा कहीं गद्य रूप में भी संग्रह एवं विग्रह रूप मिलता है। बीच-बीच में भी ‘भवन्ति चात्र’ ‘अत्र श्लोकाः’ इत्यादि द्वारा कहीं संक्षेप के लिये तथा कहीं उपपादक अर्थ को सूचित करने के लिये पद्य (श्लोक) दिये हैं तथा प्रत्येक अध्याय के अन्त में भी ‘अत्र श्लोकाः’ द्वारा अध्याय के विषयको श्लोकों में दिया हुआ है। संक्षिप्त लेख के ग्रहण

२५२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

सौकर्य (आराम से समझने) के लिये विस्तृत रूप देना तथा विस्तृत लेख के धारणसौकर्य (याद करने) के लिये संक्षिप्त रूप में देने की प्रणाली प्राचीन आचार्यों के लेखों में भी मिलती है। व्याकरण महाभाष्यकार की भी यही शैली है। कुसुमाञ्जलि आदि में कारिकाओं के प्रतिपाद्य विषयों का पूरणिका रूप में गद्यवाक्यों द्वारा विशदीकरण (स्पष्टीकरण) दिया गया है तथा शास्त्रदीपिका भामती आदि में इसके विपरीत विस्तृत भावों को संक्षेप से कारिका रूप में दिया गया है। सुश्रुत तथा काश्यपसंहिता में भी स्थान-स्थान पर संग्रह तथा विग्रह (संक्षेप और विस्तार) से वर्णन मिलता है। इस प्रकार एक ही विषय को संक्षेप एवं विस्तार दोनों प्रकार से निरूपण करना मूल आचार्य के द्वारा भी सम्भव हो सकता है। किसी एक प्रकार से कही हुई पूर्व आचार्य की उक्ति को पीछे संस्कर्ता द्वारा किसी दूसरी प्रकार भी कहा जा सकता है। चरक संहिता के निम्न श्लोक द्वारा यह स्पष्ट कहा गया है कि गहन विषयों का अन्तर्दृष्टि होकर ज्ञान प्राप्त करने के लिये इस प्रकार के संक्षेप एवं विस्ताररूप उक्तिभेद में पुनरुक्ति दोष नहीं होता है—

गद्योक्तो १ यः पुनः श्लोकैरर्थः समनुगीयते। तद्व्यक्तिव्यवसायार्थं द्विरुक्तं तन्न गर्ह्यते ।।

इस प्रकार संक्षेप तथा विस्तार द्वारा की गई रचना “प्रौढिर्व्याससमासौ च” २ के अनुसार पुनरुक्ति दोष नहीं है अपितु गुण है।

इसी प्रकार चरकाचार्य ने अग्निवेश तन्त्र के एक-एक वाक्य को लेकर कहीं उसे पूरा करने के लिये, कहीं संक्षेप एवं विस्तार के लिये तथा कहीं ग्रहण एवं धारण में उपयोगी बनाने के लिये, उसे पूर्ण करने तथा बढ़ाने की दृष्टि से अपने कुछ वाक्य तथा पद आदि सम्मिलित करके मूल आचार्य तथा अपने वाक्यों को तिलतण्डुल रूप में मिलाकर प्रतिसंस्करण किया है। जिस प्रकार भारत ग्रन्थ में अनेक कथानक, वैशम्पायन आदि के प्रश्नोत्तर आदि पूरणिका वाक्य तथा आदि और अन्त में उपक्रम तथा उपसंहार ग्रन्थों को जोड़कर उसे महाभारत का रूप दे दिया गया है इसी प्रकार चरक ने भी ऐसा ही संस्करण करके इसे दूसरे परिमार्जित रूप में उपस्थित कर दिया है। इसलिये मूलग्रन्थ के परवश होने के कारण मूलग्रन्थ में जैसा विषय का पौर्वापर्यक्रम था, प्रतिसंस्कृत ग्रन्थ में भी वैसा हो होने से सुश्रुतसंहिता की अपेक्षा चरकसंहिता में ग्रन्थ का विषय अधिक विशृङ्खलित मिलता है। इस प्रकार चरक ने भी उसे ठीक नहीं किया। यदि वह स्वतन्त्ररूप से चरकसंहिता की रचना करता हो इतना प्रौढ विद्वान् होकर भी क्या इस पौर्वापर्यक्रमरूप सन्दर्भ शुद्धि को ठीक न करता। समास एवं व्यासरूप में पुनरुक्त प्रकीर्ण विषय को संकलित करते हुए भी उसने इस दोष को दूर क्यों नहीं किया। ज्वरसमुच्चय में आश्विन, भारद्वाज आदि के वचनों के मिलने से उनकी संहिताओं से भी विषयों को संग्रह करके इस संस्करण में चरकाचार्य ने संभवतः दिये हों। इस प्रकार बहुत प्रयत्न एवं परिश्रम से प्रतिसंस्कृत करके इस प्राचीन संहिता को चरक ने अनेक विषयों से युक्त कर दिया है। इसीलिये इस संहिता के अन्त में दृढ़बल ने इस संहिता के ज्ञान से ही दूसरे तन्त्रों के ज्ञान तथा इसकी महत्ता का निर्देश करते हुए कहा है कि यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित्'। उपर्युक्त गुणों के कारण तथा अन्वर्थक चरक नाम के अनुरूप सब जगह घूम-घूम कर प्रचार करने के कारण अन्तरङ्ग दृष्टि से ग्रन्थ के आत्रेय तथा अग्निवेश संहिता रूप होने पर भी बहिरङ्ग दृष्टि से वर्तमान संहिता की चरक संहिता नाम से ही प्रसिद्धि है।

भेडसंहिता में भी उतने ही अध्यायों के होने से तथा इस ग्रन्थ (चरकसंहिता) में भी एक सौ बीस ३ अध्याय तथा आठ स्थानों का आत्रेय तथा अग्निवेश द्वारा उपदेश किया होने से प्रतीत होता है कि इस सम्पूर्ण ग्रन्थ के अपस्मार प्रकरण से अगले भाग के कालवशात् लुप्त हो जाने से तथा चरक के समय भी उसका संस्करण न होने से पीछे आत्रेय द्वारा उपदिष्ट हारीत आदि के ग्रन्थों से विषयों को लेकर संभवतः दृढ़बल ने इसकी पूर्ति की है। पीछे से पूरा किये हुए उतने अंश में विभिन्न पद्यप्रायः लेख का होना भी इसी का समर्थन करता है।


१. १-२ की टि. उपो. संस्कृत पृ. ७७-७८ देखें।

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद

२५३

अग्निवेश के नाम से चक्रपाणि तथा शिवदास आदि द्वारा उद्धृत वचनों के मिलने से प्रतीत होता है कि संभवतः उस समय तक अग्निवेशतन्त्र उपलब्ध था। परन्तु उस अवस्था में दृढबल के समय भी अग्निवेशतन्त्र से ही शेष भाग की पूर्ति न करके 'शिलोञ्छवृत्ति¹ द्वारा अन्य तन्त्रों से विषयों को एकत्रित करके दृढबल द्वारा चिकित्सास्थान के अन्तिम १७ अध्याय तथा सिद्धि और कल्पस्थान की पूर्ति करने में क्या हेतु है ? अग्निवेशतन्त्र से पूर्ति न करके अन्य तन्त्रों से पूर्ति करने का उल्लेख दृढबल ने स्वयं किया है। लगभग एक हजार वर्ष पूर्व लिखित एवं उससे प्राचीन ज्वरसमुच्चय में चरक के वचनों के मिलने तथा अग्निवेश के वचनों के न मिलने से, वाग्भट आदि द्वारा भी चरक का ही उल्लेख होने से तथा खलीफा हारूंरशीद के समय भी इसी चरकसंहिता का ही अनुवाद होने से प्रतीत होता है कि वाग्भट तथा दृढबल आदि के समय से पूर्व ही अग्निवेश का तन्त्र विलुप्त हो चुका था। चक्रपाणि तथा शिवदास आदि के समय तक यदि अग्निवेशतन्त्र मिलता होता तो भिन्न-भिन्न विषयों में अग्निवेश तथा चरक की समानताओं तथा विषमताओं का अनेक स्थानों पर वर्णन होना चाहिये था। परन्तु इसके विपरीत यहां अग्निवेश के कुछ ही वचनों के उद्धरण दिये होने से प्रतीत होता है कि ये उद्धरण प्राचीन निबन्ध एवं टीकाओं से दिये गये हैं।

सुश्रुतसंहिता के संस्करण के विषय में ग्रन्थ में कहीं भी स्पष्टरूप से उल्लेख नहीं है। केवल 'प्रतिसंस्कर्ताऽपीह नागार्जुनः' डल्हण के इस निर्देश के अनुसार ही कुछ लोग नागार्जुन को इसका प्रतिसंस्कर्ता मानते हैं। नागार्जुन को भी प्रतिसंस्कर्ता मानने पर सुश्रुत उससे प्राचीन सिद्ध होता है। परन्तु नागार्जुन के वर्तमान सुश्रुतसंहिता का प्रतिसंस्कर्ता होने में कोई प्रबल प्रमाण नहीं मिलता है। यदि वह प्रतिसंस्कर्ता होता तो चरक के 'अग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते' उल्लेख की तरह वह भी अपना प्रतिसंस्कर्ता के रूप में उल्लेख क्यों न करता ? आर्य नागार्जुन तथा दूसरे किसी नागार्जुन के विषय में भी अन्य ग्रन्थों में शल्यतन्त्र के विषय में कहीं उल्लेख नहीं मिलता। आर्य नागार्जुन के उपायहृदय में सुश्रुत का नाम दिया होने पर भी पूर्वनिर्दिष्ट भैषज्यविद्या के प्रकरण में शल्यतन्त्र का पृथक् निर्देश नहीं मिलता है। तथा यह भी विचारणीय है कि शान्तिप्रधान बौद्धमार्गानुयायी तथा बोधिसत्व विद्वान् होने के कारण शस्त्रसाध्य शल्य चिकित्सा में उसकी रुचि (प्रवृत्ति) किस प्रकार हो सकती थी। आर्य नागार्जुन या तान्त्रिक नागार्जुन द्वारा यदि इसका संस्करण किया जाता तो उसमें स्वाभाविकरूप से बौद्धमत की छाया अवश्य होती। इस ग्रन्थ में कहीं नाम मात्र को भी बौद्ध छाया नहीं मिलती है अपितु निम्न श्लोक के द्वारा स्थान-स्थान पर राम तथा कृष्ण की महिमा, वैदिक मन्त्रों के प्रयोग तथा सांख्य दर्शन के अनुसार अध्यात्म का विषय दिया हुआ है—

महेन्द्ररामकृष्णानां ब्राह्मणानां गवांमपि । तपसा तेजसा वाऽपि प्रशाम्यध्वं शिवाय वै ।।

इस प्रकार नागार्जुन को सुश्रुत का प्रतिसंस्कर्ता सिद्ध करने के लिये अन्य बलवान् प्रमाणों की अपेक्षा है। बहुत से प्राच्य एवं पाश्चात्य विद्वानों की सम्मति है कि वर्तमान समय में सुश्रुत का पुनः संस्करण ही मिलता है। कहीं-कहीं अर्वाचीन विषयों के मिलने से मेरी भी यही राय है कि इसका संस्करण हुआ है। परन्तु इस संस्करण में चरकसंहिता की तरह पुनरुक्तियां नहीं मिलती हैं। इसमें संस्कर्ता तथा उत्तर भाग के लेखक का यद्यपि स्पष्ट उल्लेख नहीं है, परन्तु मेरे पास ६३३ नेवार (नेपाली) संवत् में लिखित ताडपत्रीय सुश्रुत है उसकी पुष्पिका (समाप्ति भाग) में पूर्वभाग में 'सुश्रुते शल्यतन्त्रे' ऐसा उल्लेख है तथा उत्तरतन्त्र के अन्त में 'इति सौश्रुते महोत्तरतन्त्रे चतुःषष्टितमोऽध्यायः, अतो निघण्टुर्भाविष्यति इति' तथा उस निघण्ट भाग के समाप्त होने पर—सौश्रुत्यां संहितायां महोत्तरायां निघण्टुः समाप्तः' उल्लेख मिलता है। यद्यपि 'इदम्' अर्थ प्रत्ययान्त सौश्रुत शब्द से सुश्रुत के ग्रन्थ का भी ग्रहण को सकता


१. जिस प्रकार पक्षी जाति भिन्न-भिन्न स्थानों से छोटे कणों को बीन-बीन कर संग्रह करते हैं उसी प्रकार भिन्न-भिन्न ग्रन्थों से जब थोड़ा-थोड़ा अंश संग्रह करके किसी विषय को पूरा किया जाय तब यह शब्द व्यवहृत होता है। (अनुवादक)

२५४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

है तथापि पूर्व तथा अपर ग्रन्थ के भाग में लेख की एक ही शैली के औचित्य को दृष्टि में रखते हुए पूर्वभाग में सुश्रुत शब्द तथा उत्तर भाग में भिन्न ही सौश्रुत शब्द से निर्देश होने के कारण पूर्व भाग सुश्रुत-लिखित है तथा उत्तर भाग उसी के वंश वाले किसी अन्य (सौश्रुत) व्यक्ति द्वारा लिखित प्रतीत होता है। निघण्टु भाग के उपक्रम में दिवोदास के उपदेश का उल्लेख होने पर भी मूल आचार्य के एक होने से यह ग्रन्थ भी मूल ग्रन्थ ही है, इसको सिद्ध करने के लिये संभवतः दिवोदास का निर्देश किया हो तथा निघण्टु भाग में आये हुए लेख में कुछ विकसित अवस्था होने से तथा उत्तर भाग के शब्दों के विशेष रूप से मिलने से यह निघण्टु भाग भी संभवतः सौश्रुत का है। अपूर्ण अंश को पूर्ण करने की दृष्टि से इसमें उत्तरतन्त्र सम्मिलित करने वाले सौश्रुताचार्य ने पूर्वभाग में भी संभवतः कुछ संस्करण किया हो। महाभाष्यकार द्वारा सौश्रुतशब्द से युक्त उदाहरण के देने से सौश्रुतों की भी पहले से प्रसिद्धि का बोध होता है। सुश्रुत के वंश वाले शल्यविद्या के पण्डित सौश्रुतों का राजाओं के साथ सम्बन्ध होने के कारण ही अत्यन्त प्राचीन काल से 'सौश्रुतपार्थिवाः' उदाहरण प्रसिद्ध है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि सुश्रुत के वंश वाले या उसके किसी शिष्य (सौश्रुताचार्य) ने पूर्वभाग का संस्करण करके उत्तरतन्त्र और निघण्टु भाग उसमें पीछे से सम्मिलित कर दिया है।

पूर्व आचार्य की संहिता के उपलब्ध होने पर भी अन्य आचार्यों के ग्रन्थों में मिलने वाली विशेषताओं को लेकर पूर्व संहिता की कमियों को दूर करके उसे सर्वाङ्ग पूर्ण बनाने की दृष्टि से पीछे से पूर्ववर्ती दिवोदास की संहिता को लेकर उसमें अन्य ग्रन्थों के विषयों की संस्कर्ता ने उत्तरतन्त्र के रूप में सम्मिलित किया प्रतीत होता है। स्वयं ग्रन्थ कर्ता की उक्ति से स्पष्ट है कि उत्तरतन्त्र का विषय विदेहाधिप आदि के शालाक्यतन्त्र से संबन्धित है। सुश्रुतसंहिता के उत्तरभाग में कौमारभृत्य के प्रकरण में अन्य आचार्यों का निर्देश करते हुए मूल में यद्यपि 'कुमाराबाधहेतुभिः' द्वारा सामान्य उल्लेख होने पर भी टीकाकारों द्वारा पार्वतक बन्धक जीव आदि का निर्देश किया जाने से तथा जीवक के इस कौमारभृत्य विषयक ग्रन्थ के मिल जाने से संभवतः उस प्रकरण में काश्यप तथा जीवक के विषयों को भी उत्तरतन्त्र में सम्मिलित कर दिया गया है।

सुश्रुत के उत्तरतन्त्र में रसभेद विषयक ६४ अध्याय तथा दोषभेदविषयक अन्तिम (६६) अध्याय के बीच में ६५ वां तन्त्रयुक्तियों का अध्याय है। कौटिलीय अर्थशास्त्र में तन्त्रयुक्तियों का अन्तिम अध्याय है। इनकी तुलना करने पर हम देखते हैं कि दोनों में अधिकरण से प्रारंभ करके ऊह्य पर्यन्त ३२ युक्तियां दी हुई है। तथा बीच में भी उद्देश, निर्देश, उपदेश, अपदेश, प्रदेश, अतिदेश आदि तथा अन्य ग्रन्थों में न आये हुए भेदों तथा अन्य भी पदार्थों में (अपने-अपने वैद्यक तथा नैतिक विषयों को छोड़कर) परस्पर समानता को देखकर एक की दूसरे पर छाया प्रतीत होती है। इनमें किसकी किस पर छाया है इस विषय में परस्पर विचार करने पर हम देखते हैं कि कौटिलीय अर्थशास्त्र में औपनिषदाधिकरण की समाप्ति पर ग्रन्थ के अन्त में तन्त्रयुक्तियां दी हुई हैं। इसी प्रकार सुश्रुत के उत्तरतन्त्र में भी साथ-साथ दिये जाने योग्य रसभेद तथा दोषभेद प्रकरण के बीच में तन्त्रयुक्तियों के अध्याय के दिये होने से पूर्वापर सङ्गति को देखकर यह कहा जा सकता है कि यह किसी दूसरे ग्रन्थ को देखकर किया गया है अथवा संस्करण के समय भी यह अनुप्रवेश संभव है। चरक संहिता में भी ग्रन्थ के अन्त में ही तन्त्रयुक्तियों का विषय दिया हुआ है, जो कि दृढ़बल द्वारा पूरित भाग में है। बाद में मिलाये हुए उत्तरतन्त्र में भी पूर्वभाग की तरह इसकी प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिये धन्वन्तरि की उक्तिरूप 'यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः' वाक्य लेखक ने संभवतः स्वयं जोड़ दिया है। इस प्रकार सुश्रुत संहिता में पीछे सम्मिलित किये हुए विषयों को मूलग्रन्थ के आगे उत्तरतन्तरूप में पृथक् जोड़ दिया गया है। चरक के समान मूल ग्रन्थ के साथ ही विषय को मिलाकर परस्पर एकाकार नहीं कर दिया गया है। इससे संहिता में संग्रह किये हुए नवीन तथा प्राचीन विषयों में परस्पर सुगमता से भेद किया जा सकता है। मुद्रित सुश्रुतसंहिता में प्रथम अध्याय के अन्त में 'सविंशमध्यायशतं पञ्चसु स्थानेषु संविभज्य उत्तरे तन्त्रे शेषानर्थान् व्याख्यास्यामः' इस पाठ के मिलने से

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद

२५५

पूर्वसंहिता के समय उत्तरतन्त्र की भी उपस्थिति प्रतीत होने से दोनों भाग एक ही समय के होने चाहिये। परन्तु मेरे संग्रहालय में विद्यमान प्राचीनताडपत्र पर लिखे हुए सुश्रुत में स्थान-स्थान पर बहुत से पाठभेद मिलते हैं। यहां भी '..... संविभज्य उत्तरे व्याख्यास्याः' यह पाठ मिलता है। इस पाठ के अनुसार १२० अध्यायों को पांच स्थानों में विभक्त करके फिर आगे व्याख्या करेंगे, इतना ही ग्रन्थ का आशय है। इससे उत्तरतन्त्र का निर्देश नहीं मिलता है। तृतीय अध्याय के प्रारंभ में अध्यायों की गणना करते हुए मुद्रित पुस्तक में दिया हुआ 'तदुत्तरं षट्षष्टिः' यह पाठ भी ताडपुस्तक में नहीं मिलता है। किन्तु उत्तरतन्त्र के अध्यायों के विषयों को सूचित करने वाले 'अतः परं स्वनाम्नैव तन्त्रमुत्तरमुच्यते' से प्रारंभ करके 'विधिनाऽधीत्य युञ्जाना भवन्ति प्राणदा भुवि' इत्यादि श्लोक तो ताडपुस्तक में भी मिलते हैं। पीछे उत्तरतन्त्र के जोड़ने के बाद उसके विषयों की सूची वाले ये श्लोक भी संभवतः पीछे से अनुप्रविष्ट हो गये हों।

वृद्धजीवकीय तन्त्र के विषय में तो यह कहा जा सकता है कि प्राचीन काश्यप संहिता के बहुत विस्तृत होने से वृद्धजीवक द्वारा उसको संक्षिप्त करके तन्त्र बनाने का उल्लेख संहिता के कल्पाध्याय में मिलता है इसलिये जिस रूप में काश्यपसंहिता थी उसी रूप में वृद्धजीवकीय तन्त्र नहीं है अपितु अन्य संक्षिप्त रचना के कारण स्पष्टरूप से उसका रूपान्तर हो चुका है। परन्तु वृद्धजीवक ने भी संक्षेप करते हुए मूलसंहिता की उपेक्षा करके स्वतन्त्र रचना नहीं की हैं अपितु उसीके उपदेशरूप वाक्यों तथा विषयों को ही लेकर विस्तृत अंशों को छोड़कर उसी का केवल संक्षिप्तंरूप कर दिया है जैसा कि उसके लेख से प्रतीत होता है।

काश्यपसंहिता के पूर्वभाग तथा खिलभाग में भी आदि से अन्त तक प्रत्येक अध्याय में इत्याह भगवान् कश्यपः' 'इति ह स्माह भगवान् कश्यपः' इत्यादि वाक्यों के समान रूप से मिलने पर भी ग्रन्थ के अन्दर आये हुए सब विषय कश्यप के ही हों, ऐसी बात नहीं है अपितु सिद्धान्त तथा उपदेश वाक्य ही केवल कश्यप के है तथा बीच में उस विषय के लिये दिये हुए पूरणिका रूप से उपक्रम तथा उपसंहार वाक्य पीछे से वृद्धजीवक द्वारा तन्त्र बनाते समय भी संभवतः दे दिये गये हों। सब अध्यायों के आदि तथा अन्त में 'इत्याह कश्यपः' यह पद तो जीवक ने संभवतः इसलिए दे दिया है कि लोग इस सारे विषय को उसकी कपोलकल्पना न समझकर काश्यपसंहिता के साररूप में ही जानकर इसे प्रामाणिक मानें। काश्यपसंहिता के पूर्वभाग में 'साहसादतिबालस्य सर्वं नेच्छन्ति कश्यपः' 'मज्जवस्योस्तु मण्डं सर्वेषां कश्यपः पूर्वम्' 'अथ कश्यपोऽब्रवीत् सर्वमप्येतदसम्ब्यक्, इत्यादि स्थलों में तथा खिलभाग में भी 'पाययेदिति कश्यपः' 'यथास्वमिति कश्यपः' 'पेय इति ह स्माह कश्यपः' इत्यादि स्थलों में पुनः कश्यप शब्द का उल्लेख होने से प्रतीत होता है कि जीवक द्वारा कश्यप के सिद्धान्तों का अर्थानुवाद किया गया है अथवा वृद्धजीवक के उपदेशक मारीच कश्यप ने भी प्राचीन कश्यपपरम्परा को सूचित करने के लिये स्थान-स्थान पर 'इति कश्यपः' पद दिया है। अस्तु, 'प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति' के अनुसार इसमें आई हुई सब सिद्धान्त आदि उक्तियां कश्यप की ही प्रतीत होती हैं। मनुस्मृति आदि प्राचीन ग्रन्थों में शिष्य भृगु ने मनु के तथा सामश्रव आदि ने याज्ञवल्क्य के उपदेशों को शब्दरूप तथा भावरूप में ग्रहण करके तथा उसे पूर्ण करके बनाई हुई संहिताओं के मनुसंहिता तथा याज्ञवल्क्यसंहिता आदि नाम रखे हैं। यहां भी इसी प्राचीन आर्ष शैली का अनुसरण किया गया प्रतीत होता है। पूर्वसम्प्रदायों का उल्लेख करते हुए कश्यप के समान उसके पुत्र काश्यपों का निर्देश होने पर भी प्रत्येक अध्याय के उपक्रम तथा उपसंहार में 'इति ह स्माह कश्यपः' तथा ग्रन्थ के मध्य में भी स्थान-स्थान पर 'कश्यपोऽब्रवीत्' 'इति कश्यपः' आदि द्वारा कश्यप शब्द से ही आचार्य का उल्लेख किया है।

इस संहिता में दो भाग हैं। कल्पस्थान तक पूर्वभाग तथा उसके बाद खिलभाग। दोनों ही भागों में प्रत्येक अध्याय के उपक्रम तथा उपसंहार में कश्यप के उपदेश रूप में 'इत्याह कश्यपः' पद मिलता है। ज्वरसमुच्चय में कश्यप नाम से दिये हुए वचन इस संहिता के पूर्वभाग तथा उत्तर भाग दोनों में मिलते हैं। पूर्वभाग में सर्वत्र कश्यप के शिष्य रूप

२५६काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

में जीवक का तथा उत्तरभाग में भी अधिकांश रूप में जीवक का तथा कहीं-कहीं किसी अन्य व्यक्ति का भी उल्लेख मिलता है। इसमें पूर्व तथा उत्तर भाग में एक ही उपदेश को सूचित करने वाले परस्पर संयोजक वाक्य दोनों भागों में मिलते$^१$ हैं।

इस प्रकार पूर्व एवं उत्तर दोनों भागों के परस्पर संबद्ध होने से एक से एक शरीर रूप से बना हुआ यह ग्रन्थ आपाततः कश्यसंहिता रूप ही प्रतीत होता है। परन्तु पूर्वभाग के अन्त में पूर्वग्रन्थ के उपसंहार रूप में ग्रन्थ की समाप्ति का निर्देश करने वाला कल्पाध्याय दिया हुआ है। उपसंहार को ग्रन्थ के अन्त में होना चाहिये। आत्रेय तथा भेड की प्राचीन संहिताएँ सूत्र, निदान आदि आठ स्थानों तथा १२० अध्यायों में पूर्ण हुई मिलती हैं। उसी के अनुसार यहां काश्यपसंहिता में भी पूर्वभाग में ही आठ स्थान तथा १२० अध्याय पूरे हो जाते हैं। इस संहिता के कल्पाध्याय के निम्न श्लोक के अनुसार भी इसके आठ विभाग दृष्टिगोचर होते हैं—

सूत्रस्थाननिदानानि विमानान्यात्मनिश्चयः । इन्द्रियाणि चिकित्सा च सिद्धिः कल्पाश्च संहिता ।।

इसके बाद अन्त में 'समाप्ता चेयं संहिता, अतः परं खिलस्थानं भविष्यति' यह संहिता की समाप्ति का सूचक पुष्पिकावाक्य भी दिया हुआ मिलता है। इस प्रकार आठ स्थानों तथा १२० अध्यायों वाला यह पूर्वभाग ही वृद्धजीवक द्वारा संक्षिप्त की हुई काश्यपसंहिता प्रतीत होती है।

उसके बाद पूर्वभाग में अनुक्त विषयों को (तथा पूर्वभाग में आये हुए विषयों को भी विकसित रूप में) इधर-उधर से कुछ आवश्यक एवं प्रकीर्ण विषयों को संग्रह करके पूर्वभागोक्त क्रम को विना ध्यान में रखे ही, सुश्रुत में १२० अध्याय वाली पूर्वसंहिता के बाद उत्तरतन्त्र के समान ८० अध्याय वाला खिलभाग पीछे से जोड़ा गया प्रतीत होता है।

मेघदूत आदि कुछ ग्रन्थों में, स्वयं लेखक द्वारा कथांश को दो भागों में विभक्त करके पूर्व एवं उत्तर भाग के दिये होने से सब जगह यद्यपि ऐसा नियम नहीं बनाया जा सकता तथापि कादम्बरी और दशकुमारचरित आदि में पूर्व एवं उत्तरभाग में रचना का भेद तथा कहीं-कहीं लेखक के भी भेद का स्पष्ट उल्लेख किया है। इन ग्रन्थों में उसके बाद में पूरे किये हुए भाग का केवल उत्तरभाग नाम से ही निर्देश किया गया है। ग्रन्थ का नाम तो सम्पूर्ण ग्रन्थ के अनुसार, कादम्बरी, दशकुमारचरित आदि एक ही है। कुछ विद्वानों का विचार है कि रामायण में भी राम के घर पर कुश तथा लव द्वारा गाये हुए भाग के पश्चात् का अंश बाद में पूरा करके जोड़ा गया है। उस भाग का उत्तरकाण्ड नाम से पृथक् व्यवहार होने पर भी सम्पूर्ण ग्रन्थ का कतो एक ही नाम से व्यवहार मिलता है। ऐसे स्थानों में जहां उत्तरभाग में लेखशैली की भिन्नता प्रतीत होती हो वहां कर्ता एवं समय के भेद से निर्माण के भेद का भी अनुमान किया गया है। सुश्रुत के पूर्वभाग में भी कौमारभृत्य तथा शालाक्य आदि विषयान्तरों के विकसित अवस्था में मिलने के कारण एक ही लेखक की रचना होने से उनका विस्तृत वर्णन मिलना चाहिये परन्तु शल्यतन्त्र की प्रधानता की रक्षा के लिये ये विषय बहुत संक्षेप से दिये गये हैं। उत्तरतन्त्र के रूप में पुनः मिलने वाले विस्तृत प्रसङ्गान्तरीय विषयों का बाद में सम्मिलित किया जाना प्रकट करने के लिये उत्तरतन्त्र नाम से निर्देश किया गया है। लेख की रचना में भेद के द्वारा निर्माण में भी भेद मालूम हो सकता है। इसी प्रकार काश्यपसंहिता का खिलभाग भी यदि पूर्वभाग के साथ ही बनाया गया होता तो पूर्वभाग में दिये हुए ज्वर आदि विषयों के साथ खिलभाग में दिये हुए ज्वर आदि विषयों की समानता को दृष्टि में रखते हुए उसी के अनुसार वर्णन किया जाता परन्तु खिलभाग में पुनः उन्हीं विषयों के देने से तथा उपदेश स्थान, समय और उपदेश्य व्यक्ति का भी भेद दिखाई देने से पूर्वभाग तथा खिलभाग में ग्रन्थ कर्ता, समय तथा रचना का भी भेद प्रतीत होता है। विद्वान् लोग ऋग्वेद में भी खिलरूप से सम्मिलित किये हुए भाग का समय भिन्न मानते हैं। यहां भी खिल नाम से निर्देश


१. इसकी टि. उपो. संस्कृत पृ. ८१ देखें।

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २५७

किया जाना ही समय तथा कर्ता के भेद को प्रकट करता है। काश्यपसंहिता के कल्पाध्याय में आए हुए 'तन्त्रं सखिलमुच्यते' वाक्य के अनुसार खिलस्थान भी इसी वृद्धजीवकीय तन्त्र का भाग प्रतीत होता है। तथा खिलभाग में आये हुए विषयों के भी काश्यप के ही उपदेश रूप होने से खिलभाग सहित ग्रन्थ ही काश्यपसंहिता प्रतीत होती है। परन्तु इस संहिता के पूर्वभाग के निम्न श्लोक से दारुवाह द्वारा प्रेरित वृद्धजीवक को कश्यप का उपदेश दिया जाना प्रतीत होता है—

उपास्यमानमृषिभिः कश्यपं वृद्धजीवकः । चोदितो दारुवाहेन वेदनार्थेऽभ्यचोदयत् ।।

इस प्रकार पूर्वभाग में प्रायः बहुत से अध्यायों में जीवक का प्रश्न तथा कश्यप द्वारा उत्तर दिया जाना मिलता है। वत्स के भृगु की सन्तान होने से वात्स्य के पूर्वपुरुष के रूप में निर्दिष्ट जीवक को भार्गव शब्द द्वारा सम्बोधन किया जाना उचित होने पर भी “भार्गवास्थीनि” द्वारा केवल एक स्थान पर भार्गव शब्द से सम्बोधन किया गया है। अन्यत्र सब स्थानों पर जीवक शब्द द्वारा ही सम्बोधन किया गया है। इसके विपरीत उत्तरभाग (खिलस्थान) में दारुवाह का उल्लेख नहीं मिलता है तथा जीवक शब्द द्वारा संबोधन भी कहीं-कहीं ही है। प्रायः सब स्थानों पर भार्गव शब्द से ही संबोधन मिलता है। अन्तर्वत्नीचिकित्सा तथा कुक्कुणक आदि अध्याय में भी कहीं-कहीं जीवक तथा भार्गव शब्द द्वारा सम्बोधन तथा जीवक द्वारा प्रश्न न करके 'नृप, नराधिप, विशाम्पते, इत्यादि राजा के सम्बोधन दिये हुए हैं तथा एक स्थान पर 'इति वार्योविदायेदम्' द्वारा वार्योविद को कश्यप के उपदेश का उल्लेख मिलता है। लेख की रचना का अनुसन्धान करने पर पूर्वभाग में प्रायः लेख की प्रौढ़ता आर्षभाव का प्राचुर्य तथा विषय की गम्भीरता दीखती है तथा उत्तरभाग में प्रायः विकसित विषय तथा निरूपण शैली भी स्पष्ट एवं सुन्दर प्रतीत होती है। रेवतीकल्प, चर्मदल, जातकर्मोत्तरीय तथा शूलचिकित्सा आदि अध्यायों में कही-कहीं पूर्वभाग के समान प्रौढ़ एवं आर्ष रचना तथा विषय की गंभीरता दिखाई देती है। उपर्युक्त वर्णन के अनुसार प्रतीत होता है कि मुख्यरूप से दारुवाह द्वारा प्रेरित जीवक ने कश्यप द्वारा दिये गये उपदेशों को लेकर पूर्वभाग का निर्माण किया है जिसमें कि रचना शैली भी प्रौढ़ है तथा अन्यत्र जीवक, वार्योविद तथा अन्य भी व्यक्तियों को समय-समय पर दिये गये कश्यप के उपदेशों को लेकर उत्तरभाग की रचना की गई है जिसमें कि विकसित अवस्था दिखाई देती है। इन उपर्युक्त स्थलों को देखने से दोनों भागों में लेखनी एवं समय का भेद स्पष्ट दिखाई देता है। संहिता के कल्पाध्याय में वृद्धजीवकतन्त्र के कुछ समय तक लुप्त रहने के बाद वात्स्य द्वारा प्राप्ति एवं संस्करण के निर्देश के बाद दिया हुआ निम्न श्लोक भी वात्स्य द्वारा ही कहा जा सकता है—

स्थानेष्वष्टसु शाखायां यद्यन्नोक्तं प्रयोजनम् । तत्तद्भूयः प्रवक्ष्यामि खिलेषु निखिलेन ते ।।

इस प्रकार यह प्रतीत होता है कि अष्टस्थानात्मक पूर्वतन्त्र ही काश्यपसंहिता का संक्षिप्तस्वरूप वृद्धजीवकीय तन्त्र है। इस पूर्वभाग में न आये हुए आवश्यक विषयों को कश्यप की उपदेश परम्परा तथा अन्य आचार्यों के ग्रन्थों से संग्रह करके वात्स्य द्वारा ही खिलभाग के रूप में अन्त में जोड़ दिया गया प्रतीत होता है। वात्स्य द्वारा ही इस भाग के जोड़े जाने पर भी कश्यप के कुछ उपदेशों को साक्षात् ग्रहण करके तथा कुछ इधर-उधर के ग्रन्थों से एकत्रित करके दिया जाने के कारण ही ग्रन्थ में कहीं प्रौढ़ और कहीं साधारण शैली दृष्टिगोचर होना स्वाभाविक ही है। इसमें वार्योविद, काङ्कायन, भारद्वाज, दारुवाह, हिरण्याक्ष, वैदेह तथा अन्य आचार्यों के मत देकर वृद्धजीवक का मत भी दिया हुआ है। अपने सामयिक एवं शिष्य होने के कारण वृद्धजीवक का मत कश्यप द्वारा अथवा स्वयं जीवक द्वारा भी पूर्वपक्ष के रूप में देकर अन्त में चरम सिद्धान्त रूप में कश्यप का मत दिया जाना यद्यपि संभव हो सकता है परन्तु बाद में वमनविरेचनाध्याय में कौत्स, पाराशर्य, वृद्धकाश्यप, वैदेह, वार्योविद तथा उस समय के अन्य भी आचार्यों के मतों का पूर्वपक्ष के रूप में निर्देश करने के बाद चरमसिद्धान्त के रूप में कश्यप के मत के स्थान पर वात्स्य का मत दिया हुआ है। परन्तु पूर्ववाद

२५८काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

के कारण बहुत पीछे होनेवाले प्रतिसंस्कर्ता वात्स्य का कश्यप तथा वृद्धजीवक द्वारा निर्देश किया जाना सम्भव न होने से वात्स्य ही इस ग्रन्थ का संस्कर्ता प्रतीत होता है। यहां दिये हुए कौत्स, पाराशर्य आदि सब प्राचीन ही आचार्य हैं। इसलिये उनके समकक्ष आया हुआ वात्स्य भी प्राचीन आचार्य ही होना चाहिये। शतपथ वंश ब्राह्मण में भरद्वाज, पाराशर्य, आग्निवेश्य, हारीत, काप्य, गालव, जातूकर्ण तथा आत्रेय आदि बहुत से प्राचीन ऋषियों का उल्लेख मिलता है। उन्हीं के साथ वात्स्य का भी उल्लेख है। आयुर्वेद के ग्रन्थों से इन नामों वाले आयुर्वेद के आचार्यों का सत्व भी प्रकट होता है। यद्यपि यहाँ ब्रह्मविद्या का निर्देश होने से इनका आयुर्वेदाचार्यत्व सिद्ध नहीं होता है, समान नाम वाले ये अन्य व्यक्ति भी हो सकते हैं तथापि यह नहीं कहा जा सकता कि ये केवल ब्रह्मविद्या के ही ज्ञाता थे, आयुर्वेद के नहीं। इन्हीं आचार्यों की पूर्वश्रेणी में स्वर्विद्य के रूप में प्रसिद्ध अश्वियों का उल्लेख होने से उसी परम्परा में होने से ये भी आयुर्वेद के आचार्य हो सकते हैं। आयुर्वेद के ग्रन्थों में पूर्वाचार्यों के रूप में दिये हुए बहुत से नामों का इस वंश ब्राह्मण में प्रायः साथ-साथ मिलने से संभवतः ये वे ही व्यक्ति प्रतीत होते हैं।

प्रतिसंस्कर्ता वात्स्य ने केवल खिलभाग ही नहीं जोड़ा है अपितु कल्पाध्याय के 'संस्कृतं तत्पुनस्तन्त्रं वृद्धजीवकनिर्मितम्' इस निर्देश के कारण पूर्वभाग में भी वात्स्य द्वारा संस्करण किया जाना स्पष्ट प्रतीत होता है। परन्तु वात्स्य द्वारा अपने विचारों को मिलाकर अनेक विषयों से युक्त खिलभाग को पृथक् रूप से जोड़ने से प्रतीत होता है कि उसने पूर्वभाग में मूल ग्रन्थ के विपर्यास रूप कोई विशेष प्रतिसंस्कार नहीं किया है अपितु पूर्वग्रन्थ में ही केवल कहीं-कहीं पूरणिका वाक्य, कहीं अपना विशेष वक्तव्य तथा तात्कालिक विषयों को देकर प्रायः उसी रूप में ही रखा है।

प्रतिसंस्कार का उद्देश्य जिस किसी भी वस्तु अथवा निबन्ध में गुणाधान द्वारा उसे उज्ज्वल करना होता है। इस उपर्युक्त प्रक्रिया द्वारा संस्कार करने से उन प्राचीन संहिताओं के लेख अथवा विषय को संक्षिप्त एवं विस्तृत करके नये विषयों के प्रवेश करने से तथा अनुपयोगी अंश को परिवर्तित करके तथा निकाल करके उनका रूपान्तर कर देने का प्रतिसंस्कर्ताओं का प्रयत्न संभवतः उचित हो परन्तु इस प्रकार पुनः संस्करण होकर प्राचीन संहिता के लेख तथा प्रतिसंस्कर्ताओं के लेख परस्पर नीर-क्षीर (दूध और पानी) की तरह मिल जाने से प्राचीन संहिता के लेखों का प्रतिसंस्कर्ताओं के लेखों में ही अन्तर्भाव हो गया है। इसीलिये प्राचीन आत्रेय संहिता का अग्निवेश द्वारा विस्तार तथा उस अग्निवेश संहिता के चरक द्वारा किये गये प्रतिसंस्करण में तथा इसी प्रकार काश्यपसंहिता के वृद्धजीवक द्वारा किये गये संक्षेप तथा उसके वात्स्य द्वारा किये गये प्रतिसंस्करणों में यह कहना कठिन है कि इनमें कितना अंश किसका है। जिस प्रकार प्राचीन मूल नावनीतक ग्रन्थ में नवीन विषयों के प्रवेश द्वारा अपूर्ण विषयों को पूर्ण करके लाहौर से प्रकाशित करवाकर प्रतिसंस्कर्ता ने बहुत उपकार किया है तथा यह भी सन्तोष का विषय है कि वाग्भट, नागेन्द्रनाथ आदि बहुत से अर्वाचीन विद्वानों के अनुभव सिद्ध ओषधियों को इसमें प्रविष्ट करके इसे और विस्तृत कर दिया है। परन्तु इस प्रकाशन में यदि नवीन पूरित (प्रतिसंस्कृत) अंश को लिपि के भेद द्वारा अथवा कोष्ठक में देकर पृथक् प्रकाशित कर दिया जाता तो यह मालूम करने में सुविधा रहती कि ग्रन्थ का कितना अंश प्राचीन (मूल ग्रन्थ) है तथा कितना अंश प्रतिसंस्कार में नया प्रविष्ट किया गया है। इस समय लाहौर तथा यूरोप से मूल नावनीतक पृथक् मुद्रित हुआ उपलब्ध होता है इसलिये उन दोनों (मूल तथा प्रतिसंस्कृत) ग्रन्थों की तुलना करने पर प्राचीन एवं अर्वाचीन अंश में यद्यपि भेद किया जा सकता हैं, परन्तु कालक्रम से यदि कभी मूल ग्रन्थ की उपलब्धि न हो सके तो केवल प्रतिसंस्कृत पुस्तक को देखकर यह भेद करना संभव नहीं होगा। इसमें वाग्भट तथा नागेन्द्रनाथ आदि का उल्लेख होने से कभी बाद में यह सन्देह हो सकता है कि नागेन्द्रनाथ के बाद में मूल नावनीतक ग्रन्थ का निर्माण हुआ है। इसी प्रकार किसी समय चरक तथा वात्स्य द्वारा प्रतिसंस्कृत ग्रन्थों से काश्यपसंहिता, आत्रेयसंहिता, वृद्धजीवकीय तन्त्र तथा अग्निवेश तन्त्रों की पृथक् स्थिति अवश्य रही होगी। रूपान्तर प्रतिसंस्कारों के प्रचार के कारण प्राचीन ग्रन्थों का प्रचार कम हो गया और इसीलिये पीछे से वे लुप्त

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद

२५९

हो गये। प्रतिसंस्करणों में कुछ अंश छोड़ दिया जाता है, कुछ नवीन अंश प्रविष्ट कर दिया जाता है तथा कुछ अंश का रूपान्तर हो जाता है। इस प्रकार ग्रन्थ के उस-उस अंश के साथ आचार्य के काल का निर्णय करना भी कठिन हो जाता है।

मस्तिष्क में उदय होनेवाले नाना प्रकार के विचारों तथा अन्य आचार्यों के उपदेशों के अनुसन्धान से नये-नये विचार उत्पन्न हो जाते हैं। प्रतिसंस्करण के अवसर पर प्राचीन आचार्यों के सिद्धान्तों का भी अर्वाचीन आचार्यों के विचारों से सामंजस्य न होने पर रूपान्तर हो सकता है तथा उनको बिलकुल निकाला भी जा सकता है। कहीं-कहीं बिलकुल निर्मल सिद्धान्त भी पुरुष सुलभ दोषों के कारण संस्करण के समय दूषित हो जाते हैं। चरकसंहिता में चिकित्सास्थान के अन्तिम १७ अध्याय तथा सिद्धि और कल्पस्थान के लुप्त हो जाने से पुनः दृढ़बल द्वारा पूरित किया जाने से उतना अंश यदि दृढ़बल की ही रचना मानी जाय तो उसमें आत्रेय, अग्निवेश तथा चरक में से किसी की भी लेखनी का प्रवेश न होने से उस भाग की अच्छाई या बुराई का उत्तरदायित्व दृढ़बल पर ही होना चाहिये। इस प्रकार यदि अग्निवेश और चरक ने भी पूर्वग्रन्थ के अन्त में परिच्छेद के रूप से अपने-अपने विचार पृथक् दिये होते अथवा आजकल अग्निवेश तन्त्र पृथक् उपलब्ध होता तो उन-उन ग्रन्थों में उस-उस भाग में आये हुए अच्छे या बुरे विचारों का उत्तरदायित्व उन-उन पर हो सकता था। परन्तु इसके विपरीत प्राचीन एवं अर्वाचीन आचार्यों के लेख गङ्गा-यमुना की तरह परस्पर मिले हुए होने से तथा पूर्व ग्रन्थों के पृथक् उपलब्ध न होने से स्थान-स्थान पर आये हुए अच्छे या बुरे विचारों का उत्तरदायित्व किस पर है यह नहीं कहा जा सकता। इस अवस्था में अर्वाचीन आचार्य के समय सम्मिलित हुई त्रुटियों का दोष भी प्राचीन आचार्यों पर पड़ सकता है। यह बात केवल चरक के विषय में ही नहीं है अपितु सुश्रुतसंहिता तथा काश्यपसंहिता में भी बाद में संस्करण के समय प्रविष्ट हुए कुछ विकार तथा अर्वाचीन विषयों के सम्बन्ध में निश्चयपूर्वक यह नहीं कहा जा सकने के कारण कि ये किसके हैं, मूलसंहिता के आचार्यों के विषय में भी अर्वाचीनता तथा उन विकारों की शङ्का उत्पन्न हो जाती है। किस प्रकार भारत के विस्तृत होकर महाभारत का रूप धारण कर लेने पर अथवा पुनः-पुनः हुए संस्करणों के अवसर पर प्रविष्ट हुए शब्दों के प्रवेश के समय का निश्चय न होने से मूलमहाभारत को भी लोग अर्वाचीन सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं। चरकसंहिता में आया हुआ विकसित निग्रहस्थान आदि का विषय भी आत्रेय, अग्निवेश अथवा चरक में से किसी की लेखनी द्वारा प्रविष्ट किया गया है इसका निश्चय न होने से आत्रेय के विषय में भी अर्वाचीनता की शंका उत्पन्न हो जाती है। इसी प्रकार काश्यपसंहिता में आये हुए उत्सर्पिणी, अवसर्पिणी आदि शब्दों का भी वात्स्य के प्रतिसंस्करण में ही होना सम्भव होने पर भी, निश्चय न होने से प्राचीनता के साधक बहुत से प्रमाणों के जागरूक होने पर भी कश्यप तथा वृद्धजीवक की अर्वाचीनता की शंका उत्पन्न कर देते हैं।

प्राचीन ग्रन्थों में ही नये विचारों को पीछे से प्रविष्ट करके पुनःसंस्करण करने की प्रथा केवल भारतीय ग्रन्थों में ही नहीं मिलती है अपितु अन्य देशों में भी यही प्रक्रिया विद्यमान थी। ग्रीस देश की प्राचीन चिकित्सा के आचार्य हिपोक्रिटस के ग्रन्थ में भी इसी प्रकार प्राचीन एवं नवीन विषयों को एकत्र तिलतण्डुल रूप से मिलाकर पुनः पुनः संस्करण होने से उसके विषय में भी कुछ विवेचन नहीं किया जा सकता है। इसी प्रकार मिश्र देश में भी एवर्टसप्येयिरस¹ नामक प्राचीन ग्रन्थ के भी अनेक संस्करण हो चुके हैं। पूर्व ग्रन्थों में ही नवीन विचारों के उदय होने पर उन विचारों का भी उसीके अन्दर अनुप्रवेश, कहीं पुस्तक के एक प्रान्त पर देना तथा कहीं टीका टिप्पणी के रूप में सम्पूर्ण नये विचारों को ग्रन्थ के मध्य में भी संस्करण के समय दिया जा सकता है। प्राचीन ग्रन्थों का सारांश भी वहां दिया जा सकता है। तथा स्थान भेद से मिले हुए पाठ भेद भी उसी में दिये जा सकते हैं। इस प्रकार यह भेद करना कठिन हो जाता है कि प्राचीन ग्रन्थ


१. इसकी टि. उपो. संस्कृत पृ. ८३ देखें।

२६० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

में कितना अंश प्राचीन है तथा कितना अंश सस्करण के समय प्रविष्ट किया गया है। समय-समय पर नये-नये विचारों के एकत्र अनुप्रवेश होते जाने से पूर्वापर ग्रन्थलेख में कहीं-कहीं परस्पर विरोध तथा व्याघात भी दृष्टिगोचर होता है। इस प्रकार प्राचीन एवं अर्वाचीन विचारों के परस्पर एकत्र सम्मिलित करने से समयान्तर में सब जगह गड़बड़ी होती आई है। पूर्वोक्त युक्तियों तथा महावग्ग, पालीजातक और तिब्बतीय गाथाओं के आधार पर भी प्राचीन सिद्ध किए हुए धन्वन्तरि, कश्यप, जीवक तथा उसी न्याय से आत्रेय सुश्रुत आदि के ग्रन्थों में भी संस्कार के कारण आये हुए अर्वाचीन विषयों के सूचक किसी-किसी पद, वाक्य या विषय, के दर्शन मात्र से ही यदि मूलग्रन्थ को अर्वाचीन सिद्ध करने का प्रयत्न किया जाय तो २३०० वर्ष पूर्व अशोक द्वारा सब स्थानों पर उद्घाटित सर्वसाधारण के चिकित्सालयों में सुविचार पूर्ण तथा सर्वाङ्ग सम्पन्न ग्रन्थों, उनके ज्ञाता चिकित्सकों, अनुभूत ओषधियों तथा सुन्दर चिकित्साप्रणालियों के होने का जो उल्लेख मिलता है उसका क्या आधार हो सकता है। कश्यप, आत्रेय, सुश्रुत आदि प्राचीन प्रौढ़ विद्वानों तथा उनके ग्रन्थों को यदि अर्वाचीन सिद्ध करें तो इनमें पूर्व के ग्रन्थ उस समय प्रसिद्ध नहीं थे। ४०१ ईस्वी पूर्व में मेयून नामक पारसी राजा का राजवैद्य टी. सी. यस. नामक एक यूनानी वैद्य था। इस प्रकार के उसके इतिहास के समान भारत में उस समय किसी भी विदेशी चिकित्सक के यहां के चिकित्सालय में आने का वृत्तान्त नहीं मिलता है। ईसा से पूर्व का महावग्ग नामक प्राचीन बौद्ध वैद्यक ग्रन्थ भी आत्रेय आदि के सिद्धान्त के अनुसार ही होने से इससे पृथक् प्रतीत नहीं होता। सर्वप्रथम रूप में मिलने वाले, कश्यप, आत्रेय, सुश्रुत आदि के ग्रन्थों तथा उनके आचार्यों को यदि छोड़ दिया जाय तो शिलालेख में दिये हुए सर्वसाधारण चिकित्सालय किन अनुपस्थित व्यक्तियों की कल्पना के आधार पर माने जायेंगे। यदि ये आत्रेय आदि आचार्य अशोक के चिकित्सालयों के उद्घाटन के बाद के माने जांय तो लोकोपकार की दृष्टि से अत्यन्त उपादेय इन साधारण औषधालयों का इन आत्रेय आदियों ने उल्लेख क्यों नहीं किया है। इनके अतिरिक्त आत्रेय आदि का कोई भी लेख इनसे प्रभावित नहीं प्रतीत होता।

इसी प्रकार सुश्रुतसंहिता आदि में भी आये हुए कुछ स्थूल सिद्धान्त, गलत सिद्धान्त अथवा अपूर्ण अंशों को देखकर कुछ लोगों को इसके विषय में अश्रद्धा उत्पन्न हो जाती है। यह भी मूललेख तथा प्रतिसंस्कार के परस्पर नीर-क्षीर के रूप में मिले होने से ही है। कालक्रम से विज्ञान, अन्य विद्याओं तथा यन्त्रों के उत्तरोत्तर विकास एवं परिष्कार हो जाने से नये-नये सिद्धान्तों के प्रकट होते जाने से प्राचीन ऋषियों के पूर्व सिद्धान्त सम्भवतः हमें स्थूल एवं कुण्ठित भले ही प्रतीत हों परन्तु उनका विचार करने का ढंग (दृष्टिकोण) सीमित नहीं कहा जा सकता। एक व्यक्ति द्वारा अच्छी समझी जाने वाली वस्तु का दूसरे द्वारा भी वैसा ही समझा जाना आवश्यक नहीं है। एक दिन उचित प्रतीत होने वाली वस्तु अगले ही दिन इसमें विपरीत भी मालूम हो सकती है। जिस प्रकार भारत में अत्यन्त प्राचीन काल से प्रचलित शोधित धातुओं एवं रसौषधियों के उपयोग की पद्धति को अन्यदेशीय विद्वान् अनेक शताब्दियों तक अनुपयोगी एवं अहितकर समझते रहे। वे ही लोग आजकल उसको उपादेय एवं हितकर कहकर उसका व्यवहार करते हैं। इसी प्रकार हमारे प्राचीन आचार्यों के बहुत से सिद्धान्त पाश्चात्त्यवैज्ञानिक प्रगति के कारण बहुत समय तक अन्यथा माने जाने के बाद अब पुनः दृष्टि के परिष्कृत हो जाने के कारण समुचितरूप में माने जाने लगे हैं। प्राचीन समय में किसी विज्ञान के अनुसन्धान के लिये क्या-क्या साधन थे? इस विषय में कुछ उल्लेख न मिलने पर भी यह कहा जा सकता है कि प्राचीन सम्प्रदाय परम्परा, अनुभव, निरन्तर लगन एवं तपस्या के आलोक से उज्ज्वल प्राचीन ऋषियों के हृदयों में प्रकट हुए बहुत से सिद्धान्त निर्मल एवं सुन्दर भी हो सकते हैं।

एक ही विषय पुनः विचार करने पर अत्यन्त परिमार्जित हो जाता है। स्वयं ग्रन्थकर्ता ही अपने पूर्वलेख का पुनः परिमार्जित विचारों के उदय होने पर आवापोद्वाप प्रक्रिया द्वारा बिलकुल विपरीत संस्कार कर सकता है। उस अवस्था में अपने ही हृदय में बार-बार उदय हुए विचारों के परस्पर सम्पर्क से मुख्य प्रमेय (ज्ञातव्य विषय) तथा तात्कालिक विषयों

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद

२६१

के अनुप्रवेश द्वारा किये गये संस्कार से गुणों में वृद्धि ही होती है। समयान्तर से इसमें गड़बड़ की संभावना नहीं होती। विद्वान् लोग निम्न प्रकार का संस्करण उचित समझते हैं—

आवापोद्धरणे तावद्यावद्दोलायते मनः । पदस्य स्थापिते स्थैर्ये हन्त सिद्धा सरस्वती ।।

(अर्थात् जब तक मन स्थिर नहीं होता तब तक आवाप और उद्वाप होते रहते है परन्तु पद के स्थिर होने पर अर्थात् पद-पदार्थ के संबन्ध के सम्यक् ज्ञान हो जाने पर सरस्वती सिद्ध हो जाती है अर्थात् अपने वश में हो जाती है)।

किन्तु बाद में आलोचना करते हुए प्राचीन महर्षियों के उपदेशात्मक ग्रन्थों में अभिप्राय भेद से पूर्वग्रन्थ के गंभीर वाक्यों के अन्यथा प्रतीत होने से तथा तात्कालिक नये विचारों के द्वारा पूर्व विचारों के अन्यथा (विपरीतरूप में) प्रकट होने से पूर्व ग्रन्थ में नवोदित विचारों को प्रविष्ट करके आवापोद्वाप प्रक्रिया द्वारा परिवर्तन, विकास एवं संक्षेप के द्वारा पूर्व ग्रन्थ का रूपान्तर युक्त प्रतिसंस्करण करने में अर्वाचीन लोगों की जो मनोवृत्ति है, वह उचित प्रतीत नहीं होती। प्राचीन सिद्धान्त एवं लेखों के विपरीत हो जाने से उनका स्वरूप ही बदल जाता है अथवा दोषों की शङ्का से वे मलिन प्रतीत होने लगते हैं। प्राचीन सूत्र, भाष्य आदि में उक्त, अनुक्त एवं द्विरुक्त आदि दोषों को दूर करने के लिए अन्य विद्वानों ने सूत्र आदियों को उसी प्रकार रखकर अपने विचारों को वार्तिक के रूप में पृथक् प्रकट किया है। इससे सूत्र भाष्य आदि में आये हुए पद एवं वाक्य आदि में अन्यथा दृष्टि उत्पन्न नहीं हो पाती। इसी प्रकार समयान्तर से नये विचारों के उदय और विकसित हो जाने से तथा पूर्वसिद्धान्तों को अन्यथासिद्ध करने की दृष्टि से प्रतिसंस्कार करने के इच्छुक व्यक्ति यदि मूलग्रन्थ को उसी रूप में रखकर अपने विशेष विचार एवं व्याख्यानों से युक्त समालोचनात्मक अन्य ग्रन्थ को खिलरूप में पृथक् जोड़ दें तो परस्पर मिश्रित न होने से प्राचीन एवं अर्वाचीन विषयों का पृथक्-पृथक् भेद, विचारों के विकास का ज्ञान तथा पूर्वापर लेख एवं विचारों की अच्छाई और बुराई का भी ज्ञान ठीक-ठीन हो जाने से कोई गड़बड़ न हो। इसके विपरीत कुछ लोग प्राचीन ग्रन्थों में भी किन्हीं सन्देहास्पद शब्दों के मिलने से ही समस्त ग्रन्थ को अर्वाचीन बतलाने लगते हैं। परन्तु प्राचीन ग्रन्थों में संस्कार के न होने पर भी उन शब्दों का अनुप्रवेश संभव होने से केवल उन शब्दों को देखकर ही ग्रन्थ को अर्वाचीन कहना संगत नहीं प्रतीत होता। कुछ विद्वान् इस प्रकार के शब्द तथा अन्य ऐसे ही विषयों को उन ग्रन्थों में दिखाकर अपने अभिप्राय को विना प्रमाणों के सिद्ध किये ही उन ग्रन्थों का आनुमानिक समय बतलाते रहते हैं। परन्तु उनके उन विचारों में क्या प्रमाण हैं, यह नहीं कहा जा सकता। इस प्रकार अव्यक्त प्रमाणों से ही विचार किया जाता है। उनके मन में आये हुए असाधारण प्रमाणों का स्पष्ट ज्ञान होने पर ही तथ्य के निर्धारण में सुविधा हो सकती है।

इस ग्रन्थ का संहितात्व तथा तन्त्रत्व

इस ग्रन्थ के संहिताकल्पाध्याय में 'संहिताकल्पं व्याख्यास्यामः' द्वारा प्रारम्भ करके निम्न श्लोक दिये हैं। जिनमें इसका तन्त्र के रूप में उल्लेख किया गया है—

स पृष्टोऽन्येन वैद्येन .... (मूल उपोद्घात पृ. ६२ देखें)।

इसके बाद 'समाप्ता चेयं संहिता' द्वारा इसका उपसंहार किया गया है। इस प्रकार मूल और पुष्पिका वाक्यों में संहिता एवं तन्त्र दोनों रूप में इसका उल्लेख किया गया है। इस ग्रन्थ के उपक्रम तथा उपसंहार के खण्डित होने से उसके द्वारा ज्ञातव्य विषय के संबन्ध में कुछ नहीं कहा जा सकता।

२६२ कश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

परन्तु संहिता शब्द का व्यवहार तन्त्र शब्द के व्यवहार की अपेक्षा प्राचीन है। प्राचीन आर्षयुग में बनाये हुए ग्रन्थ प्रायः संहिता नाम से तथा उसके बाद प्राचीन आचार्यों द्वारा बताये हुए ग्रन्थ तन्त्र नाम से व्यवहृत होते थे। संहिता शब्द का अर्थ ऋषियों के प्रतिभा एवं ज्ञान बल से प्राप्त प्रकीर्ण (भिन्न-भिन्न विषयों से सम्बन्धित) उपदेशों को सामूहिक रूप से एकत्र करके ग्रन्थ का रूप दे देना है। तथा तन्त्र शब्द भिन्न-भिन्न विषयों को भिन्न-भिन्न प्रकरण एवं सन्दर्भ सहित शास्त्र का रूप दे देने के अर्थ में प्रयुक्त होता है। इस प्रकार आत्रेय, धन्वन्तरि तथा कश्यप आदि द्वारा मूल उपदिष्ट ग्रन्थों का संहिता नाम से व्यवहार होना चाहिये। तथा इन मूलसंहिता में अग्निवेश, सुश्रुत, वृद्धजीवक आदि द्वारा प्रकरण के अनुसार विषयों को ठीक करके शास्त्र का रूप देने के बाद तैयार हुए ग्रन्थों का तन्त्र नाम दिया जाना चाहिये चरकसंहिता के प्रारम्भ में—

तन्त्रप्रणेता प्रथममग्निवेशो यतोऽभवत्। अथ भेदादयश्चक्रुः स्वं स्वं तन्त्रं .......'।।

इत्यादि द्वारा अग्निवेश आदियों को जो तन्त्रकर्ता के रूप में उल्लेख किया है, वह उपर्युक्त परिभाषा के अनुसार ही है।

संहिताओं का निर्माण ऋषियों द्वारा स्वयं अथवा उनके उपदेशों को शब्दशः अथवा अर्थशः (भावार्थ) ग्रहण करके शिष्यों द्वारा किये जाने की प्रायः प्रथा है। शिष्यों द्वारा निर्माण किये जाने पर भी केवल उनके भावों को प्रकट करने के कारण संहिताओं का नाम मूल आचार्य के अनुसार ही रखा जाता है। तन्त्रकर्ता मूल संहिता के उपक्रम तथा उपसंहार में प्रश्नोत्तर रूप में अपने तथा दूसरों के मतों को देकर उसे तन्त्र का रूप दे देते हैं। अन्य विशेषताओं को प्रविष्ट करके प्रतिसंस्कर्ता मूलसंहिता को विशालरूप में उपस्थित कर देते हैं। इस प्रकार प्रतिसंस्कर्ता के लेख में तन्त्र का तथा तन्त्र में संहिता का अन्तर्भाव होता है।

जिस प्रकार उपलब्ध चरक तथा सुश्रुत में क्रमशः आत्रेय तथा धन्वन्तरि की उक्तियां गुरु सूत्र के रूप में, अग्निवेश सुश्रुत आदियों की पूरितोक्तियां शिष्य सूत्ररूप में, अन्य आचार्यों की उक्तियां एकीय सूत्ररूप में तथा चरक, दृढबल आदि की उक्तियां प्रतिसंस्कर्तृ सूत्र के रूप में एकत्र¹ मिलती हैं, उसी प्रकार काश्यपसंहिता में भी काश्यप की उक्तियां गुरुसूत्र के रूप में, वृद्धजीवक की उक्तियां शिष्य सूत्र के रूप में, अन्य आचार्यों की उक्तियां एकीयसूत्र के रूप में तथा वात्स्य की उक्तियां प्रतिसंस्कर्तृ सूत्र के रूप में एकत्रित मिलती हैं।

जिस प्रकार पुनर्वसु आत्रेय द्वारा सर्वप्रथम उपदिष्ट संहिता को लेकर बनाये हुए अग्निवेश के तन्त्र को ही चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत करके प्रकाशित किया जाने से, आत्रेयसंहिता ही अग्निवेश तन्त्र के रूप को प्राप्त करके आजकल चरक संहिता के रूप में दृष्टिगोचर होती है। अथवा जिस प्रकार धन्वन्तरि के अष्टप्रस्थानात्मक उपदेश को लेकर दिवोदास द्वारा अन्य प्रस्थानों के उपदेशों के लुप्त हो जाने पर भी केवल शल्य प्रस्थान के विषय में उपदिष्ट संहिता को सुश्रुत ने अपने तन्त्र का रूप दिया तथा उसी का समयान्तर से संस्कार हुआ, इसलिये धन्वन्तरिसंहिता (विशेषकर शल्यसम्बन्धी विषय) ही, आजकल सुश्रुतसंहिता के रूप में मिलती है। उसी प्रकार संहिताकल्पाध्याय के लेख के अनुसार काश्यपसंहिता ही संक्षिप्त वृद्धजीवकीयतन्त्र का रूप धारण करके तथा समयान्तर से वात्स्य द्वारा प्रतिसंस्कृत होकर इस ग्रन्थ के रूप में हमारे सामने विद्यमान है। ज्यों-ज्यों उत्तरकक्षा आती है त्यों-त्यों पूर्वकक्षा पृथक् रहती हुई भी, आवापीद्वाप, विवर्धन एवं संस्कार से अन्य स्वरूप के उदय एवं प्रचार के कारण विलुप्त हो जाती है अथवा उत्तरकक्षा में अन्तर्निहित होकर एक शरीर हो जाती है (परस्पर मिल जाती है) इस प्रकार तृतीय संस्कार से युक्त होकर ये संहिताएं तन्त्र तथा प्रतिसंस्कार


१. इसकी टि. उपो. संस्कृत पृ. ८६ देखें।

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २६३

हमारे दृष्टिगोचर होते हैं। यद्यपि इन ग्रन्थों के पूर्वापर पर्यालोचन करने पर कहीं प्राचीन एवं प्रौढ लेखशैली तथा कहीं साधारण शैली के दिखाई देने से विवेचकों को इनके विषय में कुछ प्रकाश मिल सकता है तथापि वर्तमान चरकसंहिता में कितना अत्रेय का तथा कितना अंश अग्निवेश और चरक का है, सुश्रुत संहिता में भी कितना अंश मूल धन्वन्तरि का तथा कितना अंश दिवोदास, सुश्रुत तथा प्रतिसंस्कर्ता का है, इसी प्रकार काश्यपसंहिता में भी कितना अंश मूलकाश्यपसंहिता का है और कितना अंश वृद्धजीवक एवं वात्स्य का है तथा वृद्धजीवक द्वारा किये गये संक्षेप का क्या स्वरूप है इत्यादि बातों का ठीक-ठीक ज्ञान होना संभव नहीं है।

कश्यप, आत्रेय, भेड तथा सुश्रुत के ग्रन्थों की परस्पर तुलना

प्राचीन संहिताओं में पूर्व उपलब्ध चरक, भेड तथा सुश्रुतसंहिता और नवीन उपलब्ध काश्यपसंहिता के स्थान, अध्याय, प्रकरण, ग्रन्थ रचना तथा विषयों की परस्पर तुलना करने पर निम्न समानताएँ एवं विषमताएँ दृष्टिगोचर होती हैं। इस काश्यपसंहिता के प्रकरण एवं अध्यायों का स्वयं ग्रन्थकार ने कल्पस्थान के अन्तिम अध्याय में इस प्रकार वर्णन किया है—

‘अष्टौ स्थानानि वक्ष्यानि........तन्त्रं सखिलमुच्यते’ (मूल उपोद्घात पृ. ६२-६३ देखें)।

काश्यप, चरक, भेड तथा सुश्रुत संहिताओं के स्थान एवं अध्यायों की तुलना निम्न प्रकार से की जा सकती है—

स्थानवृद्धजीवकीय तन्त्रचरकभेडतन्त्रसुश्रुत
सूत्रस्थान अध्याय३०३०३०४६
निदानस्थान अध्याय१६
विमानस्थान अध्याय×
शारीरस्थान अध्याय१०
इन्द्रियस्थान अध्याय१२१२१२×
चिकित्सास्थान अध्याय३०३०३०४०
सिद्धिस्थान अध्याय१२१२९ (१२ ?)×
कल्पस्थान अध्याय१२१२८ (१२ ?)
योग१२०१२०१२०१२०
खिलभाग८०६६

उपर्युक्त चारों ग्रन्थों में से चरक, भेड तथा काश्यपसंहिता आदि तीनों में खिल स्थान को छोड़कर स्थान, अध्याय तथा अध्यायों की कुल संख्या में भी समानता¹ है। काश्यप एवं चरक संहिता में केवल सिद्धि एवं कल्पस्थान के पूर्वापर का ही भेद है। ग्रन्थों के अवयवों का विभाजन करने पर हम कह सकते हैं कि काश्यपसंहिता की चरक और भेडसंहिता में छाया दिखाई देती है अथवा उपर्युक्त तीनों ग्रन्थकारों ने किसी एक ही आचार्य का अनुसरण किया प्रतीत होता है। इन सब आचार्यों के पश्चिमप्रदेश के निवासी होने के कारण इनके ग्रन्थों में समान छाया का होना उचित भी है। इनमें से भी चरक तथा भेडसंहिता में एक ही चिकित्सा का विषय होने से तथा एक ही आत्रेय के उपदेशों को ग्रहण करके


१. भेडसंहिता के अध्याय भी अन्य स्थानों में समान है परन्तु सिद्धि एवं कल्पस्थान के खण्डित होने पर भी चरक तथा काश्यप संहिता के अनुसार कुल १२० अध्याय प्रतीत होते हैं।

१८ का.सं.

२६४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

अग्निवेश तथा चरक द्वारा तन्त्रों के निर्माण का उल्लेख मिलने से नामों के निर्देश तथा विषयों के निरूपण में विशेषरूप से समानता मिलती है। चरक तथा भेडसंहिता दोनों में निदान-स्थान में आठ प्रधान रोग दिये गये हैं। चिकित्सा स्थान में भी दोनों में उन्हीं पूर्वोद्दिष्ट आठ रोगों काही पहले वर्णन करके फिर आगे अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार बहुत से रोगों की चिकित्सा दी गई है। दोनों के सूत्रस्थान में आये हुए समान नाम एवं तुल्य विषय वाले अध्यायों का उल्लेख पहले किया ही जा चुका है। इस प्रकार आगे भी बहुत से स्थानों पर समानता दिखाई देती है। भेड केवल इतना ही है कि भेड की रचना संक्षिप्त, साररहित तथा साधारण है, परन्तु इसके विपरीत स्वयं आत्रेय अथवा अग्निवेश की रचना में तो प्रौढता एवं विषयगाम्भीर्य है ही अपितु पीछे से चरक तथा दृढबल द्वारा किये गये संस्करण में भी गूढ भाव एवं रहस्यपूर्ण तथा असाधारण रचना दिखाई देती है।

इस काश्यपसंहिता के कौमारभृत्य का ग्रन्थ होने से इसमें बालकों के तथा धात्री, गर्भिणी और सूतिका के विषय होने से अनेक विशेष विषय, ग्रहरोग तथा भैषज्यप्रक्रियाओं का भेद होने पर भी उपलब्ध भाग में स्नेहाध्याय आदि समान नाम वाले साधारण विषय थोड़े बहुत अन्तर के साथ निम्नरूप में मिलते हैं—

काश्यपसंहिताआत्रेय (चरक) संहिता
२२ वां स्नेहाध्याय१३ वां स्नेहाध्याय
२३ वां स्वेदाध्याय१४ वां स्वेदाध्याय
२४ वां उपकल्पनीयाध्याय१५ वां उपकल्पनीयाध्याय
२५ वां वेदनाध्याय१६ वां चिकित्साप्राभृतीयाध्याय
२६ वां चिकित्सासांपदीयाध्याय१७ वां कियन्तःशिरसीयाध्याय
२७ वां रोगाध्याय१८ वां त्रिशोथाध्याय
१९ वां अष्टोदरीय रोगाध्याय
२० वां महारोगाध्याय
२१ वां अष्टौ निन्दितीयाध्याय

आत्रेय तथा काश्यपसंहिता में कहीं-कहीं शब्दों तथा रचना में भेद होने पर भी विषय तथा कहीं-कहीं लेख की शैली में परस्पर समानता मिलती है।

१. काश्यपसंहिता के खिलभाग हैं—

यथा विषं यथा शस्त्रं यथाऽग्निरशनिर्यथा। तथौषधमविज्ञातं विज्ञातममृतोपमम्।।

आत्रेय (चरक) संहिता के सूत्रस्थान के प्रथम अध्याय में—

यथा विषं यथा शस्त्रं यथाऽग्निरशनिर्यथा। तथौषधमविज्ञातं विज्ञातममृतोपमम्।।

यह ^१समान श्लोक दोनों में इसी रूप में मिलता है। इस प्रकार के श्लोक को देखकर प्रतीत होता है कि एक पूर्व आचार्य द्वारा उद्धृत श्लोक को दूसरे अर्वाचीन आचार्य ने ग्रहण किया हो अथवा किसी एक ही पूर्व आचार्य का यह श्लोक किन्हीं बाद में होने वाले दोनों आचार्यों ने ग्रहण कर लिया हो यह भी संभव है।


१. इसी प्रकार निम्न श्लोक भी दोनों संहिताओं के इन्द्रियस्थानों में एक ही रूप में मिलता है—
यस्य गोमयचूर्णाभं चूर्णं मूर्धनि जायते। सस्नेहं भ्रश्यते चैव मासान्तं तस्य जीवितम्।। (अनुवादक)

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २६५

२. काश्यप संहिता में—

औषधं चापि दुर्युक्तं .... (मूल उपोद्घात पृ. ६३)

आत्रेय संहिता में—

औषधं ह्यनभिज्ञातं .... (मूल उपो. पृ. ६३)

इसी प्रकार काश्यपसंहिता के खिलस्थान के ज्वर चिकित्सा में—

सर्पिः पित्तं शमयति .... (मूल उपो. पृ. ६३)

आत्रेयसंहिता के ज्वरनिदान प्रथम अध्याय में—

स्नेहाद् वातं शमयति .... (मूल उपो. पृ. ६३)

काश्यपसंहिता में—

मज्जावसे वसन्ते .... (मूल उपो. पृ. ६३)

आत्रेय (चरक) संहिता में—

सर्पिः शरदि पातव्यं .... (मूल उपो. पृ. ६४)

इस प्रकार रचनाभेद से दोनों ग्रन्थों में एक ही विषय मिलता है।

३. काश्यपसंहिता के रोगाध्याय में रोग के विषय में एक से लेकर आठ तक भेद देकर अन्त में असंख्येयवाद दिया है। इसी प्रकार आत्रेय संहिता के सूत्रस्थान २६ अध्याय में रस के विषय में भी एक से प्रारंभ करके पहले आठ तक भेद देकर अन्त में असंख्येयवाद दिया होने से दोनों में समान शैली दृष्टिगोचर होती है।

४. रोगों के विषय में काश्यपसंहिता में (पृ. ४१) जो ८० वातिक, ४० पैत्तिक तथा २० श्लैष्मिक रोग दिये हैं। चरकसंहिता के सूत्रस्थान के २० वें अध्याय में भी वे ही रोग उतनी संख्या में तथा लगभग उन्हीं नामों से दिये हैं। इस प्रकार इस विषय में बहुत समानता है।

५. काश्यपसंहिता के लक्षणाध्याय (पृ. ५१) में सात्विक राजस तथा तामस सत्त्वों के जो अवान्तर भेद दिये हैं, आत्रेयसंहिता के शारीरस्थान के सातवें अध्याय में भी केवल सात्त्विक भेदों में एक भेद कम है, अन्य सब भेद समान हैं। दोनों की लेखशैली को देखन पर भी गम्भीर विचार एवं नये-नये विषयों से युक्त प्रौढ शैली दृष्टिगोचर होती है।

सुश्रुतसंहिता में तो खिलस्थान से पूर्वभाग में अध्यायों की कुल संख्या में १२० की समानता होने पर भी विमान, इन्द्रिय तथा सिद्धिस्यान नहीं हैं, शेष पांच स्थान ही हैं तथा उनमें भी अध्यायों की संख्या में समानता नहीं है। गर्भावक्रान्ति अध्याय में बालक तथा धात्री आदि से संबद्ध विषयों के भी होने से कर्णवेध, स्तन्यपरीक्षा, सामुद्रिक लक्षण तथा सत्त्वभेद इत्यादि कुछ विषयों में प्रायः वृद्धजीवकीयोक्त विषयों से समानता दिखाई देती है। शल्य-प्रधान सुश्रुत में शल्य से संबन्धित विषय पूर्वभाग में हैं तथा—शालाक्य आदि अन्य विषय उत्तरतन्त्र में दिये हुए हैं। खिलभाग में ६६ अध्याय हैं। वृद्धजीवकीयतन्त्र में बालकोपयोगी प्रधान विषयों का पूर्वभाग में पहले संक्षेप में निर्देश करके फिर खिलभाग में भी प्रायः वे ही कुछ पूर्वभाग में आये हुए धात्री आदि से संबन्धित विषय विस्तार से दिये हैं। इसमें खिल भाग में ८० अध्याय हैं। इस दृष्टि से कुछ समानता है तथा भिन्न विषय होने से, उनके भागानिरूपणशैली तथा रोगों के निर्देश आदि में विषमता दिखाई देती हैं।