काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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आत्रेय द्वारा वार्योविद तथा मारीच कश्यप का प्रतिपक्षी के रूप में तथा काश्यप संहिता में कश्यप द्वारा वार्योविद को उपदेश देने का उल्लेख मिलने से समकालीन अनेक प्रसिद्ध आचार्यों के परस्पर मत तथा नामोल्लेख की संभावना होने से भेड से कुछ समय पूर्व तथा परम्पर नामोल्लेख सहित एक दूसरे मत का निर्देश करने वाले आत्रेय तथा मारीच कश्यप परस्पर समकालीन प्रतीत होते हैं। अथवा जिस प्रकार इस काश्यपसंहिता में अपने ग्रन्थ के निबन्धा एवं प्रतिसंस्कर्ता वृद्धजीवक तथा वात्स्य के नाम तथा मत का उल्लेख कश्यप द्वारा संभव होने से बाद में संस्कार अथवा प्रतिसंस्कार के समय का माना जाना चाहिये। उसी प्रकार बाद में होने वाले भेड आदि का नाम तथा मतोल्लेख भी पीछे संस्करण के अवसर पर अनुप्रविष्ट हुआ प्रतीत होता है।
इसके अनुसार कौटिलीय अर्थशास्त्र आदि प्राचीन ग्रन्थों में मानव, बृहस्पति, वातव्याधि आदि तथा यास्क द्वारा गृहीत अन्य पूर्वाचार्यों का भी पक्ष प्रतिपक्षरूप से उल्लेख होने पर भी इतने मात्र से इन्हें समकालीन नहीं कहा जा सकता। पुस्तकों में लिखे हुए अतीत आचार्यों के विषयों को देखकर भी परस्पर विमर्शरूप से लिखने की भी प्राचीन शैली है। इससे अन्य आचार्यों के एकत्र नाम एवं मतोल्लेख मात्र से उन्हें समकालीन कहना उचित नहीं है। पूर्व एवं पश्चात् के दो आचार्यों का जहां परस्पर एक दूसरे का नाम एवं मतोल्लेख करना संभव प्रतीत नहीं होता वहां भी बाद में किये गये संस्करणों में पूर्व एवं उत्तरकालीन आचार्य का परस्पर नाम एवं मतोल्लेख संभव है, जैसा कि इस ग्रन्थ में प्रतिसंस्करण के कारण जीवक एवं वात्स्य का नाम एवं मतोल्लेख कई स्थानों पर किया गया है। अथवा दो समकालीन आचार्यों का स्वयं भी परस्पर नाम एवं एतोल्लेख संभव है। इस प्रकार बाद में प्रतिसंस्करण किये हुए ग्रन्थों में परस्पर नाम आदि देखकर उनके पौर्वापर्य अथवा समकालीनता का निश्चय करने के लिये सूक्ष्म दृष्टि एवं अन्य साधनों से इनका विवेचन करना आवश्यक है।
बहुत से विद्वान् तिब्बतीय उपकथाओं (Tibbatian Tales) में आये हुए तक्षशिला निवासी आत्रेय से जीवक के अध्ययन के उल्लेख के आधार पर बुद्धकालीन जीवक के गुरु आत्रेय को ही चरक संहिता का मूल आचार्य पुनर्वसु आत्रेय मानकर उसको बुद्धकालीन निश्चित करते हैं। परन्तु जीवक के विषय में तिब्बतीय गाथाओं के समान ब्रह्मदेशीय तथा सिंहलदेशीय गाथाएं भी प्रचलित हैं। इन गाथाओं में परस्पर अनेक भेद दिखाई देते हैं। जीवक के अध्ययन के विषय में महावग्ग के अनुसार किसी आचार्य से उसके अध्ययन का उल्लेख मिलता है, उसके अनुसार उसका गुरु आत्रेय था ऐसा प्रतीत नहीं होता। चुल्लक सेट्ठि जातक में भी तक्षशिक्षा में ५०० शिष्यों के गुरु किसी प्रसिद्ध बोधिसत्त्व का निर्देश मिलता है। उसकी कथाओं में पापक तथा जीवक का भी निर्देश मिलता है। सिंहल¹ की गाथाओं में शक्र द्वारा विशेष विद्या पायेहुए कपलक्ष्य (कपिलाक्ष) नामक गुरु से जीवक के अध्ययन का उल्लेख मिलता है। तथा ब्रह्मदेश² की गाथाओं में तक्षशिला का वर्णन नहीं है। अपितु वाराणसी जाकर जीवक के अध्ययन का उल्लेख मिलता है। इस
१. जीवक चिकित्सा विज्ञान के अध्ययन के लिये तक्षशिला गया। वहां का आचार्य उसे पढ़ाने के लिये सहमत हो गया। उस समय इन्द्र का सिंहासन डोलने लगा क्योंकि जीवक कपलक्ष्य के द्वारा विद्या में विशेष निपुणता प्राप्त करने लगा। जिसके बाद उसे गौतम बुद्ध की चिकित्सा की अनुमति मिली थी। देखिये—Maunal of Buddhism by Spence hardy पृष्ठ २३९. २. जीवक ने लोगों को आरोग्य प्रदान करने तथा रोगों से मुक्ति दिलाने के लिये चिकित्सा शास्त्र का अध्ययन प्रारम्भ किया। उसने वाराणसी जाकर एक प्रसिद्ध चिकित्सक का शिष्यत्व स्वीकार करके शीघ्र ही अपनी प्रतिभा के कारण इस शास्त्र में नैपुण्य प्राप्त कर लिया। देखिये—Legend of the Burmese Buddha by Right Revrent P. Bigandet पृष्ठ १९७.
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २२७
प्रकार गाथाओं में परस्पर विरोध होने से किसको प्रमाण माना जाय ? इन उपर्युक्त विरोधी कथाओं में से केवल तिब्बतीय गाथाओं के आधार पर आत्रेय को अर्वाचीन सिद्ध करना युक्तिसंगत एवं शोभन प्रतीत नहीं होता। केवल इन दुर्बल प्रमाणों के आधार पर चरक संहिता के मूल आचार्य पुनर्वसु आत्रेय का समय निर्धारण करना दुःसाहस है। यदि आत्रेय जीवक का गुरु हो तो जीवक ने अपने ग्रन्थ में आत्रेय का गुरु रूप से निर्देश क्यों नहीं किया ? क्याङ्गुर विनय के तृतीय भाग के ६१ अध्याय (९२ से १०८ पृष्ठों पर) में जीवक कुमार (छ्वे गे सोन नु) नामक वैद्यराज के विषय में निम्न कक्षा मिलती है—'जीवक ने राजा से प्रार्थना करके आजीविका के लिये भैषज्य विद्या पढ़कर कपालभेदन की चिकित्सा के विशेष अध्ययन के लिये तक्षशिला (ध्येजोग्) स्थित उस विद्या में प्रवीण ध्युन् शेकि भु (नित्यप्रज्ञ) नामक वैद्य के पास जाने के लिये राजा से प्रार्थना की। तब राजा (बिम्बसार) ने पद्मसार (पद्म हि ङिङ् पो) नामक तक्षशिला के राजा के नाम पत्र लिख दिया कि मेरा पुत्र जीवक नित्यप्रज्ञ नामक विद्वान् से भैषज्य विद्या की प्राप्ति के लिये आरहा है, उसके अध्ययन का प्रबन्ध करने की कृपा करें। बिम्बसार का वह पत्र लेकर जीवक ने तक्षशिला जाकर वहां के राजा को दिया। तब राजा के कहने पर नित्यप्रज्ञ (ध्युन् शेकि भु) नामक वैद्य से जीवक ने भैषज्य विद्या का ग्रहण किया'। ध्युन्=सदा अथवा नित्यः, शेकि=प्रज्ञायाः, भूः=सूनूः, सम्बन्धी—इस अर्थ के अनुसार तिब्बती भाषा में उसके गुरु वाचक ध्युन् शेकि भु नाम के अनेक बार व्यवहृत होने से ज्ञात होता है कि जीवक का गुरु तक्षशिला में रहने वाला तथा कपाल भेदन चिकित्सा में विशेष निपुण तथा प्रसिद्ध नित्यप्रज्ञ नामक कोई वैद्य था। राहुल साङ्कृत्यायन नामक बौद्ध पण्डित द्वारा पाली भाषा से हिन्दी भाषा में अनूदित विनय पिटक में भी लिखा है कि—'उस समय तक्षशिला में (एक) दिशाप्रमुख (दिगन्त प्रसिद्ध) वैद्य रहता था'। यहां भी आत्रेय नाम से जीवक के गुरु का निर्देश नहीं मिलता है। तिब्बतीय गाथाओं के आधार पर आत्रेय को जीवक का गुरु मानने वाले विद्वानों पास कोई अन्य प्रबल प्रमाण है या नहीं, यह विचारणीय प्रश्न है। इसके अतिरिक्त आत्रेय पुनर्वसु ने अग्निवेश को दिये गये उपदेश का स्थल 'जनपदमण्डले पाञ्चालक्षेत्रे काम्पिल्यराजधान्याम्' द्वारा स्पष्टरूप से काम्पिल्य प्रदेश बताया है। यदि तिब्बतीय एवं जातक कथाओं के आधार पर बुद्ध सामयिक जीवक के तक्षशिला में आत्रेय द्वारा अध्ययन के उल्लेख के अनुसार तक्षशिला के अध्यापक आत्रेय को ही अग्निवेश का गुरु माना जाय तो अग्निवेशसंहिता में तक्षशिला का उल्लेख क्यों नहीं मिलता है। तक्षशिला में भूगर्भ से निकले हुए तीन नगरों में से दक्षिण दिशा वाले विर्माउण्ड नामक भाग को ऐतिहासिक विद्वान् १०००-१२०० वर्ष ईस्वी पूर्व का मानते हैं। पाणिनि¹ ने भी अपने सूत्र में तक्षशिला का निर्देश किया है। इतिहास के विद्वान बुद्ध से भी पूर्व तक्षशिला में विद्या का प्रचार मानते हैं। महावग्ग तथा जातकों के अनुसार मगधनिवासी जीवक तथा काशी के राजा ब्रह्मदत्त का वैद्यक शास्त्र के अध्ययन के लिये तक्षशिला जाने का उल्लेख मिलने से प्रतीत होता है कि उस समय तक्षशिला अन्य विद्याओं के समान आयुर्वेद विद्या का भी प्रधान विद्यापीठ (University) था। पुनर्वसु आत्रेय तथा उसके शिष्य अग्निवेश को यदि उस समय माना जाय तो अग्निवेशसंहिता तथा आत्रेयसंहिता के रचयिताओं ने उस प्रसिद्ध विद्यापीठरूप तक्षशिला का अपने ग्रन्थों में वर्णन क्यों नहीं किया। अग्निवेशसंहिता में पुनर्वसु आत्रेय के जितने भी उपदेश² स्थानों का उल्लेख किया है, उनमें एक भी स्थान पर तक्षशिला का नाम नहीं है। इतनी प्रसिद्ध तक्षशिला का ग्रहण न करके काम्पिल्य आदि में उपदेश का उल्लेख करने से प्रतीत होता है कि उस समय तक्षशिला की प्रसिद्धि ही नहीं थी। इसलिये तक्षशिला की विद्यापीठ के रूप में प्रसिद्धि से पूर्व ही काम्पिल्य में आत्रेय पुनर्वसु द्वारा अग्निवेश को उपदेश दिया गया प्रतीत होता है। काम्पिल्य³ देश वैदिक समय से प्रसिद्ध है। शुक्लयजुर्वेद, तैत्तिरीय, मैत्रायणीय तथा काठकसंहिताओं में भी काम्पिल्य शब्द मिलता है। पाञ्चालशब्द⁴ भी वेद, ब्राह्मण ग्रन्थ तथा उपनिषदों में मिलता है।
१. १ से ४ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ५६-५७ देखें।
२२८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
तक्षशिला का इस प्रकार वेद, ब्राह्मण तथा उपनिषद् आदि प्राचीन ग्रन्थों में उल्लेख नहीं मिलता है। महाभारत¹ में भी उपक्रम तथा उपसंहार में और रामायण² में भी केवल उत्तरकाण्ड में तक्षशिला का उल्लेख मिलने से तक्षशिला की बाद में प्रसिद्धि प्रतीत होती है। न केवल आत्रेय तथा अग्निवेश ने उसका वर्णन नहीं किया अपितु नाना देशों का वर्णन करते हुए मारीच कश्यप तथा उसके शिष्य वृद्धजीवक ने भी तक्षशिला का उल्लेख नहीं किया है। सुश्रुतसंहिता तथा भेडसंहिता में भी उसका नाम नहीं मिलता है। बुद्धसामयिक जीवक के आचार्य का केवल आत्रेय तथा तक्षशिला निवासी के रूप में निर्देश मिलता है तथा चरकसंहिता में आचार्य आत्रेय का आत्रेय पुनर्वसु नाम से तथा काम्पिल्यनिवासी के रूप में वर्णन मिलता है। यदि जीवक और अग्निवेश दोनों एक ही आत्रेय के शिष्य होते तो जीवक की कथा में उसके इतने प्रसिद्ध सतीर्थ्य (सहाध्यायी) अग्निवेश का नाम तथा अग्निवेश के लेख में उस विशिष्ट बुद्धि एवं प्रतिभासम्पन्न प्रसिद्ध जीवक के नाम का निर्देश क्यों नहीं मिलता है। अग्निवेश का आचार्य आत्रेय पुनर्वसु केवल कायचिकित्सा का ही विद्वान् प्रतीत होता हैं। इसीलिये अग्निवेश आदि उसके शिष्यों ने भी उसी विषय में अपने ग्रन्थों की रचना की है। इसके विपरीत जीवक का गुरु आत्रेय कायचिकित्सा के अतिरिक्त शल्यचिकित्सा में विशेष कुशल था जैसा कि उसके शिष्य जीवक की चिकित्सा प्रक्रिया द्वारा स्पष्ट है। इस प्रकार चिकित्सा के विभागों की विभिन्नता भी दोनों आत्रेयों को भिन्न-भिन्न व्यक्ति सिद्ध करती है। उपर्युक्त वर्णन के अनुसार यह कहा जा सकता है कि तक्षशिला की विद्यापीठ के रूप में उन्नति एवं प्रसिद्धि से पूर्व ही काश्यप, आत्रेय, अग्निवेश, भेड तथा दिवोदास आदि का आयुर्वेद के उपदेश के ग्रहण एवं धारण का समय है। इसी प्रकार पाणिनि के कच्छादि गण (४-२-१३३) तथा तक्षशिलादि गण (४-३-९३) में आये हुए देशवाचक काश्मीर शब्द के वेद तथा ब्राह्मण ग्रन्थों की तरह आत्रेय तथा अग्निवेशसंहिताओं में न मिलने से प्रतीत होता है कि काश्मीर की उस समय विद्यमानता होने पर भी विद्यापीठ रूप में प्रसिद्धि होने से पूर्व उसकी स्थिति गौण (अप्रसिद्ध) थी। अन्यथा पाञ्चाल (गङ्गा यमुना का प्रदेश) तथा काम्पिल्य (कम्पिल-फर्रुखाबाद) के आसपास लिखी गई आत्रेय संहिता में काम्पिल्य के समीपवर्ती तथा इतने प्रसिद्ध काश्मीर का उल्लेख न होना आश्चर्य का विषय है।
इसके अतिरिक्त तिब्बतीय गाथाओं को प्रमाण मानकर यदि जीवक के आचार्य को आत्रेय माना भी जाय तो भी गोत्रवाचक आत्रेय शब्द द्वारा अनेक व्यक्तियों का उल्लेख मिलने से केवल गोत्रवाचक आत्रेय शब्द से ही उसे पुनर्वसु आत्रेय नहीं कहा जा सकता। किन्तु तिब्बतीय कथाओं के अनुसार बौद्ध ग्रन्थोक्त जीवक के अध्ययन स्थान तक्षशिला का अध्यापक आत्रेय, पुनर्वसु आत्रेय के पश्चात् बौद्धकालीन तथा केवल गोत्र की समानता वाला कोई अन्य ही आत्रेय प्रतीत होता है। राजर्षि वार्योविद का बुद्ध के समय या उसके बाद इतिहास में कहीं उल्लेख नहीं मिलता। वार्योविद के समकालीन पुनर्वसु आत्रेय का मारीच कश्यप के साथ तथा उपनिषत्कालीन समय प्रतीत होता है। इसलिये आत्रेय पुनर्वसु को बुद्धकालीन निश्चित करना अत्यन्त दुर्बल प्रमाणों पर आश्रित है।
अग्निवेश
चरकसंहिता में आत्रेय पुनर्वसु के प्रधान शिष्यरूप में निर्दिष्ट अग्निवेश तथा उसके सतीर्थ्य (सहपाठी) भी उसीके समकालीन होने चाहिये।
१. उपलब्ध महाभारत में तक्षशिला शब्द आदिपर्व के तृतीयाध्याय में दो बार तथा स्वर्गारोहण पर्व के पांचवें अध्याय में आता है। 'गुरवे प्राङ्नमस्कृत्य' (१-५५ अध्याय) से महाभारत का उपक्रम है। उससे पहला भाग सूत द्वारा बाद में पूरा किया गया है-ऐसा महाभारत के विमर्श में (Bhandarkar O.R.I. Vol. XVI part III, IV) मैंने निर्देश किया है।
२. १ की टि उपो. संस्कृत पृ. ५७ देखें।
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद [२२९]
अग्निवेश संहिता में तक्षशिला का उल्लेख न होने से परन्तु पाणिनि¹ के सूत्रो में तक्षशिला का उल्लेख मिलने से तथा पाणिनि द्वारा गर्गादि² गण में जतूकर्ण, पराशर तथा अग्निवेश शब्द का उल्लेख दिया होने से अग्निवेश का समय पाणिनि से भी पूर्व प्रतीत होता है। यद्यपि ऐसा कोई नियम नहीं है कि पाणिनि के उन-उन गणों में समानवर्गीय (समान श्रेणी के) शब्द ही दिये गये हों तथापि भाषा की दृष्टि से प्रायः एक जाति के शब्दों में प्रत्यय आदि की समानता होने से शब्दों की एकाकारता दिखाई देती है जिससे पाणिनि के गण में ऋषि, देश, नदी, नगर तथा प्राणिवाचक शब्द प्रायः साथ-साथ दिये हुए हैं। इस गर्गादि गण में जतूकर्ण, पराशर, भिषज् तथा चिकित्सित आदि शब्दों के पाठ से भिषज् तथा चिकित्सित शब्दों के सान्निध्य से पराशर शब्द वैद्याचार्य पराशर का बोधक प्रतीत होता है। उस गण में आया हुआ अग्निवेश शब्द भी उसी न्याय से आत्रेय के शिष्य वैद्याचार्य अग्निवेश का बोधक होना चाहिए। इससे अग्निवेश पाणिनि से भी प्राचीन प्रतीत होता है।
पूर्वनिर्दिष्ट³ हेमाद्रि लक्षणप्रकाश में उद्धृत शालिहोत्र के श्लोकों में आयुर्वेदाचार्यों की सूची में हारीत, क्षारपाणि, जातूकर्ण, पराशर आदि सतीर्थ्यों सहित अग्निवेश का नामोल्लेख आचार्य आत्रेय के साथ मिलता है। पालकाप्यकृत हस्त्यायुर्वेद के चतुर्थस्थान के चतुर्थ अध्याय में स्नेह विशेष⁴ के वर्णन में अग्निवेश का नाम आता है। चरकसंहिता में पुनर्वसु के नाम से दिये हुए द्वैविध्यवाद को पालकाप्य में भरद्वाज के नाम से तथा चातुर्विध्यवाद को गौतम के मत के रूप में दिया हुआ। पालकाप्य में साप्तविध्यवाद को अग्निवेश के मत के रूप में दिया हुआ है। वर्तमान चरकसंहिता में अन्य स्नेहों का उल्लेख मिलने पर भी चार स्नेहों का ही मुख्य प्रयोग मिलता है। यह परिवर्तन संस्करण के कारण प्रतीत होता है।
स्थान-स्थान पर आये हुए विषयों से प्रतीत होता है कि प्राचीन महर्षि वेद-वेदाङ्गों की तरह आयुर्वेद के विषयों के भी पण्डित थे। यद्यपि एक नाम वाले अनेक व्यक्ति हो सकते हैं तो भी मज्झमनिकाय⁵ में गौतम बुद्ध के साथ आध्यात्मिक चर्चा करने वाले सञ्चक (सत्यक) नामक निगण्ठ (निर्ग्रन्थ) नाथ पुत्र का भी गोत्रपरक अग्निवेश शब्द द्वारा निर्देश किया गया है। पक्ष एवं विपक्ष की युक्तियों के अभाव में यह वही अग्निवेश है अथवा नहीं, यह निश्चय करना कठिन है क्योंकि किसी व्यक्ति विशेष के निर्णय करने के लिये दृढ साधनों की अपेक्षा होती है तथापि आत्रेय, ब्राह्मण ग्रन्थ एवं उपनिषदों के समय के सिद्ध किये हुए दिवोदास, प्रतर्दन आदि के ही समान काल वाले होने से उसका शिष्य अग्निवेश शतपथ ब्राह्मण में आयुर्वेदीय विषयों के मिलने से संभवतः वंश ब्राह्मण⁶ में निर्दिष्ट अग्निवेश्य (अग्निवेश का शिष्य अथवा सन्तति) का पूर्वपुरुष प्रतीत होता है। आत्रेय इस प्रस्थान में प्रधान आचार्य माना गया है। उसके अग्निवेश आदि ६ प्रधान शिष्यों ने उसके उपदेश को ग्रहण करके अपने-अपने विचारों के अनुसार पृथक्-पृथक् तन्त्र बनाये। उनमें से मुख्य तन्त्रकर्ता के रूप में चरकसंहिता में उल्लेख होने से अग्निवेश का तन्त्र सबसे अधिक प्रतिष्ठित माना जाता था। जिस प्रकार आकाश के मध्य में स्थित एक ही मणि की प्रभा उस-उस प्रदेश के तारतम्य के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रतीत होती है उसी प्रकार एक ही आचार्य आत्रेय के उपदेश अग्निवेश, हारीत, क्षारपाणि आदि विद्वान् शिष्यों के अन्तःकरणों में जाकर अपने-अपने ग्रहण, धारण, मनन, प्रयोग एवं अनुभव की शक्ति के भिन्न-भिन्न होने से भिन्न-भिन्न योग्यता वाले तन्त्रों के निर्माण के कारण हुए। इनमें से अग्निवेश तन्त्र सबसे विशिष्ट था। इसीलिये बाद में इस अग्निवेश तन्त्र का ही चरक ने संस्करण करके लोक में प्रसिद्ध किया। इसकी विशिष्टता के कारण ही हारीत तथा क्षारपाणि आदि अन्य आचार्यों के ग्रन्थों का प्रचार कम था और इसीलिये आज वे विलुप्त हुए हैं।
१. १-६ की टि. उपो. संस्कृत पृ. ५८-५९ देखें।
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काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
चरक
पुनर्वसु आत्रेय के उपदेश को ग्रहण करके बनाई हुई अग्निवेश संहिता का पीछे प्रतिसंस्कर्ता के रूप में मिलने वाला चरक कौन हुआ है तथा किस समय हुआ है इसका विचार करने पर हम देखते हैं कि यद्यपि भिन्न-भिन्न ग्रन्थों में विभिन्न जगहों पर चरक शब्द का प्रयोग आता है तथापि उनसे विभिन्न¹ अर्थों का बोध होता है, फिर भी चरक नाम से प्रसिद्ध आयुर्वेद के कोई आचार्य हुये हैं, वे आचार्य चरक अमुक व्यक्ति ही थे यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता।
भावप्रकाश² में जहां आयुर्वेद के आचार्यों का वर्णन मिलता है वहां शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष तथा छन्द आदि ६ वेदाङ्गों सहित वेद तथा अथर्ववेद के अन्तर्गत आयुर्वेद के ज्ञाता शेषनाग ने भूमण्डल का वृत्तान्त जानने के लिये चर (गुप्तचर) रूप में वेद तथा वेदाङ्गों के ज्ञाता किसी मुनि के यहां आयुर्वेद के पण्डित के रूप में अवतार ग्रहण किया तथा ‘चर इव’ इस निर्वचन के अनुसार चरक नाम से प्रसिद्ध हुआ। फिर उसने आत्रेय के शिष्य अग्निवेश आदि द्वारा बनाये हुये आयुर्वेद के तन्त्रों का संस्कार करके चरकसंहिता नामक ग्रन्थ का निर्माण किया। इस प्रकार चरक संहिता के प्रणेता तथा आयुर्वेद के आचार्य चरक का इतिहास मिलता है।
चरक शब्द वैद्यमात्र का ज्ञान कराता है इसीसे एक दो स्थलों पर अन्य व्यक्तियों के लिये भी चरक शब्द का व्यवहार दिखाई देता है, ऐसा भी बहुत से लोग कहते हैं। परन्तु चरक शब्द का वैद्यमात्र के पर्याय के रूप में अभिधान ग्रन्थों (कोश) में प्रयोग होने पर सुश्रुत आदि अन्य आचार्यों के लिये भी चरक शब्द का प्रयोग होना चाहिये था, परन्तु ऐसा नहीं है, अपितु चरक संहिता के प्रणेता व्यक्ति विशेष के लिये रूढ हुआ यह चरक शब्द स्वभावतः उसी का बोध कराता है। इस प्रकार कुछ अन्य व्यक्तियों के लिये प्रयुक्त हुआ यह चरक शब्द ‘कलियुगी भीम’ की तरह औपचारिक
१. (i) कृष्ण यजुर्वेद की एक शाखा भी चरक नाम से प्रसिद्ध है। उस शाखा को मानने वाले भी चरक कहलाते हैं—ऐसा शतपथ आदि ब्राह्मणों में लिखा मिलता है।
(ii) ललितविस्तर नामक बौद्ध ग्रन्थ के १म अध्याय में—‘अत्यतीर्थिकश्रमणब्राह्मणचरकपरिव्राजकानाम्’ में श्रमणों के साथ चरक शब्द आता है जो कुछ भ्रमणशील तपस्वियों का बोधक है।
(iii) वराहमिहिरने बृहज्जातक (१५-१) में संन्यास के वर्णन में—‘शाक्या जीविक-क भिक्षुवृद्धचरका निर्ग्रन्थ-ख वन्याशनाः’ आदि में चरक शब्द दिया है जिसकी व्याख्या करते हुए भट्टोत्पल ने ‘चरकश्चक्रधरः अर्थात् चक्र धारण करने वाले तथा रुद्र ने ‘चरका योगाभ्यासकुशला मुद्राधारिणश्चिकित्सानिपुणाः पाखण्डभेदाः’ अर्थात् योगाभ्यास में कुशल मुद्रा (योगासन की अवस्था विशेष) को धारण करने वाले तथा चिकित्सा में निपुण संप्रदाय विशेष वाले—यह अर्थ किया है।
(iv) श्री हर्ष ने नैषधचरित (४-११६) में ‘देवाकर्णय सुश्रुतेन चरकस्योक्तेन जानेऽखिलम्’ इस द्व्यर्थक पद्यांश में ‘चरः स्पश एव चरकः’ अर्थात् गुप्तचर अर्थ किया है।
(v) ब्रह्मणे ब्राह्मणमिति’ तैत्तिरीय संहिता के इस मन्त्र में आये हुये चरक शब्द का भाष्यकार सायन ने बांस के अग्रभाग पर खेल करने वाला नट अर्थ किया है।
२. ‘अनन्ताश्चिन्तयामास ।.ग .... ग्रन्थोऽयं चरकः कृतः।
इत्यादि (भावप्रकाश पूर्वखण्ड १म प्रकरण ६०-६५) (अनुवादक)
क. जीविक—आजीविक सम्प्रदाय जिसका प्रर्वतक गौतमबुद्ध का समकालीन मङ्खलिपुत्र गोसाल हुवा है।
ख. निर्ग्रन्थ—जैन।
ग. सहस्रजिह्व शेषनाग का अवतार पतञ्जलि को माना है तथा आगे पतञ्जलि और चरक का अभेद प्रदर्शित किया है अतः यहां अनन्त (शेष) का अवतार चरक को माना है। (अनुवादक)
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २३१
(लाक्षणिक) ही समझना चाहिये। अथर्ववेद में आयुर्वेद के विषयों के विशेषरूप से मिलने से कश्यप तथा सुश्रुत की संहिता के समान चरकसंहिता में भी अथर्ववेद के प्रधानरूप से वर्णन होने से उसका चरक शाखा वाला होने पर भी चरकाचार्य होने में कोई व्याघात नहीं होता।
इस प्रकार गोत्र¹ नाम से आत्रेय की तरह शाखा के नाम से भी इसकी चरकरूप में प्रसिद्धि हो सकती है। अथवा उस व्यक्ति का चरक यह नाम रूढि रूप से भी हो सकता है। अथवा प्राचीन काल में पश्चिम दिशा में नागजाति का इतिहास मिलता है, भावप्रकाश के अनुसार उस जाति का कोई विद्वान् शेषनाग के अवतार के रूप में चरक नाम से प्रसिद्ध हुआ हो। बृहज्जातक के व्याख्याकार रुद्र के अनुसार वह आयुर्वेद विद्या का विशेष पण्डित था। वह लोकोपकार की दृष्टि से मधुकरी वृत्ति धारण करके गांव-गांव में घूम-घूम कर वैद्यक के उपदेश तथा चिकित्सा द्वारा लोगों का उपकार करता था। अतः संचरणशील (घूमने वाले) भिक्षु का रूप धारण करने से चरक नाम से उसकी प्रसिद्धि हुई हो यह भी सम्भव है। अस्तु, इसका किसी भी कारण चरक नाम प्रसिद्ध हुआ हो, परन्तु इस चरकाचार्य का आत्रेयसंहिता के उपदेशों को ग्रहण करके अग्निवेश द्वारा बनाए हुये तन्त्र का प्रतिसंस्कर्ता होने से आयुर्वेद विद्या में अतिनिपुण होने के कारण प्राचीन समय से ही आचार्यों की श्रेणी में सम्मान था, ऐसा प्रतीत होता है। इसीलिये वाग्भट आदियों ने भी चरकाचार्य का विशेष रूप से कीर्तन किया है। जयन्त भट्ट (मध्यकालीन काश्मीरी दार्शनिक) ने भी अपनी न्यायमञ्जरी में 'प्रत्यक्षीकृत-देशकालपुरुषदशाभेदानुसारिसमस्तव्यस्तपदार्थशक्तिनिश्चयाश्चरकादयः' इस प्रकार से चरकाचार्य को बहुत सम्मान के साथ स्मरण किया है।
चरक के समय का विचार करते हुये पाणिनिके 'कठचरकाल्लुक्' (४-३-१०९) सूत्र में चरक शब्द देखकर कुछ विद्वान् कहते हैं कि चरक पाणिनि से भी पूर्व हुए हैं। परन्तु इस सूत्र में आया हुआ चरक शब्द कठ शब्द के साहचर्य से तथा चरणव्यूह (वेद की शाखा) में गिनाये होने से चरकशाखा संहिता का निर्माता है अथवा उसी सम्प्रदाय का कोई अन्य ही प्राचीन महर्षि होना चाहिये। आजकल चरक शाखा संहिता मुद्रिता हुई मिलती भी है। इसी प्रकार 'माणवकचरकाभ्यां खञ्' (५-१-१४) सूत्र में आया हुवा चरक शब्द भी चरक नामक एक लौकिक व्यक्ति परक होने की अपेक्षा चरकशाखापरक होना अधिक उचित प्रतीत होता है क्योंकि ञित् का स्वरविषयक विधान है तथा स्वर का विशेषरूप से वैदिक प्रक्रिया में ही प्रयोग होता है।
याज्ञवल्क्य स्मृति की व्याख्या में विश्वरूपाचार्य (८वीं शताब्दी) द्वारा उद्धृत 'तथा च चरकाः² पठन्ति' इस वाक्य में अश्वियों द्वारा भैषज्य का उपदेश दीखने से आपाततः यह वैद्यक का विषय प्रतीत होने पर भी आपत्काल में
१. गोत्र—'अपत्यं पौत्रप्रभृति गोत्रम्' । (४-१-१६२) (अनुवादक)
२. चरक ऐसा कहते हैं—आरुणी के पुत्र श्वेतकेतु को उसने ब्रह्मचर्य धारण कराया। उसे अश्विनीकुमारों^क ने मधु^ख तथा मांस ओषधिरूप में बताया। उसने कहा—ब्रह्मचर्य को धारण करने वाला मैं मधु (शराब) कैसे सेवन करूं। उन्होंने उत्तर दिया कि यदि मनुष्य अपनी आत्मा द्वारा जीवित रहता है तो वह दूसरे पुण्य भी कर सकता है। इस प्रकार मनुष्य सब तरह से अपनी रक्षा करे (अर्थात् चिकित्सा के रूप में आवश्यकता होने पर मांस तथा शराब का भी सेवन किया जा सकता है) इसपर वाजसनेयियों (शुक्ल यजुर्वेद की एक शाखा वाले) ने कहा—इत्यादि ..... (याज्ञवल्क्य टीका बालक्रीड़ा १-२-३२)
क. चिकित्सा की सर्जिकल तथा मेडिकल दोनों पद्धतियों को जानने वाले। आजकल के अनुसार उन्हें M.B.B.S. कहा जा सकता है।
ख. मधु—शराब। चरक में भी मधु शब्द शराब के लिये आया हैं—'विबन्धघ्नं कफघ्नं च मधु लध्वल्पमारुतम्' । (च.सू. २७ अ. १८६) (अनुवादक)।
१६ का.सं.
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मधु (शराब) के ब्रह्मचर्य का बाधक न होकर साधक के रूप में निर्देश है। इसके साथ ही वाजसनेयियों के वचन दिये होने से तथा उनके साहचर्य से यह स्पष्ट है कि यहां चरक शब्द चरक शाखा वालों के लिये ही प्रयुक्त हुआ है। काशिकावृत्ति के लेखानुसार भी वैशम्पायन के लिये जो चरक शब्द का व्यवहार हुआ है वह भी चरक शाखा के प्रवर्तक होने से ही है। (वैशम्पायन का नाम चरक है। इसीलिये उसके सब शिष्य भी चरक कहलाते हैं—काशिकावृत्तिः ४-३-१०४)
शुक्ल यजुःसंहिता के ३० अध्याय के पुरुषमेधप्रकरण के १८वें मन्त्र में ‘दुष्कृताय चरकाचार्यम्’ यह मन्त्र खण्ड आता है। उसकी व्याख्या करते हुए हिन्दी भाषा भाष्यकार मिश्रजी ने चरकाचार्य का अर्थ वैद्याचार्य किया है इससे वैद्याचार्य चरक अत्यन्त प्राचीन हुए हैं, ऐसा भी कोई-कोई कहते हैं। परन्तु इस प्रकार व्यक्ति परक अर्थ करने में क्या कारण हो सकता है। पुरुषमेध में चरकाचार्य को दुष्कृत देवता को अर्पण करने के बाद फिर यज्वा किस वस्तु को उपहार में दे। महीधर ने तो केवल चरकों का आचार्य अर्थात् गुरु इस प्रकार सामान्यरूप से अव्यक्त ही विवरण दे दिया है। चरक शाखा वालों का आचार्य यह अर्थ भी प्रकरण विरुद्ध प्रतीत होता है क्योंकि इस प्रकरण में भिन्न-भिन्न जाति तथा भिन्न-भिन्न वृत्ति (आजीविका) वाले पुरुषों का मेधोपहरणीय के रूप में उपादान दिखाई देता है, (अर्थात् यज्ञ में बलि के रूप में संभवतः लाये जाते हुए दीखते हैं) न कि किसी शाखाविशेष के अनुयायी या व्यक्ति विशेष का। इसी मन्त्र में कितव-(जुवारी) आदि दुर्वृत्तिमान् (दुष्ट आचरण वाले) निम्नश्रेणी के लोगों को अपने योग्य देवताओं को अर्पण किया जाता हुआ दिखाई देता है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि दुष्कृत देवता को अर्पण किया जाने वाला चरकाचार्य भी कोई दुर्वृत्तिमान ही होना चाहिये। मराठी के ज्ञान कोश (Encyclopedia) के कर्ता का मत है कि यह पद चरक शाखा वालों पर आक्षेप है। परन्तु शतपथ ब्राह्मण में चरक शाखा का बोध कराने वाला चरक पद कई बार दिखाई देने पर भी केवल उस संप्रदाय मात्र का बोधक होता है, न कि उस पर कोई आक्षेप। तैत्तिरीय ब्राह्मण के मन्त्र में भी ‘दुष्कृताय चरकाचार्यम्’ यह पद है, वहां सायन ने चरकाचार्य का बांसों पर खेल करने वालों का आचार्य अर्थात् नट अर्थ किया है किन्तु वहां चरक शाखा के आचार्य का कहीं बोध नहीं होता। कृष्णयजुर्वेद के मन्त्र में दिखाई देने वाले पद का, आक्षेप की दृष्टि से, उस विभाग की चरकशाखा कां आचार्य परक अर्थ करना उपयुक्त नहीं है। इस प्रकार प्रकरण को दृष्टि में रखते हुए सायन की व्याख्या के समान यहां भी उसी प्रकार दुर्वृत्तिमान अर्थ ही उपयुक्त है। नैषध चरित¹ में जिस प्रकार चर का अर्थ स्पश=दूत किया है और चर से स्वार्थ में कन् प्रत्यय करके चरक बनाया है वैसे ही यहां भी स्पश=दूतवृत्ति वालों का प्रधान यह भी अर्थ हो सकता है। इस अवस्था में प्रकरण शुद्धि कितव-(जुवारियों) की संगति तथा दुर्वृत्ति होने से योग्य को योग्य व्यक्ति के लिये ही अर्पित करना चाहिये—इस न्याय के अनुसार दुष्कृत देवता को अर्पण किया जाना उचित प्रतीत होता है। यजुर्वेद के भाष्यकार श्रीस्वामी दयानन्द जी ने खाने वालों का आचार्य (भोजनभट्ट) अर्थ किया है। यह अर्थ ‘चर् गतिभक्षणयोः’ इस धातु से किया प्रतीत होता है।
नागेश भट्ट (व्याकरण के पण्डित) की ‘चरके पतञ्जलिः’ तथा चक्रपाणि की ‘पातञ्जलमहाभाष्यचरकप्रतिसंस्कृतैः’ इन उक्तियों के आधार पर स्थिर की हुई विज्ञानभिक्षु, भोज, भावमिश्र आदि के वचनों को प्रवण मानकर कुछ लोग चरक और पतञ्जलि को एक ही मानते हैं तथा कुछ लोग भिन्न-भिन्न मानते हैं। इस विषय में हमारे विचार निम्न हैं—
१. जिस समय दमयन्ती नल राजा के प्रेम में मूर्च्छित हो गई उसकी सहेलियों ने राजा को इसकी सूचना दी। तब राजा ने मन्त्री तथा वैद्य के सहित प्रवेश किया। उस समय मन्त्री तथा वैद्य दोनों ने राजा से कहा—कन्या के शरीर के रोग के विषय में राजा का कोई दोष नहीं है। हे राजन् ! आप सुनें-अच्छी प्रकार सुने हुए चरक (दूत) के वचन से मैं सब कुछ जानता हूँ कि इस दमयन्ती को नल राजा को दिये विना इसका सन्ताप दूर नहीं होगा अथवा चरक तथा सुश्रुत के वचनों के अनुसार मैं सब कुछ जानता हूँ कि इस दमयन्ती का ताप (ज्वर) नलद (खस) के बिना दूर नहीं हो सकता है। (यह श्लोक द्व्यर्थक है)
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद
२३३
पतञ्जलि ने ‘अरुणद्यवनः साकेतम्’ अर्थात् यवनों (यूनानियों) ने अयोध्या पर आक्रमण किया—इस वाक्य द्वारा यूनानियों के आक्रमण को अतीतरूप में तथा ‘पुष्यमित्रं याजयामः’ अर्थात् ‘पुष्यमित्र की स्तुति करते हैं’ इस वाक्य द्वारा अशोक के बाद वैदिक धर्म के पुनरुद्धारक पुष्यमित्र को वर्तमानरूप से उल्लेख किया है। इस प्रकार पतञ्जलि विक्रम संवत् के प्रारंभ से दो सौ वर्ष पूर्व का निश्चित होता है। भाण्डारकर महोदय ने भी महाभाष्य, पुराण पाश्चात्य इतिहास आदि की आलोचना करके महाभाष्यकार पतञ्जलि का समय ईसा से दो सौ पूर्व निश्चित किया है। ज्यादा प्राचीन न जाकर केवल त्रिपिटक के लेख के अनुसार ही चरक को यदि कनिष्क का समकालीन स्वीकार करें तो कनिष्क और पुष्यमित्र के समय में दो तीन सौ वर्ष का अन्तर होने से क्रमशः इनके समयों में होने वाले चरक और पतञ्जलि को एक मानने की कल्पना समाप्त हो जाती है।
योग और व्याकरण में व्यवहृत पतञ्जलि नाम को वैद्यक में न देकर वहां अन्य ही चरक नाम देने में क्या हेतु हो सकता है। महाभाष्य में ‘गोनर्दीयस्त्वाह’ ऐसा निर्देश होने से भाष्यकार अपने आपको गोनर्द देशवासी प्रकट करता है। ‘एङ् प्राचां देशे’ इस इस सूत्र की व्याख्या में काशिकाकार ने गोनर्दीय उदाहरण दिया है, इससे गोनर्द देश पश्चिम भाग में प्रतीत होता है। भाण्डारकर महोदय ने इसे वर्तमान ‘गोण्डा’ बतलाया है। कश्मीर राज्य के प्राचीन इतिहास में गोनर्द नामक राजा का वर्णन मिलने से कश्मीर ही गोनर्द देश है ऐसा भी किसी-किसी का मत है। यदि भाष्यकार पतञ्जलि ही गोनर्दीय हो और उसका चरक से अभेद हो तो चरकसंहिता के प्रतिसंस्करण में चरक अपने देश गोनर्द का कहीं भी उल्लेख क्यों नहीं करता। चरकसंहिता में पाञ्चाल (रुहेलखण्ड और मेरठ डिवीजन), पंचनद (पंजाब), काम्पिल्य (फर्रुखाबाद जिले में कम्पिल ग्राम) आदि प्रदेशों का उल्लेख है परन्तु वहाँ गोनर्द का कहीं नाम तक भी नहीं है। यदि पतञ्जलि का ही दूसरा नाम चरक हो तो व्याकरणमहाभाष्यकार पतञ्जलि ‘गोनर्दीयस्त्वाह’ कहता हुआ ‘चरकस्त्वाह’ ऐसा एक बार भी क्यों नहीं कहता। इस प्रकार समय, नाम तथा देशों के भेद से ये दोनों पृथक्-पृथक् ही सिद्ध होते हैं। पतञ्जलि के महाभाष्य में बीच-बीच में लोकोक्तियां, समासोक्तियां एवं व्यासोक्तियों का बाहुल्य है तथा उसकी भाषा एक दम दुर्बोध है परन्तु चरक संहिता में चरक द्वारा संभावित लेखांश गंभीर अर्थ वाला होता हुआ भी सरस एवं मनोहर रचना से सहृदय व्यक्तियों के हृदय को आनन्दित करता हुआ अन्य ही शैली का प्रतीत होता है। इस प्रकार लेख की शैली का भेद भी दोनों के अनैक्य (भेद) को ही प्रकट करता है। इसके अतिरिक्त यदि पतञ्जलि ही चरक हो तो व्याकरण के नये तथा विशाल ग्रन्थ महाभाष्य एवं योग के विषय में शीर्षण्य (सर्वश्रेष्ठ) पातञ्जल योगसूत्र का निर्माण करने वाला पतञ्जलि, वैद्यक में अपने प्रतिभायुक्त नये ग्रन्थ का निर्माण न करके केवल दूसरे के लेख पर संस्कारमात्र करके कैसे सन्तोष कर सकता था।
चक्रदत्त की टीका में शिवदास ने ‘तदुक्तं पातञ्जले’ इस उद्देश्य से जो श्लोक दिया है उसके रसविषय प्रतीत होने से, तथा इस श्लोक के चरक संहिता में उपलब्ध न होने से ऐसा प्रतीत होता है कि रसवैद्यक में पतञ्जलि का कोई अन्य ही ग्रन्थ है। रसवैद्यक के विषय में ग्रन्थ लिखने वाला रसायनाचार्य पतञ्जलि अपने दूसरे ग्रन्थ चरकसंहिता में रस धातु आदि औषधों को क्यों नहीं प्रविष्ट करता। चरक में तो धातुओं का केवल नाममात्र आता है तथा पारदका भी केवल एक बार वर्णन है। इसके सिवाय कहीं भी इस विषय का विशेष उल्लेख नहीं किया है, और न इस विषय को अपने रसवैद्यक के दूसरे ग्रन्थ में विस्तृत रूप से देने की सूचना दी है। एक ही वैद्यक के विषय में रसवैद्यक में पातञ्जलतन्त्र नाम से तथा ‘अग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते’ के अनुसार कायचिकित्सा में चरकसंहिता इन दो विभिन्न नामों से ग्रन्थ निर्माण का क्या प्रयोजन हो सकता है। जब स्वयं चरक, प्रतिसंस्कर्ता दृढ़बल, प्राचीन टीकाकार भट्टार हरिचन्द्र आदि तथा अन्य वाग्भट आदि आचार्यों ने सब जगह समानरूप से एक ही चरक नाम से व्यवहार किया है, तब अर्वाचीन चक्रपाणि तथा नागेश ने ही क्यों पतञ्जलि नाम से उल्लेख किया है? पतञ्जलि के आयुर्वेद के भी आचार्य होने से योग, व्याकरण तथा वैद्यक में ग्रन्थ निर्माण करने से भोज आदि द्वारा इसका निर्देश न होना ठीक नहीं है।
२३४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
पातञ्जलमहाभाष्यचरकप्रतिसंस्कृतैः । मनोवाक्कायदोषणां हन्त्रेऽहिपतये नमः ।।
चक्रपाणि के इस लेख द्वारा भी चरक ही पतञ्जलि है यह सिद्ध करना कोई शब्दयोजना के अनुकूल नहीं हैं। यहां पर यदि चरक पद उस नाम के व्यक्ति के लिये आया हो तो ‘चरकायाहिपतये’ कहना चाहिये था। चरक शब्द का प्रतिसंस्कृत पद के साथ आना उपयुक्त नहीं है क्योंकि ‘नामैकदेशे नामग्रहणम्’ अर्थात् नाम के एक अंश से सम्पूर्ण नाम का ग्रहण हो जाता है—इसके अनुसार चरक शब्द से यदि चरकसंहिता का ग्रहण किया जाय तो प्रतिसंस्कृत पद के साथ अन्वय हो सकता है। इससे चरक नाम से पूर्वप्रसिद्ध किसी ग्रन्थ विशेष का प्रतिसंस्कर्ता पतञ्जलि है यह प्रतीत होता है न कि चरक ही पतञ्जलि है।
अब हमें देखना है कि ‘इति चरके पतञ्जलिः’¹ नागेशः-चार्य की इस उक्ति का क्या आशय हो सकता है ? ‘चरकसंहिता ग्रन्थ में पतञ्जलि का यह वचन हैं’ यदि ऐसा अर्थ हो तो इस उद्धृत वचन को ‘चरक सहिता’ में मिलना चाहिये परन्तु इस उद्धृत वाक्य का चरक संहिता में न होना इस आशय के विपरीत है। चरकसंहिता के सूत्र स्थान के ११वें अध्याय तथा विमान स्थान के ४ थे अध्याय में आप्त का निर्वचन इसमें उद्धृत रीति से भिन्न ही रीति से किया है। इस प्रकार चरक पर पतञ्जलि यह अर्थ करके चरक की व्याख्या में पतञ्जलि ने ऐसा कहा यह भी अर्थ हो सकता है। इस प्रकार चरक के व्याख्याकार पतञ्जलि की यह उक्ति है, ऐसा समझना चाहिये। इससे प्रतीत होता है कि चरकसंहिता पर पतञ्जलि की व्याख्या अनुपलब्ध होने पर भी, थी अवश्य। कुछ लोग आजकल यह कहने भी लगे हैं कि पतञ्जलि स्वयं चरक न होकर चरक का व्याख्याकार था। कुछ लोग कहते हैं कि पतञ्जलि चरकसंहिता की मञ्जूषा नामक टीका का करने वाला है क्योंकि आर्यप्रदीप नामक आधुनिक पुस्तक में लिखा है कि चरकसंहिता की पतञ्जलिकृत मञ्जूषा व्याख्या थी। नागेश द्वारा रचित मञ्जूषाख्य व्याकरण ग्रन्थ में पूर्वोल्लिखित—‘इति चरके पतञ्जलिः' यह वाक्य दिया हुआ है। मञ्जूषा नागेश द्वारा बनाया हुआ व्याकरण का ग्रन्थ प्रसिद्ध ही है। पतञ्जलिकृत चरक की मञ्जूषा टीका न कहीं दिखाई देती है और न कहीं सुनने में आती है और न चक्रपाणि आदि टीकाकारों ने इसका निर्देश ही किया है। इस प्रकार अन्य साधनों (पक्ष की युक्तियों) के अभाव में निश्चय न कर सकने से ‘चरकप्रतिसंस्कृतैः’ तथा ‘चरके पतञ्जलिः' आदि अस्पष्ट वाक्यों के आधार पर दोनों को एक सिद्ध नहीं किया जा सकता।
इसके अतिरिक्त जो विषय अथवा देश जिसका विशेष रूप से परिचित एवं अभ्यस्त हो वही अनुप्राणित होकर बार-बार उसके हृदय में आता है। उदाहरण के लिये महाभाष्य में पाटलिपुत्र के अनेक बार उल्लेख होने से महाभाष्यकार का उससे विशेष परिचय तथा उनका निवासस्थान प्रतीत होता है। एक व्यक्ति के नाना विषयों में ग्रन्थ निर्माण करने पर एक ग्रन्थ में दूसरे ग्रन्थ से संबन्धित विषय आने पर अमुक ग्रन्थ में इसका प्रतिपादन किया गया है ऐसा कहना तथा दोनों ग्रन्थों में एक ही आशय के वचन देना ग्रन्थकारों का तरीका है। इस प्रकार अनेक ग्रन्थों के रचयिताओं के कुछ विषय, उक्तियां एवं युक्तियां अत्यन्त प्रिय होने से नाना ग्रन्थों में एक ही रूप में प्रायः मिलती है जैसे कि भामती के कर्त्ता वाचस्पतिमिश्र के अपने ग्रन्थ के प्रारंभ में दी हुई व्यापकविरुद्ध तथा उपलब्धि युक्तियां उसके दूसरे दर्शन के निबन्धों में भी थोड़े बहुत अन्तर से प्रायः मिलती हैं। इसी प्रकार चरकाचार्य एवं महाभाष्यकार पतञ्जलि के एक ही होने पर महाभाष्यगत विषय चरकसंहिता में और चरकसंहिता के विषय महाभाष्य में जगह-जगह क्यों नहीं मिलते जब कि दोनों विचारों का उद्गम एक ही हृदय से हुआ हो। यद्यपि इसमें यह कहा जा सकता है कि अग्निवेश संहिता का चरक केवल प्रतिसंस्कर्ता है इस लिये मूल ग्रन्थ के परवशवर्ती होकर उसने संकोच के साथ अपनी लेखनी को चलाया है और इसी
१. आप्तोपदेश रूप शब्द प्रमाण माना जाता है। अनुभव द्वारा वास्तविक तत्त्व का जिसे पूर्ण निश्चय हो तथा जो राजद्वेषादि के कारण भी कभी इससे विपरीत न कहे उसे आप्त कहते हैं—ऐसा चरक में पतञ्जलि ने कहा। (नागेशमञ्जूषायाम्)
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद | २३५
लिये महाभाष्यकार के भावों को व्यक्त करने वाली उक्तियां, शब्द तथा अन्य विशेषताएं चरकसंहिता में सन्निहित नहीं की हैं परन्तु महाभाष्य में तो केवल सूत्रों की ही परवशता थी उसमें महाभाष्यकार ने जब स्वच्छन्दतापूर्वक अपनी वाग्धारा, उदाहरण साधनोक्ति एवं लोकोक्तियों द्वारा विज्ञान एवं व्याख्यान में अपने कौशल का प्रदर्शन किया है, तब कई स्थलों पर अवसर प्राप्त होने पर भी चरकाचार्य के भावों से आबद्ध (ओतप्रोत) वैद्यक के विषयों को उसने क्यों नहीं प्रविष्ट किया। जहां कहीं सूत्र के परवश होकर उसे वे विषय आवश्यक रूप से कहने पड़े हैं उनमें वे उसके हृदय के विकास नहीं कहे जा सकते हैं। जैसे केवल वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक शब्दों के उदाहरण देना वैद्यक विद्या का जानना नहीं कहा जा सकता। वहां ‘तस्य निमित्तं संयोगात्पातौ’ (५-१-३८) सूत्र पर निमित्त अर्थ के लिये दिये हुये ‘वातपित्तश्लेष्मभ्यः शमनकोपनयोरुपसंख्यानं कर्तव्यं, सन्निपाताच्चेति वक्तव्यम्’ इन वार्तिकों के परवश होकर ही वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक, सान्निपातिक आदि उदाहरण दिये हैं। इसी प्रकार भाष्यकार ने ‘उदः स्थास्तम्भोः पूर्वस्य’ (८-४-६१) सूत्र के ‘उदः पूर्वत्वे स्कन्दे च्छन्दस्युपसंख्यानं रोगे’ इस वार्तिक के उदाहरण में लाचारी में ‘उत्कन्दको रोगः’ दिया है। परन्तु जहां उदाहरण देना ग्रन्थकार की अपनी इच्छा पर हो वहां दिया हुआ उदाहरण ही ग्रन्थकार के अन्तर्गत भावों को प्रकट करता है। भाष्यकार ने ‘ह्वः सम्प्रसारणम्’ इस सूत्र की व्याख्या में ‘अन्तरेणापि निमित्तशब्देन निमित्तार्थोऽवगम्यते’ यह लिखकर ज्वरनिमित्तक ‘दधित्रपुसं¹ प्रत्यक्षो ज्वरः पादरोगनिमित्तक ‘नड्वलोदकं² पादरोगः’ तथा आयुर्निमित्तक ‘आयुर्वे घृतम्’³ ये उदाहरण दिये हैं। यहां पर ‘आयुर्वे घृतम्’ के समान ‘दधित्रपुसं प्रत्यक्षो ज्वरः’ तथा ‘नड्वलोदकं पादरोगः’ भी प्राचीन आचार्यों के वाक्यों के ही उद्धरण प्रतीत होते हैं। अन्य भी निमित्त तथा निमित्ति के अभेद को प्रकट करने वाले बहुत से उदाहरणों के संभव होने पर इन्ही पूर्वोक्त उदाहरणों के देने से महाभाष्यकार का वैद्यक विषय का जानना प्रतीत हो सकता है परन्तु केवल इतने मात्र से उसका चरक होना सिद्ध नहीं होता। यदि इन दोनों की एकता हो तो प्रसङ्गवश व्याकरण के ग्रन्थ में आये हुये इस तरह के विषय अपने वैद्यक ग्रन्थ में उसने क्यों नहीं लिखे हैं। दधित्रपुस का ज्वर के हेतु रूप में तथा नड्वलोदक का पादरोग के हेतुरूप में उल्लेख चरक में क्यों नहीं मिलता, और उत्कन्दक नाम का रोग भावप्रकाश में मिलने पर भी चरक में क्यों नहीं मिलता। महाभाष्यकार ने विशेषरूप से परिचय, निवास एवं प्रेम के कारण जिस पाटलिपुत्र का बार-बार उल्लेख किया है चरकसंहिता में उसका वर्णन एक बार भी क्यों नहीं मिलता। गर्गादिगण में आये हुये वैद्याचार्यों के स्मरण कराने वाले अग्निवेश पराशर, जतूकर्ण आदि शब्दों के उदाहरण देना उचित होने पर भी भाष्यकार ने उनके उदाहरण नहीं दिये। अन्यत्र भी ‘आद्यन्तवदेकस्मिन्’ (१-१-२०) ‘स्वरितात्संहितायामनुदात्तानाम्’ (१-२-३९) ‘समासस्य’ (६-१-२२३) आदि सूत्रों की व्याख्याओं में अग्निवेश का उल्लेख होने पर स्वर का विषय होने से ही भाष्यकार ने अग्निवेश का वैद्याचार्य के रूप में कहीं भी परिचय नहीं दिया है। चरक में दिये हुए अन्य प्राचीन वैद्याचार्यों के महाभाष्यकार ने नाम तक भी नहीं दिये हैं।
ऋतूक्थादि सूत्र (४-२-६०) की व्याख्या में उक्थादिगण में आये हुये आयुर्वेद शब्द के ठक् प्रत्यय के रूप का उसने निर्देश नहीं किया है। वहां ‘विद्यालक्षणेत्यादि’ वार्तिक में विद्या के उदाहरण रूप वायसविधिकः, सार्पविधिकः, आङ्गविद्यः, धर्मविद्यः, त्रैविद्यः, आदि देकर भी स्वयं आचार्यरूप से अधिष्ठित आयुर्वेदविद्या का प्रतिष्ठापूर्वक नाम भी न लेना, ‘रोगाख्यायां ण्वुल् बहुलम्’ (३-३-१०८) सूत्र की व्याख्या में रोगवाचक शब्द का उदाहरण न देना, ‘रोगाच्चापनयने’ (५-४-४९) इस सूत्र में चिकित्सा रूप विशेष अर्थ में काशिका की तरह तसिल् प्रत्यय के ‘प्रवाहिकातः कुरु’ आदि किसी एक का भी वर्णन न होने पर भी भाष्यकार को चरक कहना आश्चर्यकारक ही है।
१. दही और खीरे के एक साथ खाने से प्रत्यक्षरूप से ज्वर हो जाता है। (अनुवादक)
२. ‘नड्वलोदकम्’ जिसमें नड या सरकण्डे अधिक हों ऐसे पानी (ठहरा हुआ जोहड़ का पानी) से पादरोग हो जाते हैं। (अनुवादक)
३. आयुर्धृतं नदी पुण्यं भयं चौरः सुखं प्रिया। वैरं द्यूतं गुरुर्ज्ञानं श्रेयो ब्राह्मणपूजनम् ॥ (अनुवादक)
| २३६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् |
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'चतुर्थ्यर्थ बहुलं छन्दसि' (२-३-६२) सूत्र के 'षष्ठ्यर्थे चतुर्थी वाच्या' इस वार्तिक के उदाहरण के रूप में दिये हुये तैत्तिरीय¹ वाक्य में रजस्वला के पालन करने योग्य धर्मशास्त्र के नियम दिये हैं उनके पालन न करने पर सन्तान की अनिष्टोत्पत्तिरूप फल होते हैं—ऐसा महाभाष्य में विशेषरूप से दिया है। इसी प्रकार सुश्रुत के शारीरस्थान के द्वितीय अध्याय में भी फलनिर्देश सहित इसी प्रकार के नियम दिये हैं। परन्तु पतञ्जलि से अभेद रूप में संभावित चरकाचार्य ने शारीरजातिसूत्राध्याय में महाभाष्य में विशेषरूप से उल्लिखित विषयों को सामान्यरूप से ही कहा है तथा उसके फल नहीं कहे हैं। पात्रांश (बर्तनों) में भी भेद है। यह भी एक विचारणीय विषय है।
भाष्यकार के अनुसार स्त्यै धातु से घनीभाव अर्थ में स्त्री शब्द बनता है। (स्त्यै ष्ट्यै संघाते) तथा 'सू' धातु से प्रवृत्ति अर्थ में पुंस शब्द बनता है। इसी प्रकार घनीभाव रूप अर्थ को लेकर स्त्री शब्द का व्यवहार होता है। चरक के अनुसार घनीभाव को लेकर पुंस् शब्द का व्यवहार होता है। प्रसव माता का धर्म होने से तथा 'षूङ् प्राणिगर्भविमोचने' इस पाणिनीय धातुपाठ के अनुसार व्यवहार में 'स्त्री सूते' 'माता सूते' आदि प्रयोग ही ठीक है। परन्तु भाष्यकार के अनुसार प्रसव पुरुष का धर्म होने से 'पुमान् सूते' यह प्रयोग ठीक है। 'माता सूते' यह प्रयोग दूसरे अर्थ को प्रकट करने से औपचारिक (लाक्षणिक) जानना चाहिये। इस प्रकार चरक तथा भाष्यकार की प्रक्रिया में भेद है। इन पक्ष-प्रतिपक्ष की युक्तियों के आधार पर मेरी दृष्टि में चरक एवं पतञ्जलि के अभेद की अपेक्षा भेद ही अधिक सिद्ध होता है।
इसके अतिरिक्त चरकसंहिता के शारीर स्थान के १ म अध्याय में पुरुष के वर्णन के प्रसङ्ग में आये हुये योग से पातञ्जल योग के विषय की तुलना करने पर भी यही प्रतीत होता है। शारीरस्थान के प्रथम अध्याय में पूर्वोद्दिष्ट २३ प्रश्नों में से षद्धातुसमवायात्मक (खादयश्चेतनाषष्ठा-६ धातुओं के समवायरूप) अथवा चतुर्विंशतितत्त्वसमवायात्मक (मनोदशेन्द्रियाण्यर्याः । प्रकृतिश्चाष्टधातुकी-२४ तत्त्वों के समवायरूप) वेदना तथा योग के निवर्तन के योग्य कर्मपुरुष (चिकित्साधिष्ठित पुरुष) के विषय में २१ प्रश्नों का समाधान करके सब वेदनाएं जिसकी निवृत्त हो गई हैं ऐसे पुरुष के विषय में 'क्व चैता वेदना सर्वा निवृत्तिं यान्त्यशेषतः' इस प्रश्न के उत्तर में भगवान् आत्रेय कहते हैं कि—
योगे मोक्षे च सर्वासां वेदनानामवर्तनम् । मोक्षे निवृत्तिर्निःशेषा योगो मोक्षप्रवर्तकः ।।
अर्थात् अन्तःकरण (मन) के विषय के दुर्योंग (मिथ्यायोग) से उत्पन्न सुख-दुःख से रहित होने की अवस्था का जिसमें उदय हो गया है ऐसे योग का वर्णन है। फिर ५वें अध्याय में अग्निवेश के पूछने पर आत्रेय ने प्रवृत्ति तथा निवृत्ति को पृथक्-पृथक् बांटकर निवृत्त्यात्मक अपवर्ग के लिये पूर्वोक्त सत्सङ्ग ब्रह्मचर्य आदि का साधन के रूप में गद्यवाक्यों में विशेषरूप से वर्णन किया है। इन दोनों पूर्वापर अध्यायों में एक ही विषय भङ्गीभेद से आत्रेय ने ही वर्णन किया है। इस प्रकार प्रतिसंस्कर्ता चरक के रूप में संभावित पतञ्जलि से प्राचीन ही यह लेख मालूम पड़ता है।
सुश्रुत में चिकित्सा शास्त्र में उपयोगी होने से चिकित्सा के अधिकरण पंचमहाभूत एवं आत्मा के समवायरूप कर्म पुरुष (चिकित्साधिष्ठित कर्म पुरुष) की, भेडसंहिता में भी उसी प्रकार के षड्धातु एवं चेतना के समवायरूप तथा इस काश्यपसंहिता में भी 'शरीरेन्द्रियात्मसत्त्वसमुदयरूपं पुरुषमाचक्षते आत्मानमेके' (पृष्ठ ६७) के अनुसार शरीर एवं शरीरी के समवायरूप (कर्मपुरुष) का ही वर्णन है। इन्हीं के अनुसार प्राचीन सिद्धान्त को दृष्टि में रखते हुए भगवान् आत्रेय ने भी उतना ही लिखा होगा और मोक्ष के लिए उपयोगी योग का विषय पीछे से इस प्रकरण में प्रतिसंस्कार करते हुए हुए चरक ने प्रविष्ट कर दिया, यह मानें तो चरक तथा पातञ्जल सूत्र में कही हुई योग की प्रक्रिया समान होनी चाहिये थी परन्तु ऐसा नहीं है। पातञ्जल में— 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः' (१-२) 'ता एव सबीजः समाधिः' (१-४५) तस्यापि
१. इसकी टि. उपो. संस्कृत पृ. ५० देखें।
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद
२३७
निरोधेन सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः' (१-५०)¹ इत्यादि सूत्रों द्वारा अन्तःकरण की बहिर्वृत्तियों को रोक कर आत्मस्वरूप एक वृत्ति की स्थापना करना और अन्त में आत्माकार वृत्ति को भी रोक कर निवात दीप की तरह अपने आपको स्थिर कर लेना—इस प्रकार संप्रज्ञात और असम्प्रज्ञात भेद से (सबीज तथा निर्बीज भेद से) दो प्रकार का योग दिया है और इस प्रकार के योग के हो जाने पर ऋतम्भरा प्रज्ञा आदि (ऋतं बिभर्ति इति) फल होते हैं। तथा मोक्ष का स्वरूप निम्न है—'तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्' (१-३) अर्थात् द्रष्टा का अपने स्वरूप में स्थित हो जाना 'पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपनिष्ठा वा चितिशक्तेः' अर्थात् पुरुषार्थशून्य गुणों का उदय होना और विशुद्ध चिकिशक्ति का अपने रूप में स्थिर रहना ही मोक्ष है—इत्यादि द्वारा आत्मा का किसी के साथ न रहना, अपरिवर्तनशीलता, अपने चित् स्वरूप में रहना, यह चरम सिद्धान्त रूप से वर्णन किया है। इसके विपरीत चरकसंहिता में—
आत्मनेन्द्रियमनोर्थानां सन्निकर्षात् प्रवर्तते । सुखदुःखमनारम्भादात्मस्थे मनसि स्थिरे ।।
निवर्तते तदुभयं वशित्वं चोपजायते । सशरीरस्य योगज्ञास्तं योगमृषयो विदुः ।।
अर्थात् इन्द्रियों और मन को बाहरी विषयों से लौटाकर मन को आत्मा में स्थिर करना योग कहलाता है। और
मोक्षो रजस्तमोऽभावाद्वलवत्कर्मसंक्षयात् । वियोगः कर्मसंयोगैरपुनर्भव उच्यते ।।
अर्थात् जब रजोगुण और तमोगुण समाप्त होकर केवल सत्त्वगुण शेष रहे, बलवान प्राक्तन कर्म क्षीण हो जायें तथा शरीर और अन्तःकरण (मन) के साथ आत्मा का स्थायीरूप से वियोग हो जाये उसे मोक्ष कहा है।
इन दोनों की यदि हम तुलना करें तो हम देखते हैं कि चरक में केवल सत्त्वगुण के शेष रह जाने पर आत्मा में अपने अन्तःकरण की वृत्तियों के स्थिर करने को योग तथा त्रैगुण्यावस्था के संपादन के योग्य शरीर तथा अन्तःकरण के वियोग को मोक्ष कहा है। पतञ्जलि ने तो सबीज समाधि के बाद अन्त में निर्बीज समाधि द्वारा अन्तःकरण की सब वृत्तियों के विलय हो जाने पर उनका फिर उदय न हो उसे योग तथा अन्तःकरण (मन) की वृत्तिरूप सुख दुःख की छाया की समाप्ति होकर आत्मा का कूटस्थ (अपरिवर्तनशील) तथा चित्स्वरूप होने को मोक्ष कहा है। अतः मुख्य प्रतिपाद्य विषयों में भेद दीखता है। इस प्रकार चरकोक्त योग 'आत्मस्थे मनसि स्थिरे, रजस्तमोऽभावात्, शुद्धसत्त्वसमाधानात्' इत्यादि (वाक्यों के आधार पर रजोगुण तथा तमोगुण समाप्त होकर शुद्ध सत्त्वगुण के शेष रहने पर सत्त्वगुण प्रधान मन के आत्मा में स्थिर हो जाने के कारण पतञ्जलि के सम्प्रज्ञात श्रेणी में कहे हुए योग में ही अन्तर्निहित हो जाता है। यदि मन के लय होने का प्रतिपादन किया जाता तो सात्त्विकवृत्ति के भी परिहार से ध्येयमात्र प्रकाशावस्था रूप असम्प्रज्ञात योग का बोध होता। पतञ्जलि का योग सम्प्रज्ञात श्रेणी से भी परे असम्प्रज्ञात श्रेणी में जाकर समाप्त होता है तथा उसी अवस्था में ही इष्ट सिद्धि होती है—इस प्रकार योग की मुख्य श्रेणियों में भेद है।
चरक में
आवेशश्चेतसो ज्ञानमर्थानां छन्दतः क्रिया । इष्टिः श्रोत्रं स्मृतिः कान्तिरिष्टतश्चाप्यदर्शनम् ।।
इत्यष्टविधमाख्यातं योगिनां बलमैश्वरम् । शुद्धसत्त्वसमाधानात्तत्सर्वमुपजायते ।।
१. चित्तवृत्ति के निरोध, (Concentration of mind) को योग कहते हैं। उसके दो भेद हैं। सबीज और निर्बीज समाधि। अर्थात् जब वासनाओं का कुछ अंश शेष रह जाय तथा आत्मा की सत्ता विद्यमान रहे तो उसे सबीज-समाधि कहते हैं। उस सबीज समाधि के भी निरोध हो जाने पर सब कुछ निरोध हो जाता है उसे निर्बीज समाधि कहते हैं जिसमें आत्मा का भी पृथक् अस्तित्व न रहे। (अनुवादक)
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(इत्यादि द्वारा ८ (आठ) योग की विभूतियां दी हैं। यथा (१) दूसरे के मन में प्रवेश करना (२) सब विषयों का ज्ञान (३) अपनी इच्छानुसार कार्य करना (४) दिव्य दृष्टि (५) दिव्य श्रोत्र (६) दिव्य स्मृति (७) कान्ति (८) अपने आपको तिरोहित कर सकना)—ये सब आत्मा में मन के स्थिर हो जाने पर ही होती हैं तथा उनको केवल ईश्वरीय शक्तियां ही कहा है। इसके अतिरिक्त पतञ्जलि ने आत्मविषयक योग के ऋतम्भरप्रज्ञा आदि फल कहे हैं। उस योग को सिद्ध करने की अवस्था में अभ्यास को बढ़ाने के लिये त्राटकादि की तरह उन-उन विषयों में किये जाने वाले धारणा, ध्यान तथा समाधि रूप योग के अङ्गभूत संयम का, परचित्तज्ञान, सर्वभूतरुतज्ञान (सब प्राणियों के शब्दों का ज्ञान, पूर्वजातिज्ञान, हस्तिबल भुवनज्ञान, ताराव्यूहज्ञान, कायव्यूहज्ञान आदि बहुत सी सिद्धियों का विभूतिपाद में विभूतियों के रूप में वर्णन किया है। इस प्रकार दोनों में हेतुहेतुमद्भाव (भिन्न-भिन्न कारणों से भिन्न-भिन्न कार्यों का होना) विभिन्न है, प्रक्रिया का भेद है, कहीं-कहीं एक ही विषय में भिन्न-भिन्न पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग है तथा विभूतियों की संख्या भी इसमें ८ नहीं है। उन विभूतियों का भी 'ते समाधावुपसर्गाव्युत्थाने' के अनुसार मुख्य योग के मार्ग में व्याघात होने से वर्णन नहीं किया है।
योग और मोक्ष के साधन के वर्णन में कहा है—
सतामुपासनं सम्यगसतां परिवर्जनम्। ब्रह्मचर्योपवासश्च नियमाश्च पृथग्विधाः ।।
धारणं धर्मशास्त्राणां विज्ञानं विजने रतिः । विषयेष्वरतिर्मोक्षे व्यवसायः परा धृतिः ।।
इत्यादि द्वारा सत्सङ्ग असत्सङ्गवर्जन आदि बहुत से उपाय बताये हैं। इनमें ब्रह्मचर्य आदि कुछ उपाय पतञ्जलि के यम-नियमों में भी आते हैं। सत्सङ्ग, उपवास, शास्त्रधारण आदियों को वहां साधनों में नहीं लिखा है। अपितु वहां अभ्यास तथा वैराग्य को जो कि योग के हेतु रूप में लिखे हैं, ओंकार की उपासना, मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा$^१$ आदि चित्तसम्बन्धी कर्म, प्राणायाम तथा आसन आदि, जिनका योग के अङ्गरूप में विशेष उल्लेख किया है उनका चरकसंहिता में उल्लेख नहीं किया। इस प्रकार साधनों में भी पूर्ण समानता नहीं पाई जाती। मुख्य उपादेय अंश में थोड़ी बहुत समानता तो सब जगह मिल सकती है।
इसके अतिरिक्त योग विद्या भी पतञ्जलि की ही आविष्कृत नहीं है, इसके पूर्व महाभारत आदि में भी इसका वर्णन मिलता है। 'हिरण्यगर्भ योग का वक्ता है'—इस वाक्य के अनुसार हिरण्यगर्भ के समय से ही योग विद्या का शाश्वतिक उदय माना गया है। महेञ्जोदारो की खुदाई में योगस्थ पुरुष की मूर्ति के मिलने से भारत में योग का प्रचलन अत्यन्त प्राचीन है—ऐसा सर जान मार्सले ने अपनी पुस्तक (Mohenjodaro and indus civilization Vol I) के ५४ पृष्ठ में अपना मत प्रदर्शित किया है। श्रीयुत सुरेन्द्रनाथदास गुप्त ने अपनी पुस्तक (History of Indian Philosophy Vol I) के २२६ पृष्ठ पर यही लिखा है। इस प्रकार स्वरूप, हेतु, फल, साधन, पारिभाषिक शब्दों की भिन्नता, पातञ्जल योग क्रिया में समय के व्यतिक्रम (व्यवधान) से विषय का विकसित होना तथा दोनों की लेखन शैली में भेद होने से दोनों लेखक भिन्न-भिन्न प्रतीत होते हैं।
महाभारत के अश्वमेध के अनुगीता पर्व के १९वें अध्याय में 'अतः$^२$ परं प्रवक्ष्यामि योगशास्त्रमनुत्तमम्' इस वाक्य द्वारा प्रारम्भ करके दी हुई योग विद्या में भी इसी प्रकार इन्द्रियों को रोक कर मन को आत्मा में स्थिर करके मोक्ष के लिये योग करना लिखा है तथा उसके उपाय रूप से योगशास्त्रों का अभ्यास, एकान्त में रह कर संयम तथा इन्द्रियों
१. चरक में यद्यपि मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा आदि इन्हीं नामों से ये शब्द नहीं दिये हैं-फिर भी ये शब्द कुछ थोड़े से अन्तर से अवश्य मिलते हैं, यथा—
मैत्री कारुण्यमार्तेषु शक्ये प्रीतिरुपेक्षणम्। प्रकृतिस्थेषु भूतेषु, वैद्यवृत्तिश्चतुर्विधा ।। (च.सू. ९ अ. २५ श्लोक) (अनु.)
२. इसकी टि. उपो. संस्कृत पृ. ६५ देखें।
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को वश में करना लिखा है। इस प्रकार योग से मनुष्य में इच्छानुसार नाना शरीरों को उपलब्ध करना, देवताओं को वश में करना, निर्भयता, अक्लेश, निस्पृहा आदि उत्पन्न हो जाते हैं—इस प्रकार महाभारत में जिस योग का वर्णन किया है वह पूर्णरूप से न मिलने पर भी इसका कुछ अंश में सान्निध्य चरकसंहितागत योग प्रक्रिया में मिलने से हम कह सकते हैं कि चरक में प्राचीन योग का ही अनुसरण किया गया है न कि पातञ्जल योग का। इस प्रकार इन दोनों आचार्यों की विभिन्न योग प्रक्रियाएँ भी इन दोनों को भिन्न-भिन्न व्यक्ति ही सिद्ध करती हैं।
इसके अतिरिक्त योग सूत्रों के कर्ता पतञ्जलि एवं महाभाष्यकार पतञ्जलि भी एक ही व्यक्ति हैं अथवा भिन्न-भिन्न, इसमें भी विद्वानों में परस्पर मतभेद हैं। महाभाष्यकार पतञ्जलि का समय धातु एवं रसायनों की उन्नति से पूर्व का होने से रसायन शास्त्र का आचार्य पतञ्जलि भी भिन्न-भिन्न ही व्यक्ति है—इनमें केवल नाम का ही साम्य है ऐसा सुरेन्द्रनाथ दास गुप्त ने अपनी पुस्तक (History of indian philosophy Vol I) के २६१ पृष्ठ पर लिखा है। अप्रासङ्गिक होने से इस विषय में हम अधिक विचार नहीं करते।
अल्वेरूनी¹ नामक लेखक तो अग्निवेश तथा चरक में ही अभेद मानता है परन्तु यह मत 'अग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते' में तन्त्रकार एवं प्रतिसंस्कर्ता का स्पष्ट भेद दिये होने से खण्डित हो जाता है। परन्तु यद्यपि दोनों आचार्य भिन्न-भिन्न हैं तो भी दोनों के ग्रन्थों का एक ही व्यक्ति द्वारा संकलित किया जाने से तथा उनके नाम मात्र शेष जाने से वर्तमान समय में तो दोनों का अभेद सा ही हो गया है, यह बड़े दुख का विषय है।
वर्तमान में उपलब्ध प्रतिसंस्कृत चरकसंहिता में भी अधिकांश रूप में प्राचीन सांख्य दर्शन को ही लेने से, बौद्ध मत की छाया न होने से तथा प्रतिसंस्कार के समय संभावित रूप से प्रविष्ट लेखों में भी प्राचीन एवं प्रौढ़ रचना के दिखाई देने से प्रतिसंस्कर्ता चरक भी अर्वाचीन प्रतीत नहीं होता। किन्तु भिषग्जितीय अध्याय में न्यायदर्शन के निग्रह स्थान आदि बहुत से पदार्थों की समीक्षा होना, इसके विषय को प्राचीन सिद्ध करने में बाधक होते हैं। श्रौत (वैदिक) दार्शनिक ग्रन्थों में गौतमसूत्र से पूर्व तथा बौद्ध दार्शनिक ग्रन्थों में नागार्जुन के उपायहृदय आदि ग्रन्थों से पूर्व विगृह्यसंभाषा में उपयोगी न्याय, छल, जाति, निग्रहस्थान आदि पदार्थों के न मिलने से प्रतीत होता है कि बौद्धों के महायानिक² विचारों के उदय होने पर दोनों (हीनयान तथा महायान के अनुयायियों) में जब परस्पर संघर्ष हुआ तब पक्ष-प्रतिपक्ष, जय-पराजय, नियम-व्यवस्था आदि के अनुसन्धान करने पर जो वादविवाद का विषय पहले संक्षेप में था उसी को गौतम तथा नागार्जुन ने ग्रन्थनिर्माण के द्वारा परिष्कृत करके उसे नियमित कर दिया, पक्षप्रतिपक्षरूप से होने वाले विवाद के विषय को बाद में होने वाले दिङ्नाग, धर्मकीर्ति आदि बौद्ध आचार्यों द्वारा प्रमाण समुच्चय, प्रमाण वार्तिक वाद, न्यायहेतु बिन्दु आदि ग्रन्थों में, न्यायवैशेषिकाचार्यों द्वारा वात्स्यायन भाष्य, उद्योतकर वार्तिकतात्पर्य टीका तात्पर्य परिशुद्धि आदि ग्रन्थों में, तथा जैनाचार्यों द्वारा तत्त्वसंग्रह आदि अपने ग्रन्थों में मध्यकाल में भी बढ़ाया हुआ हम देखते हैं। इस प्रकार समय-समय पर विमर्श के अवसर के उपस्थित होने पर विमर्दनीय (विचारणीय) पदार्थों का अनुप्रवेश (पीछे से प्रवेश) होता ही रहता है। आयुर्वेद के प्राचीन ग्रन्थों में सुश्रुत, भेड आदि वादविवाद के विषय में उदासीन ही रहे हैं। कश्यप ने वैद्यों के परस्पर विचारणीय विषयों के उपस्थित होने पर संधायसंभाषा को देकर विगृह्यसंभाषा का विषय विस्तार से न देकर लेशमात्र ही दिया है। इन प्राचीन आचार्यों द्वारा गृहीत मार्ग के अनुसार आत्रेय तथा अग्निवेश को भी अपनी संहिता में सन्धायसंभाषा
१. महमूद गजनवी का समकालीन तथा उसका सभा-कवि। इसने भारत में संस्कृत का अध्ययन करके भारतीय विद्याओं पर पुस्तक लिखी है (समय ११वीं शताब्दी का पूर्वार्ध)—अनुवादक।
२. बौद्ध धर्म का अर्वाचीन रूप महायान है जिसमें भगवान् बुद्ध के मूल उपदेशों में बहुत सा परिवर्तन कर दिया गया है। (अनुवादक)
काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् २४०
को ही देना चाहिये था क्योंकि चिकित्सा के विषय में विवाद होने पर जब व्यक्ति येन केन प्रकारेण स्वपक्षप्रतिष्ठापन एवं परपक्ष के खण्डन में लगता है तब वस्तुतत्त्व के तिरोहित हो जाने से अनर्थ की संभावना होती है, इसलिये वस्तुतत्त्व के अनुसन्धान के औचित्य को दृष्टि में रखते हुये विगृह्यसंभाषा में उपयोगी छल, जाति, निग्रहस्थान आदि हितकारी मार्ग में बाधक हो जाते हैं।
उपलब्ध चरक संहिता में वादविवाद के प्रकरण में लिखा है—
विगृह्यभाषा तीव्रं हि केषाञ्चिद् द्रोहमावहेत्। कुशला नाभिनन्दन्ति कलहं समितौ सताम्।।
अर्थात् इसमें सन्धायसंभाषा को ही प्रधानता दी है। यहां तक का विषय ही भगवान् आत्रेय का प्रतीत होता है। इसके बाद विगृह्यसंभाषा के विशेष पदार्थों को लेकर प्रवृत्त हुये हैं। वहां पर 'इमानि खलु पदानि भिषग्वादज्ञानार्थमधिगम्यानि भवन्ति' अर्थात् ये पद वैद्यक के विवाद विषयों के ज्ञान के लिये जानने चाहिये, यहां से प्रारम्भ करके 'इति वादमार्गपदानि यथोद्देशमभिनिर्दिष्टानि भवन्ति' अर्थात् इस प्रकार आवश्यकतानुसार वादविवाद के लिये पदों का निर्देश कर दिया। इस प्रकार प्रारंभ एवं उपसंहार (समाप्ति) द्वारा पृथक् प्रतीत होता हुआ ग्रन्थ प्रकरण प्राप्त विषयों से खींचकर पीछे से चरक के समय अनुप्रविष्ट प्रतीत होता है। प्राचीन समय में भी विभिन्न मत वाले भिन्न-भिन्न आचार्यों के होने से परस्पर उनमें विचार विमर्श होता ही होगा। इस विषय में पूर्ण प्रमाणों के अभाव में हम निश्चय से यह भी नहीं कह सकते कि उस समय वादविवाद के नियम नहीं थे। भासकवि के प्रतिमा नाटक$^१$ में प्राचीन शास्त्रों में मेधातिथि का न्यायशास्त्र विशेष प्रतिष्ठित माना जाता था। वहां भी वादविवाद के विषय का उल्लेख है। परन्तु यहां बार्हस्पत्य अर्थशास्त्र के पृथक् उल्लेख होने के कारण न्यायशास्त्र से शब्दमात्र द्वारा तर्क का ग्रहण है या अन्य विषय का यह नहीं कहा जा सकता। और यदि तर्क शास्त्र का ही ग्रहण हो तो भी उसमें वादविवाद का विषय है या नहीं, और होने पर भी उसका क्या स्वरूप है यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता। गौतम तथा नागार्जुन से पूर्व के ग्रन्थों में इस विषय के न मिलने से ऐसा प्रतीत होता है कि गौतम तथा नागार्जुन के समय पक्ष-प्रतिपक्ष भाव के विशेषरूप से प्रबलता धारण कर लेने पर सामान्यरूप से मिलने वाले प्राचीन विषयों का ही विशेष प्रसार हो गया है। इन बातों को दृष्टि में रखते हुये चरक, गौतम तथा नागार्जुन द्वारा निर्दिष्ट वादविवाद के विषयों की यदि हम पौर्वापर्य की दृष्टि से तुलना करें तो हम देखेंगे कि न्याय, प्रतिज्ञा आदि अवयव, तथा सिद्धान्त आदि के विषय में चरक और गोतम की उक्तियों में समानता होने पर भी गौतम ने बाद, जल्प, वितण्डा आदि शास्त्रीय विचारों के कथात्रैविध्य की दृष्टि से संप्राय संभाषा रूपी वाद को तत्त्वज्ञान की दृष्टि से और विगृह्य भाषारूपी जल्प (वितण्डा) को पक्ष-प्रतिपक्ष की दृष्टि से दिये है तथा जल्प में उपयोगी होने की दृष्टि से ही छल, जाति, निग्रहस्थान आदि का निर्देश किया है। परन्तु चरक की अपेक्षा गौतम में छल, जाति, निग्रहस्थान आदि के विभाग तथा संख्या की अधिकता मिलने से गौतम में विकसित अवस्था प्रतीत होती है। नागार्जुन के उपायहृदय में कुछ पदार्थ गौतम और चरक की अपेक्षा भिन्न प्रक्रिया द्वारा कुछ संक्षिप्त होने पर भी अधिकन्यूनत्रैविध्य, दृष्टान्तद्वैविध्य, सिद्धान्तधर्मचातुर्विध्य आदि २० प्रश्नोत्तरसम्बन्धी अनेक विषयों के विकसित अवस्था में दिखाई देने से और विकासवाद (Elevation theory) की दृष्टि से चरक की अपेक्षा गौतम और नागार्जुन के समय में विकसित विचारों के मिलने से प्रतीत होता है कि एक ही वादविवाद के युग में होने पर भी कुछ समय के पौर्वापर्य से चरक का समय गौतम तथा नागार्जुन के समय से प्राचीन प्रतीत होता है। सुरेन्द्रनाथ दास ने भी अपनी (History of Indian Philosophy Vol I) में यही मत प्रकट किया है।
१. साङ्गोपाङ्ग वेद, मनु के धर्मशास्त्र, महेश्वर के योगशास्त्र, बृहस्पति के अर्थशास्त्र, मेधातिथि के न्यायशास्त्र और प्रचेता के श्राद्धकल्प को पढ़ता हूँ। (प्रतिमा नाटक पृष्ठ ७९)।
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद
२४१
बौद्धत्रिपिटक के चीनी अनुवाद (Chinese Buddhist chronicle) में मिलता है कि चरकनामक वैद्य कनिष्क राजा का राजवैद्य था। उसने उसकी रानी के किसी भयंकर रोग की चिकित्सा की थी। इससे चरकाचार्य कनिष्क के समय होने से प्रथम शताब्दी में हुआ है ऐसा पाश्चात्य लेखक सिल्वान लेभी का मत है। इतिहास के अनुसार दार्शनिक नागार्जुन का कनिष्क के समय होना तथा नागार्जुन के उपायहृदय तथा चरक के लेख में विगृह्यसंभाषा के समानरूप में मिलने से चरक तथा आर्य नागार्जुन दोनों ही कनिष्क के समकालीन सिद्ध होते हैं। परन्तु शिलालेख आदि के द्वारा कनिष्क राजा के बौद्ध होने तथा नागार्जुन का कनिष्क के समकालीन सिद्ध होने पर भी चरकसंहिता का प्रतिसंस्कर्ता चरक ही कनिष्क का राजवैद्य चरक था इसमें विद्वानों का मतभेद है। श्रीयुत कीथ¹ महाशय इसी मत के हैं। यदि चरक कनिष्क² का समकालीन हो तथा उसका राजवैद्य हो तो उसके लेखों में कहीं तो बौद्ध सम्प्रदाय की छाया (झलक) मिलनी चाहिये थी परन्तु इसके विपरीत चरकसंहिता में वैदिक मन्त्रों द्वारा वैदिक प्रक्रिया का ही प्रयोग क्यों किया गया है। कुछ लोग इसके प्रत्युत्तर में कहते हैं कि प्राचीन अग्निवेश संहिता में सांख्य दर्शन तथा वैदिक प्रक्रिया पहले से ही विद्यमान थी, चरक तो इस संहिता का केवल प्रतिसंस्कर्ता मात्र था इसलिये उसमें बौद्ध विचारों का प्रवेश नहीं हो सकता था। केवल इतने से ही चरक को प्राचीन सिद्ध नहीं किया जा सकता। कुछ लोग कहते हैं कि चरक संहिता में कुछ स्थलों पर स्वभाववाद³ का उल्लेख है जिसकी टीका में चक्रपाणि ने बौद्धमत का संकेत किया है इसलिये इसमें बौद्ध मत का प्रवेश है। परन्तु इसके प्रत्युत्तर में कुछ लोग कहते हैं कि इतने मात्र से ही बौद्ध मत का प्रवेश नहीं कहा जा सकता क्योंकि स्वभाववाद् केवल बौद्धों का ही नहीं है। इससे पहले भी विद्यमान था।
यदि चरक को कनिष्क का राजवैद्य मानें तो उपायहृदय में नागार्जुन ने जहां चिकित्सा के प्रसंग में सुश्रुत को स्मरण किया है वहां अपने समकालीन बौद्ध राजा कनिष्क के राजवैद्य एवं इतने प्रसिद्ध विद्वान् चरक का नामोल्लेख तक कैसे भूल गया। यदि इन युक्तियों के आधार पर चरक को नागार्जुन से भी बाद का माना जाय तो चरक का समय नागार्जुन से भी अर्वाचीन प्रतीत होता है।
नागार्जुन द्वारा अपने दार्शनिक ग्रन्थ उपायहृदय में प्रसङ्गवश आये हुये वैद्यक के प्रकरण में पूर्ववर्ती आत्रेय अग्निवेश कश्यप आदि की तरह चरक तथा बौद्ध मतानुयायी जीवक का नामोल्लेख न करना ठीक ही है। चरक के वहां नामोल्लेख न होने मात्र से ही यदि उसे अर्वाचीन मान लें तो इस युक्ति के आधार पर आत्रेय आदि को ही हमें अर्वाचीन मानना पड़ेगा। नागार्जुन के उपायहृदय में सुश्रुत का नाम होने पर भी चरक का नाम न होने का कारण संभवतः यह हो कि सुश्रुत संप्रदाय का प्रादुर्भाव काशी में हुआ था और चरक संप्रदाय का पाञ्चाल, काम्पिल्य आदि पश्चिम प्रदेश में। इसलिये उस प्रदेश में उनकी प्रसिद्धि स्वाभाविक थी। परिणामस्वरूप पूर्व दिशा के देशों में सुश्रुत की अधिक प्रसिद्धि हो गई और इसलिये श्याम, कम्बोडिया आदि देशों के यशोवर्मा तथा जयवर्मा⁴ के शिलालेखों में वैद्य के रूप में सुश्रुत का उल्लेख मिलता
१. चरक परम्परा के अनुसार कनिष्क का चिकित्सक था, उसने उसकी स्त्री की कठिन रोगावस्था में चिकित्सा की थी। परन्तु दुर्भाग्यवश पीछे से जब हम इन कहानियों को सुनते हैं तो हम नहीं कह सकते कि इन कहानियों का कितना मूल्य है (History of Sanskrit literature A. B. Keith P. 406)।
२. कनिष्क का समय ७८ से १०० ईसवी-स्मिथ १२० ईसवी मानता है। (अनुवादक)
३. प्रवृत्तिर्हेतुर्भावानां न निरोधेऽस्ति कारणम् । केचित्तत्रापि मन्यन्ते हेतुं हेतोरवर्तनम् ।। (च.सू.अ. १६ श्लोक २७)
अर्थात् भाव (पदार्थों) की प्रवृत्ति अर्थात् उत्पत्ति में कारण होता है परन्तु विनाश में कोई कारण नहीं। अर्थात् भावों का नाश अकारण ही (स्वभावतः) हो जाता है। (अनुवादक)
४. यशोवर्मा—(कम्बुज का राजा ८८९ से ९०८ ईसवी) तथा जयवर्मा—(यह भी कम्बुज का राजा १२वीं शताब्दी)। (अनुवादक)
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है। नागार्जुन का संबन्ध विशेषरूप से दक्षिण प्रदेश तथा मगध से था इसलिये पूर्व दिशा में प्रसिद्ध तथा अपने समाज में सम्मानित सुश्रुत का ही नाम उसे ध्यान में आया हो। परन्तु सुश्रुत से भी पहले उसे चरक का नाम याद आना चाहिये था क्योंकि अपने समकालीन राजा कनिष्क के राजवैद्य तथा विद्वान् होने के नाते चरक से उसका परिचय अवश्य होना चाहिये था। इसके अतिरिक्त राजतरंगिणी के लेखक (कल्हण) ने भी कनिष्कवृत्ति में चरक का नाम क्यों नहीं दिया। इनके आधार पर तथा गौतमसूत्र के आविर्भाव से पूर्व भी न्याय वितण्डा आदि विवाद के विषयों के प्रचलित होने और चरक की लेखन शैली में भी प्राचीन ब्राह्मण ग्रन्थों की ही झलक मिलने से सिल आदि विद्वान् चरक को कनिष्क का समकालीन नहीं मानते हैं।
इस प्रकार जब हम चरक के समय का अन्वेषण करते हैं तो हमें बहुत से मत दिखाई देते हैं। इसके समय के पूर्ण निश्चय करने के लिये अभी बहुत से प्रमाणों के खोजने की आवश्यकता है। श्रीयुत प्रफुल्लचन्द्र राय ने भी अपनी पुस्तक (History of Hindu chemistry Vol I) में चरक तथा सुश्रुत के विषय में बहुत से विचार प्रकट किये हैं।
वार्योविद, दारुवाह, नग्नजित् तथा भेड
इस काश्यपसंहिता के रोगाध्याय में काश्यपसम्मत रोगों के द्वैविध्यवाद¹ का उल्लेख होने से तथा वमन विरेचनीयाध्याय में भी ग्रन्थ के त्रुटितं होने से वार्योविद के नाम से किसी अव्यक्त मत के दिये होने से वार्योविद का उल्लेख मिलता है। कुक्कुणक चिकित्सा सम्बन्धी अध्याय के अन्त में वार्योविद नामक राजा को मारीच कश्यप द्वारा बालभैषज्य² के उपदेश का निर्देश मिलता है। उत्तर भाग में अनेक स्थानों पर जीवक द्वारा प्रश्न एवं सम्बोधन के मिलने पर भी बीच-बीच में पार्थिव, विशांपते, नृपोत्तम, नृप तथा नराधिप आदि द्वारा मिलने वाले राजा के सम्बोधन, अन्य किसी दूसरे राजा के सम्भव न होने से तथा एक स्थान पर नामपूर्वक उल्लेख होने से उसी वार्योविद के प्रति किये गये प्रतीत होते हैं। इसी प्रकार देशसात्म्याध्याय में भी 'काशीराजो (काशिराजं) महामुनिः' में काशीराज द्वारा निर्दिष्ट व्यक्ति भी वही वार्योविद प्रतीत होता है। इस प्रकार इस संहिता के अनुसार मारीच कश्यप का शिष्य तथा उसका समकालीन वैद्याचार्य वार्योविद काशी का राजा प्रतीत होता है। आत्रेय संहिता के वातकलाकलीय अध्याय में मारीच तथा वार्योविद का पक्ष-प्रतिपक्ष रूप में निर्देश होने से भी दोनों का सहभाव प्रतीत होता है। वातकलाकलीय³, यज्जः⁴ पुरुषीय तथा आत्रेय भद्रकाष्पीय⁵ अध्यायों में आत्रेय के साथ एकत्रित हुए ऋषियों में वार्योविद का उल्लेख होने से आत्रेय तथा वार्योविद का सहभाव तथा स्थान-स्थान पर उसके मतों का उल्लेख मिलने से वार्योविद का वैद्याचार्य होना भी स्पष्ट है। यज्जःपुरुषीयाध्याय में आत्रेय के सहभाव तथा काशीपति रूप में निर्देश होने से वामक⁶ भी काशीराज तथा वैद्याचार्य प्रतीत होता है। काशीराज रूप में मिलने वाले वैद्याचार्य दिवोदास, वामक तथा वार्योविद आदि तीनों के परस्पर पौर्वापर्य के विषय में अभी तक कुछ ज्ञात नहीं है। यद्यपि आजकल वार्योविद का ग्रन्थ तथा मतोल्लेख नहीं मिलता है तथापि आत्रेय तथा काश्यपसंहिता में उसके मत के उल्लेख मिलने से यह कहा जा सकता है कि यह उस समय कोई प्रसिद्ध आचार्य था। संभवतः यह भी कश्यप से बालभैषज्य के उपदेश को ग्रहण करने वाला कौमारभृत्य का कोई आचार्य हो। इस प्रकार आत्रेय पुनर्वसु तथा मारीच कश्यप के समकालीन रूप में निर्दिष्ट, परस्पर एक दूसरे का उल्लेख करने वाले आत्रेय पुनर्वसु तथा मारीच कश्यप के समान काल वाला ही प्रतीत होता है।
उपास्यमानमृषिभिः कश्यपं वृद्धजीवकः। चोदितो दारुवाहेन वेदनार्थेऽभ्यचोदयत् ।।
१. १ से ६ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ६९ देखें।
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २४३
काश्यपसंहिता के उपर्युक्त वचन के अनुसार संहिता के पूर्वभाग में वृद्धजीवक को प्रश्न पूछने में प्रेरणा देने वाला दारुवाह प्रतीत होता है। वही रोगाध्याय में 'पञ्चरोगा आगन्तुवातपित्तकफ त्रिदोषजा इति दारुवाहो राजर्षिः' के द्वारा रोगों के पाञ्चविध्यवाद के मत के द्वारा उसका राजर्षि रूप में निर्देश किया गया है। रोगद्वैविध्यवाद के रूप में वार्योविद का तथा रोगपाञ्चविध्यवाद के रूप में दारुवाह का पृथक् निर्देश होने से, ये दोनों विभिन्न व्यक्ति प्रतीत होते हैं। राजर्षि दारुवाह कहां का हैं, यह इससे प्रतीत नहीं होता। किन्तु अष्टाङ्गसंग्रह के उत्तर स्थान में विष के वेगों के विषय में पुनर्वसु, नग्नजित् विदेह, आलम्बायन तथा धन्वन्तरि के मत का उल्लेख मिलने से नग्नजित्¹ नाम का भी कोई वैद्य प्रतीत होता है। उसी की इन्दु² की व्याख्या में 'नग्नजितोदारुवाहिनः' पद द्वारा नग्नजित् तथा दारुवाह दोनों शब्दों को समानाधिकरण के रूप में दिया है। यहां इन्नन्त दारुवाहिन् शब्द का प्रयोग होने पर भी चरक की चक्रपाणि³ व्याख्या में दारुवाह नाम दिया होने से तथा काश्यपसंहिता में भी दारुवाह नाम से ही उल्लेख होने से केवल अन्तिम वर्ण के भेद होने से दोनों एक ही व्यक्ति प्रतीत होते हैं। अन्यत्र कहीं-कहीं मिलने वाला दारुक⁴ भी संभवतः यही दारुवाह हो। दारुवाह तथा नग्नजित् के अभेद को मानकर अनुसन्धान करने पर मुद्रित भेड संहिता में निम्न श्लोक मिलता है—
गान्धारभूमौ राजर्षिममग्रिजित्स्वर्गमार्गदः। संगृह्य पादौ पप्रच्छ चान्द्रभागं पुनर्वसुम् ।।
एवमुक्तस्तथा तस्मै महर्षिः पार्थिवर्षये। विषयोगेषु विज्ञानं प्रोवाच वदतां वरः ।।
(पृष्ठ ३०)
उपर्युक्त श्लोक में 'राजर्षिममग्रिजित्' इस पाठ के मिलने पर भी श्री यादवजी⁵ महाराज द्वारा तञ्जोर पुस्तकालय में मिलने वाली पुस्तक के अनुसार 'राजर्षिर्नग्नजित्स्वर्णमार्गदः' पाठ दिया होने से तथा पूर्वापर वाक्य के अनुसार प्रथमान्त राजर्षि पाठ के ही उचित होने से उस पाठ के अनुसार भेड के समकालीन नग्नजित् नाम वाले किसी गान्धार के राजा द्वारा चन्द्रभागा नाम वाली माता के अनुसार चान्द्रभाग संज्ञा वाले पुनर्वसु आत्रेय से विष के विषय में प्रश्न किये जाने का निर्देश मिलता है। अष्टाङ्गहृदय के 'रसाद्रक्तमित्यादि' की अरुणदत्त की व्याख्या में नग्नजित्⁶ के वचन का उल्लेख मिलने से अष्टाङ्गहृदय में 'इति नग्नजितो मतम्' के मिलने से तथा भेड संहिता में भी इस विषसम्बन्धी प्रश्न के मिलने से यह वही (एक ही) व्यक्ति प्रतीत होता है। दारुवाह तथा नग्नजित् का राजा के रूप में उल्लेख मिलने से, इन्दु की टीका के अनुसार दोनों का समानाधिकरण के रूप में दिया होने से तथा इन दोनों के विषय में उस-उस नाम से मिलने वाले गुणों की समानता होने से इस गान्धार राजर्षि का नाम केवल विष के विषय में अपितु वैद्यक के विषय में भी आचार्य भाव प्रकट होता है। पूर्वनिर्दिष्ट शालिहोत्रोक्त अश्वशास्त्र में भी आयुर्वेद के आचार्यों में विनग्नजित् का नाम मिलता है। यह भी संभवतः वही व्यक्ति हो। मत्स्य⁷ में वास्तुशास्त्र (गृह निर्माणकला) के उपदेशक के रूप में भी नग्नजित् का उल्लेख है। यह नग्नजित् गान्धार का राजा ही है या कोई अन्य व्यक्ति यह नहीं कहा जा सकता।
इसके अतिरिक्त ऐतरेय ब्राह्मण⁸ में क्षत्रिय यज्वाओं के फलचमस भक्षण के साम्प्रदायिकत्व प्रदर्शन में नग्नजित् गान्धार का उल्लेख मिलता है। वहीं क्षत्रिय यजमानों के लिये ही दिग्विजय रूप राष्ट्रसम्पत्ति के फल का उल्लेख होने से फलचमस भक्षण द्वारा ऐश्वर्य को प्राप्त किये हुए, सब शत्रुओं को विजय करने वाले एक नग्नजित् नाम के क्षत्रिय गान्धार के महाराजा का निर्देश मिलता है। इस प्रकार यहां निर्दिष्ट गान्धार का राजा नग्नजित् ही देश तथा नामों की समानता के कारण भेडसंहिता में सम्मानपूर्वक राजर्षिरूप में निर्दिष्ट गान्धार का राजा नग्नजित् ही होना चाहिये। शतपथ ब्राह्मण⁹ में भी चितिशक्ति में प्राणों के उपधान करने के विषय में नग्नजित् के पुत्र स्वर्जित तथा गान्धार के नग्नजित् का उल्लेख मिलता हैं। वहां प्राणों की महिमा का वर्णन करने वाले राजन्य बन्धु का निर्देश होने से इससे भी शारीरविद्या के आचार्य गान्धार
१. १ से ९ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ६९-७० देखें।
| २४४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् |
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के राजा नग्नजित् का ही निर्देश प्रतीत होता है। यहां उसके पुत्र स्वर्जित् का उल्लेख होने से तथा भेडसंहिता में नग्नजित् के 'स्वर्गमार्गद' इस विशेषण से उसके किसी विजय के वृत्तान्त की सूचना मिलती है। उपर्युक्त वर्णन के अनुसार नग्नजित् को ऐतरेय तथा शतपथ ब्राह्मण के काल का सिद्ध करते हुए 'नग्नजितो दारुवाहिनोऽप्यत्र' इन्दु के इस वाक्य में अपि शब्द के कारण यदि दो पृथक् व्यक्तियों की कल्पना भी का जाय तो भी औपदेशिक सम्बन्ध से नग्नजित् के सम्बन्ध से पुनर्वसु आत्रेय तथा उसके शिष्य भेड का समय भी ऐतरेय तथा शतपथ ब्राह्मण के काल से बाद का नहीं है। इसलिये 'स्वर्णमार्गद' इस पद के आधार पर कहना कि गान्धार के राजा नग्नजित् और भेड दारायस नामक पारसीक राजा के समय (५२१ से ४८५ ईस्वी पूर्व) के हैं—युक्तिसंगत नहीं है।
इसी प्रकार महाभारत¹ में युग के अन्त में अन्तर्हित वेद, इतिहास आदि को अपने तपोबल से प्राप्त करके उस-उस विद्या के प्रकाशक महर्षियों के विवरण में कृष्णात्रेय का चिकित्सक के रूप में उल्लेख मिलता है। यह कृष्णात्रेय ही पुनर्वसु आत्रेय हैं या नहीं, यह एक पृथक् प्रश्न है। तथापि भेड संहिता तथा चरक संहिता में भी कृष्णावेश के उपदेश का उल्लेख होने से उसके सहभावी पुनर्वसु आत्रेय का महाभारत से प्राचीनत्व तो इससे भी प्रकट होता है।
इस प्रकार आत्रेय के सहभावी रूप से मारीच कश्यप का उल्लेख, वार्योविद का आत्रेय पुनर्वसु तथा मारीच कश्यप के साथ सहभाव, कृष्णात्रेय तथा पुनर्वसु आत्रेय का समानाधिकरण (एक व्यक्तित्व) के रूप में निर्देश, महाभारत में चिकित्सा के प्रवर्तक के रूप में कृष्णात्रेय का उल्लेख, आत्रेय के शिष्य रूप में भेड का उल्लेख, भेड के सहभावी तथा आत्रेय पुनर्वसु के शिष्य रूप में गान्धार के राजा नग्नजित् के उल्लेख, नग्नजित् तथा दारुवाह के एक व्यक्तित्व का निर्देश, दारुवाह का काश्यपसंहिता में निर्देश, गान्धार के राजा नग्नजित् का ऐतरेय ब्राह्मण में तथा गान्धार के प्राणतत्त्व के वेत्ता नग्नजित् तथा उसके पुत्र स्वर्जित् का भी शतपथ ब्राह्मण में कीर्तन, दिवोदास का ब्राह्मणग्रन्थों तथा उपनिषदों में उल्लेख तथा धन्वन्तरि का उसके पूर्वपुरुष के रूप में मिलना, इत्यादि बातों को देखकर उसके अनुसार विचार करने का पर ज्ञात होता है कि मारीच कश्यप, पुनर्वसु आत्रेय, भेड, नग्नजित् दारुवाह तथा वार्योविद इत्यादि भैषज्य विद्या के आचार्य ऐतरेय तथा शतपथ ब्राह्मण के समय से बाद के नहीं हैं अपितु धन्वन्तरि तथा दिवोदास के ही समान ब्राह्मण ग्रन्थ तथा उपनिषदों के समय एक साथ अथवा थोड़े बहुत पौर्वापर्य के साथ विद्यमान थे।
इस प्रकार उपर्युक्त वर्णन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि वैदिक काल में प्रारंभ हुई यह भारतीय आयुर्वेद विद्या उपनिषदों तथा ब्राह्मण ग्रन्थों के समय भी इसी प्रकार महर्षियों एवं प्राचीन आचार्यों द्वारा भारत में (विशेषकर भारत के पश्चिम प्रदेशों में) उन्नति की चरमसीमा पर पहुंची हुई थी।
रसशास्त्र के ग्रन्थ
यद्यपि भावप्रकाश आदि अर्वाचीन ग्रन्थों में कुछ विदेशी ओषधियों, विदेशी चिकित्सा पद्धति, धातु रस आदि के विशेष प्रयोग, अफीम का उपयोग इत्यादि अर्वाचीन विषय मिलते हैं तथा इससे कुछ प्राचीन काल के सिद्धयोग आदि में पारद तथा धातुओं का सामान्यरूप से प्रयोग मिलता है। तथापि हम देखते हैं कि वाग्भट के समय तक इस प्रकार के अर्वाचीन विषय बहुत कम उपलब्ध होते हैं। सम्भवतः चतुर्थ शताब्दी में लिखित बावर नामक विद्वान् द्वारा उपलब्ध नावनीतक नामक ग्रन्थ में, तथा उससे भी प्राचीन माने जाने वाले हार्नले नामक विद्वान् द्वारा उपलब्ध लेख में भी स्वर्ण आदि धातुओं का उल्लेख होने पर भी उनकी शोधन आदि की विशेष प्रक्रियाओं तथा पारद के उपयोग आदि का विशेष विवरण नहीं मिलता। महावग्ग में जीवक के वृत्तान्त में वनस्पतियों के अन्वेषण के लिये गुरु से नियुक्त जीवक द्वारा
१. १ की टि. उपो. संस्कृत पृ. ७१ देखें।
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २४५
चिकित्सा में अनुपयोगी एक भी ओषधि के न प्राप्त कर सकने के वर्णन, घृत नस्य आदि ओषधियों अथवा शस्त्रक्रिया द्वारा रोगियों की चिकित्सा तथा रस धातु आदि के कहीं भी न मिलने से प्रतीत होता है कि जीवक के समय तक भी रस धातु आदि ओषधियों का प्रचार नहीं था। चरक¹ तथा सुश्रुत² में भी धातु तथा मणियों का ओषधियों में केवल नाम मात्र का ही उल्लेख मिलता है। उनके शोधन, सिद्धौषध, पारदौषध तथा अहिफेन आदि का वर्णन नहीं मिलता है। काश्यपसंहिता के खिलभाग में आत्रेय तथा भेड के समान शोथरोग में केवल दो तीन बार ही अयोरज (लोहचूर) तथा ताम्ररज का उल्लेख मिलता है। काश्यपसंहिता में यद्यपि उनके शोधन एवं भस्मीकरण का निर्देश नहीं मिलता है तथापि खाने के लिये उनके उपयोग का निर्देश मिलने से यह कहा जा सकता है कि उनका शोधन इत्यादि किया जाता होगा। धातु तथा पारद आदि का उपयोग इसके अतिरिक्त इसमें नहीं मिलता है। तथा अहिफेन आदि अर्वाचीन वस्तुओं का भी इसमें निर्देश नहीं है। इस प्रकार ज्यों-ज्यों प्राचीन ग्रन्थों का अन्वेषण करते हैं त्यों-त्यों हमें ये अर्वाचीन वस्तुएं कम मिलती जाती हैं।
इस रसायन विद्या की उत्पत्ति कब तथा कहां से हुई है इस विषय में विचार करने पर रसायन विद्या में प्रयुक्त होने वाला कैमिस्ट्री (Chemistry) शब्द अल्केमीविज्ञान को सूचित करता है। किसी-किसी व्यक्ति का मत है कि केमिस्ट्रीशब्द मिश्रदेशीय 'क्यामी' शब्द से बना है। इस प्रकार मिश्रदेश से उत्पन्न हुई रसायन विद्या अरब तथा ग्रीस के द्वारा यूरोप में फैली है। परन्तु कुछ विद्वान् कहते हैं कि मिश्रदेश में उस विद्या के अर्थ में 'क्यामी' शब्द मिलता ही नहीं है। तथा वहां रसायन विद्या की प्रागुत्पत्ति के इतिहास के विषय में कोई निर्देश नहीं मिलता है। कुछ लोगों का कहना हैं कि कैमिस्ट्री शब्द तृतीय शताब्दी के अरबदेशीय 'किमाइ' शब्द से बना हुआ है। इस 'किमाइ' शब्द को सिनिस नामक विद्वान् ने अपने अभिधान ग्रन्थ में 'अल्केमी' अर्थ में प्रयुक्त किया है। इससे ज्ञात होता है कि यह विद्या न तो मिश्रदेश में और न तो ग्रीस देश में उत्पन्न हुई है। क्योंकि यदि वहां उत्पन्न होती तो क्या उस देश के हेरोडोटस, डायोडोरश, प्लुचाट तथा प्लीनी आदि प्राचीन लेखक उसके विषय में कुछ भी नहीं लिखते ? तृतीय, चतुर्थ शताब्दी तक मिश्र तथा ग्रीस वालों को तो रसायन विद्या का ज्ञान ही नहीं था। अल्केमी विद्या में पारद का प्रयोग तो पीछे से ही मिलता है। इस प्रकार पाश्चात्य देशों में रसायन विद्या का सबसे प्रथम जानने वाला ग्याबर नामक एक अरबदेशीय विद्वान् था। तथा अरब से ही इस विद्या का अन्य सब देशों में प्रचार हुआ है। कुछ विद्वान् कहते हैं कि वैदिक काल में सोमरस का बहुत अधिक व्यवहार मिलने से ऋग्वेद के कसमय से ही रसायन विद्या भारत में प्रचलित थी। उसी के अनुसार चरक आदि के समय में यूष शरीर के रस आदि के अर्थ में रस शब्द का प्रयोग होता था। इसके बाद रस के समान तरलता के कारण ही पारद तथा अन्य द्रव धातुओं में भी रस शब्द का व्यवहार होने लगा। इस प्रकार भारतीय रसायन शास्त्र का मूल अत्यन्त प्राचीन हैं। यह रसप्रक्रिया सर्वप्रथम रस विषयक तान्त्रिक ग्रन्थों में मिलती है, तथा उसके बाद के रसग्रन्थों में इसका विकसित रूप दिखाई देता है। विद्वानों का यह विचार है कि यह विद्या नागार्जुन द्वारा प्रारम्भ की गई है। लोहशास्त्र का पतञ्जलि द्वारा निर्माण करने का अनेक स्थानों पर निर्देश मिलता है। पारसीक मत के प्रवर्तक जरथुष्ट से पूर्व उस देश के निवासी मागी जाति वालों द्वारा इस गुप्त रसायन विद्या को भारतीय ब्राह्मणों से प्राप्त करने का वृत्तान्त उनके इतिहास से मिलता है। ग्रीस देश के रसायन ग्रन्थों में भी इस विद्या के विषय में पारसीक (पर्शिया) देश का स्थान-स्थान पर निर्देश है। इस प्रकार यह प्रतीत होता है कि यह रसायन विद्या सबसे पहले भारत में ही आविर्भूत हुई थी। भारतीय वैद्यों के अरब देश में जाने से तथा चरक और सुश्रुत के अरब देश में अनुवाद होने तथा भारतीय चिकित्सा का आदर होने से भारत से ही अरब में इस विद्या के प्रचार की प्रतीति होती है। अरब देश के इतिहास से प्रकट होता है
१. १-२ की टि. उपो. संस्कृत पृ. पृ. ७१ देखें।