काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
| २३६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् |
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'चतुर्थ्यर्थ बहुलं छन्दसि' (२-३-६२) सूत्र के 'षष्ठ्यर्थे चतुर्थी वाच्या' इस वार्तिक के उदाहरण के रूप में दिये हुये तैत्तिरीय¹ वाक्य में रजस्वला के पालन करने योग्य धर्मशास्त्र के नियम दिये हैं उनके पालन न करने पर सन्तान की अनिष्टोत्पत्तिरूप फल होते हैं—ऐसा महाभाष्य में विशेषरूप से दिया है। इसी प्रकार सुश्रुत के शारीरस्थान के द्वितीय अध्याय में भी फलनिर्देश सहित इसी प्रकार के नियम दिये हैं। परन्तु पतञ्जलि से अभेद रूप में संभावित चरकाचार्य ने शारीरजातिसूत्राध्याय में महाभाष्य में विशेषरूप से उल्लिखित विषयों को सामान्यरूप से ही कहा है तथा उसके फल नहीं कहे हैं। पात्रांश (बर्तनों) में भी भेद है। यह भी एक विचारणीय विषय है।
भाष्यकार के अनुसार स्त्यै धातु से घनीभाव अर्थ में स्त्री शब्द बनता है। (स्त्यै ष्ट्यै संघाते) तथा 'सू' धातु से प्रवृत्ति अर्थ में पुंस शब्द बनता है। इसी प्रकार घनीभाव रूप अर्थ को लेकर स्त्री शब्द का व्यवहार होता है। चरक के अनुसार घनीभाव को लेकर पुंस् शब्द का व्यवहार होता है। प्रसव माता का धर्म होने से तथा 'षूङ् प्राणिगर्भविमोचने' इस पाणिनीय धातुपाठ के अनुसार व्यवहार में 'स्त्री सूते' 'माता सूते' आदि प्रयोग ही ठीक है। परन्तु भाष्यकार के अनुसार प्रसव पुरुष का धर्म होने से 'पुमान् सूते' यह प्रयोग ठीक है। 'माता सूते' यह प्रयोग दूसरे अर्थ को प्रकट करने से औपचारिक (लाक्षणिक) जानना चाहिये। इस प्रकार चरक तथा भाष्यकार की प्रक्रिया में भेद है। इन पक्ष-प्रतिपक्ष की युक्तियों के आधार पर मेरी दृष्टि में चरक एवं पतञ्जलि के अभेद की अपेक्षा भेद ही अधिक सिद्ध होता है।
इसके अतिरिक्त चरकसंहिता के शारीर स्थान के १ म अध्याय में पुरुष के वर्णन के प्रसङ्ग में आये हुये योग से पातञ्जल योग के विषय की तुलना करने पर भी यही प्रतीत होता है। शारीरस्थान के प्रथम अध्याय में पूर्वोद्दिष्ट २३ प्रश्नों में से षद्धातुसमवायात्मक (खादयश्चेतनाषष्ठा-६ धातुओं के समवायरूप) अथवा चतुर्विंशतितत्त्वसमवायात्मक (मनोदशेन्द्रियाण्यर्याः । प्रकृतिश्चाष्टधातुकी-२४ तत्त्वों के समवायरूप) वेदना तथा योग के निवर्तन के योग्य कर्मपुरुष (चिकित्साधिष्ठित पुरुष) के विषय में २१ प्रश्नों का समाधान करके सब वेदनाएं जिसकी निवृत्त हो गई हैं ऐसे पुरुष के विषय में 'क्व चैता वेदना सर्वा निवृत्तिं यान्त्यशेषतः' इस प्रश्न के उत्तर में भगवान् आत्रेय कहते हैं कि—
योगे मोक्षे च सर्वासां वेदनानामवर्तनम् । मोक्षे निवृत्तिर्निःशेषा योगो मोक्षप्रवर्तकः ।।
अर्थात् अन्तःकरण (मन) के विषय के दुर्योंग (मिथ्यायोग) से उत्पन्न सुख-दुःख से रहित होने की अवस्था का जिसमें उदय हो गया है ऐसे योग का वर्णन है। फिर ५वें अध्याय में अग्निवेश के पूछने पर आत्रेय ने प्रवृत्ति तथा निवृत्ति को पृथक्-पृथक् बांटकर निवृत्त्यात्मक अपवर्ग के लिये पूर्वोक्त सत्सङ्ग ब्रह्मचर्य आदि का साधन के रूप में गद्यवाक्यों में विशेषरूप से वर्णन किया है। इन दोनों पूर्वापर अध्यायों में एक ही विषय भङ्गीभेद से आत्रेय ने ही वर्णन किया है। इस प्रकार प्रतिसंस्कर्ता चरक के रूप में संभावित पतञ्जलि से प्राचीन ही यह लेख मालूम पड़ता है।
सुश्रुत में चिकित्सा शास्त्र में उपयोगी होने से चिकित्सा के अधिकरण पंचमहाभूत एवं आत्मा के समवायरूप कर्म पुरुष (चिकित्साधिष्ठित कर्म पुरुष) की, भेडसंहिता में भी उसी प्रकार के षड्धातु एवं चेतना के समवायरूप तथा इस काश्यपसंहिता में भी 'शरीरेन्द्रियात्मसत्त्वसमुदयरूपं पुरुषमाचक्षते आत्मानमेके' (पृष्ठ ६७) के अनुसार शरीर एवं शरीरी के समवायरूप (कर्मपुरुष) का ही वर्णन है। इन्हीं के अनुसार प्राचीन सिद्धान्त को दृष्टि में रखते हुए भगवान् आत्रेय ने भी उतना ही लिखा होगा और मोक्ष के लिए उपयोगी योग का विषय पीछे से इस प्रकरण में प्रतिसंस्कार करते हुए हुए चरक ने प्रविष्ट कर दिया, यह मानें तो चरक तथा पातञ्जल सूत्र में कही हुई योग की प्रक्रिया समान होनी चाहिये थी परन्तु ऐसा नहीं है। पातञ्जल में— 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः' (१-२) 'ता एव सबीजः समाधिः' (१-४५) तस्यापि
१. इसकी टि. उपो. संस्कृत पृ. ५० देखें।
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद
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निरोधेन सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः' (१-५०)¹ इत्यादि सूत्रों द्वारा अन्तःकरण की बहिर्वृत्तियों को रोक कर आत्मस्वरूप एक वृत्ति की स्थापना करना और अन्त में आत्माकार वृत्ति को भी रोक कर निवात दीप की तरह अपने आपको स्थिर कर लेना—इस प्रकार संप्रज्ञात और असम्प्रज्ञात भेद से (सबीज तथा निर्बीज भेद से) दो प्रकार का योग दिया है और इस प्रकार के योग के हो जाने पर ऋतम्भरा प्रज्ञा आदि (ऋतं बिभर्ति इति) फल होते हैं। तथा मोक्ष का स्वरूप निम्न है—'तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्' (१-३) अर्थात् द्रष्टा का अपने स्वरूप में स्थित हो जाना 'पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपनिष्ठा वा चितिशक्तेः' अर्थात् पुरुषार्थशून्य गुणों का उदय होना और विशुद्ध चिकिशक्ति का अपने रूप में स्थिर रहना ही मोक्ष है—इत्यादि द्वारा आत्मा का किसी के साथ न रहना, अपरिवर्तनशीलता, अपने चित् स्वरूप में रहना, यह चरम सिद्धान्त रूप से वर्णन किया है। इसके विपरीत चरकसंहिता में—
आत्मनेन्द्रियमनोर्थानां सन्निकर्षात् प्रवर्तते । सुखदुःखमनारम्भादात्मस्थे मनसि स्थिरे ।।
निवर्तते तदुभयं वशित्वं चोपजायते । सशरीरस्य योगज्ञास्तं योगमृषयो विदुः ।।
अर्थात् इन्द्रियों और मन को बाहरी विषयों से लौटाकर मन को आत्मा में स्थिर करना योग कहलाता है। और
मोक्षो रजस्तमोऽभावाद्वलवत्कर्मसंक्षयात् । वियोगः कर्मसंयोगैरपुनर्भव उच्यते ।।
अर्थात् जब रजोगुण और तमोगुण समाप्त होकर केवल सत्त्वगुण शेष रहे, बलवान प्राक्तन कर्म क्षीण हो जायें तथा शरीर और अन्तःकरण (मन) के साथ आत्मा का स्थायीरूप से वियोग हो जाये उसे मोक्ष कहा है।
इन दोनों की यदि हम तुलना करें तो हम देखते हैं कि चरक में केवल सत्त्वगुण के शेष रह जाने पर आत्मा में अपने अन्तःकरण की वृत्तियों के स्थिर करने को योग तथा त्रैगुण्यावस्था के संपादन के योग्य शरीर तथा अन्तःकरण के वियोग को मोक्ष कहा है। पतञ्जलि ने तो सबीज समाधि के बाद अन्त में निर्बीज समाधि द्वारा अन्तःकरण की सब वृत्तियों के विलय हो जाने पर उनका फिर उदय न हो उसे योग तथा अन्तःकरण (मन) की वृत्तिरूप सुख दुःख की छाया की समाप्ति होकर आत्मा का कूटस्थ (अपरिवर्तनशील) तथा चित्स्वरूप होने को मोक्ष कहा है। अतः मुख्य प्रतिपाद्य विषयों में भेद दीखता है। इस प्रकार चरकोक्त योग 'आत्मस्थे मनसि स्थिरे, रजस्तमोऽभावात्, शुद्धसत्त्वसमाधानात्' इत्यादि (वाक्यों के आधार पर रजोगुण तथा तमोगुण समाप्त होकर शुद्ध सत्त्वगुण के शेष रहने पर सत्त्वगुण प्रधान मन के आत्मा में स्थिर हो जाने के कारण पतञ्जलि के सम्प्रज्ञात श्रेणी में कहे हुए योग में ही अन्तर्निहित हो जाता है। यदि मन के लय होने का प्रतिपादन किया जाता तो सात्त्विकवृत्ति के भी परिहार से ध्येयमात्र प्रकाशावस्था रूप असम्प्रज्ञात योग का बोध होता। पतञ्जलि का योग सम्प्रज्ञात श्रेणी से भी परे असम्प्रज्ञात श्रेणी में जाकर समाप्त होता है तथा उसी अवस्था में ही इष्ट सिद्धि होती है—इस प्रकार योग की मुख्य श्रेणियों में भेद है।
चरक में
आवेशश्चेतसो ज्ञानमर्थानां छन्दतः क्रिया । इष्टिः श्रोत्रं स्मृतिः कान्तिरिष्टतश्चाप्यदर्शनम् ।।
इत्यष्टविधमाख्यातं योगिनां बलमैश्वरम् । शुद्धसत्त्वसमाधानात्तत्सर्वमुपजायते ।।
१. चित्तवृत्ति के निरोध, (Concentration of mind) को योग कहते हैं। उसके दो भेद हैं। सबीज और निर्बीज समाधि। अर्थात् जब वासनाओं का कुछ अंश शेष रह जाय तथा आत्मा की सत्ता विद्यमान रहे तो उसे सबीज-समाधि कहते हैं। उस सबीज समाधि के भी निरोध हो जाने पर सब कुछ निरोध हो जाता है उसे निर्बीज समाधि कहते हैं जिसमें आत्मा का भी पृथक् अस्तित्व न रहे। (अनुवादक)
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(इत्यादि द्वारा ८ (आठ) योग की विभूतियां दी हैं। यथा (१) दूसरे के मन में प्रवेश करना (२) सब विषयों का ज्ञान (३) अपनी इच्छानुसार कार्य करना (४) दिव्य दृष्टि (५) दिव्य श्रोत्र (६) दिव्य स्मृति (७) कान्ति (८) अपने आपको तिरोहित कर सकना)—ये सब आत्मा में मन के स्थिर हो जाने पर ही होती हैं तथा उनको केवल ईश्वरीय शक्तियां ही कहा है। इसके अतिरिक्त पतञ्जलि ने आत्मविषयक योग के ऋतम्भरप्रज्ञा आदि फल कहे हैं। उस योग को सिद्ध करने की अवस्था में अभ्यास को बढ़ाने के लिये त्राटकादि की तरह उन-उन विषयों में किये जाने वाले धारणा, ध्यान तथा समाधि रूप योग के अङ्गभूत संयम का, परचित्तज्ञान, सर्वभूतरुतज्ञान (सब प्राणियों के शब्दों का ज्ञान, पूर्वजातिज्ञान, हस्तिबल भुवनज्ञान, ताराव्यूहज्ञान, कायव्यूहज्ञान आदि बहुत सी सिद्धियों का विभूतिपाद में विभूतियों के रूप में वर्णन किया है। इस प्रकार दोनों में हेतुहेतुमद्भाव (भिन्न-भिन्न कारणों से भिन्न-भिन्न कार्यों का होना) विभिन्न है, प्रक्रिया का भेद है, कहीं-कहीं एक ही विषय में भिन्न-भिन्न पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग है तथा विभूतियों की संख्या भी इसमें ८ नहीं है। उन विभूतियों का भी 'ते समाधावुपसर्गाव्युत्थाने' के अनुसार मुख्य योग के मार्ग में व्याघात होने से वर्णन नहीं किया है।
योग और मोक्ष के साधन के वर्णन में कहा है—
सतामुपासनं सम्यगसतां परिवर्जनम्। ब्रह्मचर्योपवासश्च नियमाश्च पृथग्विधाः ।।
धारणं धर्मशास्त्राणां विज्ञानं विजने रतिः । विषयेष्वरतिर्मोक्षे व्यवसायः परा धृतिः ।।
इत्यादि द्वारा सत्सङ्ग असत्सङ्गवर्जन आदि बहुत से उपाय बताये हैं। इनमें ब्रह्मचर्य आदि कुछ उपाय पतञ्जलि के यम-नियमों में भी आते हैं। सत्सङ्ग, उपवास, शास्त्रधारण आदियों को वहां साधनों में नहीं लिखा है। अपितु वहां अभ्यास तथा वैराग्य को जो कि योग के हेतु रूप में लिखे हैं, ओंकार की उपासना, मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा$^१$ आदि चित्तसम्बन्धी कर्म, प्राणायाम तथा आसन आदि, जिनका योग के अङ्गरूप में विशेष उल्लेख किया है उनका चरकसंहिता में उल्लेख नहीं किया। इस प्रकार साधनों में भी पूर्ण समानता नहीं पाई जाती। मुख्य उपादेय अंश में थोड़ी बहुत समानता तो सब जगह मिल सकती है।
इसके अतिरिक्त योग विद्या भी पतञ्जलि की ही आविष्कृत नहीं है, इसके पूर्व महाभारत आदि में भी इसका वर्णन मिलता है। 'हिरण्यगर्भ योग का वक्ता है'—इस वाक्य के अनुसार हिरण्यगर्भ के समय से ही योग विद्या का शाश्वतिक उदय माना गया है। महेञ्जोदारो की खुदाई में योगस्थ पुरुष की मूर्ति के मिलने से भारत में योग का प्रचलन अत्यन्त प्राचीन है—ऐसा सर जान मार्सले ने अपनी पुस्तक (Mohenjodaro and indus civilization Vol I) के ५४ पृष्ठ में अपना मत प्रदर्शित किया है। श्रीयुत सुरेन्द्रनाथदास गुप्त ने अपनी पुस्तक (History of Indian Philosophy Vol I) के २२६ पृष्ठ पर यही लिखा है। इस प्रकार स्वरूप, हेतु, फल, साधन, पारिभाषिक शब्दों की भिन्नता, पातञ्जल योग क्रिया में समय के व्यतिक्रम (व्यवधान) से विषय का विकसित होना तथा दोनों की लेखन शैली में भेद होने से दोनों लेखक भिन्न-भिन्न प्रतीत होते हैं।
महाभारत के अश्वमेध के अनुगीता पर्व के १९वें अध्याय में 'अतः$^२$ परं प्रवक्ष्यामि योगशास्त्रमनुत्तमम्' इस वाक्य द्वारा प्रारम्भ करके दी हुई योग विद्या में भी इसी प्रकार इन्द्रियों को रोक कर मन को आत्मा में स्थिर करके मोक्ष के लिये योग करना लिखा है तथा उसके उपाय रूप से योगशास्त्रों का अभ्यास, एकान्त में रह कर संयम तथा इन्द्रियों
१. चरक में यद्यपि मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा आदि इन्हीं नामों से ये शब्द नहीं दिये हैं-फिर भी ये शब्द कुछ थोड़े से अन्तर से अवश्य मिलते हैं, यथा—
मैत्री कारुण्यमार्तेषु शक्ये प्रीतिरुपेक्षणम्। प्रकृतिस्थेषु भूतेषु, वैद्यवृत्तिश्चतुर्विधा ।। (च.सू. ९ अ. २५ श्लोक) (अनु.)
२. इसकी टि. उपो. संस्कृत पृ. ६५ देखें।
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को वश में करना लिखा है। इस प्रकार योग से मनुष्य में इच्छानुसार नाना शरीरों को उपलब्ध करना, देवताओं को वश में करना, निर्भयता, अक्लेश, निस्पृहा आदि उत्पन्न हो जाते हैं—इस प्रकार महाभारत में जिस योग का वर्णन किया है वह पूर्णरूप से न मिलने पर भी इसका कुछ अंश में सान्निध्य चरकसंहितागत योग प्रक्रिया में मिलने से हम कह सकते हैं कि चरक में प्राचीन योग का ही अनुसरण किया गया है न कि पातञ्जल योग का। इस प्रकार इन दोनों आचार्यों की विभिन्न योग प्रक्रियाएँ भी इन दोनों को भिन्न-भिन्न व्यक्ति ही सिद्ध करती हैं।
इसके अतिरिक्त योग सूत्रों के कर्ता पतञ्जलि एवं महाभाष्यकार पतञ्जलि भी एक ही व्यक्ति हैं अथवा भिन्न-भिन्न, इसमें भी विद्वानों में परस्पर मतभेद हैं। महाभाष्यकार पतञ्जलि का समय धातु एवं रसायनों की उन्नति से पूर्व का होने से रसायन शास्त्र का आचार्य पतञ्जलि भी भिन्न-भिन्न ही व्यक्ति है—इनमें केवल नाम का ही साम्य है ऐसा सुरेन्द्रनाथ दास गुप्त ने अपनी पुस्तक (History of indian philosophy Vol I) के २६१ पृष्ठ पर लिखा है। अप्रासङ्गिक होने से इस विषय में हम अधिक विचार नहीं करते।
अल्वेरूनी¹ नामक लेखक तो अग्निवेश तथा चरक में ही अभेद मानता है परन्तु यह मत 'अग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते' में तन्त्रकार एवं प्रतिसंस्कर्ता का स्पष्ट भेद दिये होने से खण्डित हो जाता है। परन्तु यद्यपि दोनों आचार्य भिन्न-भिन्न हैं तो भी दोनों के ग्रन्थों का एक ही व्यक्ति द्वारा संकलित किया जाने से तथा उनके नाम मात्र शेष जाने से वर्तमान समय में तो दोनों का अभेद सा ही हो गया है, यह बड़े दुख का विषय है।
वर्तमान में उपलब्ध प्रतिसंस्कृत चरकसंहिता में भी अधिकांश रूप में प्राचीन सांख्य दर्शन को ही लेने से, बौद्ध मत की छाया न होने से तथा प्रतिसंस्कार के समय संभावित रूप से प्रविष्ट लेखों में भी प्राचीन एवं प्रौढ़ रचना के दिखाई देने से प्रतिसंस्कर्ता चरक भी अर्वाचीन प्रतीत नहीं होता। किन्तु भिषग्जितीय अध्याय में न्यायदर्शन के निग्रह स्थान आदि बहुत से पदार्थों की समीक्षा होना, इसके विषय को प्राचीन सिद्ध करने में बाधक होते हैं। श्रौत (वैदिक) दार्शनिक ग्रन्थों में गौतमसूत्र से पूर्व तथा बौद्ध दार्शनिक ग्रन्थों में नागार्जुन के उपायहृदय आदि ग्रन्थों से पूर्व विगृह्यसंभाषा में उपयोगी न्याय, छल, जाति, निग्रहस्थान आदि पदार्थों के न मिलने से प्रतीत होता है कि बौद्धों के महायानिक² विचारों के उदय होने पर दोनों (हीनयान तथा महायान के अनुयायियों) में जब परस्पर संघर्ष हुआ तब पक्ष-प्रतिपक्ष, जय-पराजय, नियम-व्यवस्था आदि के अनुसन्धान करने पर जो वादविवाद का विषय पहले संक्षेप में था उसी को गौतम तथा नागार्जुन ने ग्रन्थनिर्माण के द्वारा परिष्कृत करके उसे नियमित कर दिया, पक्षप्रतिपक्षरूप से होने वाले विवाद के विषय को बाद में होने वाले दिङ्नाग, धर्मकीर्ति आदि बौद्ध आचार्यों द्वारा प्रमाण समुच्चय, प्रमाण वार्तिक वाद, न्यायहेतु बिन्दु आदि ग्रन्थों में, न्यायवैशेषिकाचार्यों द्वारा वात्स्यायन भाष्य, उद्योतकर वार्तिकतात्पर्य टीका तात्पर्य परिशुद्धि आदि ग्रन्थों में, तथा जैनाचार्यों द्वारा तत्त्वसंग्रह आदि अपने ग्रन्थों में मध्यकाल में भी बढ़ाया हुआ हम देखते हैं। इस प्रकार समय-समय पर विमर्श के अवसर के उपस्थित होने पर विमर्दनीय (विचारणीय) पदार्थों का अनुप्रवेश (पीछे से प्रवेश) होता ही रहता है। आयुर्वेद के प्राचीन ग्रन्थों में सुश्रुत, भेड आदि वादविवाद के विषय में उदासीन ही रहे हैं। कश्यप ने वैद्यों के परस्पर विचारणीय विषयों के उपस्थित होने पर संधायसंभाषा को देकर विगृह्यसंभाषा का विषय विस्तार से न देकर लेशमात्र ही दिया है। इन प्राचीन आचार्यों द्वारा गृहीत मार्ग के अनुसार आत्रेय तथा अग्निवेश को भी अपनी संहिता में सन्धायसंभाषा
१. महमूद गजनवी का समकालीन तथा उसका सभा-कवि। इसने भारत में संस्कृत का अध्ययन करके भारतीय विद्याओं पर पुस्तक लिखी है (समय ११वीं शताब्दी का पूर्वार्ध)—अनुवादक।
२. बौद्ध धर्म का अर्वाचीन रूप महायान है जिसमें भगवान् बुद्ध के मूल उपदेशों में बहुत सा परिवर्तन कर दिया गया है। (अनुवादक)
काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् २४०
को ही देना चाहिये था क्योंकि चिकित्सा के विषय में विवाद होने पर जब व्यक्ति येन केन प्रकारेण स्वपक्षप्रतिष्ठापन एवं परपक्ष के खण्डन में लगता है तब वस्तुतत्त्व के तिरोहित हो जाने से अनर्थ की संभावना होती है, इसलिये वस्तुतत्त्व के अनुसन्धान के औचित्य को दृष्टि में रखते हुये विगृह्यसंभाषा में उपयोगी छल, जाति, निग्रहस्थान आदि हितकारी मार्ग में बाधक हो जाते हैं।
उपलब्ध चरक संहिता में वादविवाद के प्रकरण में लिखा है—
विगृह्यभाषा तीव्रं हि केषाञ्चिद् द्रोहमावहेत्। कुशला नाभिनन्दन्ति कलहं समितौ सताम्।।
अर्थात् इसमें सन्धायसंभाषा को ही प्रधानता दी है। यहां तक का विषय ही भगवान् आत्रेय का प्रतीत होता है। इसके बाद विगृह्यसंभाषा के विशेष पदार्थों को लेकर प्रवृत्त हुये हैं। वहां पर 'इमानि खलु पदानि भिषग्वादज्ञानार्थमधिगम्यानि भवन्ति' अर्थात् ये पद वैद्यक के विवाद विषयों के ज्ञान के लिये जानने चाहिये, यहां से प्रारम्भ करके 'इति वादमार्गपदानि यथोद्देशमभिनिर्दिष्टानि भवन्ति' अर्थात् इस प्रकार आवश्यकतानुसार वादविवाद के लिये पदों का निर्देश कर दिया। इस प्रकार प्रारंभ एवं उपसंहार (समाप्ति) द्वारा पृथक् प्रतीत होता हुआ ग्रन्थ प्रकरण प्राप्त विषयों से खींचकर पीछे से चरक के समय अनुप्रविष्ट प्रतीत होता है। प्राचीन समय में भी विभिन्न मत वाले भिन्न-भिन्न आचार्यों के होने से परस्पर उनमें विचार विमर्श होता ही होगा। इस विषय में पूर्ण प्रमाणों के अभाव में हम निश्चय से यह भी नहीं कह सकते कि उस समय वादविवाद के नियम नहीं थे। भासकवि के प्रतिमा नाटक$^१$ में प्राचीन शास्त्रों में मेधातिथि का न्यायशास्त्र विशेष प्रतिष्ठित माना जाता था। वहां भी वादविवाद के विषय का उल्लेख है। परन्तु यहां बार्हस्पत्य अर्थशास्त्र के पृथक् उल्लेख होने के कारण न्यायशास्त्र से शब्दमात्र द्वारा तर्क का ग्रहण है या अन्य विषय का यह नहीं कहा जा सकता। और यदि तर्क शास्त्र का ही ग्रहण हो तो भी उसमें वादविवाद का विषय है या नहीं, और होने पर भी उसका क्या स्वरूप है यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता। गौतम तथा नागार्जुन से पूर्व के ग्रन्थों में इस विषय के न मिलने से ऐसा प्रतीत होता है कि गौतम तथा नागार्जुन के समय पक्ष-प्रतिपक्ष भाव के विशेषरूप से प्रबलता धारण कर लेने पर सामान्यरूप से मिलने वाले प्राचीन विषयों का ही विशेष प्रसार हो गया है। इन बातों को दृष्टि में रखते हुये चरक, गौतम तथा नागार्जुन द्वारा निर्दिष्ट वादविवाद के विषयों की यदि हम पौर्वापर्य की दृष्टि से तुलना करें तो हम देखेंगे कि न्याय, प्रतिज्ञा आदि अवयव, तथा सिद्धान्त आदि के विषय में चरक और गोतम की उक्तियों में समानता होने पर भी गौतम ने बाद, जल्प, वितण्डा आदि शास्त्रीय विचारों के कथात्रैविध्य की दृष्टि से संप्राय संभाषा रूपी वाद को तत्त्वज्ञान की दृष्टि से और विगृह्य भाषारूपी जल्प (वितण्डा) को पक्ष-प्रतिपक्ष की दृष्टि से दिये है तथा जल्प में उपयोगी होने की दृष्टि से ही छल, जाति, निग्रहस्थान आदि का निर्देश किया है। परन्तु चरक की अपेक्षा गौतम में छल, जाति, निग्रहस्थान आदि के विभाग तथा संख्या की अधिकता मिलने से गौतम में विकसित अवस्था प्रतीत होती है। नागार्जुन के उपायहृदय में कुछ पदार्थ गौतम और चरक की अपेक्षा भिन्न प्रक्रिया द्वारा कुछ संक्षिप्त होने पर भी अधिकन्यूनत्रैविध्य, दृष्टान्तद्वैविध्य, सिद्धान्तधर्मचातुर्विध्य आदि २० प्रश्नोत्तरसम्बन्धी अनेक विषयों के विकसित अवस्था में दिखाई देने से और विकासवाद (Elevation theory) की दृष्टि से चरक की अपेक्षा गौतम और नागार्जुन के समय में विकसित विचारों के मिलने से प्रतीत होता है कि एक ही वादविवाद के युग में होने पर भी कुछ समय के पौर्वापर्य से चरक का समय गौतम तथा नागार्जुन के समय से प्राचीन प्रतीत होता है। सुरेन्द्रनाथ दास ने भी अपनी (History of Indian Philosophy Vol I) में यही मत प्रकट किया है।
१. साङ्गोपाङ्ग वेद, मनु के धर्मशास्त्र, महेश्वर के योगशास्त्र, बृहस्पति के अर्थशास्त्र, मेधातिथि के न्यायशास्त्र और प्रचेता के श्राद्धकल्प को पढ़ता हूँ। (प्रतिमा नाटक पृष्ठ ७९)।
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद
२४१
बौद्धत्रिपिटक के चीनी अनुवाद (Chinese Buddhist chronicle) में मिलता है कि चरकनामक वैद्य कनिष्क राजा का राजवैद्य था। उसने उसकी रानी के किसी भयंकर रोग की चिकित्सा की थी। इससे चरकाचार्य कनिष्क के समय होने से प्रथम शताब्दी में हुआ है ऐसा पाश्चात्य लेखक सिल्वान लेभी का मत है। इतिहास के अनुसार दार्शनिक नागार्जुन का कनिष्क के समय होना तथा नागार्जुन के उपायहृदय तथा चरक के लेख में विगृह्यसंभाषा के समानरूप में मिलने से चरक तथा आर्य नागार्जुन दोनों ही कनिष्क के समकालीन सिद्ध होते हैं। परन्तु शिलालेख आदि के द्वारा कनिष्क राजा के बौद्ध होने तथा नागार्जुन का कनिष्क के समकालीन सिद्ध होने पर भी चरकसंहिता का प्रतिसंस्कर्ता चरक ही कनिष्क का राजवैद्य चरक था इसमें विद्वानों का मतभेद है। श्रीयुत कीथ¹ महाशय इसी मत के हैं। यदि चरक कनिष्क² का समकालीन हो तथा उसका राजवैद्य हो तो उसके लेखों में कहीं तो बौद्ध सम्प्रदाय की छाया (झलक) मिलनी चाहिये थी परन्तु इसके विपरीत चरकसंहिता में वैदिक मन्त्रों द्वारा वैदिक प्रक्रिया का ही प्रयोग क्यों किया गया है। कुछ लोग इसके प्रत्युत्तर में कहते हैं कि प्राचीन अग्निवेश संहिता में सांख्य दर्शन तथा वैदिक प्रक्रिया पहले से ही विद्यमान थी, चरक तो इस संहिता का केवल प्रतिसंस्कर्ता मात्र था इसलिये उसमें बौद्ध विचारों का प्रवेश नहीं हो सकता था। केवल इतने से ही चरक को प्राचीन सिद्ध नहीं किया जा सकता। कुछ लोग कहते हैं कि चरक संहिता में कुछ स्थलों पर स्वभाववाद³ का उल्लेख है जिसकी टीका में चक्रपाणि ने बौद्धमत का संकेत किया है इसलिये इसमें बौद्ध मत का प्रवेश है। परन्तु इसके प्रत्युत्तर में कुछ लोग कहते हैं कि इतने मात्र से ही बौद्ध मत का प्रवेश नहीं कहा जा सकता क्योंकि स्वभाववाद् केवल बौद्धों का ही नहीं है। इससे पहले भी विद्यमान था।
यदि चरक को कनिष्क का राजवैद्य मानें तो उपायहृदय में नागार्जुन ने जहां चिकित्सा के प्रसंग में सुश्रुत को स्मरण किया है वहां अपने समकालीन बौद्ध राजा कनिष्क के राजवैद्य एवं इतने प्रसिद्ध विद्वान् चरक का नामोल्लेख तक कैसे भूल गया। यदि इन युक्तियों के आधार पर चरक को नागार्जुन से भी बाद का माना जाय तो चरक का समय नागार्जुन से भी अर्वाचीन प्रतीत होता है।
नागार्जुन द्वारा अपने दार्शनिक ग्रन्थ उपायहृदय में प्रसङ्गवश आये हुये वैद्यक के प्रकरण में पूर्ववर्ती आत्रेय अग्निवेश कश्यप आदि की तरह चरक तथा बौद्ध मतानुयायी जीवक का नामोल्लेख न करना ठीक ही है। चरक के वहां नामोल्लेख न होने मात्र से ही यदि उसे अर्वाचीन मान लें तो इस युक्ति के आधार पर आत्रेय आदि को ही हमें अर्वाचीन मानना पड़ेगा। नागार्जुन के उपायहृदय में सुश्रुत का नाम होने पर भी चरक का नाम न होने का कारण संभवतः यह हो कि सुश्रुत संप्रदाय का प्रादुर्भाव काशी में हुआ था और चरक संप्रदाय का पाञ्चाल, काम्पिल्य आदि पश्चिम प्रदेश में। इसलिये उस प्रदेश में उनकी प्रसिद्धि स्वाभाविक थी। परिणामस्वरूप पूर्व दिशा के देशों में सुश्रुत की अधिक प्रसिद्धि हो गई और इसलिये श्याम, कम्बोडिया आदि देशों के यशोवर्मा तथा जयवर्मा⁴ के शिलालेखों में वैद्य के रूप में सुश्रुत का उल्लेख मिलता
१. चरक परम्परा के अनुसार कनिष्क का चिकित्सक था, उसने उसकी स्त्री की कठिन रोगावस्था में चिकित्सा की थी। परन्तु दुर्भाग्यवश पीछे से जब हम इन कहानियों को सुनते हैं तो हम नहीं कह सकते कि इन कहानियों का कितना मूल्य है (History of Sanskrit literature A. B. Keith P. 406)।
२. कनिष्क का समय ७८ से १०० ईसवी-स्मिथ १२० ईसवी मानता है। (अनुवादक)
३. प्रवृत्तिर्हेतुर्भावानां न निरोधेऽस्ति कारणम् । केचित्तत्रापि मन्यन्ते हेतुं हेतोरवर्तनम् ।। (च.सू.अ. १६ श्लोक २७)
अर्थात् भाव (पदार्थों) की प्रवृत्ति अर्थात् उत्पत्ति में कारण होता है परन्तु विनाश में कोई कारण नहीं। अर्थात् भावों का नाश अकारण ही (स्वभावतः) हो जाता है। (अनुवादक)
४. यशोवर्मा—(कम्बुज का राजा ८८९ से ९०८ ईसवी) तथा जयवर्मा—(यह भी कम्बुज का राजा १२वीं शताब्दी)। (अनुवादक)
| २४२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् |
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है। नागार्जुन का संबन्ध विशेषरूप से दक्षिण प्रदेश तथा मगध से था इसलिये पूर्व दिशा में प्रसिद्ध तथा अपने समाज में सम्मानित सुश्रुत का ही नाम उसे ध्यान में आया हो। परन्तु सुश्रुत से भी पहले उसे चरक का नाम याद आना चाहिये था क्योंकि अपने समकालीन राजा कनिष्क के राजवैद्य तथा विद्वान् होने के नाते चरक से उसका परिचय अवश्य होना चाहिये था। इसके अतिरिक्त राजतरंगिणी के लेखक (कल्हण) ने भी कनिष्कवृत्ति में चरक का नाम क्यों नहीं दिया। इनके आधार पर तथा गौतमसूत्र के आविर्भाव से पूर्व भी न्याय वितण्डा आदि विवाद के विषयों के प्रचलित होने और चरक की लेखन शैली में भी प्राचीन ब्राह्मण ग्रन्थों की ही झलक मिलने से सिल आदि विद्वान् चरक को कनिष्क का समकालीन नहीं मानते हैं।
इस प्रकार जब हम चरक के समय का अन्वेषण करते हैं तो हमें बहुत से मत दिखाई देते हैं। इसके समय के पूर्ण निश्चय करने के लिये अभी बहुत से प्रमाणों के खोजने की आवश्यकता है। श्रीयुत प्रफुल्लचन्द्र राय ने भी अपनी पुस्तक (History of Hindu chemistry Vol I) में चरक तथा सुश्रुत के विषय में बहुत से विचार प्रकट किये हैं।
वार्योविद, दारुवाह, नग्नजित् तथा भेड
इस काश्यपसंहिता के रोगाध्याय में काश्यपसम्मत रोगों के द्वैविध्यवाद¹ का उल्लेख होने से तथा वमन विरेचनीयाध्याय में भी ग्रन्थ के त्रुटितं होने से वार्योविद के नाम से किसी अव्यक्त मत के दिये होने से वार्योविद का उल्लेख मिलता है। कुक्कुणक चिकित्सा सम्बन्धी अध्याय के अन्त में वार्योविद नामक राजा को मारीच कश्यप द्वारा बालभैषज्य² के उपदेश का निर्देश मिलता है। उत्तर भाग में अनेक स्थानों पर जीवक द्वारा प्रश्न एवं सम्बोधन के मिलने पर भी बीच-बीच में पार्थिव, विशांपते, नृपोत्तम, नृप तथा नराधिप आदि द्वारा मिलने वाले राजा के सम्बोधन, अन्य किसी दूसरे राजा के सम्भव न होने से तथा एक स्थान पर नामपूर्वक उल्लेख होने से उसी वार्योविद के प्रति किये गये प्रतीत होते हैं। इसी प्रकार देशसात्म्याध्याय में भी 'काशीराजो (काशिराजं) महामुनिः' में काशीराज द्वारा निर्दिष्ट व्यक्ति भी वही वार्योविद प्रतीत होता है। इस प्रकार इस संहिता के अनुसार मारीच कश्यप का शिष्य तथा उसका समकालीन वैद्याचार्य वार्योविद काशी का राजा प्रतीत होता है। आत्रेय संहिता के वातकलाकलीय अध्याय में मारीच तथा वार्योविद का पक्ष-प्रतिपक्ष रूप में निर्देश होने से भी दोनों का सहभाव प्रतीत होता है। वातकलाकलीय³, यज्जः⁴ पुरुषीय तथा आत्रेय भद्रकाष्पीय⁵ अध्यायों में आत्रेय के साथ एकत्रित हुए ऋषियों में वार्योविद का उल्लेख होने से आत्रेय तथा वार्योविद का सहभाव तथा स्थान-स्थान पर उसके मतों का उल्लेख मिलने से वार्योविद का वैद्याचार्य होना भी स्पष्ट है। यज्जःपुरुषीयाध्याय में आत्रेय के सहभाव तथा काशीपति रूप में निर्देश होने से वामक⁶ भी काशीराज तथा वैद्याचार्य प्रतीत होता है। काशीराज रूप में मिलने वाले वैद्याचार्य दिवोदास, वामक तथा वार्योविद आदि तीनों के परस्पर पौर्वापर्य के विषय में अभी तक कुछ ज्ञात नहीं है। यद्यपि आजकल वार्योविद का ग्रन्थ तथा मतोल्लेख नहीं मिलता है तथापि आत्रेय तथा काश्यपसंहिता में उसके मत के उल्लेख मिलने से यह कहा जा सकता है कि यह उस समय कोई प्रसिद्ध आचार्य था। संभवतः यह भी कश्यप से बालभैषज्य के उपदेश को ग्रहण करने वाला कौमारभृत्य का कोई आचार्य हो। इस प्रकार आत्रेय पुनर्वसु तथा मारीच कश्यप के समकालीन रूप में निर्दिष्ट, परस्पर एक दूसरे का उल्लेख करने वाले आत्रेय पुनर्वसु तथा मारीच कश्यप के समान काल वाला ही प्रतीत होता है।
उपास्यमानमृषिभिः कश्यपं वृद्धजीवकः। चोदितो दारुवाहेन वेदनार्थेऽभ्यचोदयत् ।।
१. १ से ६ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ६९ देखें।
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २४३
काश्यपसंहिता के उपर्युक्त वचन के अनुसार संहिता के पूर्वभाग में वृद्धजीवक को प्रश्न पूछने में प्रेरणा देने वाला दारुवाह प्रतीत होता है। वही रोगाध्याय में 'पञ्चरोगा आगन्तुवातपित्तकफ त्रिदोषजा इति दारुवाहो राजर्षिः' के द्वारा रोगों के पाञ्चविध्यवाद के मत के द्वारा उसका राजर्षि रूप में निर्देश किया गया है। रोगद्वैविध्यवाद के रूप में वार्योविद का तथा रोगपाञ्चविध्यवाद के रूप में दारुवाह का पृथक् निर्देश होने से, ये दोनों विभिन्न व्यक्ति प्रतीत होते हैं। राजर्षि दारुवाह कहां का हैं, यह इससे प्रतीत नहीं होता। किन्तु अष्टाङ्गसंग्रह के उत्तर स्थान में विष के वेगों के विषय में पुनर्वसु, नग्नजित् विदेह, आलम्बायन तथा धन्वन्तरि के मत का उल्लेख मिलने से नग्नजित्¹ नाम का भी कोई वैद्य प्रतीत होता है। उसी की इन्दु² की व्याख्या में 'नग्नजितोदारुवाहिनः' पद द्वारा नग्नजित् तथा दारुवाह दोनों शब्दों को समानाधिकरण के रूप में दिया है। यहां इन्नन्त दारुवाहिन् शब्द का प्रयोग होने पर भी चरक की चक्रपाणि³ व्याख्या में दारुवाह नाम दिया होने से तथा काश्यपसंहिता में भी दारुवाह नाम से ही उल्लेख होने से केवल अन्तिम वर्ण के भेद होने से दोनों एक ही व्यक्ति प्रतीत होते हैं। अन्यत्र कहीं-कहीं मिलने वाला दारुक⁴ भी संभवतः यही दारुवाह हो। दारुवाह तथा नग्नजित् के अभेद को मानकर अनुसन्धान करने पर मुद्रित भेड संहिता में निम्न श्लोक मिलता है—
गान्धारभूमौ राजर्षिममग्रिजित्स्वर्गमार्गदः। संगृह्य पादौ पप्रच्छ चान्द्रभागं पुनर्वसुम् ।।
एवमुक्तस्तथा तस्मै महर्षिः पार्थिवर्षये। विषयोगेषु विज्ञानं प्रोवाच वदतां वरः ।।
(पृष्ठ ३०)
उपर्युक्त श्लोक में 'राजर्षिममग्रिजित्' इस पाठ के मिलने पर भी श्री यादवजी⁵ महाराज द्वारा तञ्जोर पुस्तकालय में मिलने वाली पुस्तक के अनुसार 'राजर्षिर्नग्नजित्स्वर्णमार्गदः' पाठ दिया होने से तथा पूर्वापर वाक्य के अनुसार प्रथमान्त राजर्षि पाठ के ही उचित होने से उस पाठ के अनुसार भेड के समकालीन नग्नजित् नाम वाले किसी गान्धार के राजा द्वारा चन्द्रभागा नाम वाली माता के अनुसार चान्द्रभाग संज्ञा वाले पुनर्वसु आत्रेय से विष के विषय में प्रश्न किये जाने का निर्देश मिलता है। अष्टाङ्गहृदय के 'रसाद्रक्तमित्यादि' की अरुणदत्त की व्याख्या में नग्नजित्⁶ के वचन का उल्लेख मिलने से अष्टाङ्गहृदय में 'इति नग्नजितो मतम्' के मिलने से तथा भेड संहिता में भी इस विषसम्बन्धी प्रश्न के मिलने से यह वही (एक ही) व्यक्ति प्रतीत होता है। दारुवाह तथा नग्नजित् का राजा के रूप में उल्लेख मिलने से, इन्दु की टीका के अनुसार दोनों का समानाधिकरण के रूप में दिया होने से तथा इन दोनों के विषय में उस-उस नाम से मिलने वाले गुणों की समानता होने से इस गान्धार राजर्षि का नाम केवल विष के विषय में अपितु वैद्यक के विषय में भी आचार्य भाव प्रकट होता है। पूर्वनिर्दिष्ट शालिहोत्रोक्त अश्वशास्त्र में भी आयुर्वेद के आचार्यों में विनग्नजित् का नाम मिलता है। यह भी संभवतः वही व्यक्ति हो। मत्स्य⁷ में वास्तुशास्त्र (गृह निर्माणकला) के उपदेशक के रूप में भी नग्नजित् का उल्लेख है। यह नग्नजित् गान्धार का राजा ही है या कोई अन्य व्यक्ति यह नहीं कहा जा सकता।
इसके अतिरिक्त ऐतरेय ब्राह्मण⁸ में क्षत्रिय यज्वाओं के फलचमस भक्षण के साम्प्रदायिकत्व प्रदर्शन में नग्नजित् गान्धार का उल्लेख मिलता है। वहीं क्षत्रिय यजमानों के लिये ही दिग्विजय रूप राष्ट्रसम्पत्ति के फल का उल्लेख होने से फलचमस भक्षण द्वारा ऐश्वर्य को प्राप्त किये हुए, सब शत्रुओं को विजय करने वाले एक नग्नजित् नाम के क्षत्रिय गान्धार के महाराजा का निर्देश मिलता है। इस प्रकार यहां निर्दिष्ट गान्धार का राजा नग्नजित् ही देश तथा नामों की समानता के कारण भेडसंहिता में सम्मानपूर्वक राजर्षिरूप में निर्दिष्ट गान्धार का राजा नग्नजित् ही होना चाहिये। शतपथ ब्राह्मण⁹ में भी चितिशक्ति में प्राणों के उपधान करने के विषय में नग्नजित् के पुत्र स्वर्जित तथा गान्धार के नग्नजित् का उल्लेख मिलता हैं। वहां प्राणों की महिमा का वर्णन करने वाले राजन्य बन्धु का निर्देश होने से इससे भी शारीरविद्या के आचार्य गान्धार
१. १ से ९ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ६९-७० देखें।
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के राजा नग्नजित् का ही निर्देश प्रतीत होता है। यहां उसके पुत्र स्वर्जित् का उल्लेख होने से तथा भेडसंहिता में नग्नजित् के 'स्वर्गमार्गद' इस विशेषण से उसके किसी विजय के वृत्तान्त की सूचना मिलती है। उपर्युक्त वर्णन के अनुसार नग्नजित् को ऐतरेय तथा शतपथ ब्राह्मण के काल का सिद्ध करते हुए 'नग्नजितो दारुवाहिनोऽप्यत्र' इन्दु के इस वाक्य में अपि शब्द के कारण यदि दो पृथक् व्यक्तियों की कल्पना भी का जाय तो भी औपदेशिक सम्बन्ध से नग्नजित् के सम्बन्ध से पुनर्वसु आत्रेय तथा उसके शिष्य भेड का समय भी ऐतरेय तथा शतपथ ब्राह्मण के काल से बाद का नहीं है। इसलिये 'स्वर्णमार्गद' इस पद के आधार पर कहना कि गान्धार के राजा नग्नजित् और भेड दारायस नामक पारसीक राजा के समय (५२१ से ४८५ ईस्वी पूर्व) के हैं—युक्तिसंगत नहीं है।
इसी प्रकार महाभारत¹ में युग के अन्त में अन्तर्हित वेद, इतिहास आदि को अपने तपोबल से प्राप्त करके उस-उस विद्या के प्रकाशक महर्षियों के विवरण में कृष्णात्रेय का चिकित्सक के रूप में उल्लेख मिलता है। यह कृष्णात्रेय ही पुनर्वसु आत्रेय हैं या नहीं, यह एक पृथक् प्रश्न है। तथापि भेड संहिता तथा चरक संहिता में भी कृष्णावेश के उपदेश का उल्लेख होने से उसके सहभावी पुनर्वसु आत्रेय का महाभारत से प्राचीनत्व तो इससे भी प्रकट होता है।
इस प्रकार आत्रेय के सहभावी रूप से मारीच कश्यप का उल्लेख, वार्योविद का आत्रेय पुनर्वसु तथा मारीच कश्यप के साथ सहभाव, कृष्णात्रेय तथा पुनर्वसु आत्रेय का समानाधिकरण (एक व्यक्तित्व) के रूप में निर्देश, महाभारत में चिकित्सा के प्रवर्तक के रूप में कृष्णात्रेय का उल्लेख, आत्रेय के शिष्य रूप में भेड का उल्लेख, भेड के सहभावी तथा आत्रेय पुनर्वसु के शिष्य रूप में गान्धार के राजा नग्नजित् के उल्लेख, नग्नजित् तथा दारुवाह के एक व्यक्तित्व का निर्देश, दारुवाह का काश्यपसंहिता में निर्देश, गान्धार के राजा नग्नजित् का ऐतरेय ब्राह्मण में तथा गान्धार के प्राणतत्त्व के वेत्ता नग्नजित् तथा उसके पुत्र स्वर्जित् का भी शतपथ ब्राह्मण में कीर्तन, दिवोदास का ब्राह्मणग्रन्थों तथा उपनिषदों में उल्लेख तथा धन्वन्तरि का उसके पूर्वपुरुष के रूप में मिलना, इत्यादि बातों को देखकर उसके अनुसार विचार करने का पर ज्ञात होता है कि मारीच कश्यप, पुनर्वसु आत्रेय, भेड, नग्नजित् दारुवाह तथा वार्योविद इत्यादि भैषज्य विद्या के आचार्य ऐतरेय तथा शतपथ ब्राह्मण के समय से बाद के नहीं हैं अपितु धन्वन्तरि तथा दिवोदास के ही समान ब्राह्मण ग्रन्थ तथा उपनिषदों के समय एक साथ अथवा थोड़े बहुत पौर्वापर्य के साथ विद्यमान थे।
इस प्रकार उपर्युक्त वर्णन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि वैदिक काल में प्रारंभ हुई यह भारतीय आयुर्वेद विद्या उपनिषदों तथा ब्राह्मण ग्रन्थों के समय भी इसी प्रकार महर्षियों एवं प्राचीन आचार्यों द्वारा भारत में (विशेषकर भारत के पश्चिम प्रदेशों में) उन्नति की चरमसीमा पर पहुंची हुई थी।
रसशास्त्र के ग्रन्थ
यद्यपि भावप्रकाश आदि अर्वाचीन ग्रन्थों में कुछ विदेशी ओषधियों, विदेशी चिकित्सा पद्धति, धातु रस आदि के विशेष प्रयोग, अफीम का उपयोग इत्यादि अर्वाचीन विषय मिलते हैं तथा इससे कुछ प्राचीन काल के सिद्धयोग आदि में पारद तथा धातुओं का सामान्यरूप से प्रयोग मिलता है। तथापि हम देखते हैं कि वाग्भट के समय तक इस प्रकार के अर्वाचीन विषय बहुत कम उपलब्ध होते हैं। सम्भवतः चतुर्थ शताब्दी में लिखित बावर नामक विद्वान् द्वारा उपलब्ध नावनीतक नामक ग्रन्थ में, तथा उससे भी प्राचीन माने जाने वाले हार्नले नामक विद्वान् द्वारा उपलब्ध लेख में भी स्वर्ण आदि धातुओं का उल्लेख होने पर भी उनकी शोधन आदि की विशेष प्रक्रियाओं तथा पारद के उपयोग आदि का विशेष विवरण नहीं मिलता। महावग्ग में जीवक के वृत्तान्त में वनस्पतियों के अन्वेषण के लिये गुरु से नियुक्त जीवक द्वारा
१. १ की टि. उपो. संस्कृत पृ. ७१ देखें।
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २४५
चिकित्सा में अनुपयोगी एक भी ओषधि के न प्राप्त कर सकने के वर्णन, घृत नस्य आदि ओषधियों अथवा शस्त्रक्रिया द्वारा रोगियों की चिकित्सा तथा रस धातु आदि के कहीं भी न मिलने से प्रतीत होता है कि जीवक के समय तक भी रस धातु आदि ओषधियों का प्रचार नहीं था। चरक¹ तथा सुश्रुत² में भी धातु तथा मणियों का ओषधियों में केवल नाम मात्र का ही उल्लेख मिलता है। उनके शोधन, सिद्धौषध, पारदौषध तथा अहिफेन आदि का वर्णन नहीं मिलता है। काश्यपसंहिता के खिलभाग में आत्रेय तथा भेड के समान शोथरोग में केवल दो तीन बार ही अयोरज (लोहचूर) तथा ताम्ररज का उल्लेख मिलता है। काश्यपसंहिता में यद्यपि उनके शोधन एवं भस्मीकरण का निर्देश नहीं मिलता है तथापि खाने के लिये उनके उपयोग का निर्देश मिलने से यह कहा जा सकता है कि उनका शोधन इत्यादि किया जाता होगा। धातु तथा पारद आदि का उपयोग इसके अतिरिक्त इसमें नहीं मिलता है। तथा अहिफेन आदि अर्वाचीन वस्तुओं का भी इसमें निर्देश नहीं है। इस प्रकार ज्यों-ज्यों प्राचीन ग्रन्थों का अन्वेषण करते हैं त्यों-त्यों हमें ये अर्वाचीन वस्तुएं कम मिलती जाती हैं।
इस रसायन विद्या की उत्पत्ति कब तथा कहां से हुई है इस विषय में विचार करने पर रसायन विद्या में प्रयुक्त होने वाला कैमिस्ट्री (Chemistry) शब्द अल्केमीविज्ञान को सूचित करता है। किसी-किसी व्यक्ति का मत है कि केमिस्ट्रीशब्द मिश्रदेशीय 'क्यामी' शब्द से बना है। इस प्रकार मिश्रदेश से उत्पन्न हुई रसायन विद्या अरब तथा ग्रीस के द्वारा यूरोप में फैली है। परन्तु कुछ विद्वान् कहते हैं कि मिश्रदेश में उस विद्या के अर्थ में 'क्यामी' शब्द मिलता ही नहीं है। तथा वहां रसायन विद्या की प्रागुत्पत्ति के इतिहास के विषय में कोई निर्देश नहीं मिलता है। कुछ लोगों का कहना हैं कि कैमिस्ट्री शब्द तृतीय शताब्दी के अरबदेशीय 'किमाइ' शब्द से बना हुआ है। इस 'किमाइ' शब्द को सिनिस नामक विद्वान् ने अपने अभिधान ग्रन्थ में 'अल्केमी' अर्थ में प्रयुक्त किया है। इससे ज्ञात होता है कि यह विद्या न तो मिश्रदेश में और न तो ग्रीस देश में उत्पन्न हुई है। क्योंकि यदि वहां उत्पन्न होती तो क्या उस देश के हेरोडोटस, डायोडोरश, प्लुचाट तथा प्लीनी आदि प्राचीन लेखक उसके विषय में कुछ भी नहीं लिखते ? तृतीय, चतुर्थ शताब्दी तक मिश्र तथा ग्रीस वालों को तो रसायन विद्या का ज्ञान ही नहीं था। अल्केमी विद्या में पारद का प्रयोग तो पीछे से ही मिलता है। इस प्रकार पाश्चात्य देशों में रसायन विद्या का सबसे प्रथम जानने वाला ग्याबर नामक एक अरबदेशीय विद्वान् था। तथा अरब से ही इस विद्या का अन्य सब देशों में प्रचार हुआ है। कुछ विद्वान् कहते हैं कि वैदिक काल में सोमरस का बहुत अधिक व्यवहार मिलने से ऋग्वेद के कसमय से ही रसायन विद्या भारत में प्रचलित थी। उसी के अनुसार चरक आदि के समय में यूष शरीर के रस आदि के अर्थ में रस शब्द का प्रयोग होता था। इसके बाद रस के समान तरलता के कारण ही पारद तथा अन्य द्रव धातुओं में भी रस शब्द का व्यवहार होने लगा। इस प्रकार भारतीय रसायन शास्त्र का मूल अत्यन्त प्राचीन हैं। यह रसप्रक्रिया सर्वप्रथम रस विषयक तान्त्रिक ग्रन्थों में मिलती है, तथा उसके बाद के रसग्रन्थों में इसका विकसित रूप दिखाई देता है। विद्वानों का यह विचार है कि यह विद्या नागार्जुन द्वारा प्रारम्भ की गई है। लोहशास्त्र का पतञ्जलि द्वारा निर्माण करने का अनेक स्थानों पर निर्देश मिलता है। पारसीक मत के प्रवर्तक जरथुष्ट से पूर्व उस देश के निवासी मागी जाति वालों द्वारा इस गुप्त रसायन विद्या को भारतीय ब्राह्मणों से प्राप्त करने का वृत्तान्त उनके इतिहास से मिलता है। ग्रीस देश के रसायन ग्रन्थों में भी इस विद्या के विषय में पारसीक (पर्शिया) देश का स्थान-स्थान पर निर्देश है। इस प्रकार यह प्रतीत होता है कि यह रसायन विद्या सबसे पहले भारत में ही आविर्भूत हुई थी। भारतीय वैद्यों के अरब देश में जाने से तथा चरक और सुश्रुत के अरब देश में अनुवाद होने तथा भारतीय चिकित्सा का आदर होने से भारत से ही अरब में इस विद्या के प्रचार की प्रतीति होती है। अरब देश के इतिहास से प्रकट होता है
१. १-२ की टि. उपो. संस्कृत पृ. पृ. ७१ देखें।
२४६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
कि ११-१२ वीं शताब्दी में अरब देश में भी रसायन शास्त्र उन्नत अवस्था में था। इसलिये यह कहना निरर्थक है कि पारद के शोधन आदि का ज्ञान भारत ने अरब से सीखा। पी.सी. राय आदि इतिहास लेखक लिखते हैं कि यूरोप आदि पाश्चात्य देश वालों ने रसायन शास्त्र की उपादेयता न जानकर कई शताब्दी तक उसे ग्रहण नहीं किया। पीछे कालक्रम से उसके गुणों को जानने पर बहुत अर्वाचीन काल में ही पाश्चात्य देशों में इसका प्रचलन हुआ है।
रक्तपारद के भारत से ग्रीस तथा रोम में जाने का वर्णन मिलता है। उसके विषय में विवेचन करते हुए जायसवाल जी ने रक्तपारद, शब्द रससिन्दूर के लिये व्यवहृत हुआ बतलाया है। परन्तु रक्तपारद शब्द रससिन्दूर के लिये न मिलकर हिंगुल के पर्यायों में मिलने से रक्तपारद से संभवतः हिंगुल (शिंगरफ) का ग्रहण किया गया है।
^१प्रथमशताब्दी वाले भर्तृहरि के ‘उत्खातं निधिशङ्कया क्षितितलं ध्माता गिरेर्धातवः’ वचन से कुछ^२ लोग कहते हैं कि भारत में रसविद्या के प्राचीन होने की कल्पना दृढ़ होती है।
धातुविज्ञान पहले से ही था यह बात तो आत्रेय, सुश्रुत तथा कश्यप आदि के द्वारा धातुओं का उल्लेख किया होने से स्पष्ट है। कश्यप ने भी सद्योजात शिशु के लिये स्वर्णप्राशन तथा उसके अवलेहनरूप फलों को दिया है। श्रुति एवं स्मृतियों में धातुओं तथा रत्नों के धारण आदि से आयु, आरोग्य एवं श्रेयस् की प्राप्ति का उल्लेख मिलने से प्रतीत होता है कि भारतीयों को इस विद्या के उपयोग का ज्ञान अत्यन्त प्राचीन काल से था। यजुर्वेद में ‘प्रथमो दैव्यो भिषक्’ द्वारा रुद्र को भी प्रधान (आदि) वैद्याचार्य बतलाया है। आत्रेय आदि ने ब्रह्मा के प्राथमिकता दी है, वहां रुद्र का उल्लेख नहीं है। नाथ सम्प्रदाय तथा तर्कशास्त्र में भी स्थान-स्थान पर रसवैद्यक का विषय मिलता है। तन्त्रशास्त्र तथा नाथ सम्प्रदाय में शिव का परम आचार्य के रूप में निर्देश किया है। इसप्रकार तान्त्रिक आदि प्रचलित रसवैद्यक के ग्रन्थों में रुद्र का मूल (प्रधान) आचार्य होना संभव हैं। रसविद्या के प्राचीन तन्त्र ग्रन्थों में मिलने से तथा चरक, सुश्रुत और काश्यप आदि के ग्रन्थों में भी लेशरूप में मिलने से इसे अर्वाचीन नहीं कहा जा सकता। यह भी कहा जा सकता है कि जिस प्रकार अरबदेश में सातवीं शताब्दी में प्रचलित हुए भी रसायन शास्त्र को यूरोप वालों ने सोलहवीं (१६वीं) शताब्दी में ग्रहण किया था उसी प्रकार पूर्व प्रचलित तन्त्रोक्त रसशास्त्र को वैदिक सम्प्रदाय वाले आत्रेय आदि महर्षियों ने भी अपने समय में लेशरूप में ग्रहण करना प्रारम्भ किया हो।
धातुओं के शोधन एवं योग आदियों के द्वारा तन्त्रोक्त भारतीय रसौषधनिर्माण प्रक्रिया भी प्राचीन काल में गुप्त, अप्रचलित अथवा आंशिकरूप में वर्तमान थी। पीछे से उस विद्या को नागार्जुन आदि भारतीय रसविद्या के आचार्यों ने प्रकाश में लाकर विकसित किया प्रतीत होता है। इसीलिये सम्भवतः प्राचीन ग्रन्थों में रसविद्या का विशेष विवरण नहीं मिलता है।
(३) संस्करणों की तुलना तथा तत्सम्बन्धी विषय
प्रतिसंस्करण
प्राचीन आचार्यों के नाम से मिलने वाली संहिताओं में वृद्धजीवकीय तन्त्ररूप काश्यपसंहिता, चरकसंहितारूप आत्रेय एवं अग्निवेशसंहिता, सुश्रुतसंहितारूप धन्वन्तरि संहिता तथा भेडसंहिता–ये सब प्राचीन संहिताएं हैं। उनमें जहां कहीं अर्वाचीनता का सन्देह उत्पन्न करने वाले पद, वाक्य तथा प्रबन्ध इत्यादि मिलते हैं, वे संभवतः पीछे से संस्करण के समय अनुप्रविष्ट हुए प्रतीत होते हैं।
१. यह विचारणीय प्रश्न है कि भर्तृहरि प्रथम शताब्दी में था या नहीं।
२. इसकी टि. उपो. संस्कृत पृ. ७२ देखें।
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २४७
इनमें से काश्यपसंहिता के संक्षिप्तस्वरूप वृद्धजीवकीय तन्त्र के वात्स्य द्वारा प्रतिसंस्करण का उल्लेख इस संहिता के कल्पाध्याय में स्वयं किया हुआ है। आत्रेयसंहितात्मक अग्निवेशतन्त्र के चरक द्वारा प्रतिसंस्करण का निर्देश चरकसंहिता के ‘अग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते’ इत्यादि श्लोक द्वारा स्पष्ट है। सुश्रुतसंहिता के प्रतिसंस्करण का यद्यपि ग्रन्थ (सुश्रुतसंहिता) में स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है तथापि डल्लन आदि टीकाकार इसे नागार्जुन द्वारा प्रतिसंस्कृत मानते हैं। अस्तु, नागार्जुन इसका प्रतिसंस्कर्ता को चाहे न हो परन्तु यह तो सब विद्वान् स्वीकार करते हैं कि स्थान-स्थान पर अन्य विषयों के मिलने के कारण सुश्रुतसंहिता का वर्तमानरूप प्रतिसंस्कृत ही है। भेड संहिता में ‘चक्षुरिति कश्यपः’ द्वारा दिये हुए कश्यप का चक्षुर्निर्वृत्तिवाद तथा काश्यपसंहिता में भेड के नाम से दिया हुआ ६ वर्ष के बाद विरेचन देने सम्बन्धी मत उपलब्ध भेडसंहिता में न मिलने का उल्लेख पहले किया जा चुका है। ज्वरसमुच्चय में उद्धृत भेड के वचनों में से पचास से अधिक भेड के श्लोकों के मुद्रित भेडसंहिता में आंशिक¹ रूप में मिलने से ज्वर प्रकरण की तरह अन्य प्रकरणों का भी स्थान-स्थान पर खण्डित एवं अधूरा होना, बीच-बीच में अन्य विषयों का होना तथा पुनः किया गया प्रतिसंस्करण स्पष्ट प्रतीत होता है। इस गड़बड़ से सन्देह उत्पन्न होता है। आत्रेय रूप एक ही आचार्य के उपदेश को ग्रहण करके पृथक्-पृथक् ग्रन्थों का निर्माण करने वाले अग्निवेश तथा भेड के ग्रन्थों में अनेक समानताओं एवं संवादों के मिलने से पुनः मतिविभ्रम हो जाता है। इस प्रकार भेडसंहिता में दीखने वाले दोष (कमियां) समय के कारण प्रतीत होते हैं। यद्यपि यहां भी प्रतिसंस्करण का कहीं उल्लेख नहीं मिलता है तथापि इसमें प्रतिसंस्करण का होना स्पष्ट है।
आत्रेय आदि की संहिताओं को लेकर बनाये हुए अग्निवेशतन्त्र आदि का चरक आदि आचार्यों ने जो संस्करण किया है उसके स्वरूप के विषय में विचार करने पर हम देखते हैं कि दृढ़बल ने चरक द्वारा किये संस्करण का निम्न स्वरूप बताया है—
विस्तारयति² लेशोक्तं संक्षिपत्यति विस्तरम् । संस्कर्ता कुरुते तन्त्रं पुराणं च पुनर्नवम् ।।
अर्थात् संक्षिप्त भाव को विस्तार से कह देना तथा विस्तृत रूप में दिये हुए भावों को संक्षेप में कह देना यह चरक के संस्करण की शैली है। पूर्वोक्त संस्करण आवापोद्वाप अथवा संग्रह-विग्रह प्रक्रिया में से किसी एक द्वारा संभव है। आवापोद्वाप प्रक्रिया का यह अभिप्राय है कि संक्षिप्त पूर्वग्रन्थ के स्थान में दूसरा ही विस्तृत लेख तैयार कर दिया जाय तथा विस्तृत पूर्वग्रन्थ के स्थान में अन्य संक्षिप्त लेख बना दिया जाय। तथा संग्रहविग्रह प्रक्रिया का अभिप्राय यह है कि पूर्व ग्रन्थ में संक्षेप के कारण विषय के स्पष्ट न होने से उसे स्पष्ट करने के लिये विस्तार से दे दिया जाय, तथा,अत्यन्त विस्तार से दिये हुए विषय को सरलतापूर्वक ग्रहण एवं धारण कर सकने के लिये उसके सारांश को लेकर पुनरुक्ति के रूप में संक्षेप से कह दिया जाय। इनमें से यदि प्रथम (आवापोद्वाप) प्रक्रिया द्वारा संस्करण किया गया होता तो आत्रेय एवं अग्निवेश तन्तरूप मूल ग्रन्थ का अधिकांश रूप में स्वरूप ही बदल जाता तथा नई ही रचना बन जाती। तथा उस अवस्था में चरकसंहिता में बीच-बीच में आत्रेय तथा अग्निवेश के प्रतिवचन, प्रश्न आदि नहीं दिये होने चाहिये। परन्तु चरकसंहिता में वक्तव्य विषयों को सामान्य तथा विशेष रूप से न कहकर उसी विषय को संक्षेप एवं विस्तार से तथा वाक्यभेद से बार-बार कहा गया है। इस प्रकार चरकसंहिता का आवापोद्वाप प्रक्रिया द्वारा नवनिबन्धनात्मक संस्करण नहीं किया गया है अपितु मूलग्रन्थ में संक्षेप में आये हुए विषयों को स्पष्ट करने के लिये विस्तार से दे दिया गया है तथा कहीं-कहीं विस्तृत विषयों को ग्रहण एवं धारण के उपयोगी बनाने के लिये संक्षिप्त कर दिया गया है। इस प्रकार चरकाचार्य ने पौनरुक्तय प्रक्रिया द्वारा भी इसका संस्करण किया प्रतीत होता है।
१. १ से २ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ७३-७४ देखें।
१७ का.सं.
२४८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
चरकाचार्य उपलब्ध संहिता का स्वतन्त्र रूप से लेखक न होकर आत्रेयसंहितारूप अग्निवेश तन्त्र का प्रतिसंस्कर्ता ही है। इस विषय में निम्न प्रमाण दिये जा सकते हैं।
आत्रेय संहिता के निदान, चिकित्सा आदि स्थानों में प्राय: विषयों के अनुसार ही अध्यायों के नामों का निर्देश किया गया है। इसके विपरीत सूत्र, विमान, शारीर आदि स्थानों में कहीं-कहीं विषयों के अनुसार नाम होने पर भी अध्याय के आदि वाक्य के प्रतीक के अनुसार दीर्घञ्जीवितीय, अपामार्गतण्डुलीय, आरग्वधीय, कतिधापुरुषीय तथा अतुल्यगोत्रीय इत्यादि नाम प्राय: मिलते हैं। आदि-प्रतीक के अनुसार दिये नामों में कई नाम विभक्ति सहित हो दे दिये गये हैं। उन-उन अध्यायों के उपसंहार के संग्रह श्लोकों में भी उन अध्यायों का उन्हीं नामों से उल्लेख किया होने से यह कहा जा सकता है कि इन अध्यायों के नाम पीछे से केवल शिष्य सम्प्रदाय द्वारा ही नहीं रखे गये हैं अपितु मूलग्रन्थकर्ता की लेखनी द्वारा ही लिखे गये हैं। भेडसंहिता में भी सूत्र, विमान, शारीर तथा इन्द्रिय आदि स्थानों में आदिप्रतीक के अनुसार दिये हुए नाम स्वल्प से भेद के साथ इससे समानता रखते हैं। उदाहरणार्थ—
अध्याय के आदि प्रतीक
| अध्याय का नाम | चरक | भेड |
|---|---|---|
| न वेगान्धारणीयः | न वेगान्धारयेद्धीरः | न वेगान्धारयेद्धीमान |
| मात्राशितीयः | मात्राशी स्यादाहारमात्रा | मात्राशी स्याद्विप्रकाशी |
| आत्रेयभद्रकाप्यीयः | आत्रेयो भद्रकाप्यश्च | आत्रेयः खण्डकाप्यश्च |
| यस्य श्यावनिमित्तीयः | यस्य श्यावे परिव्रस्ते | यस्य श्यावे उभे नेत्रे |
| अवाक् शिरसीयः | अवाक्शिरा वा जिह्वा वा | अवाक्शिरा वा जिह्वा बा |
इसी प्रकार आत्रेय तथा भेडसंहिता में इन्द्रियोपक्रमणीय, तिस्रैषणीय, वातकलाकलीय, विधिशोणितीय, दशप्राणायतनीय, दशमूलीय, अष्टोदरीय, रसविमान पुरुषनि(वि)चय, खुड्डिकागर्भाविक्रान्ति तथा जातिसूत्रीय इत्यादि अध्यायों के समान नाम मिलते हैं।
स्नेहन, स्वेदन तथा निदान और चिकित्सा सम्बन्धी अध्यायों के विषयों के अनुसार दिये हुए नामों में अपने आप ही समानता के संभव होने पर भी दोनों ग्रन्थों में एक ही प्रतीक के द्वारा अध्याय के प्रारम्भ होने, विभक्ति युक्त प्रतीक के अनुसार ही अध्यायों के नाम तथा समान नाम वाले अध्यायों में विशेष विषय की समानता होने से एक ही सूत्र के अनुसार (अर्थात् एक ही आचार्य के उपदेश को ग्रहण करके) दो विभिन्न व्यक्तियों द्वारा इनका लिखा जाना संभव है। यदि उन दोनों में परस्पर कोई संबन्ध न हो तथा उन्हें एक ही आचार्य का उपदेश न मिला हो तो दो स्वतन्त्र लेखों में इस प्रकार की समानता सहज नहीं प्रतीत होती। इसलिये ऐसा प्रतीत होता है कि आत्रेय द्वारा उन्हीं प्रतीकों से प्रारम्भ करके उपदिष्ट अध्यायों के वाक्यों एवं विषयों को लेकर अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार उसे बढ़ाकर तथा दूसरे विषयों को सम्मिलित करके भेड तथा अग्निवेश ने पृथक्-पृथक् तन्त्रों का निर्माण किया है। इसीलिये इनमें परस्पर इतनी समानता है। कहीं-कहीं आत्रेय तथा भेडसंहिता में अध्यायों के आदि प्रतीकों के भिन्न होने पर भी अध्यायों के नाम समान ही मिलते हैं। जैसे—
| भेड तथा चरकसंहिता में अध्यायों के नाम | चरक का प्रतीक | भेड का प्रतीक |
|---|---|---|
| व्याधितरूपीयम् | द्वौ पुरुषौ व्याधितरूपौ भवतः | गुरुव्याधिनरः कश्चित् |
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद | २४९
| शरीरविचयः | शरीरविचयःशरीरोपकारार्थ | इह खल्वोजस्तेजः |
|---|---|---|
| शरीरसंख्या | 'शरीरख्यामभवयवशः | इह खलुशरीरे षट् त्वचः |
| पूर्वरूपीयम् | पूर्वरूपाण्यसाध्यानां | अन्तर्लोहितकायस्तु |
| गोमयचूर्णीयम् | यस्य गोमयचूर्णाभं | चूर्णं शिरसि यस्यैव |
इनको देखने से प्रतीत होता है कि अग्निवेश ने आत्रेयसंहिता में उन-उन आदि प्रतीकों के अनुसार दिये हुए नाम तथा प्रतीकों को उसी रूप में रखा है तथा भेड ने भी अपने ग्रन्थ में आदि प्रतीक की विभिन्नता होने पर भी अध्यायों के वे ही पूर्वपरम्परागत नाम रखे हैं। दोनों संहिताओं में अध्यायों के नामों या आदि प्रतीकों में जहां समानता मिलती है वह आत्रेय द्वारा दोनों का समान उपदेश दिया जाने के कारण उचित ही है। अग्निवेश संहिता में आये हुए अध्यायों के नाम तथा प्रतीक यदि स्वयं अग्निवेश द्वारा दिये गये हों तो सतीर्थ्य भेड द्वारा उनके अनुसरण किये जाने का कोई कारण प्रतीत नहीं होता है। और यदि चरकाचार्य ने ही उन प्रतीकों द्वारा प्रारंभ करके चरकसंहिता का स्वयं निर्माण किया हो तो भी उससे प्राचीन समय वाले भेड ने उसका अनुसरण किस प्रकार किया होगा। भेड तथा अग्निवेश दोनों संहिताओं में आठ स्थानों तथा १२० अध्यायों द्वारा संख्या की समानता भी यही प्रकट करती है। भेड संहिता के चतुष्पाद अध्याय में (पृ. १५) 'सिध्यति प्रतिकुर्वाण इत्यात्रेयस्य शासनम्' द्वारा अप्रतीकारवाद का खण्डन करते हुए नामपूर्वक दिये हुए आत्रेय के मत का वर्तमान चरकसंहिता के महाचतुष्पाद अध्याय (सू.अ. १०) में विस्तारपूर्वक मिलने से भी इसकी पुष्टि होती है। इस प्रकार आत्रेय मत के दोनों ग्रन्थों में समानरूप से मिलने से आत्रेय के उपदेश की पूर्वस्थिति स्पष्ट है। चरक तथा भेड दोनों में खुड्डाक चतुष्पाद अध्याय में समानरूप में मिलने वाले मृद्दण्ड चक्र इत्यादि सिद्धान्त श्लोक भी आत्रेय संहिता के ही होने चाहिये। इस प्रकार इन दोनों संहिताओं में समानरूप से मिलने वाले अध्यायों के नाम तथा विषयों को देखकर यह कहा जा सकता है कि इन दोनों में ओतप्रोतरूप में विद्यमान आत्रेयसंहिता इनसे पूर्व ही विद्यमान थी। उसी आत्रेय संहिता तथा उसके विषयों को लेकर आवश्यकतानुसार अपने विचारों से उसे परिवर्धित करके संक्षेपप्रिय भेड ने संक्षिप्त रूप से तथा विस्तारप्रिय अग्निवेश ने विस्तृत रूप से पृथक्-पृथक् तन्त्रों के रूप में उपस्थित किया। भेडसंहिता में चतुष्पाद के विषय में एक ही अध्याय दिया है। इसमें पहले आत्रेय तथा शौनक के विप्रतिपत्तिवाद को देकर आत्रेय के ज्ञानवैशिष्ठ्य का वर्णन किया है। तथा पीछे चतुष्पादों के वर्णन के बाद सिद्धान्तरूप में संक्षेप से भिषक्प्राधान्यवाद का उल्लेख किया है। इसके विपरीत आत्रेयसंहिता में इस विषय में दो अध्याय हैं। इसमें पहले खुड्डाकाध्याय में चतुष्पादों का वर्णन करके भिषक्प्राधान्यवाद को सिद्धान्तरूप से देकर अगले अध्याय (महाचतुष्पाद अध्याय) में मैत्रेय (शौनक) तथा आत्रेय के मतों का पक्ष-प्रतिपक्षरूप से निर्देश किया है। इस प्रकार एक ही विषय एक (भेडसंहिता) में संक्षिप्त रूप में तथा दूसरे (अग्निवेशसंहिता) में विस्तार से दृष्टिगोचर होते हैं। इसी प्रकार अग्निवेश तथा भेडसंहिता में अन्य भी अनेक स्थानों पर कई विषय क्रमशः विस्तार तथा संक्षेप से मिलते हैं।
काश्यप, चरक, भेड तथा सुश्रुत-इस सब संहिताओं में गद्य एवं पद्य दोनों मिलते हैं। टीकाकारों ने क्षारपाणि, जातूकर्ण, पराशर आदि के वाक्यों के भी जहां-जहां उद्धरण दिये हैं वे भी गद्य एवं पद्यमय होने से उनके ग्रन्थ भी गद्य-पद्यमय प्रतीत होते हैं। ज्वरसमुच्चय में केवल एक ज्वर के विषय में काश्यप, आत्रेय, सुश्रुत, हारीत तथा अन्य भी प्राचीन आचार्यों के केवल पद्यमय वाक्य मिलते हैं। इनमें दिये हुए हारीत, क्षारपाणि, जातूकर्ण तथा भेड आदि सतीर्थ्य आचार्यों के वाक्यों को देखने पर प्रतीत होता है कि शब्दों का भेद होने पर भी उनमें एक ही आचार्य का उपदेश समान रूप से झलकता है। भेडसंहिता के समान आत्रेय के अन्य शिष्य जातूकर्ण, हारीत, क्षारपाणि आदियों के भी सम्पूर्ण तन्त्र यदि उपलब्ध हो जायें तथा भेड का भी सम्पूर्ण तन्त्र अखण्डित रूप में मिल जाय तो उन सबकी तुलना करने पर जो अंश एक आचार्य के उपदेशरूप से सब में समान रूप में मिलता हो उतना अंश प्राचीन एवं आत्रेय का समझना चाहिये।
२५० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
तथा इनमें परस्पर जितना भिन्न अंश है वह उनके अपने-अपने विचार एवं दृष्टिकोण को प्रकट करता है। अथवा संस्कार के कारण प्रतीत होता है। उस अवस्था में अग्निवेश के तन्त्र तथा चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत अंश में भेद करने में भी सुविधा हो जायेगी। इस प्रकार ज्वरसमुच्चय में आये हुए कुछ विषयों में परम्पर समानता को देखकर भी यही प्रतीत होता है कि साथ-साथ अध्ययन करने वाले भिन्न-भिन्न शिष्यों के हृदयों में एक ही आत्रेयरूप आचार्य का उपदेश उन्हें प्रेरणा दे रहा है।
चरकसंहिता के विषय में कुछ लोग कहते हैं कि चरक नाम से प्रसिद्ध संहिता चरकाचार्य की अपनी ही कृति (रचना) है। कुछ लोगों का विचार है कि संक्षेप से विद्यमान पूर्वतन्त्र को पूर्णरूप से परिवर्तित एवं परिवर्धित करके चरकाचार्य ने एक नई ही रचना बना दी है तथा कुछ लोगों का यह भी मत है कि आयुर्वेद के ज्ञाता ऋषियों द्वारा परस्पर एकत्रित होकर किये गये संभाषणों एवं संवादों के सारांश को लेकर चरकाचार्य ने उसे चरकसंहिता के रूप में उपस्थित किया (वसुमती वर्ष ९ पृष्ठ ३७८)—इत्यादि अनेक विभिन्न मत दिखाई देते हैं। परन्तु पूर्वोक्त वर्णन के अनुसार मूलभूत आत्रेयसंहिता तथा उसी के आधार पर बनाये हुए अग्निवेश-तन्त्र की पूर्व स्थिति का स्पष्ट ज्ञान होने से, तथा 'अग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते' चरक की इस स्पष्टोक्ति के आधार पर यह कहा जा सकता है कि तन्त्र का रचयिता अग्निवेश ही है तथा चरक ने तो दूसरे तन्त्रों तथा अपने विचार के अनुसार कुछ अन्य उपयोगी विषयों द्वारा उसे बढ़ाकर तथा अन्य भी संस्कारोपयोगी विशेषताओं को उसमें मिलाकर इस अग्निवेशतन्त्र का प्रतिसंस्कार ही किया है। यदि चरक ही स्वयं इस तन्त्र का रचयिता होता तो वह उस रूप में अपने नाम का उल्लेख क्यों न करता। ग्रन्थ में संबोधन आदि के रूप में अग्निवेश का नाम अनेक स्थानों पर मिलता है, परन्तु चरक का नाम 'चरकप्रतिसंस्कृते' इस उल्लेख के अतिरिक्त ग्रन्थ में और कहीं नहीं मिलता है। चरक के उत्तर भाग को पूर्ण करने वाले दृढ़बल ने भी निम्न श्लोक के द्वारा चरक का केवल संस्कर्ता के रूप में तथा द्वादशसाहस्रसंहिता का अग्निवेश की कृति के रूप में स्पष्ट निर्देश किया है—
अतस्तन्त्रोत्तममिदं चरकेणातिबुद्धिना । संस्कृतं तत्तु संसृष्टं विभागेनोपलक्ष्यते ।।
यस्य द्वादशसाहस्री हृदि तिष्ठति संहिता । चिकित्सा वह्निवेशस्य स्वस्थातुरहितं प्रति ।।
यदि चरक ही इस ग्रन्थ का रचयिता होता तो उसके बाद का तथा उसके ग्रन्थ को पूर्ण करने वाला दृढ़बल भी अग्निवेश को ही ग्रन्थकर्ता तथा चरक को संस्कर्ता के रूप में क्यों निर्देश करता। संभवतः सब जगह घूमने फिरने की प्रकृति के कारण अन्वर्थ चरक संज्ञा वाले किसी आचार्य द्वारा इस ग्रन्थ का संस्करण करके उसका प्रचार, प्रवचन, प्रयोगकुशलता तथा लोकोपकार के लिये प्रवृत्त होने के कारण उस संहिता की चरक नाम से प्रसिद्धि हो गई होगी। इसी प्रसिद्धि के कारण चरकाचार्य के विषय में ग्रन्थ का कर्ता होने की भ्रान्ति उत्पन्न हो गई प्रतीत होती है।
इस प्रकार दृढ़बल की संस्करण की पूर्वोक्त परिभाषा के अनुसार स्थान-स्थान पर कुछ पद, वाक्य तथा सन्दर्भ चरकाचार्य की लेखनी से भी अनुप्रविष्ट हो सकते हैं। चरकसंहिता का सामान्यरूप से अनुसन्धान करने पर कुछ इस प्रकार के विषय चरकाचार्य की लेखनी से लिखे गये प्रतीत होते हैं। उदाहरण के लिये चरकसंहिता में निर्दिष्ट वाद-विवाद के विषय में दिखाई देनेवाली अर्वाचीन विकसित अवस्था चरक के समय की प्रतीत होती है जैसा कि पूर्व निर्देश किया जा चुका है।
स्वेदप्रकरण में भेडसंहिता में सङ्करस्वेद, प्रस्तरस्वेद आदि आठ स्वेदों का ही उल्लेख किया गया है। उपलब्ध चरकसंहिता में भेडोल्लिखित आठ भेदों के अतिरिक्त पांच भेद और मिलाकर १३ (तेरह) स्वेदों का निर्देश मिलता है। यदि ये तेरह भेद आत्रेय द्वारा ही उपदिष्ट होते तो आत्रेय की अनुगामी भेडसंहिता में भी ये तेरह भेद ही मिलने चाहिये।
उपपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २५१
काश्यपसंहिता में भी आठ ही भेदों के मिलने से प्रतीत होता है कि प्राचीन समय में आठ विभाग ही थे। प्राचीन आठ विभागों के साथ जोड़े हुए दूसरे भेदों में जेन्ताक तथा होलाक शब्द के सर्वथा भिन्न प्रतीत होने से पूर्वोक्त आठ भेदों के साथ अन्य पांच भेदों को मिलाकर तेरह भेदों का वर्णन करना चरकाचार्य की विकासदृष्टि को प्रकट करता है।
भेडसंहिता में खुड्डीकागर्भावक्रान्ति के विषय में एक ही अध्याय है। उसमें गर्भ को मातृज तथा पितृज न मानने रूप भरद्वाज के मत का खण्डन करके उस मत की स्थापना करते हुए आत्रेय के मत का निर्देश किया है। चरक के खुड्डीकाध्याय में भी वही विषय है। इस प्रकार दोनों में समानता देखकर यह कहा जा सकता है कि अग्निवेश संहिता में आया हुआ यही आत्रेय का मत है। परन्तु चरक में उसके बाद दूसरा महागर्भावक्रान्त्यध्याय है। उसमें गर्भ संबन्धी अन्य विषयों का निरूपण किया गया है। इन विषयों के भेडसंहिता में न मिलने से इसे बाद में चरक के समय का विकास कहा जा सकता है। अथवा यह भी सम्भावना हो सकती है कि खुड्डीका पद के दिये होने से महागर्भावक्रान्ति अध्याय भी पहले से ही अग्निवेश संहिता में हो तथा भेडसंहिता में वह कालक्रम से खण्डित (लुप्त) हो गया हो।
वर्तमान चरकसंहिता के उपक्रम में ऋषियों के समुदाय में इन्द्र द्वारा प्राप्त आयुर्वेद विद्या के भरद्वाज द्वारा प्रकाशन से तथा आत्रेय द्वारा उस विद्या को भरद्वाज से प्राप्त करने का उल्लेख न होने पर भी आत्रेय के शिष्य अग्निवेश आदि द्वारा तन्त्र के निर्माण तथा उन अग्निवेश आदि के तन्त्रों की लोक में प्रसिद्धि का निर्देश अग्निवेश की अपेक्षा अपने संस्करण की उत्कृष्टता दिखाने के लिये चरक द्वारा अधिक उचित प्रतीत होने से, अग्निवेश द्वारा बाद में कहीं भी भारद्वाज से इस विद्या की प्राप्ति का निर्देश न होने से, प्रत्युत भारद्वाज के मत का खण्डन करने से तथा भारद्वाज के विषय में विशेष कुछ भी निर्देश न करने से प्रतीत होता है कि ‘अथातो दीर्घञ्जीवितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः, इति ह स्माह भगवानात्रेयः’ इन दो वाक्यों के बाद सीधा ‘हिताहितं सुखं दुःखम्’ से अग्निवेशतन्त्र का प्रारम्भ हुआ है तथा इनके बीच का अवतरणिकांश सम्भवतः चरकाचार्य ने पूरा किया है। ‘हिताहितम्’ इत्यादि वाक्य में दीखने वाली प्राचीन ग्रन्थ की प्रौढता का इससे पूर्व के वाक्यों में न मिलना भी इसी बात को प्रकट करता है।
वर्तमान चरकसंहिता तथा भेडसंहिता के ‘नवेगान्नधारणीय’ अध्यायों की तुलना में हम देखते हैं कि चरकसंहिता में वेगों के निरोध के औचित्य एवं अनौचित्य सम्बन्धी विषय को ही दिया है। इसके विपरीत भेडसंहिता में अध्याय के आदि तथा अन्त में उस विषय के होने पर भी बीच में दन्ताधावन, धूमवर्ती आदि अन्य विषय दिये हुए हैं। इस प्रकार अग्निवेश संहिता में सन्दर्भशुद्धि तथा भेडसंहिता में लेख, रचना अथवा उपलब्ध ग्रन्थ की विकृति के कारण अशुद्धि प्रतीत होती है।
नावनीतक नामक ग्रन्थ में आत्रेय के नाम से दिये हुए बहुत से योग एवं ओषधियों के चरकसंहिता में मिलने पर भी दो तीन ओषधियों के न मिलने से तथा चक्रपाणि शिवदास आदि द्वारा अग्निवेश के नाम से उद्धृत कुछ श्लोकों का चरकसंहिता में न मिलने से अग्निवेश संहिता में से संस्करण के अवसर पर कुछ अंश निकाल दिया गया प्रतीत होता है।
इसी प्रकार भेडसंहिता तथा अग्निवेशतन्त्र को सामने रखकर प्रत्येक विषय में तुलना करने पर अन्य भी बहुत से स्थलों पर विभेद दृष्टिगोचर होते हैं।
चरकसंहिता में अध्यायों के बीच-बीच में भी स्थान-स्थान पर आये हुए गद्यवाक्यों के संक्षेप एवं विस्तार के लिये कहीं पद्य तथा कहीं गद्य रूप में भी संग्रह एवं विग्रह रूप मिलता है। बीच-बीच में भी ‘भवन्ति चात्र’ ‘अत्र श्लोकाः’ इत्यादि द्वारा कहीं संक्षेप के लिये तथा कहीं उपपादक अर्थ को सूचित करने के लिये पद्य (श्लोक) दिये हैं तथा प्रत्येक अध्याय के अन्त में भी ‘अत्र श्लोकाः’ द्वारा अध्याय के विषयको श्लोकों में दिया हुआ है। संक्षिप्त लेख के ग्रहण
२५२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
सौकर्य (आराम से समझने) के लिये विस्तृत रूप देना तथा विस्तृत लेख के धारणसौकर्य (याद करने) के लिये संक्षिप्त रूप में देने की प्रणाली प्राचीन आचार्यों के लेखों में भी मिलती है। व्याकरण महाभाष्यकार की भी यही शैली है। कुसुमाञ्जलि आदि में कारिकाओं के प्रतिपाद्य विषयों का पूरणिका रूप में गद्यवाक्यों द्वारा विशदीकरण (स्पष्टीकरण) दिया गया है तथा शास्त्रदीपिका भामती आदि में इसके विपरीत विस्तृत भावों को संक्षेप से कारिका रूप में दिया गया है। सुश्रुत तथा काश्यपसंहिता में भी स्थान-स्थान पर संग्रह तथा विग्रह (संक्षेप और विस्तार) से वर्णन मिलता है। इस प्रकार एक ही विषय को संक्षेप एवं विस्तार दोनों प्रकार से निरूपण करना मूल आचार्य के द्वारा भी सम्भव हो सकता है। किसी एक प्रकार से कही हुई पूर्व आचार्य की उक्ति को पीछे संस्कर्ता द्वारा किसी दूसरी प्रकार भी कहा जा सकता है। चरक संहिता के निम्न श्लोक द्वारा यह स्पष्ट कहा गया है कि गहन विषयों का अन्तर्दृष्टि होकर ज्ञान प्राप्त करने के लिये इस प्रकार के संक्षेप एवं विस्ताररूप उक्तिभेद में पुनरुक्ति दोष नहीं होता है—
गद्योक्तो १ यः पुनः श्लोकैरर्थः समनुगीयते। तद्व्यक्तिव्यवसायार्थं द्विरुक्तं तन्न गर्ह्यते ।।
इस प्रकार संक्षेप तथा विस्तार द्वारा की गई रचना “प्रौढिर्व्याससमासौ च” २ के अनुसार पुनरुक्ति दोष नहीं है अपितु गुण है।
इसी प्रकार चरकाचार्य ने अग्निवेश तन्त्र के एक-एक वाक्य को लेकर कहीं उसे पूरा करने के लिये, कहीं संक्षेप एवं विस्तार के लिये तथा कहीं ग्रहण एवं धारण में उपयोगी बनाने के लिये, उसे पूर्ण करने तथा बढ़ाने की दृष्टि से अपने कुछ वाक्य तथा पद आदि सम्मिलित करके मूल आचार्य तथा अपने वाक्यों को तिलतण्डुल रूप में मिलाकर प्रतिसंस्करण किया है। जिस प्रकार भारत ग्रन्थ में अनेक कथानक, वैशम्पायन आदि के प्रश्नोत्तर आदि पूरणिका वाक्य तथा आदि और अन्त में उपक्रम तथा उपसंहार ग्रन्थों को जोड़कर उसे महाभारत का रूप दे दिया गया है इसी प्रकार चरक ने भी ऐसा ही संस्करण करके इसे दूसरे परिमार्जित रूप में उपस्थित कर दिया है। इसलिये मूलग्रन्थ के परवश होने के कारण मूलग्रन्थ में जैसा विषय का पौर्वापर्यक्रम था, प्रतिसंस्कृत ग्रन्थ में भी वैसा हो होने से सुश्रुतसंहिता की अपेक्षा चरकसंहिता में ग्रन्थ का विषय अधिक विशृङ्खलित मिलता है। इस प्रकार चरक ने भी उसे ठीक नहीं किया। यदि वह स्वतन्त्ररूप से चरकसंहिता की रचना करता हो इतना प्रौढ विद्वान् होकर भी क्या इस पौर्वापर्यक्रमरूप सन्दर्भ शुद्धि को ठीक न करता। समास एवं व्यासरूप में पुनरुक्त प्रकीर्ण विषय को संकलित करते हुए भी उसने इस दोष को दूर क्यों नहीं किया। ज्वरसमुच्चय में आश्विन, भारद्वाज आदि के वचनों के मिलने से उनकी संहिताओं से भी विषयों को संग्रह करके इस संस्करण में चरकाचार्य ने संभवतः दिये हों। इस प्रकार बहुत प्रयत्न एवं परिश्रम से प्रतिसंस्कृत करके इस प्राचीन संहिता को चरक ने अनेक विषयों से युक्त कर दिया है। इसीलिये इस संहिता के अन्त में दृढ़बल ने इस संहिता के ज्ञान से ही दूसरे तन्त्रों के ज्ञान तथा इसकी महत्ता का निर्देश करते हुए कहा है कि यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित्'। उपर्युक्त गुणों के कारण तथा अन्वर्थक चरक नाम के अनुरूप सब जगह घूम-घूम कर प्रचार करने के कारण अन्तरङ्ग दृष्टि से ग्रन्थ के आत्रेय तथा अग्निवेश संहिता रूप होने पर भी बहिरङ्ग दृष्टि से वर्तमान संहिता की चरक संहिता नाम से ही प्रसिद्धि है।
भेडसंहिता में भी उतने ही अध्यायों के होने से तथा इस ग्रन्थ (चरकसंहिता) में भी एक सौ बीस ३ अध्याय तथा आठ स्थानों का आत्रेय तथा अग्निवेश द्वारा उपदेश किया होने से प्रतीत होता है कि इस सम्पूर्ण ग्रन्थ के अपस्मार प्रकरण से अगले भाग के कालवशात् लुप्त हो जाने से तथा चरक के समय भी उसका संस्करण न होने से पीछे आत्रेय द्वारा उपदिष्ट हारीत आदि के ग्रन्थों से विषयों को लेकर संभवतः दृढ़बल ने इसकी पूर्ति की है। पीछे से पूरा किये हुए उतने अंश में विभिन्न पद्यप्रायः लेख का होना भी इसी का समर्थन करता है।
१. १-२ की टि. उपो. संस्कृत पृ. ७७-७८ देखें।
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद
२५३
अग्निवेश के नाम से चक्रपाणि तथा शिवदास आदि द्वारा उद्धृत वचनों के मिलने से प्रतीत होता है कि संभवतः उस समय तक अग्निवेशतन्त्र उपलब्ध था। परन्तु उस अवस्था में दृढबल के समय भी अग्निवेशतन्त्र से ही शेष भाग की पूर्ति न करके 'शिलोञ्छवृत्ति¹ द्वारा अन्य तन्त्रों से विषयों को एकत्रित करके दृढबल द्वारा चिकित्सास्थान के अन्तिम १७ अध्याय तथा सिद्धि और कल्पस्थान की पूर्ति करने में क्या हेतु है ? अग्निवेशतन्त्र से पूर्ति न करके अन्य तन्त्रों से पूर्ति करने का उल्लेख दृढबल ने स्वयं किया है। लगभग एक हजार वर्ष पूर्व लिखित एवं उससे प्राचीन ज्वरसमुच्चय में चरक के वचनों के मिलने तथा अग्निवेश के वचनों के न मिलने से, वाग्भट आदि द्वारा भी चरक का ही उल्लेख होने से तथा खलीफा हारूंरशीद के समय भी इसी चरकसंहिता का ही अनुवाद होने से प्रतीत होता है कि वाग्भट तथा दृढबल आदि के समय से पूर्व ही अग्निवेश का तन्त्र विलुप्त हो चुका था। चक्रपाणि तथा शिवदास आदि के समय तक यदि अग्निवेशतन्त्र मिलता होता तो भिन्न-भिन्न विषयों में अग्निवेश तथा चरक की समानताओं तथा विषमताओं का अनेक स्थानों पर वर्णन होना चाहिये था। परन्तु इसके विपरीत यहां अग्निवेश के कुछ ही वचनों के उद्धरण दिये होने से प्रतीत होता है कि ये उद्धरण प्राचीन निबन्ध एवं टीकाओं से दिये गये हैं।
सुश्रुतसंहिता के संस्करण के विषय में ग्रन्थ में कहीं भी स्पष्टरूप से उल्लेख नहीं है। केवल 'प्रतिसंस्कर्ताऽपीह नागार्जुनः' डल्हण के इस निर्देश के अनुसार ही कुछ लोग नागार्जुन को इसका प्रतिसंस्कर्ता मानते हैं। नागार्जुन को भी प्रतिसंस्कर्ता मानने पर सुश्रुत उससे प्राचीन सिद्ध होता है। परन्तु नागार्जुन के वर्तमान सुश्रुतसंहिता का प्रतिसंस्कर्ता होने में कोई प्रबल प्रमाण नहीं मिलता है। यदि वह प्रतिसंस्कर्ता होता तो चरक के 'अग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते' उल्लेख की तरह वह भी अपना प्रतिसंस्कर्ता के रूप में उल्लेख क्यों न करता ? आर्य नागार्जुन तथा दूसरे किसी नागार्जुन के विषय में भी अन्य ग्रन्थों में शल्यतन्त्र के विषय में कहीं उल्लेख नहीं मिलता। आर्य नागार्जुन के उपायहृदय में सुश्रुत का नाम दिया होने पर भी पूर्वनिर्दिष्ट भैषज्यविद्या के प्रकरण में शल्यतन्त्र का पृथक् निर्देश नहीं मिलता है। तथा यह भी विचारणीय है कि शान्तिप्रधान बौद्धमार्गानुयायी तथा बोधिसत्व विद्वान् होने के कारण शस्त्रसाध्य शल्य चिकित्सा में उसकी रुचि (प्रवृत्ति) किस प्रकार हो सकती थी। आर्य नागार्जुन या तान्त्रिक नागार्जुन द्वारा यदि इसका संस्करण किया जाता तो उसमें स्वाभाविकरूप से बौद्धमत की छाया अवश्य होती। इस ग्रन्थ में कहीं नाम मात्र को भी बौद्ध छाया नहीं मिलती है अपितु निम्न श्लोक के द्वारा स्थान-स्थान पर राम तथा कृष्ण की महिमा, वैदिक मन्त्रों के प्रयोग तथा सांख्य दर्शन के अनुसार अध्यात्म का विषय दिया हुआ है—
महेन्द्ररामकृष्णानां ब्राह्मणानां गवांमपि । तपसा तेजसा वाऽपि प्रशाम्यध्वं शिवाय वै ।।
इस प्रकार नागार्जुन को सुश्रुत का प्रतिसंस्कर्ता सिद्ध करने के लिये अन्य बलवान् प्रमाणों की अपेक्षा है। बहुत से प्राच्य एवं पाश्चात्य विद्वानों की सम्मति है कि वर्तमान समय में सुश्रुत का पुनः संस्करण ही मिलता है। कहीं-कहीं अर्वाचीन विषयों के मिलने से मेरी भी यही राय है कि इसका संस्करण हुआ है। परन्तु इस संस्करण में चरकसंहिता की तरह पुनरुक्तियां नहीं मिलती हैं। इसमें संस्कर्ता तथा उत्तर भाग के लेखक का यद्यपि स्पष्ट उल्लेख नहीं है, परन्तु मेरे पास ६३३ नेवार (नेपाली) संवत् में लिखित ताडपत्रीय सुश्रुत है उसकी पुष्पिका (समाप्ति भाग) में पूर्वभाग में 'सुश्रुते शल्यतन्त्रे' ऐसा उल्लेख है तथा उत्तरतन्त्र के अन्त में 'इति सौश्रुते महोत्तरतन्त्रे चतुःषष्टितमोऽध्यायः, अतो निघण्टुर्भाविष्यति इति' तथा उस निघण्ट भाग के समाप्त होने पर—सौश्रुत्यां संहितायां महोत्तरायां निघण्टुः समाप्तः' उल्लेख मिलता है। यद्यपि 'इदम्' अर्थ प्रत्ययान्त सौश्रुत शब्द से सुश्रुत के ग्रन्थ का भी ग्रहण को सकता
१. जिस प्रकार पक्षी जाति भिन्न-भिन्न स्थानों से छोटे कणों को बीन-बीन कर संग्रह करते हैं उसी प्रकार भिन्न-भिन्न ग्रन्थों से जब थोड़ा-थोड़ा अंश संग्रह करके किसी विषय को पूरा किया जाय तब यह शब्द व्यवहृत होता है। (अनुवादक)
२५४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
है तथापि पूर्व तथा अपर ग्रन्थ के भाग में लेख की एक ही शैली के औचित्य को दृष्टि में रखते हुए पूर्वभाग में सुश्रुत शब्द तथा उत्तर भाग में भिन्न ही सौश्रुत शब्द से निर्देश होने के कारण पूर्व भाग सुश्रुत-लिखित है तथा उत्तर भाग उसी के वंश वाले किसी अन्य (सौश्रुत) व्यक्ति द्वारा लिखित प्रतीत होता है। निघण्टु भाग के उपक्रम में दिवोदास के उपदेश का उल्लेख होने पर भी मूल आचार्य के एक होने से यह ग्रन्थ भी मूल ग्रन्थ ही है, इसको सिद्ध करने के लिये संभवतः दिवोदास का निर्देश किया हो तथा निघण्टु भाग में आये हुए लेख में कुछ विकसित अवस्था होने से तथा उत्तर भाग के शब्दों के विशेष रूप से मिलने से यह निघण्टु भाग भी संभवतः सौश्रुत का है। अपूर्ण अंश को पूर्ण करने की दृष्टि से इसमें उत्तरतन्त्र सम्मिलित करने वाले सौश्रुताचार्य ने पूर्वभाग में भी संभवतः कुछ संस्करण किया हो। महाभाष्यकार द्वारा सौश्रुतशब्द से युक्त उदाहरण के देने से सौश्रुतों की भी पहले से प्रसिद्धि का बोध होता है। सुश्रुत के वंश वाले शल्यविद्या के पण्डित सौश्रुतों का राजाओं के साथ सम्बन्ध होने के कारण ही अत्यन्त प्राचीन काल से 'सौश्रुतपार्थिवाः' उदाहरण प्रसिद्ध है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि सुश्रुत के वंश वाले या उसके किसी शिष्य (सौश्रुताचार्य) ने पूर्वभाग का संस्करण करके उत्तरतन्त्र और निघण्टु भाग उसमें पीछे से सम्मिलित कर दिया है।
पूर्व आचार्य की संहिता के उपलब्ध होने पर भी अन्य आचार्यों के ग्रन्थों में मिलने वाली विशेषताओं को लेकर पूर्व संहिता की कमियों को दूर करके उसे सर्वाङ्ग पूर्ण बनाने की दृष्टि से पीछे से पूर्ववर्ती दिवोदास की संहिता को लेकर उसमें अन्य ग्रन्थों के विषयों की संस्कर्ता ने उत्तरतन्त्र के रूप में सम्मिलित किया प्रतीत होता है। स्वयं ग्रन्थ कर्ता की उक्ति से स्पष्ट है कि उत्तरतन्त्र का विषय विदेहाधिप आदि के शालाक्यतन्त्र से संबन्धित है। सुश्रुतसंहिता के उत्तरभाग में कौमारभृत्य के प्रकरण में अन्य आचार्यों का निर्देश करते हुए मूल में यद्यपि 'कुमाराबाधहेतुभिः' द्वारा सामान्य उल्लेख होने पर भी टीकाकारों द्वारा पार्वतक बन्धक जीव आदि का निर्देश किया जाने से तथा जीवक के इस कौमारभृत्य विषयक ग्रन्थ के मिल जाने से संभवतः उस प्रकरण में काश्यप तथा जीवक के विषयों को भी उत्तरतन्त्र में सम्मिलित कर दिया गया है।
सुश्रुत के उत्तरतन्त्र में रसभेद विषयक ६४ अध्याय तथा दोषभेदविषयक अन्तिम (६६) अध्याय के बीच में ६५ वां तन्त्रयुक्तियों का अध्याय है। कौटिलीय अर्थशास्त्र में तन्त्रयुक्तियों का अन्तिम अध्याय है। इनकी तुलना करने पर हम देखते हैं कि दोनों में अधिकरण से प्रारंभ करके ऊह्य पर्यन्त ३२ युक्तियां दी हुई है। तथा बीच में भी उद्देश, निर्देश, उपदेश, अपदेश, प्रदेश, अतिदेश आदि तथा अन्य ग्रन्थों में न आये हुए भेदों तथा अन्य भी पदार्थों में (अपने-अपने वैद्यक तथा नैतिक विषयों को छोड़कर) परस्पर समानता को देखकर एक की दूसरे पर छाया प्रतीत होती है। इनमें किसकी किस पर छाया है इस विषय में परस्पर विचार करने पर हम देखते हैं कि कौटिलीय अर्थशास्त्र में औपनिषदाधिकरण की समाप्ति पर ग्रन्थ के अन्त में तन्त्रयुक्तियां दी हुई हैं। इसी प्रकार सुश्रुत के उत्तरतन्त्र में भी साथ-साथ दिये जाने योग्य रसभेद तथा दोषभेद प्रकरण के बीच में तन्त्रयुक्तियों के अध्याय के दिये होने से पूर्वापर सङ्गति को देखकर यह कहा जा सकता है कि यह किसी दूसरे ग्रन्थ को देखकर किया गया है अथवा संस्करण के समय भी यह अनुप्रवेश संभव है। चरक संहिता में भी ग्रन्थ के अन्त में ही तन्त्रयुक्तियों का विषय दिया हुआ है, जो कि दृढ़बल द्वारा पूरित भाग में है। बाद में मिलाये हुए उत्तरतन्त्र में भी पूर्वभाग की तरह इसकी प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिये धन्वन्तरि की उक्तिरूप 'यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः' वाक्य लेखक ने संभवतः स्वयं जोड़ दिया है। इस प्रकार सुश्रुत संहिता में पीछे सम्मिलित किये हुए विषयों को मूलग्रन्थ के आगे उत्तरतन्तरूप में पृथक् जोड़ दिया गया है। चरक के समान मूल ग्रन्थ के साथ ही विषय को मिलाकर परस्पर एकाकार नहीं कर दिया गया है। इससे संहिता में संग्रह किये हुए नवीन तथा प्राचीन विषयों में परस्पर सुगमता से भेद किया जा सकता है। मुद्रित सुश्रुतसंहिता में प्रथम अध्याय के अन्त में 'सविंशमध्यायशतं पञ्चसु स्थानेषु संविभज्य उत्तरे तन्त्रे शेषानर्थान् व्याख्यास्यामः' इस पाठ के मिलने से
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद
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पूर्वसंहिता के समय उत्तरतन्त्र की भी उपस्थिति प्रतीत होने से दोनों भाग एक ही समय के होने चाहिये। परन्तु मेरे संग्रहालय में विद्यमान प्राचीनताडपत्र पर लिखे हुए सुश्रुत में स्थान-स्थान पर बहुत से पाठभेद मिलते हैं। यहां भी '..... संविभज्य उत्तरे व्याख्यास्याः' यह पाठ मिलता है। इस पाठ के अनुसार १२० अध्यायों को पांच स्थानों में विभक्त करके फिर आगे व्याख्या करेंगे, इतना ही ग्रन्थ का आशय है। इससे उत्तरतन्त्र का निर्देश नहीं मिलता है। तृतीय अध्याय के प्रारंभ में अध्यायों की गणना करते हुए मुद्रित पुस्तक में दिया हुआ 'तदुत्तरं षट्षष्टिः' यह पाठ भी ताडपुस्तक में नहीं मिलता है। किन्तु उत्तरतन्त्र के अध्यायों के विषयों को सूचित करने वाले 'अतः परं स्वनाम्नैव तन्त्रमुत्तरमुच्यते' से प्रारंभ करके 'विधिनाऽधीत्य युञ्जाना भवन्ति प्राणदा भुवि' इत्यादि श्लोक तो ताडपुस्तक में भी मिलते हैं। पीछे उत्तरतन्त्र के जोड़ने के बाद उसके विषयों की सूची वाले ये श्लोक भी संभवतः पीछे से अनुप्रविष्ट हो गये हों।
वृद्धजीवकीय तन्त्र के विषय में तो यह कहा जा सकता है कि प्राचीन काश्यप संहिता के बहुत विस्तृत होने से वृद्धजीवक द्वारा उसको संक्षिप्त करके तन्त्र बनाने का उल्लेख संहिता के कल्पाध्याय में मिलता है इसलिये जिस रूप में काश्यपसंहिता थी उसी रूप में वृद्धजीवकीय तन्त्र नहीं है अपितु अन्य संक्षिप्त रचना के कारण स्पष्टरूप से उसका रूपान्तर हो चुका है। परन्तु वृद्धजीवक ने भी संक्षेप करते हुए मूलसंहिता की उपेक्षा करके स्वतन्त्र रचना नहीं की हैं अपितु उसीके उपदेशरूप वाक्यों तथा विषयों को ही लेकर विस्तृत अंशों को छोड़कर उसी का केवल संक्षिप्तंरूप कर दिया है जैसा कि उसके लेख से प्रतीत होता है।
काश्यपसंहिता के पूर्वभाग तथा खिलभाग में भी आदि से अन्त तक प्रत्येक अध्याय में इत्याह भगवान् कश्यपः' 'इति ह स्माह भगवान् कश्यपः' इत्यादि वाक्यों के समान रूप से मिलने पर भी ग्रन्थ के अन्दर आये हुए सब विषय कश्यप के ही हों, ऐसी बात नहीं है अपितु सिद्धान्त तथा उपदेश वाक्य ही केवल कश्यप के है तथा बीच में उस विषय के लिये दिये हुए पूरणिका रूप से उपक्रम तथा उपसंहार वाक्य पीछे से वृद्धजीवक द्वारा तन्त्र बनाते समय भी संभवतः दे दिये गये हों। सब अध्यायों के आदि तथा अन्त में 'इत्याह कश्यपः' यह पद तो जीवक ने संभवतः इसलिए दे दिया है कि लोग इस सारे विषय को उसकी कपोलकल्पना न समझकर काश्यपसंहिता के साररूप में ही जानकर इसे प्रामाणिक मानें। काश्यपसंहिता के पूर्वभाग में 'साहसादतिबालस्य सर्वं नेच्छन्ति कश्यपः' 'मज्जवस्योस्तु मण्डं सर्वेषां कश्यपः पूर्वम्' 'अथ कश्यपोऽब्रवीत् सर्वमप्येतदसम्ब्यक्, इत्यादि स्थलों में तथा खिलभाग में भी 'पाययेदिति कश्यपः' 'यथास्वमिति कश्यपः' 'पेय इति ह स्माह कश्यपः' इत्यादि स्थलों में पुनः कश्यप शब्द का उल्लेख होने से प्रतीत होता है कि जीवक द्वारा कश्यप के सिद्धान्तों का अर्थानुवाद किया गया है अथवा वृद्धजीवक के उपदेशक मारीच कश्यप ने भी प्राचीन कश्यपपरम्परा को सूचित करने के लिये स्थान-स्थान पर 'इति कश्यपः' पद दिया है। अस्तु, 'प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति' के अनुसार इसमें आई हुई सब सिद्धान्त आदि उक्तियां कश्यप की ही प्रतीत होती हैं। मनुस्मृति आदि प्राचीन ग्रन्थों में शिष्य भृगु ने मनु के तथा सामश्रव आदि ने याज्ञवल्क्य के उपदेशों को शब्दरूप तथा भावरूप में ग्रहण करके तथा उसे पूर्ण करके बनाई हुई संहिताओं के मनुसंहिता तथा याज्ञवल्क्यसंहिता आदि नाम रखे हैं। यहां भी इसी प्राचीन आर्ष शैली का अनुसरण किया गया प्रतीत होता है। पूर्वसम्प्रदायों का उल्लेख करते हुए कश्यप के समान उसके पुत्र काश्यपों का निर्देश होने पर भी प्रत्येक अध्याय के उपक्रम तथा उपसंहार में 'इति ह स्माह कश्यपः' तथा ग्रन्थ के मध्य में भी स्थान-स्थान पर 'कश्यपोऽब्रवीत्' 'इति कश्यपः' आदि द्वारा कश्यप शब्द से ही आचार्य का उल्लेख किया है।
इस संहिता में दो भाग हैं। कल्पस्थान तक पूर्वभाग तथा उसके बाद खिलभाग। दोनों ही भागों में प्रत्येक अध्याय के उपक्रम तथा उपसंहार में कश्यप के उपदेश रूप में 'इत्याह कश्यपः' पद मिलता है। ज्वरसमुच्चय में कश्यप नाम से दिये हुए वचन इस संहिता के पूर्वभाग तथा उत्तर भाग दोनों में मिलते हैं। पूर्वभाग में सर्वत्र कश्यप के शिष्य रूप