भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 510
१५२काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्बालग्रहचिकित्सिताध्यायः ? ]

अक्षिरोगचिकित्साभिः शमयेदन्धपूतनाम् ।।
शीतङ्कारचिकित्साभिः शमयेच्छीतपूतनाम् ।

अक्षिरोग की चिकित्सा से अन्धपूतना की शान्ति करे तथा शीतकारक चिकित्सा द्वारा शीतपूतना की चिकित्सा करे ।

पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरैः ।।
पचेद् घृतं पञ्चमूल्या सैन्धवेन च पण्डितः । दीपनीयमिति प्रोक्तं सर्पिरेतन्महात्मना ।।
सक्षौद्रशर्करं लेह्यं शमयेच्छीतपूतनाम् ।

शीतपूतना की चिकित्सा—पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक, सोंठ, लघु पञ्चमूल तथा सैन्धव से साधित घृत दीपनीय कहा गया है । मधु तथा शर्करा के साथ इस घृत का सेवन करने से शीतपूतना का शमन होता है ।।

रास्ना पुनर्नवा कुष्ठं तगरं देवदारु च ।।
पत्रागुरुहरेण्वश्व गुडूची त्रिफला सिता । दशमूलं च तैः सर्पिः पचेत् क्षीरे चतुर्गुणे ।।
विशुद्धं लेहयेद्बालं शाम्यते कटपूतना ।

रास्ना, पुनर्नवा, कुष्ठ, तगर, देवदारु, तेजपत्र, अगर, हरेणु, गिलोय, त्रिफला, खांड तथा दशमूल इनको चतुर्गुण क्षीर (दूध) में पकाकर घृत सिद्ध करें। बालक को इसका सेवन कराने से कटपूतना (शीतपूतना) शान्त हो जाती है । सुश्रुत उ. अ. ३४ में इसकी निम्न चिकित्सा दी है— कपित्थं सुवहां बिम्बीं तथा बिल्वं प्रचीबलम् । नन्दीं भल्लातकं चापि परिषेके प्रयोजयेत् ।। बस्तमूत्रं गवां मूत्रं मुस्तं च सुरदारु च । कुष्ठं च सर्वगन्धांश्च तैलार्थमवचारयेत् ।। रोहिणीसर्जखदिरपलाशककुभत्वचः । निष्क्वाथ्य तस्मिन्निष्क्वाथे सक्षीरं विपचेद् घृतम् ।। गृध्रोलूकपुरीषाणि बस्तगन्धामहेस्त्वचः । निम्बपत्राणि मधुकं धूपनार्थं प्रयोजयेत् ।। धारयेदपि लम्बां च गुञ्जां काकादनीं तथा । नद्यां मुद्गकृतैश्चान्नैरस्तर्पयेच्छीतपूतनाम् ।। देव्यैदेयश्चोपहारो वारुणीं रुधिरं तथा । जलाशयान्ते बालस्य स्नपनं चोपदिष्यते ।। मुद्गौदनाशना देवी सुराशोणितपायिनी । जलाशयालया देवी पातु त्वां शीतपूतना ।।

बिल्वाङ्कोठौ कपित्थाकौ कार्पासिमटरूषकम् ।।
उरूवकस्य पत्राणि वंशस्याश्मन्तकस्य च । प्रपौण्डरीकं मधुकं शतपुष्पा पुनर्नवा ।।
एतैस्तैलं घृतं वाऽथ पयसा योजितं पचेत् । एतेन गात्रमभ्यज्य सक्षारं पाययेदिदम् ।।
मृद्वीकां च पयस्यां च श्रीपर्णीं सारिवा तथा । मधूकं नागपुष्पं च शीतपाकीयुतं पिबेत् ।।
शर्करामधुसंयुक्तं तदा संपद्यते सुखी ।।
अथास्य धूपनं दद्यात् सायं प्रातरतन्द्रितः । गोलोर्म, सर्पनिर्मोकं वचां सिद्धार्थकांस्तथा ।।
संसृज्य सर्पिषा तेन धूपयेत् सन्ध्ययोर्भिषक् । इत्यन्धपूतनायास्तु बिल्वाङ्कोठादि भेषजम् ।।

अन्धपूतना की चिकित्सा—बिल्व, अङ्कोठ, कैथ, आक, कपास, बांसा, उरूवुक (रक्त एरण्ड), बांस तथा अश्मन्तक के पत्र, पुण्डरीक (कमल), मुलहठी, सौंफ, पुनर्नवा इनको दूध के साथ मिलाकर तैल अथवा घृत में पकाये। इसके द्वारा शरीर का अभ्यङ्ग (मालिश) करके क्षार मिलाकर इसी को पिलादे। मुनक्का, पयस्या (क्षीरकाकोली या जीवन्ती), श्री पर्णी, सारिवा (अनन्तमूल), महुआ, नागपुष्प (नागकेसर), शीतपाकी (गुञ्जा) तथा शर्करा और मधु मिलाकर सेवन करने से व्यक्ति सुखी होती है। इसके बाद उसे सायं-प्रातः श्वेत दूर्वा, सांप की केंचुली, वचा तथा श्वेत सरसों को घृत में मिलाकर धूप देवे। इस प्रकार अन्धपूतना की यह बिल्व अङ्कोठ आदि ओषधियां हैं। सुश्रुत उ. अ. ३३ में इसकी निम्न चिकित्सा दी है— तिक्तकद्रुमपत्राणां कार्यः क्वाथोऽवसेचने । सुरा सौवीरकं कुष्ठं हरितालं मनःशिला ।। तथा

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