काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबालग्रहचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १५३
सर्जरसश्चैव तैलार्थमुपदिश्यते । पिप्पल्यः पिप्पलीमूलं वर्गो मधुरको मधु ।। शालपर्णी बृहत्यौ च घृतार्थमुपदिश्यते । सर्वगन्धैः प्रदेहश्च गात्रेष्वक्ष्णोश्च शीतलैः ।। पुरीषं कौक्कुटं केशांश्चर्म सर्पत्वचं तथा । जीर्णां च भिक्षुसंघाटीं धूमनायोपकल्पयेत् ।। कुक्कुटीं मर्कटीं शिम्बीमनन्तां चापि धारयेत् ।। मांसमामं तथा पक्वं शोणितं च चतुष्पथे ।। निवेद्यमन्तश्च गृहे शिशो रक्षानिमित्ततः । शिशोश्च स्नपनं कुर्यात् सर्वगन्धोदकैः शुभैः ।। कराला पिङ्गला मुण्डा कषायाम्बरवासिनी । देवी बालमिमं प्रीता संरक्षत्वन्धपूतना ।।
जातमात्रं पुरा स्कन्दमुमाशङ्करसन्निधौ । गन्धालङ्कारपुष्पाद्यैर्मण्डयामास षण्मुखम् ।। इषुकं चित्रकं चास्य ललाटचक्षुषि (व्यधात्) । नासिकागण्डचिबुकवक्रे चित्रविशेषकान् ।। गन्धर्वाप्सरसश्चैनं रमयन्ति गणास्तथा । ततोऽब्रवीद्बालभावान्मातरं भगवान् गुहः ।। एतमेव महादेवजटाभारं विभूषणम् । देहीति न च लेभे तं पुनः पुनरपि ध्रुवम् ।। गुहस्त्वलभमानस्तं रुषितो ललितः सदा । अपविद्ध्य क्षितौ सर्वं निर्मृज्य मुखमण्डलम् ।। ततः क्षुभ्यास्त्रयो लोका नष्टज्ञाना विचेतसः । दम्पती चापि संविग्नौ ददतुश्चामृतोद्भवम् ।। ततः प्रभृति सप्तानां चन्द्रः शिरसि दृश्यते । रुद्रस्कन्दादिनन्दीनां रेवत्याश्च महात्मनः ।। अपविद्धं तु यत् क्रोधात् स्कन्देन मुखमण्डलम् । ततो ग्रहः सा बभूव दारुणा मुखमण्डिका ।। निर्दहिष्यन्निव क्रोधात्ततस्तामब्रवीद्गुहः । अन्नं कुरु महाभागे सङ्कीर्णाकारककर्मणाम् ।। तथाऽस्त्विति च सा प्राह स्कन्दस्य परिचारिका । एवं मुखाचि (का) जज्ञे शृणु तस्याश्चिकित्सितम् ।।
पहले किसी समय उत्पन्न हुए छै मुखों वाले स्कन्द को पार्वती तथा महादेव के समीप गन्धवाली वस्तुओं, अलंकार, (आभूषण) तथा पुष्प आदि के द्वारा अलंकृत किया (सजाया गया) था। उसके ललाट तथा चक्षुओं पर बाण का निशान तथा अन्य चित्र आदि बनाये गये। इसी प्रकार नासिका, गाल, ठोडी तथा मुख पर भी विशेष प्रकार के चिह्न बना दिये गये। तथा गन्धर्व, अप्सरायें एवं गण लोग इसके साथ क्रीडा करने लगे। उस समय भगवान् गुह बालभाव (बालस्वभाव) से माता से कहने लगे कि—महादेव जी की जटाओं में यह जो आभूषण (चन्द्रमारूपी आभूषण) है वह मुझे दे दो। परन्तु बार २ मांगने पर भी जब कुमार कार्तिकेय को वह नहीं मिला तब सदा प्रसन्न रहने वाले कार्तिकेय ने क्रुद्ध होकर उस अलंकृत किये हुए मुखमण्डल को विकृत एवं मलिन करके भूमि पर फेंक दिया। इससे तीनों लोकों में विक्षोभ उत्पन्न हो गया। उनका ज्ञान नष्ट हो गया तथा चित्त विभ्रम हो गया। इससे पार्वती तथा महादेवजी भी उदास हो गये तथा उन्होंने उसे अमृत से उत्पन्न हुआ चन्द्रमा दे दिया। तब से लेकर रुद्र (महादेव), स्कन्द (कुमार कार्तिकेय), नन्दी तथा रेवती आदि ७ के सिर पर चन्द्रमा दीखता है। क्रुद्ध होकर कार्तिकेय ने जिस मुखमण्डल को विकृत कर दिया था वह मुखमण्डिका नाम का दारुण (भयंकर) ग्रह बन गया। तब क्रोध से मानो जलाते हुए गुह (कुमार कार्तिकेय) ने उससे कहा कि हे महाभागे (महान् ऐश्वर्य वाली) तू उन लोगों को अपना अन्न (भोजन) बना जिनके आकार एवं कर्म (बलि-हवन आदि) संकीर्ण हैं। तब स्कन्द की उस परिचारिका अर्थात् मुखमण्डिका ने कहा—ऐसा ही होगा। इस प्रकार मुखार्चिका (मुखमण्डिका) उत्पन्न हुई ।।
कपित्थबिल्वतर्कारीबिम्बीगन्धर्वहस्तकाः । तैलमेतैस्तु संयुक्तं हितमभ्यञ्जनं शिशोः ।।
अब इसकी चिकित्सा सुन—कपित्थ (कैथ), बिल्व, तर्कारी (अग्निमन्थ-अरणिका), बिम्बी (कनूरी) तथा गन्धर्वहस्तक (एरण्ड) इनसे सिद्ध किये हुए तैल का शिशु की आंखों में अञ्जन करना चाहिये।