काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१५४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् बालग्रहचिकित्सिताध्यायः ? ]
खुड्डार्कं पञ्चमूलं च श्योनाकोऽथ मधूलिका।
मधूकानि त्वचः क्षीरी पिप्पल्यास्तैर्घृतं पचेत्।।
गव्यं क्षीरं गवां पक्वं शर्करामधुसंयुक्तम्। पिबेत् कोलमितं बालस्ततः संपद्यते सुखी।।
स्वल्प पञ्चमूल, श्योनाक (अरलु), मधूलिका (मर्कटहस्ततृण-गुडतृण), महुआ, क्षीरी वृक्षों (दूध वाले वृक्षों) की त्वचा तथा पिप्पली इनसे गौ का घृत सिद्ध करे। इसमें गौ का दूध डालकर पाक करे तथा शर्करा एवं मधु मिलाकर बालक को एक कोल (६ माशा) मात्रा में देने से वह सुखी (स्वस्थ) हो जाता है।।
कुष्ठं सर्जरसं चैव यवाः सर्पिंश्च धूपनम्। सर्पवीरल्लचाषाणां जिह्वानां धारणं मणेः।।
जीर्णे भोजनमप्यस्य ततः शस्तं प्रदापयेत्।
कुष्ठ (कूठ), राल, जौ तथा घृत का धूपन देना चाहिये। सर्प, वीरल्ल (सुश्रुत में वीरल्ल के स्थान पर ‘चिरल्लिल’ दिया है जो कि चिल्ल के लिये आया है) तथा चाष (कर्णायस) की जिह्वा और मणियों का धारण करना चाहिये। तथा पहले भोजन के जीर्ण हो जाने पर उसे दूसरा भोजन देना चाहिये। सुश्रुत उ. अ. ३५ में इसकी निम्न चिकित्सा दी है—
कपित्यबिल्वतर्कारीवांशीगन्धर्वहस्तकाः। कुबेराक्षी च योज्याः स्युर्बालानां परिषेचने।। स्वरसैर्भृङ्गवृक्षाणां तथाऽजहरिगन्धयोः। तैलं वसां च संयोज्य पचेदभ्यञ्जने शिशोः।। मधूलिकायां पयसि तुगाक्षीर्यो गणे तथा। मधुरे पञ्चमूले च कनीयसि घृतं पचेत्।। वचा सर्जरसः कुष्ठ सर्पिंश्चोद्धूपनं हितम्। धारयेदपि जिह्वाश्च चाषचीरल्लिसर्पजाः।। वर्णकं चूर्णकं माल्यमञ्जनं पारदं तथा। मनःशिला चोपहरेद् गोष्ठमध्येबलिं तथा।। पायसं सपुरोडाशं बल्यर्थमुपसंहरेत्। मन्त्रपूताभिरद्भिश्श्च तत्रैव स्नपनं हितम्।। अलङ्कृता रूपवती सुभगा कामरूपिणी। गोष्ठमध्यालयरता पातु त्वां मुखमण्डिका।।
अतश्चोध्वं प्रवक्ष्यामि शीतपूतनयाऽर्दिते।।
नादेयी सुरसा बिम्बी कपित्थं जीवकस्तथा।
नदीभल्लातकं श्यामा बिल्वं शीतशिवं तथा।।
एतं (भिः) कषायं निष्क्वाथ्य परिषिञ्चेत् सुखाम्बुना।
एतेन परिषिक्तस्य तैलमभ्यञ्जनं शृणु।।
गोमूत्रं बस्तमूत्रं च मुस्तकं देवदारु च। कुष्ठं च सर्वगन्धाश्च तैलमभ्यञ्जनं पचेत्।।
अब मैं शीतपूतना से पीडित बालक की चिकित्सा कहूंगा—नादेयी (नागरमोथा), सुरसा (तुलसी), बिम्बी (कन्दूरी), कैथ, जीवक, नदी भल्लातक (नदीपिप्पली—गण्डोपली), त्रिवृत्, बिल्व तथा शीतशिव (सैन्धव या शैलेयपुष्प) इनका क्वाथ बनाकर इसके कवोष्ण (ईषदूष्ण) जल से परिषेचन करना चाहिए। इस क्वाथ से परिषेचन करने के बाद निम्न तैल का अभ्यञ्जन करना चाहिये। गोमूत्र, बकरे का मूत्र, नागरमोथा, देवदारु, कुष्ठ तथा छोटी इलायची आदि सर्वगन्ध की ओषधियों से अभ्यञ्जन के लिये तैल पाक करे।
**वक्तव्य—**सर्वगन्ध—सुश्रुत सू. अ. ४६ में कहा है—चातुर्जातककर्पूरं कक्कोलागुरुकुङ्कुमम्। लवङ्गसहितञ्चैव सर्वगन्धं विनिर्दिशेत्।।
खदिरं रोहिणीसारं पलाशं ककुभत्वचम्। एतं संभृत्य संभारं क्षीरे सर्पिर्विपाचयेत्।।
तत् सिद्धं लेहयेत् काले शर्कराक्षौद्रमात्रया। शीतपूतनया ग्रस्तो मुच्यते पथ्यभोजनः।।
खदिर, कट्फल का सार, पलाश (ढाक) तथा अर्जुन की छाल इनका क्वाथ बनाकर तीन भाग में एक भाग दूध डालकर घृतपाक करे। इस से सिद्ध हुए घृत में शर्करा तथा मधु मिलाकर उचित काल में सेवन करने से तथा पथ्य का सेवन करने से बालक शीतपूतना ग्रह से मुक्त हो जाता है।।