भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 513

pliihahalīmakacikitsitādhyāyaḥ

प्लीहहलीमकचिकित्सिताध्यायः ? ]चिकित्सास्थानम्१५५

गृध्रोलूकतरक्षूणां पुरीषाणि समानयेत् । अग्निको बस्तलोमानि पिचुमन्दश्च धूपनम् ।।
शीतपूतनया ग्रस्ते तच्चेदं च चिकित्सितम् ।

गृध्र (गीध), उल्लू तथा तेंदूबाघ की पुरीष (मल), चित्रक, बकरे के बाल तथा पिचुमन्द (नीम) की धूप देनी चाहिये। इस प्रकार शीतपूतना ग्रह से आक्रान्त बालक की पूर्वोक्त तथा यह चिकित्सा है।

वक्तव्य—पहले श्लोकों में भी शीत पूतना ग्रह का प्रतिषेध दिया हुआ है। अब भी पुनः शीतपूतना ग्रह की ही चिकित्सा दी है। यहाँ के श्लोक भी यदि पूर्वोक्त श्लोकों के साथ ही दिये जाते तो अधिक विषयशुद्धि प्रतीत होती है॥

अत ऊर्ध्वं तु सर्वेषां शृणु सामान्यभेषजम् ।।
अग्निमन्थः कुरबको वरुणः पारिभद्रकः । निशाऽनलः पोटगलः पूतिका रोहिषस्तथा ।।
एतेन परिषिक्तस्य तैलमभ्यञ्जनं शृणु । प्रियङ्गु रोचना चैव शतपुष्पा कुटन्नटम् ।।
तालीसपत्रं नलदं तथा चन्दनसारिवे । मधूकाङ्कोठमञ्जिष्ठापृथ्वीकाभूतिकानि च ।।
एतैस्तैलं समं सिद्धं मुद्गाम्लोदकसंयुतम् । एतेन बालमभ्यक्तं मुञ्चत्याशु पितृग्रहः ।।
बिम्बीकाश्मर्यमधुकं कुलत्था बदरा यवाः । क्षुड्डाकपञ्चमूलस्य निष्क्वाथं चात्र दापयेत् ।।
खर्जूरं मुस्तकं चैव नारिकेलफलानि च । नालिकाङ्कुरमृद्वीका मधूकं मधुकं तथा ।।
एतानि शुष्कचूर्णानि............................
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.................................................................... (इति ताडपत्रपुस्तके १०५ तमं पत्रं$^१$म् ।)

अब सब ग्रहों की सामान्य चिकित्सा सुनो–अग्निमन्थ (अरणी), कुरबक (रक्तझिण्टी–लालकटसरैया), वरुण, पारिभद्र (पर्वतनिम्ब), हरिद्रा, चित्रक, पोटगल (नल), पूतिका (चिरबिल्व) तथा रोहिष (कत्तृण–ध्यामक)–इनके क्वाथ से परिषेक करने के बाद निम्न तेल से अभ्यङ्ग (मालिश) करनी चाहिये–प्रियङ्गु, रोचना (कम्पिल्ल अथवा कंकोष्ठ) सौंफ, कुटन्नट (तगर), तालीशपत्र, नलद (जटामांसी) रक्तचन्दन, सारिवा, महुआ, अङ्कोठ, मंजिष्ठा, पृथ्वीका (बड़ी इलायची) तथा भूतिक (भूनिम्ब–इनसे तैल सिद्ध करके इसमें मूंग तथा कांजी डालकर अभ्यङ्ग करने से पितृग्रह बालक को शीघ्र ही छोड़ देते हैं। बिम्बी, गम्भारी, मुलहठी, कुलत्थ, बेर, जौ तथा लघु पञ्चमूल (शालिपर्णी आदि) का क्वाथ देना चाहिये। तथा खजूर, नागरमोथा, नारियल का फल, कमलनालं के अङ्कुर, मुनक्का, महुआ तथा मुलहठी का शुष्क चूर्ण देने से भी ग्रहों की बाधा दूर हो जाती है.............

(इति ताडपत्रपुस्तके १०५ तमं पत्रम्)


प्लीहहलीमकचिकित्सिताध्यायः ।

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................................................. दोऽग्निबलसंक्षयः ।


१. अस्याग्रे अष्टपत्रात्मको ग्रन्थः, खण्डितस्ताडपत्रपुस्तके।