भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 514
१५६काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्प्लीहहलीमकचिकित्सिताध्यायः ? ]

मूर्च्छा तृष्णा भ्रमस्तन्द्री विषादारुचिगौरवम् ।।

हलीमक के लक्षण—अग्नि एवं बल अथवा जाठराग्नि का क्षीण होना, मूर्च्छा, तृष्णा, भ्रम, तन्द्रा, विषाद, अरुचि तथा शरीर का भारीपन—ये हलीमक के लक्षण होते हैं।।

तस्य प्रतिक्रियां कुर्याद्वातपित्तहरीं बुधः । गुडूचीस्वरसे सिद्धं सक्षीरं माहिषं घृतम् ।। उपस्निग्धं ततस्तं तु संस्रंसयेद्बलकालवित् । रसेनामलकानां तु त्रिवृद्युक्तेन युक्तितः ।। मधुराण्यविदाहीनि विरिक्तं नित्यमाशयेम् । दुर्बलस्य प्रयोज्या तु नित्यं गुडहरीतकी ।।

बुद्धिमान् व्यक्ति को इनकी वात तथा पित्तनाशक चिकित्सा करनी चाहिये अर्थात् यदि रोग वातिक है तो वातनाशक तथा पैत्तिक है तो पित्तनाशक चिकित्सा करनी चाहिये। पैत्तिक हलीमक की चिकित्सा—गिलोय के स्वरस में भैंस के घृत तथा दूध को यथाविधि सिद्ध करके रोगी को देवे। इस घृत के सेवन से स्नेहन हो जाने पर बल तथा काल को जानने वाला वैद्य रोगी को आंवले के रस में त्रिवृत् चूर्ण मिलाकर युक्तिपूर्वक विरेचन कराये। तथा विरेचन हो जाने के बाद उसे मधुर एवं अविदाही पदार्थों का ही सदा सेवन कराना चाहिये। यदि रोगी दुर्बल हो तो उसे सदा गुडहरीतकी का प्रयोग कराये।।

रक्तपित्तौषधं यच्च तच्चाप्यत्र प्रशस्यते । धात्रीफलानां पक्वानां स्वरसस्याढकं भवेत् ।। पिप्पल्‍यो मधुकं द्राक्षा चन्दनोशीरबालकम् । घृतप्रस्थं पचेदेतैः पक्वे दद्याच्च शर्कराम् ।। तल्लिहेन्मधुना प्रातः पथ्याशी नीरुजो भवेत् । एतत् पित्तोत्तरे कार्यं, शृणु वातोत्तरेऽपि तु ।।

तथा जो रक्तपित्त की चिकित्सा (अवस्था के अनुसार लङ्घन एवं तर्पण बृंहण तथा पेया आदि का प्रयोग) है, वह भी इसमें उपयोगी है। पके हुए आंवलों के १ आढक (४ प्रस्थ) रस में १ प्रस्थ घृत तथा पिप्पली, मुलहठी, द्राक्षा, चन्दन, खस तथा नेत्रबाला आदि ओषधियों का कल्क डालकर घृत पाक करे। घृत तैयार होने पर उसमें शर्करा तथा मधु मिलाकर रोगी प्रातः काल चाटे तथा पथ्य का सेवन करे। इससे रोगी नीरोग हो जाता है। यह पित्त की अधिकता में चिकित्सा कही गई है।।

कल्याणकं बलातैलं कौमा१रं वा प्रयोजयेत् । कामलापाण्डुशोथानां तुल्यं कुर्याच्च भेषजम् ।। पथ्याशिना च सततं सेव्याऽगस्त्यहरीतकी ।

वातिक हलीमक की चिकित्सा—इसमें कल्याणकारक बलातैल, तथा कुमारकल्याण घृत का प्रयोग करना चाहिये, इसकी कामला, पाण्डु एवं शोथ रोग के समान चिकित्सा करनी चाहिये तथा पथ्य का सेवन करते हुए अगस्त्यहरीतकी का प्रयोग करना चाहिये।

वक्तव्य—(i) चरक चि. अ. १८ में अगस्त्यहरीतकी का निम्न योग दिया है—दशमूलीं स्वयंगुप्तां शङ्खपुष्पीं शटीं बलाम्। हस्तिपिप्पल्यपामार्गपिप्पलीमूलचित्रकान्॥ भार्गी पुष्करमूलं च द्विपलांशं यवाढकम्। हरीतकीशतं भद्रं जले पञ्चाढके पचेत्॥ यवे स्विन्नेकषायं तं पूतं तच्चाभयाशतम्। पचेद्गुडतुलां दत्त्वा कुडवं च पृथक् घृतात्॥ तैलात्सपिप्पलीचूर्णात् सिद्धशीते च माक्षिकात्। लिह्याद् द्वे चाभये नित्यमतः खादेद्रसायनात्॥ तद्वलीपलितं हन्ति वर्णायुर्बलवर्धनम्। पञ्चकासान्


१. कुमारकल्याणघृतमित्यर्थः ।