भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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प्लीहहलीमकचिकित्सिताध्यायः ? ] | चिकित्सास्थानम् | १५७

क्षयं श्वासं हिक्कां च विषमज्वरम् ।। हन्यात्तथाऽशौंग्रहणी हृद्रोगारुचिपीनसान् अगस्त्यविहितं श्रेष्ठं रसायनमिदं शुभम् ।। (ii) चरक चि. अ. १६ में भी हलीमक रोग की चिकित्सा निम्न प्रकार दी है—गुडूचीस्वरसक्षीरसाधितं माहिषं घृतम्। स पिबेत् त्रिवृतां स्निग्धो रसेनामलकस्य तु ।। विरिक्तो मधुर प्रायं भजेत्पित्तानिलापहम् ।। द्राक्षालेहं च पूर्वोक्तं सर्पीषि मधुराणि च । यापन्नक्षीरबस्तींश्च शीलयेत्सानुवासनान् ।। मृद्वीकारिष्टयोगांश्च पिबेद्युक्त्याऽग्निवृद्धये । कासिकं चाभयालेहं पिप्पलीं मधुकं बलाम् । पयसा च प्रयुञ्जीत यथादोषं यथाबलम् ।।

इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।

(इति) प्लीहाहलीमकचिकित्सतम् ।

ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।

**वक्तव्य—**इस अध्याय में नाम के अनुसार प्लीहारोग (प्लीहोदर-प्लीहावृद्धि) तथा हलीमक रोग की चिकित्सा होनी चाहिये । परन्तु इस अध्याय के प्रारम्भिक भाग के खण्डित होने से उपलब्ध अध्याय में प्लीहारोग का बिलकुल वर्णन नहीं है । इसमें केवल हलीमक रोग की चिकित्सा ही है । हलीमकरोग-पाण्डु, कामला तथा कुम्भकामला का ही प्रवृद्ध रूप है । चरक चि. अ. १६ में हलीमकरोग का निम्न स्वरूप दिया है—यदा तु पाण्डोर्वर्णः स्याद्धरितश्यावपीतकः । बलोत्साहक्षयस्तन्द्रा मन्दाग्नित्वं मृदुज्वरः ।। स्त्रीष्वहर्षोऽङ्गमर्दश्च श्वासस्तृष्णाऽरुचिर्भ्रमः । हलीमकं तदा तस्य विद्यादनिलपित्ततः ।। सुश्रुत उ. अ. ४४ में भी कहा है—तं वातपित्ताद्धरिपीतनीलं हलीमकं नाम वदन्ति तज्ज्ञाः ।। अर्थात् हलीमक रोग वात तथा पित्त से होता है । इसीलिये प्रकृत ग्रन्थ में वातिक तथा पैत्तिक हलीमक रोग की पृथक् चिकित्सा दी है। अब हम प्लीहारोग का वर्णन करते हैं प्लीहारोग से अभिप्राय प्लीहा (Spleen) की वृद्धि (Entargement) है । चरक चि. अ. १३ में इस वृद्धि के निम्न कारण दिये हैं—अशितस्यातिसंक्षोभाद्यानपापातिचेष्टितैः । अतिव्यवायभाराध्ववमनव्याधिकर्शनैः ।। वामपार्श्वश्रितः प्लीहा च्युतः स्थानात्प्रवर्धते । शोणितं वा रसादिभ्यो विवृद्धं तं विवर्धयेत् ।। अर्थात् भोजन के पश्चात् सवारी आदि अत्यधिक शारीरिक चेष्टाओं के कारण प्लीहा की वृद्धि हो जाती है । प्लीहावृद्धि का स्वरूप—तस्य प्लीहा कठिनोऽष्ठीलेवादौ वर्धमानः कच्छपसंस्थान उपलभ्यते, स चोपेक्षितःक्रमेण कुक्षिं जठरम रन्यधिष्ठानं च परिक्षिपन्नुदरमभिनिर्वर्तयति । अर्थात् प्लीहा कठिन होकर आकार में बढ़ जाती है तथा कुक्षि आदि को घेर लेती है। प्लीहावृद्धि के लक्षण—तस्य रूपाणि—दौर्बल्यारोचकाविपाकवर्चोमूत्रग्रहतमःप्रवेशपिपासाऽङ्गमर्द्दच्छर्द्दिमूर्च्छाऽङ्गसादकासश्वास मृदुज्वरानाहाग्निनाशकार्श्यास्य-वैरस्यपर्वभेदाः कोष्ठे वातशूलं चापि चोदरमरुणवर्णं विवर्णं वा नीलहरितहारिद्रराजिमद्भवति । सुश्रुत नि. अ. ७ में इस रोग की सम्प्राप्ति निम्न प्रकार से दी है—विदाह्यभिष्यन्दिरतस्य जन्तोः प्रदुष्टमत्यर्थमसृक् कफश्च । प्लीहाभिवृद्धिं सततं करोति प्लीहोदरं तत्रवदन्ति तज्ज्ञाः ।। वामे च पार्श्वे परिवृद्धिमेति विशेषतः सीदति चातुरोऽत्र । मन्दज्वराग्निः कफपित्तलिङ्गैरुपद्रुतः क्षीणबलोऽतिपाण्डुः ।। प्लीहा वृद्धि की चिकित्सा च. चि. अ. १३ में कहा है—चिकित्सां संप्रकुर्वीत यथादोषं यथाबलम् । स्नेहं स्वेदं विरेकं च निरूहमनुवासनम् ।। समीक्ष्य कारयेद्राह्वौ वामे वा व्यधयेत् शिराम् ।। अर्थात् प्लीहावृद्धि में स्नेहन, स्वेदन, विरेचन, अनुवासन कराना चाहिये तथा वाम बाहु में शिरावेध कराना चाहिये ।। सुश्रुत चि. अ. १४ में भी कहा है—“प्लीहोदरिणः स्निग्धस्विन्नस्य दध्ना भुक्तवतो वामबाहौ कूर्पराम्यन्तरतः शिरां विध्येद्दिमर्दयेत् पाणिना प्लीहानं रुधिरस्यन्दनार्थम्” इसी प्रकार इसमें षट्पल अथवा क्षीरषट्पल घृत, रोहितक घृत, गुडहरीतकी, पिप्पलीवर्धनमान, आदि का भी प्रयोग किया जाता है । तथा वात और कफ की प्रधानता में चरक में अग्निकर्म का विधान भी दिया है कहा भी है—“अग्निकर्म च कुर्वीत भिषग्वातकफोल्वणे” ।

(इति) प्लीहाहलीमकचिकित्सिताध्यायः ।