काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१५८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् उदावर्त्तचिकित्सिताध्यायः ? ]
उदावर्त्तचिकित्सिताध्यायः ।
अथात उदावर्त्तचिकित्सितमध्यायं व्याख्यास्यामः ।। १ ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। २ ।।
अब हम उदावर्त चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।। १-२ ।।
कषायकटुतिक्तरूक्षशीतपूतिशुष्कशाकवल्लूरपिण्याकसुनिषण्णकदुग्धिकाकोद्रवश्यामाकनीवारयवककट्ट (?) वेत्राग्रकर्कन्धूकपित्थबिल्वकरीरगाङ्गेरुकीलिकुचपारावतभव्यकाञ्जिकशुक्तारनालतुषोदकमुद्गकलायात-सीप्रभृतिनिषेवणाद्रूक्षात्मनो वातभूयिष्ठप्रकृतेर्वेगविधारणादनिलः प्रकुपितो देहमूर्ध्वमुदामृत्य वायुनोदानेन प्रत्याहतो गुदमासाद्याशयं कृत्वाऽधोवहानि स्रोतांसि दूषयित्वा विण्मूत्रकफपित्तानिलशुक्रमार्गानुपपरुणद्धि, तत् सानाहमुपजनयति प्राणहरं, तल्लक्षणं वा। क्षीरमुपसेवमानस्य शिशोरचिरं वा कटीधारणद्वस्ति-गुदसंरोधनादतिरोदनात् प्रजागरादस्नेहात्क्षीरानुपसेवनाद्वेगविधारिण्या उपवासप्रमिताशनविषमाशनप्रजागर-चित्तेर्ष्याव्यायामनित्यायाः क्षीरमामोद्यते वायुना; तत् पीयमानमुदावर्तय संपद्यते । तत्र षडुदावर्ताः । वातविण्मूत्रशुक्रच्छर्दिक्षवथूनां संधारणादप्रवृत्तेश्च षण्णां षडुच्यन्ते । तदुदावर्तसामान्यात्तु तमेकमेवाहुरेके । तेषां नवेगान्धारणीयेऽध्याये लक्षणान्यौषधानि चोक्तानि । तानीहापि तु दारुणत्वादस्य व्याधेर्यत्किञ्चिदुपदेक्ष्यामः । शूलमूर्च्छादाहानाहाध्मानानि, प्रवृत्तिद्वेषो, वैवर्ण्यं, संज्ञानाशस्खलनपतनविलपनतृष्णाहिक्काश्वास-प्रस्वेदाऽङ्गारपरिकर्तिकाभिरभीक्ष्णं बाध्यते, बस्तिगुदहृदयपार्श्ववङ्क्षणोदरशूलमूरुसादो व्यथा चेत्युदा-वर्तलक्षणानि । पञ्चादौ पूर्वरूपाणि भवन्ति ।। ३ ।।
आनाह का हेतु-कषाय, कटु, तिक्त, रूक्ष, शीत, पूति (दुर्गन्धयुक्त) द्रव्य, सूखे शाक, वल्लूर (सूखा मांस), पिण्याक (खल), सुनिषण्णक (चौपतिया Marsilea-Inradrifolia), दुग्धिका (दुद्धी), कोद्रव (कोदों), श्यामाक, नीवार, जौ, कक्कट्ट (?), वेत्राग्र (बेंत का अग्रभाग) कर्कन्धू, कैथ, बिल्व, करीर (टैंट), गांगेरुकी (गंगोठ) कटहल, पारावत (कबूतर अथवा एक प्रकार का फल-फालसा), भव्य (एक प्रकार का फल), कांजी, सिरका, आरनाल (कांजी का भेद), तुषोदक, मृग, कलाय (मटर) तथा अलसी आदि के सेवन से रूक्ष तथा वातप्रकृति वाले पुरुष के मलमूत्रादि के वेगों को धारण करने से प्रकुपित हुआ वायु शरीर के ऊपर की ओर रुका हुआ उदानवायु द्वारा आहत होकर गुदा में पहुंच कर वहां अपना स्थान बनाकर अधोवाही स्रोतों को दूषित करके मल, मूत्र, कफ, पित्त, वायु तथा शुक्र के मार्गों को बन्द कर देता है जिससे प्राणनाशक आनाह अथवा उसके लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। सुश्रुत में आनाह का निम्न स्वरूप दिया है—'आमं शकृद्वा निचितं क्रमेण भूयो विबद्धं विगुणानिलेन । प्रवर्तमानं न यथास्वमेनं विकारमानाहमुदाहरन्ति ।। तस्मिन् भवत्याम समुद्भवे तु' अर्थात् आनाह आमदोष से उत्पन्न होता है। दूध पीने वाले बालक को बहुत देर तक कटि पर धारण करने से अर्थात् गोद में उठाये रखने से, बस्ति तथा गुदा के वेग अर्थात् मल तथा मूत्र को रोकने से, अधिक रोने से, जागरण से, स्नेह की कमी से, तथा दूध के सेवन न करने के कारण मलमूत्र आदि के वेगों को धारण करने वाली तथा नित्य उपवास, प्रमिताशन (मपा हुआ आहार करना) विषनाशन (विषम भोजन), जागरण, चित्त में ईर्ष्या तथा व्यायाम करने वाली स्त्री का दूध वायु के द्वारा विकृत हो जाता है। उस दूध के पीने से शिशु को उदावर्त हो जाता है। चरक चि. अ. २६ में उदावर्त का हेतु तथा संप्राप्ति निम्न प्रकार से दी है—कषायतिक्तोष्णरूक्षभोज्यैः संधारणोदीरणमैथुनैश्च । पक्वाशये कुप्यति चेदपानः स्रोतांस्यधोगानि बली स रुद्ध्वा ।। करोति विण्मूत्रमूत्रसङ्गं क्रमादुदावर्तमतः सुघोरम् ।। अर्थात् कषाय तिक्त आदि भोजनों तथा वेगसंधारण आदि से पक्वाशय में कुपित हुआ अपान वायु अधोगामी स्रोतों में
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