काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउदावर्त्तचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १५९
रुकावट पैदाकर देता है जिससे पुरीष, मूत्र एवं वायु आदि की प्रवृत्ति बन्द हो जाती है। इसे ही उदावर्त कहते हैं। इसी प्रकार सुश्रुत उ. अ. ५५ में भी कहा है। उदावर्त ६ प्रकार के होते हैं। वात, पुरीष, मूत्र, शुक्र, छर्दि (वमन) और क्षवथु (छींक)। इन ६ के रोकने तथा अप्रवृत्ति से ६ प्रकार के उदावर्त होते हैं। इन सबमें उदावर्त के सामान्य होने से कुछ लोग एक ही प्रकार का उदावर्त मानते हैं। चरक सू. अ. १९ में भी ६ प्रकार का ही उदावर्त दिया है—षडुदावर्ता इति—‘वातमूत्रपुरीष शुक्रच्छर्दिक्षवथुजा’। सुश्रुत उ. अ. ५५ में वात मल मूत्र, जृम्भा आदि के रोकने से १३ प्रकार का उदावर्त दिया है। ‘न वेगान्धारणीय’ अध्याय में उपर्युक्त ६ प्रकार के उदावर्तों के लक्षण तथा चिकित्सा दी गई है। इस व्याधि के दारुण (भयंकर) होने से उनमें से कुछ लक्षण यहां भी कहे जाते हैं—शूल (पेट में दर्द), मूर्छा, दाह, आनाह तथा आध्मान (अफारा-Flatulance), प्रवृत्तिद्वेष (किसी चीज में प्रवृत्ति-रुचि न होना), विवर्णता (वर्ण का विकृत होना), संज्ञानाश, स्खलन (फिसलना), पतन (गिरना), विलपन (विलाप करना), तृष्णा, हिक्का, श्वास स्वेद (अधिक पसीना आना), अङ्गारों की तरह जलना, तथा परिकर्तिका (गुदा में कर्तनवत् पीडा अथवा Colic) द्वारा रोगी निरन्तर कष्ट पाता है। बस्ति, गुदा, हृदय, पार्श्व, वंक्षण (कटि) तथा उदर में शूल होती है। उरुसाद (घुटनों में वेदना) तथा व्यथा (पीडा) इत्यादि उदावर्त के लक्षण होते हैं। इनमें से प्रारंभ के पांच अर्थात् शूल, मूर्छा, दाह, आनाह एवं आध्मान—उदावर्त के पूर्वरूप होते हैं। चरक चि. अ. २६ में उदावर्त के निम्न लक्षण दिये हैं—रुग्बस्तिहत्कुक्ष्युरेष्वभीक्ष्णं सपृष्ठपार्श्वेष्वतिदारुणा स्यात्। आध्मानहृल्लासविकर्तिकाश्च तोदोऽविपाकश्च सबस्तिशोथः ॥ वर्चोऽप्रवृत्तिर्जठरे च गण्डान्यूर्ध्वश्च वायुर्विहतो गुदे स्यात्। कृच्छ्रेण शुक्रस्य चिरात्प्रवृत्तिः स्याद्वा तनुः स्यात्खररूक्षशीता ॥
वक्तव्य—आनाह के लिये माधवनिदान में कहा है—आमं शकृद्वा निचितं क्रमेण भूयो विबद्धं विगुणानिलेन। प्रवर्तमानं न यथास्वमेनं विकारमानाहमुदाहरन्ति ॥ आध्मान—के लिये सुश्रुत में कहा है—साटोपमत्युग्ररुजमाध्मातमुदरं भृशम्। आध्मानमिति जानीयाद् घोरं वातनिरोधजम् ॥३॥
पञ्चजनमादावुष्णालवणतैलाभ्यक्तं यथायोगं स्विन्नशरीरं फलवर्तिभिरुपक्रमेत्। विस्त्रंसितं च संतमुष्णस्निग्धमधुरलवणप्रायमशनं यवगोधूमषष्टिकशाकघृतप्रायमानूपौदकमांसप्रायं वाऽऽहारमनुपद्रवाय बलिने उपकल्पयेत्। कोशातकीकक्ष्वलाबुबीजपिप्पलीसैन्धवहिङ्गुवचाहरितालेमनःशिलामाषचूर्णैर्गोमूत्रपिष्टैः फलवर्त्य उपवाता (क्लृप्ता) घृताक्ते कटुतैलाक्ते वा गुदे शलाकया प्रणयेत्। पूर्ववदेव चोपचारः। प्रक्षणाच्छादनपरिशेकाशनानि तानि चास्य स्निग्धोष्णानि विदध्यात्। सक्तुवाट्यकुलमाषापूपवास्तुकयवशाक-सुधापत्रत्रिवृच्छाकपञ्चाङ्गुलश्रीवारिकाश्रीफलासुवर्चलाकाकमाचीकलायपालङ्क्यादिभिश्च शाकैर्घृतसिद्धैर्भोज-येद्यवाग्नम्। त्रिवृत्पीलुयवोत्कारान् वा गोमूत्रेण पाययेत्। त्रिवृद्धरीतकीश्यामासुधाः क्षीरेण युक्ता मूत्रेर्वाऽऽनाहभेदनम्। त्रिफलादन्तीश्मामात्रिवृत्कम्पिल्लकपीलुस्वर्णक्षीरीवचासप्तलानीलिकायहणीचूर्णानि सुधाक्षीरेण गुटिका आमलकमात्रीः कृत्वा तत एकां भक्षयित्वोष्णोदकमूत्रानुपानादानाहैर्मुच्यते। एतान्येव त्रिफलादीनि क्षीरमूत्रवर्जितानि पञ्चकटुकपञ्चलवणहिङ्कुकुष्ठक्षारद्वयशतपुष्पापाठाश्रीफलयुतानि चूर्णानि कृत्वा बिडालपदकं क्षीरमद्योष्णवारिगोमूत्रान्यतमपीतमानाहशूलगुल्मभगन्दराशांसि निर्णाशनं चूर्ण, नाराचकमित्युच्यते तत् ॥४॥
सबसे पूर्व उष्ण तथा लवणयुक्त तैल से अभ्यक्त (मालिश किये हुए) उस पञ्चजन (मनुष्य-रोगी) को आवश्यकतानुसार स्वेदन करके फलवर्तियों (गुदवर्तियों—Suppositories) द्वारा चिकित्सा करे। विरेचन हो जाने के बाद यदि कोई उपद्रव न हो तथा रोगी बलवान हो तो उसे उष्ण, स्निग्ध, मधुर एवं लवण रस प्रधान, जौ, गेहूं, षष्टिक, शाक तथा घृतयुक्त एवं आनूप तथा औदक पशुओं के मांस वाला आहार देना चाहिए। तथा कोशातकी, कड़वी तुम्बी के बीज,
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