काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 518, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| १६० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | उदावर्तचिकित्सिताध्यायः ? ] |
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पिप्पली, सेन्धानमक, हींग, हरताल, मनःशिला तथा उड़द के चूर्ण को गोमूत्र में घोटकर बनाई हुई फलवर्तियां घी अथवा कडुवा तैल लगाकर गुदा में शलाका के द्वारा अन्दर प्रविष्ट कर दे। इनका उपचार पहले के समान ही करना चाहिये। इसके लिये प्रक्षण (मालिश), आच्छादन (वस्त्र), परिषेक तथा भोजन आदि सब स्निग्ध तथा उष्ण होने चाहिये। सत्तु, वाट्य (यवमण्ड-अथवा जौ का दलिया), कुल्माष (अर्धस्विन्न मुद्ग आदि घुघुनी-Powdered varley, halg boiled in warm water and then made into cakes is called kulmasha), अपूप (मालपूआ), बथुआ, यव, शाक, सेहुण्ड के पत्ते, त्रिवृत् शाक, पञ्चाङ्गुल (एरण्ड), श्रीवारिका (शितावर शाक), श्रीफला (बिल्व), सुवर्चला (हुलहुल), काकमाची (मकोय), कलाय (मटर), पालङ्क्य (पालक) इत्यादि घी में बनाये हुए शाकों के साथ यवान्न (जौ का अन्न) रोगी को खिलाये। त्रिवृत्, पीलु, एवं यवोत्कार गोमूत्र से पिलाये। त्रिवृत्, हरीतकी, श्यामा, सुधा (थूहर) को दूध अथवा गोमूत्र के साथ देने से आनाह नष्ट होता है। त्रिफला, दन्ती (जमालगोटा), श्यामा (काली निशोत), त्रिवृत्, कमीला, कपीलु, स्वर्णक्षीरी (सत्यानाशी), वचा, सातला, नीलिका (नीली), ग्रहघ्नी (श्वेत सर्षप) के चूर्णों को सेहुण्ड (थूहर) के दूध में घोटकर आंवले के प्रमाण की गुटिका बनाकर उष्ण जल अथवा गोमूत्र के अनुपान से एक गोली का प्रयोग करने से आनाह शान्त हो जाता है। क्षीर (दूध) तथा गोमूत्र से रहित इन्हीं उपर्युक्त त्रिफला आदि को पञ्चकटु (पञ्चकोल-पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक, सोंठ), पञ्चलवण (सेन्धानमक, कालानमक, विड् लवण या नौसादर, सामुद्र तथा सांभरनमक), हींग, कुष्ठ, क्षारद्वय (सज्जीक्षार तथा यवक्षार), सौंफ, पाठा तथा श्रीफल (बिल्व) के सहित चूर्ण करके इसको विडाल (१ कर्ष) मात्रा में दूध, मद्य, उष्णजल, अथवा गोमूत्र में से किसी के अनुपान से पीने से आनाह, शूल, गुल्म, भगन्दर तथा अर्श का नाश करता है—इसे 'नाराचक' चूर्ण कहते हैं ॥४॥
तत्र श्लोकाः—
यदि व्यतिक्रमेदेतानुदावर्त उपक्रमान्। युक्तोष्णलवणं तस्य निरूहमुपकल्पयेत् ॥५॥
आस्थापनं च .....................................................
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(इति ताडपत्रपुस्तके ११४ तमं पत्रं¹म्)
यदि उदावर्त रोग इन उपर्युक्त उपक्रमों—(चिकित्साओं से ठीक न हो तो उसे उष्ण तथा उचित परिमाण में लवण से युक्त निरूह तथा आस्थापन बस्ति देनी चाहिये ..........।
**वक्तव्य—**चरक चि. अ. २६ में उदावर्त का निम्न चिकित्साक्रम दिया है—तं तैलशीतज्वरनाशनाक्तं स्वेदैर्यथोक्तैः प्रविलीनदोषम्। उपाचरेद्वर्तिनिरूहबस्तिस्नेहैर्विरेकैरनुलोमनान्नैः ।। इससे आगे चरक में कई फलवर्तियों तथा प्रधमन चूर्णों का उपयोग देने के बाद लिखा है—तेषां विघाते तु भिषग्विद्ध्यात्स्वभ्यक्तसुस्विन्नतनोर्निरूहम्। ऊर्ध्वानुलोमौषध-मूत्रतैलक्षीराम्लवातघ्नयुतं सुतीक्ष्णम् ॥ अर्थात् यदि इन वर्तियों तथा प्रधमन चूर्णों से लाभ न हो तो देह पर अभ्यङ्ग एवं स्वेदन करके वमन, विरेचन, औषध, गोमूत्र, तैल, दूध तथा कांजी आदि से युक्त अच्छी तीक्ष्ण निरूहबस्ति दे। इसके बाद दोषभेद से निरूह बस्ति में भिन्न २ द्रव्यों की योजना दी है—वातेऽधिकेऽम्लं लवणं सतैलं क्षीरेण पित्तेतु कफे समूत्रम्। स मूत्रवर्चोऽनिलसङ्गमाशु गुदं सिराश्च प्रगुणीकरोति ।। अर्थात् वात की अधिकता में अम्ल, लवण तथा तैल-युक्त, पित्त की अधिकता में दूध तथा कफ की अधिकता में गोमूत्र युक्त बस्ति दी जाती है ॥५॥
(इति ताडपत्रपुस्तके ११४ तमं पत्रम्)
१. अस्याग्रे पत्रद्वयात्मको ग्रन्थस्त्रुटितस्ताडपत्रपुस्तके।