काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंराजयक्ष्मचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १६१
राजयक्ष्मचिकित्सिताध्यायः
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.............. (रोगा) नीकविनाशनम् ।। पिप्पल्यो विंशतिः श्रेष्ठा उदकार्धाढके शृताः ।।
चतुर्भागावशेषं तं छागक्षीरेण तावता । शृतं नित्यं पिबेच्छोषी तेनैवाश्नीत नित्यदा$^१$ ।।
विना वाऽन्नोदकं शक्त्या तत्प्रधानो विमुच्यते ।
**वक्तव्य—**इस अध्याय में राजयक्ष्मा रोग की चिकित्सा का वर्णन है। राजयक्ष्मा ‘क्षय’ रोग को कहते हैं। क्योंकि यह रोग सब से पूर्व नक्षत्रराज चन्द्रमा को हुआ था इसलिये इसका नाम राजयक्ष्मा है। चरक चि. अ. ८ में कहा है—यस्मात्स राज्ञः प्रागासीद्राजयक्ष्मा ततो मतः । सुश्रुत उ. अ. ४१ में भी इसी प्रकार कहा है। इस रोग को शोष भी कहते हैं क्योंकि इस रोग में शरीर के रस का शोषण हो जाता है। कहा भी है—संशोषणाइरसादीनां शोष इत्यभिधीयते । क्रिया क्षयकरत्वाच्च क्षय इत्युच्यते पुनः ।। यह अध्याय प्रारंभ में खण्डित है। इस खण्डित अंश में राजयक्ष्मा के हेतु, सम्प्राप्ति, पूर्वरूप तथा लक्षण इत्यादि होंगे। राजयक्ष्मा रोग के मुख्य चार कारण माने जाते हैं—(१) अपने बल या शक्ति से अधिक कार्य करना, (२) वेगों को रोकना, (३) धातुक्षय, (४) विषम भोजन।
अब हम अध्यायोक्त विषय पर आते हैं—बीस उत्तम पिप्पलियों को आधे आढक-(२ प्रस्थ) जल में पकाया जाय । जब चतुर्थांश जल शेष रहे तब उतार कर फिर उसमें उतना ही बकरी का दूध डालकर पकाया जाय । सिद्ध होने पर उस दूध को शोष रोग के रोगी को नित्य पीना चाहिये तथा अपनी शक्ति के अनुसार अन्न और जल का त्याग करके केवल उसी दुग्ध का आहार करना चाहिये । इससे वह रोग दूर हो जाता है ।।
द्वादशाब्दानतीतो वा स्निग्धस्विन्नो विशोधितः ।।
पिबेत् क्षीरेण पिप्पल्यः (लीः) पञ्च पञ्च च वर्धयेत् । शतं तथैव ह्रसयेद्भोज्नोदकवर्जितः ।।
पिप्पलीवर्धनमानं तु सर्वरोगविनाशनम् ।
यदि रोग १२ वर्ष का पुराना हो गया हो तो रोगी स्नेहन, स्वेदन तथा शोधन (पञ्चकर्म द्वारा) करके दूध के साथ पिप्पलियों का सेवन करें । प्रतिदिन पांच पांच पिप्पलियां बढ़ाकर १०० तक ले जाये तथा फिर उसी प्रकार क्रमशः घटाये । भोजन (अन्न) तथा जल का त्याग कर देना चाहिये । यह ‘पिप्पली वर्धमान’ योग सब रोगों को नष्ट करने वाला है ।
**वक्तव्य—**यक्ष्मा रोग के रोगी को वमन तथा विरेचन यथासंभव नहीं कराने चाहिये और यदि कराने ही पड़े तो बहुत संभल करके कराने चाहिये । चरक में कहा है—‘यन्न कर्षणम्’ अर्थात् वमन विरेचन ऐसे होने चाहिये जो शरीर का कर्षण न करें ।
पिप्पलीनां शतं वाऽपि शृतं तोयाढके सदा ।।
पादशिष्टं समक्षीरं श्रपयेत् पुनरेव तत् । कफाधिके तु सक्षौद्रं, सघृतं पवनाधिके ।।
पित्तोत्तरे शर्करया सेवमानः सुखी भवेत् ।
अथवा १०० पिप्पलियों को १ आढक जल में पकाकर चतुर्थांश शेष रहने पर उतना ही दूध मिलाकर पुनः पकाया जाय । कफ की अधिकता में इसमें मधु, वायु की अधिकता में घृत तथा पित्त की अधिकता में शर्करा (खाण्ड) मिलाकर सेवन करने से रोगी स्वस्थ हो जाता है ।।
१. सर्वदा इत्यभिसन्धिः ।