भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 520

१६२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | राजयक्ष्मचिकित्सिताध्यायः ? ]

पिप्पलीवर्धमानं तु वातश्लेष्मोत्तरे हितम् ।।
सर्वत्र पिप्पलीक्षीरं हितं कालादिदर्शनात् ।

वायु तथा कफ की अधिकता में ‘पिप्पली वर्धमान योग’ हितकर है तथा काल आदि के अनुसार ‘पिप्पलीक्षीर’ (पिप्पलियों के द्वारा शृत-पकाया हुआ दूध) सब जगह हितकर है ।।

शरन्मुखे नागबलामूलान्युद्धृत्य शोषयेत् ।।
सन्निधाय नवे भाण्डे ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः । स्त्रीशूद्रवर्जी विजने चूर्णं क्षीरेण पाययेत् ।।
प्रथमे दिवसे कर्षं ततश्चोर्ध्वं विवर्धयेत् । ततः पलं पलं नित्यं पाययेत् पयसा शुचिः ।।
जीर्णे तस्मिन् पिबेत् क्षीरं भक्तोदकविवर्जितः ।
मासात् सोपद्रवं शोषं हन्ति नागबला नृणाम् ।।
प्रजामायुर्बलं मेधां प्रयताय ददात्यपि । षण्मासेन श्रुतधरः सर्वरोगविवर्जितः ।।
अशीतिकोऽपि च युवा भवेत् संवत्सराश्नरः ।

शरद् ऋतु के प्रारंभ में नागबला की जड़ों को उखाड़कर सुखाले । उनका चूर्ण बनाकर एक नवीन बर्तन में रखले । तब रोगी को जितेन्द्रिय होकर, ब्रह्मचर्य पूर्वक वन में रहकर इस चूर्ण का दूध के साथ सेवन करना चाहिये । तथा उन दिनों स्त्री एवं शूद्र का सहवास नहीं करना चाहिये । पहले दिन चूर्ण की १ कर्ष मात्रा होनी चाहिये । तथा उसे बढ़ाकर प्रतिदिन शुद्ध तथा पवित्र होकर दूध के साथ नित्य १ पल मात्रा सेवन करनी चाहिये । इसके जीर्ण हो जाने (पच जाने) पर दूध का सेवन करना चाहिये तथा अन्न एवं जल का त्याग कर देना चाहिये । नागबला का एक मास तक सेवन करने से मनुष्यों का उपद्रव युक्त शोष रोग नष्ट हो जाता है तथा सन्तान, आयु, बल और मेधा की वृद्धि होती है । ६ मास के अन्दर रोगी सब रोगों से छुटकारा पाकर श्रुतधर (सुनी हुई चीज को धारण करने वाला) हो जाता है तथा उसकी स्मरण एवं धारणाशक्ति बढ़ जाती है । तथा एक वर्ष तक इसका सेवन करने से ८० वर्ष का वृद्ध भी युवा (जवान) हो जाता है ।।

मण्डूकपर्ण्याः शुण्ठ्याश्च ब्राह्मायाश्च मधुकस्य च ।।
तद्गुणः सर्वरोगघ्नो विधिर्नागबलासमः ।

इसी प्रकार मण्डूकपर्णी सोंठ, ब्राह्मी तथा मुलहठी का भी प्रयोग करना चाहिये । ये भी सब रोगों को नष्ट करने वाले हैं । इनकी प्रयोग विधि नागबला के समान ही है ।।

उद्वर्तितस्त्वजालेण्डैरजामूत्राभिषेचितः ।।
अजाक्षीरं पिबेन्नान्यदजाभिश्च वसेत् सह । अधस्तादवटेऽजानां वसञ्छोषी विमुच्यते ।।
आजं रसायनं ह्येतत् क्षयघ्नं बलवर्धनम् ।

क्षय रोग के रोगी को बकरियों की मेंगनियों (पुरीष) के रस से उद्वर्तन कराना चाहिये, बकरी के मूत्र से परिषेचन करना चाहिये । बकरी के दूध के अतिरिक्त दूसरे दूध का सेवन नहीं करना चाहिये । बकरियों के साथ ही रहना चाहिये तथा जहां बकरियां बांधी जाती हैं उस छप्पर आदि के नीचे ही उसे सोना चाहिये । इससे क्षय रोग से छुटकारा हो जाता है । यह उपर्युक्त बकरियों का रसायन क्षय को नष्ट करता है तथा बल को बढ़ाता है । सुश्रुत सू. अ. ४१ में कहा है— अजाशकृन्मूत्रपयोघृतासृङ्मांसालयानि प्रतिसेवमानः। स्नानादिनानाविधिना जहाति मासादशेषं नियमेन शोषम्। राजयक्ष्मा में बकरियों के महत्त्व के विषय में अन्यत्र भी कहा है—‘छागं मांसं पयश्छागं छागं सर्पिःसशर्करम्। छागोपसेवाशयनं छाग-मध्ये तु यक्ष्मनुत्’ ।।

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