काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंराजयक्ष्मचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १६३
हरीतकीनां श्रेष्ठानां द्वे शते जर्जरीकृते ।। दशमूलसुधादन्तीकरञ्जाथोगुडासनाः । मयूरकं देवदारु निचुलं कुटजाटजी (?) ।। कटङ्कटेरी बृहती रास्ना श्योनाकचित्रकौ । वरुणं चेति संकुट्य पञ्चविंशतिकैः पलैः ।। षड्द्रोणेऽपां पचेदेतद्यावत् पञ्चाढकं स्थितम् । तस्मिन् पूते गुडतुलां दत्त्वा भूयश्च साधयेत् ।। परिवृत्तं समालक्ष्य घृतभाण्डे निधापयेत् । मरिचानि विडङ्गानि भार्गी शक्रयवांस्तथा ।। आवपेत् कुटबीजानि पिप्पलीप्रस्थमेव च । मधुप्रस्थं च संसृज्य मासादूर्ध्वं प्रयोजयेत् ।। पथ्याशी मात्रया काले मुच्यते कफजैर्गदैः । महाभयारिष्ट इति कश्यपेन प्रकल्पितः ।।
यवकुट की हुई (कूटी हुई) २०० उत्तम हरड़, दशमूल, सुधा (थूहर), दन्ती (जमालगोटा), करञ्ज, अधोगुड, असन (विजयसार), अपामार्ग, देवदारु, निचुल (हिज्जलसमुद्रफल), कुटज, अटजी (?), कटङ्कटेरी (दारुहल्दी), बृहती, रास्ना, श्योनाक (अरलू), चित्रक तथा वरुण-इन्हें कूटकर सम्मिलित २५ पर लेकर ६ द्रोण जल में पकाये । ५ आढक जल शेष रहने पर उतारकर छान लें । उसमें १ तुला गुड डालकर पुनः पाक करें । पाक हो जाने पर उसे पहले से घी का लेप किये हुए बर्तन में डालदें । इसमें मरिच, विडङ्ग, भारंगी, इन्द्रजौ, कुट (गुवाक बीज) तथा पिप्पली का चूर्ण १ प्रस्थ प्रक्षेप के रूप में डालदें । अब इसमें १ प्रस्थ मधु मिलादें । मात्रा एवं काल के अनुसार एक वर्ष तक पथ्य सेवन पूर्वक इसका प्रयोग करने से श्लैष्मिक रोग नष्ट हो जाते हैं । यह कश्यप द्वारा प्रयुक्त 'महाभयारिष्ट' है ।।
अपामार्गोऽश्वगन्धा च नाकुली गौरसर्षपाः । तिला बिल्वं च कल्कः स्यात् क्षयेषूद्वर्तनं हितम् ।
क्षयरोग में अपामार्ग, अश्वगन्धा, गन्धनाकुली, श्वेत सरसों, तिल तथा बिल्व के कल्क का उद्वर्तन हितकर होता है ।।
लशुनानां पलशतं निस्तुषं जर्जरीकृतम् । जलद्रोणेषु दशसु श्रपयेत् पादशेषितम् ।। घृताढकद्वयं तत्र विपचेज्जीवनीयैः सह । आजस्य पयसो द्रोणं क्वाथं च दशमूलिकम् ।। आवपेत्तद्धृतं गोप्यं प्रयोज्यं मास्तः परम् । इन्द्राणीघृतमित्येतद्राजयक्ष्मविनाशनम् ।। वन्ध्याषण्ढकवृद्धानां कामदं पथ्यभोजिनाम् ।
एक सौ (१००) पल लहसन के छिलके उतार कर यवकुट करके १० द्रोण पानी में पकाकर चतुर्थांश शेष रहने पर उतार ले । इसमें जीवनीय ओषधियों के सहित २ आढक घी, एक द्रोण बकरी का दूध तथा दशमूल का क्वाथ डालकर पकाये । घृत सिद्ध होने पर उतार कर गुप्तस्थान (धान्यराशि आदि) में रखदें । एक मास बाद इसका सेवन करना चाहिये । इसका नाम 'इन्द्राणी घृत' है । यह राजयक्ष्मा को नष्ट करता है तथा पथ्य का सेवन करने वाले वन्ध्या (बांझ), नपुंसक तथा वृद्ध पुरुषों की कामशक्ति को बढ़ाता है ।।
लशुनं वाऽपि कल्पेन यथोक्तेनोपचारयेत् । घृतस्यार्धाढके गव्ये जर्जरं लशुनाढकम् ।। घृतभाण्डे समावाप्य वर्षं धान्येषु गोपयेत् । षण्मासमष्टमासं वा चतुर्मासमथो ततः ।। पेयं नागबलावच्च सर्वरोगैर्विमुच्यते ।
अथवा यथोक्त कल्प के द्वारा लशुन का उपचार करे । आधे आढक (२ प्रस्थ) गोघृत में एक आढक (४ प्रस्थ) यवकुट किया हुआ लहसन डालकर उसे घी से लिये हुए बर्तन में डालदें । वर्ष भर तक उसे धान्यराशि में पड़ा रहने दें । इसका आवश्यकतानुसार ६ मास ८ मास अथवा ४ मास तक नागबला के समान सेवन करने से सब रोग नष्ट हो जाते हैं ।।