भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 522, कुल 942 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 522

१६४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | राजयक्ष्मचिकित्सिताध्यायः ? ]

इन्द्राणीघृतकल्पेन द्राक्षासर्पिर्विपाचयेत् ।। तथा पीलुघृतं चैव सर्वरोगैर्विमुच्यते ।

'इन्द्राणी घृत' के समान ही 'द्राक्षा घृत' तथा 'पीलु घृत' का पाक करें । इनके सेवन से भी सब रोगों की शान्ति हो जाती है ।।

इष्टयो रोहिणीस्नानं तयोर्मङ्गलसेवनम् ।। रुद्रपूजा धृतिः शौचं ब्रह्मचर्यं च शान्तये ।

इस रोग की शान्ति के लिये इष्टियां (यज्ञ), रोहिणी नक्षत्र में स्नान तथा उनका मंगल, रुद्र की पूजा, धैर्य, पवित्रता तथा ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये । चरक चिकित्सा अध्याय ८ में कहा है—यया प्रयुक्तया चेष्ट्या राजयक्ष्मा पुराजितः । तां वेदविहितामिष्टिमारोग्यार्थी प्रयोजयेत् ।। अर्थात् इसमें वेदविहित इष्टि का विधान दिया गया है ।।

षडेकादश चोक्तानि यानि रूपाणि यक्ष्मणः ।। त एवोपद्रवास्तेषामशान्तौ स्वं चिकित्सितम् ।

यक्ष्मा रोगी के जो ६ तथा ११ रूप (लक्षण) कहे हैं वे ही इसके उपद्रव होते हैं । उन उपद्रवों के होने पर उन २ की चिकित्सा करनी चाहिये ।

वक्तव्य—यह अध्याय प्रारंभ में खण्डित है । उस अंग में यक्ष्मा के ये ६ तथा ११ रूप दिये गये होंगे । चरक चि. अ. ८ में ये ११ तथा ६ रूप निम्न दिये हैं—कासोऽसतापो वैस्वर्यं ज्वरः पार्श्वशिरोरुजा । शोणितश्लेष्मणोश्छर्दिः श्वासः कोष्ठामयोऽरुचिः ।। रूपाण्येकादशैतानि यक्ष्मणः षडिमानि वा । कासो ज्वरः पार्श्वशूलं स्वरवर्चो गदोऽरुचिः ।। अर्थात् १. कास २. अंसाभिताप ३. स्वरभेद ४. ज्वर ५. पार्श्वशूल ६. शिरःशूल ७. रक्त वमन ८. कफ का थूकना ९. श्वास १०. कोष्ठामय (अतिसार) ११. अरुचि—ये यक्ष्मा रोगी के ११ रूप हैं । तथा १. कास २. ज्वर ३. पार्श्वशूल ४. स्वरभेद ५. मलभेद ६. अरुचि—ये ६ रूप होते हैं । अर्थात् यदि दोष अत्यन्त प्रबल हों तो रोग के उपर्युक्त ११ रूप प्रकट होते हैं अन्यथा ६ रूप होते हैं । सुश्रुत उ. अ. ४१ में यक्ष्मारोग के क्रमशः ११, ६ तथा ३ रूप दिये हैं—स्वरभेदोऽनिलाच्छूलं संलोचश्वांसपार्श्वयोः । ज्वरो दाहोऽतिसारश्च पित्ताद्रक्तस्य चागमः ।। शिरसः परिपूर्णत्वमभक्तच्छन्द एव च । कासः कण्ठस्य चोद्ध्वंसो विज्ञेयः कफकोषतः ।। एकादशभिरेतैर्वा षड्भिर्वापि समन्वितम् । कासातिसारपार्श्वार्ति स्वरभेदारुचिज्वरैः ।। त्रिभिर्वा पीडितं लिङ्गैर्ज्वरकासासृगामयैः । जह्याच्छोषार्दितं जन्तुमिच्छन् सुविपुलं यशः ।। अर्थात् यहां यक्ष्मारोग के ११ तथा ६ रूपों के अतिरिक्त १. ज्वर २. कास ३. रक्तवमन—ये तीन रूप भी दिये हैं ।।

इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। (इति) चिकित्सितेषु राजयक्ष्मचिकित्सितम् ।। (इति ताडपत्रपुस्तके ११७ तमं पत्रम् ।)

ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था !

(इति) चिकित्सितेषु राजयक्ष्मचिकित्सिताध्यायः ।।