भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 523

गुल्मचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १६५

गुल्मचिकित्सिताध्यायः ।

अथातो गुल्मिनां चिकित्सितं व्याख्यास्यामः ।। १ ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। २ ।।

अब हम गुल्म रोगियों की चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।। १-२ ।।

वातादिसर्वरक्तोत्थाः कुक्षिहृत्पार्श्वबस्तिजाः । पञ्च पञ्चापदामम्या गुल्माः सूत्रे निदर्शिताः ।। ३ ।।

वातादि दोषों से पृथक् (वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक), सम्मिलित (सान्निपातिक) तथा रक्त से उत्पन्न होने वाले सब रोगों के अग्रणी ५ गुल्मों का सूत्रस्थान में निर्देश किया गया है जो कि १ कुक्षि २ हृदय ३-४ दोनों पार्श्व तथा ५ बस्ति में पैदा होते हैं। चरक चि. अ. ५ में भी गुल्मों के ये ही पांच स्थान दिये हैं—बस्तौ च नाभ्यां हृदि पार्श्वयोश्च स्थानानि गुल्मस्य भवन्ति पञ्च ।। ३ ।।

चेष्टान्नपानसामान्या दोषाः प्रकुपिता नृणाम् । आमाशयमधिष्ठाय ततो गुल्मान् प्रकुर्वते ।। ४ ।।

चेष्टा तथा सामान्य अन्नपान से मनुष्य के प्रकुपित हुए दोष आमाशय में गुल्मों को उत्पन्न करते हैं। चरक चि. अ. ५ में गुल्म रोग की निदान तथा सम्प्राप्ति निम्न प्रकार से दी है—विट्सुश्लेष्मपित्तातिपरिस्रवाद्द्वा तैरेव वृद्धैरतिपीडनाद्द्वा । वेगैरुदीर्णैर्विहतैरधो वा बाह्याभिघातैरतिपीडनैर्वा ।। रूक्षान्नपानैरतिसेवितैर्वा शोकेन मिथ्याप्रतिकर्मणा वा । विचेष्ठितैर्वा विषमातिमात्रैः कोष्ठे प्रकोपं समुपैति वायुः ।। कफं च पित्तं च स दूषयित्वा प्रोद्धूपमार्गांन्विनिबद्ध्यताभ्याम् । हृन्नाभिपार्श्वोदरबस्तिशूलं करोत्यधोयाति न बद्धमार्गः ।। अर्थात् पुरीष, कफ, पित्त आदि के अत्यधिक स्राव अथवा अन्य उदीर्ण हुए वेगों को रोकने इत्यादि कारणों से कोष्ठ में वायु का प्रकोप हो जाता है। वह प्रकुपित वायु कफ तथा पित्त को अपने स्थान से विचलित करके मार्गों को रोक देता है जिससे हृदय, नाभि, पार्श्व उदर तथा बस्ति में शूल उत्पन्न हो जाता है तथा मार्ग के रुके होने से वह नीचे की ओर नहीं जाता ।। ४ ।।

वातश्लेष्मन्नपानेषु वातलो यः प्रसज्जति । धावति प्लवतेऽधीते भृशं गायति नृत्यति ।। ५ ।।
शीतवाताम्बुसेवी च शीतरूक्षकटुप्रियः । व्याधिक्लिष्टः कृशो रूक्षः सेवते तीक्ष्णमौषधम् ।। ६ ।।
उदीरयति च्छर्दिं च बलाच्छर्दयतेऽपि वा । निरुणद्धि च वातादीन् तृप्तः पिबति वा बहु ।। ७ ।।
शीघ्रयानेन वा यति व्यवायं वाऽतिसेवते । व्यायामाध्ययनस्त्रीषु बालो रूक्षश्च यो रतः ।। ८ ।।
एतैश्चान्यैश्च कुपितो मारुतो दोषसंचयम् । करोति यत्र तत्रास्य स्थाने गुल्मो निचीयते ।। ९ ।।

वातगुल्म का निदान—जो वात प्रकृति वाला मनुष्य वात प्रधान अन्नपानों का सेवन करता है, अधिक दौड़ता है, तैरता है, पढ़ता है, गाता है, नाचता है, शीतल वायु एवं जल का सेवन करता है, शीतल सूक्ष्म तथा कटु पदार्थ जिसे प्रिय हों, जो व्याधि से आक्रान्त हो, कृश तथा रूक्ष हो, जो तीक्ष्ण ओषधियों का सेवन करतो हो, जो वमन के वेग को उदीर्ण करता हो तथा बलपूर्वक वमन करता हो, जो वातादियों के वेगों को रोकता हो तथा तृप्त होने के बाद भी बहुत अधिक जल पीता हो, जो शीघ्र चलने वाली सवारी पर चलता हो, अत्यन्त मैथुन करता हो, जो बालक एवं रूक्ष व्यक्ति व्यायाम, अध्ययन तथा स्त्री में रत रहता हो-इन कारणों से तथा अन्य भी कारणों से कुपित हुआ वायु जिस २ स्थान में दोषों को संचित करता है उसके उन २ स्थानों में गुल्म कर देता है। चरक नि. अ. ३ में इसकी निदान तथा सम्प्राप्ति निम्न प्रकार से दी है—यदा पुरुषो वातलो विशेषेण ज्वरवमनविरेचनातीसाराणामन्यतमेन कर्शनेन कर्शितो वातलमाहारमाहरति शीतं वा विशेषेणातिमात्रमस्नेहपूर्वे वा वमनविरेचने पिबत्यनुदीर्णो वा छर्दिमुदीरयति