भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 543

द्विव्रणीयचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १८५

उष्णजल का परिषेक, लङ्घन (उपवास) बन्धन तथा स्रावण के द्वारा कफव्रण को शान्त करे। चरक चि. अ. २५ में कहा है—कषायकटुरूक्षोष्णैः प्रदेहपरिषेचनैः। कफव्रणं प्रशमयेत्तथा लङ्घनपाचनैः॥ इसी युक्ति से अन्य व्रणों की चिकित्सा करे। स्रावण (Drainage), पाटन (भेदन-Incision), दहन (जलाना-Canterisation), सीवन (Suturing-stiching), एषण (शलाका द्वारा अन्वेषण-Probing-Exploring) तथा साहस आदि का प्रयोग अत्यन्त छोटे बालकों में नहीं करना चाहिये॥१०॥

अत्र श्लोकाः—

जीर्णैः प्रक्षालितैर्वस्त्रैस्तथा बद्धं निधापयेत्। यथौषधं न पतति बालकं च न पीडयेत् ॥११॥

पुराने तथा धोए हुए वस्त्रों के द्वारा व्रण पर इस ढंग से बन्ध (पट्टी) बांधकर रखे जिससे औषधि नीचे न गिरे तथा बालक को अत्यन्त पीडा नहीं देनी चाहिये॥

वैसर्पः श्वयथुर्दाहो ज्वरस्तृडतिबन्धनात्। शिथिलादनवस्थां मध्यमस्तु प्रशस्यते ॥१२॥

यदि पट्टी बहुत जोर से बांधी जाय तो विसर्प, श्वयथु, दाह, ज्वर तथा तृषा हो जाती है। यदि पट्टी बहुत ढीली बांधी जाय तो औषधि आदि अपने स्थान पर ही नहीं ठहरेंगी। इसलिये यही मध्यम (अर्थात् न बहुत जोर से तथा न बहुत ढीली) प्रशस्त मानी जाती है॥१२॥

वातातर्पत्तृणकाष्ठाम्बुमक्षिकादिभयाद्व्रणम्। बन्धो रक्षति शीघ्रं च दह्यते न च खादति ॥१३॥

पट्टी—वायु, धूप, तृण, काष्ठ, पानी तथा मक्खी आदि के भय से व्रण की रक्षा करती है। इससे व्रण का दहन नहीं होता तथा यह कृमि आदियों द्वारा खाया नहीं जाता। सुश्रुत चि. अ. १ में कहा है—यस्माच्छुध्यति बन्धेन व्रणो याति च मार्दवम्। रोहत्यपि च निःशङ्कस्तस्माद्बन्धो विधीयते॥१३॥

ज्वरवैसर्पदाहर्तं रक्तपित्तोल्बणं व्रणम्। न बध्नीयाद्द्विरहस्तु सर्वं प्रक्षालयेद्व्रणम् ॥१४॥

ज्वर, विसर्प तथा दाह से युक्त एवं रक्तपित्त की अधिकता वाले व्रणों पर बन्ध (पट्टी) नहीं बांधनी चाहिये। इस प्रकार के सब व्रणों का दिन में दो बार प्रक्षालन करना चाहिये॥१४॥

द्वे हरिद्रे तिलाः सर्पिः सैन्धवं मधुकं त्रिवृत्। अरिष्टपत्रमित्येष कल्कः शोधनरोपणः ॥१५॥

हरिद्रा, दारुहरिद्रा, तिल, घी, सैन्धव, मुलहठी, त्रिवृत् तथा नीम के पत्ते—इनका कल्क व्रण का शोधन एवं रोपण करता है। सुश्रुत चि. अ. १ में कल्कप्रणिधान का निम्न प्रयोजन कहा है—पूतिमांसप्रतिच्छन्नान् महादोषांश्च शोधयेत्। कल्कीकृतैर्थालाभं .......॥

शोधने रोपणे चैव युक्त्या क्षौद्ररसक्रिया। तत्र निर्वापणे चोक्ता घृतेनोदकसक्तवः ॥१६॥

व्रण के शोधन तथा रोपण में युक्तिपूर्वक क्षौद्र (मधु) तथा रसक्रिया (Extracts) का प्रयोग करना चाहिये। तथा निर्वापण के लिये पानी में तैयार किये हुए सत्तूओं का घी के साथ प्रयोग करना चाहिये। निर्वापण से अभिप्राय दाह को शान्त करने वाले लेपों से है। सुश्रुत चि. अ. १ में व्रण में क्षौद्र (मधु) का निम्न स्थानों पर विधान दिया है—क्षतोष्मणो निग्रहार्थं सन्धानार्थं तथैव च। सद्यो व्रणेष्व्यायतेषु क्षौद्रसर्पिर्विधीयते॥ सुश्रुत में रसक्रिया का निम्न प्रयोजन बताया है—तैलेनाशुध्यमानानां शोधनीयां रसक्रियाम्। व्रणानां स्थिरमांसानां कुर्याद् द्रव्यैरुदीरितैः॥ सुश्रुत में निर्वापण का निम्न प्रयोजन दिया है—दाहपाकज्वरवतां व्रणानां पित्तकोपततः। रक्तेन चाभिभूतानां कार्ये निर्वापणं भवेत्॥ यथोक्तैः शीतलद्रव्यैः क्षीरपिष्टैर्घृतप्लुतैः। दिह्यादबह (हु) लान् सेकान् सुशीतांश्चावचारयेत्॥ इसके द्वारा सेक और लेप दो प्रकार का निर्वापण