काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 544, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें१८६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् द्विव्रणीयचिकित्सिताध्यायः ? ]
कहा है। निर्वापण के लिये चरक चि. अ. २५ में भी कहा है—सर्पिषा शतधौतेन पयसा मधुकाम्बुना। निर्वापयेत् सुशीतेन रक्तपित्तोत्तरान् व्रणान्। अर्थात् रक्त और पित्त प्रधान व्रणों में निर्वापण किया जाता है ॥१६॥
समङ्गाधातकीपुष्पमग्रस्थामलकीत्वचम्। घृतं कृष्णास्तिला मांसी कल्कोऽयं व्रणरोपणः ।।१७।।
मंजिष्ठा, धाय के फूल, अग्रस्था, आंवले की छाल, घी, काले तिल तथा जटामांसी का कल्क व्रण का रोपण करते हैं। कषाय, लेप आदियों से शोधन हो जाने पर व्रण का रोपण करना चाहिये। सुश्रुत में रोपण का उद्देश्य एवं विधान निम्न प्रकार से बताया है—पित्तरक्तविषागन्तून् गम्भीरानपि च व्रणान्। रोपयेद्रोपणीयेन क्षीरसिद्धेन सर्पिषा ।। कफवाताभिभूतानां व्रणानां मतिमान् भिषक्। कारयेद्रोपणं तैलं भेषजैस्तद्यथोदितैः ।।१७।।
एतैरेवौषधैः सर्वैः सर्पिस्तैलमथो पचेत्। व्रणरोपणमित्याहुः कट्फलं वाऽवचूर्णितम् ।।१८।।
इन्हीं मंजिष्ठा आदि उपर्युक्त औषधियों से ही घी तथा तेल का पाक करे। ये व्रणरोपण कहलाते हैं। अथवा इन पर कट्फल चूर्ण का अवचूर्णन (Dusting) करना चाहिये ॥१८॥
ज्वरदाहपिपासातर्या पच्यमानं व्रणं वदेत्। तेषां निवृत्तौ जानीयात् पक्वं पीनोन्नताकृतिम् ।।१९।।
पच्यमान व्रण का लक्ष्य—ज्वर, दाह, एवं पिपासा से युक्त होने पर व्रण को पच्यमान (पकने की स्थिति में विद्यमान) जाने। तथा इन उपर्युक्त दाह आदि लक्षणों के निवृत्त हो जाने (हट जाने) पर मोटे तथा उठी हुई आकृति वाले व्रण को पक्व (पका हुआ) समझे ॥१९॥
मर्मस्थश्चेदुपेक्ष्यः स्याद्बालं धात्रीं च पूरयेत्। गोदध्ना प्रक्षितं चैनं बध्नीयाल्लवणान्वितम् ।।२०।।
यदि व्रण मर्मस्थान पर हो तथा यदि रोगी धात्री और बालक हो तो उसकी उपेक्षा करनी चाहिये अर्थात् उसे चीरना नहीं चाहिये। अपितु व्रण को पहले थोड़ा रगड़ कर उन पर गौ की दही में नमक मिलाकर बांध दे तथा इसके द्वारा व्रण का पूरण करे ॥२०॥
अमर्मजं पाटयेद्वा नेत्येके पूर्वदर्शनात्। रक्तक्षयादल्पभावाद्धन्याद्बालं कुपण्डितः ।।२१।।
यदि व्रण मर्मस्थान पर न हो तो उसका पाटन (दारण-Incision)कर देना चाहिये। कुछ लोग कहते हैं कि पूर्व दर्शन (अच्छी प्रकार देखे बिना अथवा पहले इस कार्य को अच्छी प्रकार जब तक देखा हुआ न हो) के बिना इस पाटन (भेदन) के कार्य को न करे। क्योंकि जो अज्ञानी वैद्य है वह रक्तक्षय (Bleeding) तथा रक्त के कम होने से बालक को मार देता है। अर्थात् बालक में पहले ही रक्त की कमी होती है उस अवस्था में यदि रक्तस्राव (Bleeding) अधिक हो जाय तो बालक की मृत्यु हो सकती है। व्रण का पाटन (भेदन) करने के बाद ........ (उसे स्नेहपान तथा स्निग्ध सेक आदि उपचार करना चाहिये) ॥२१॥
पाटितं वा प्र......................................................
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(इति ताडपत्रपुस्तके १२६ तमं पत्र¹म्।)
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१. अस्याग्रे १२७ तमं पत्रं खण्डितं ताड़पत्रपुस्तके।