काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्विव्रणीयचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १८७
......................... (मञ्जि) ष्ठाऽथ मनःशिला।
प्रलेपः सघृतक्षौद्रः सवर्णकरणः परम्।।
सवर्ण करण योग—मंजिष्ठा, मनःशिला ........ इत्यादि का घी एवं मधु के साथ मिलाकर लेप करना उत्तम सवर्णकरण (त्वचा के वर्ण के समान वर्ण का करना) योग है।।
त्रिफला जातिपुष्पाणि कासीसं लोहपत्रिका। लेपः सगोमयरसः सवर्णकरणः परम्।।
त्रिफला, जातिपुष्प (लौंग), कासीस तथा लोहचूर्ण इनका गोबर के रस (पानी) के साथ मिलाकर लेप करना उत्तम सवर्णकरण माना गया है। व्रण का रोहण होने के बाद त्वचा आ जाने पर यदि उस नवीन त्वचा का वर्ण देह की अन्य त्वचा के साथ न मिले तो उसका रंग उसके समान करने का प्रयत्न करना चाहिये इसे सवर्णकरण कहते हैं। सुश्रुत चि. अ. १ में कहा है—दुरुढत्वा कृष्णानां पाण्डुकर्म हितं भवेत्। सप्तरात्रं स्थिरं क्षीरे छागले रोहिणीफलम्।। तेनैव पिष्टं सुश्लक्ष्णं सवर्णकरणं हितम्।। इसी प्रकार चरक चि. अ. २५ में भी सवर्णकरण योग दिये हैं।
चतुष्पदानां त्वग्रोमखुरशृङ्गास्थिभस्मना। तैलाक्ता चूर्णिता भूमिर्र्भवेल्लोमभरुहा पुनः।।
लोमोत्पादन—जहां लोम उत्पन्न करने हों उस स्थान पर तैल चुपड़कर गौ घोड़े आदि चौपाये पशुओं की त्वचा, रोम (बाल), खुर (सींग) तथा अस्थि की भस्म का अवचूर्णन करे इससे उस स्थान पर पुनः बाल उग जाते हैं। सुश्रुत चि. अ. १ में भी यह श्लोक इसी रूप में दिया गया है। इसी प्रकार चरक चि. अ. २५ में भी यह श्लोक बिलकुल इसी रूप में दिया गया है।
अथ खलु बालानामष्टौ पिडकाः स्वशरीरदोषात् स्वदोषाच्चोत्पद्यन्ते। तासां निदानलक्षणे प्रोक्ते; नामरूपचिकित्सां च ब्रूमः-शराविका च कच्छपिका च जालिनी च ताः कफप्रायाः, सर्षपिका चाऽलजी च विद्रधिश्च ताः पित्ताधिकाः, विनता वाताधिका, सर्वदोषजा त्वरुंषिका। तासां लक्षणानि-मध्ये निम्ना शराविका, श्लक्ष्णोन्नता कच्छपिका, सिराजालतनुच्छिद्रवती जालिनी, सर्षपाभाऽल्पाऽऽशुपाकिनी बहुला वा सर्षपिका, बहुपद्रवाऽऽशुपाकवैसर्पाऽलजी, विनता तूदरे पृष्ठे वाऽवगाढनीला रुजावती; मांसपाकस्तु पित्तप्रकोपो वा उत्पद्यते; स एव सन्धिषु मर्मसु वा विद्रधिरित्युच्यते विदह्याशु अङ्गं विदीर्यत इति विद्रधिः, सा बहिरन्तश्चोत्पद्यते; ते चोभे बालानां कृच्छ्रसाध्ये। त्रिदोषजा त्वरुंषिका चतुर्विधा दोषभेदादेकैकाधिकसमदोषत्वात्; शूलतोदाटोपस्फुरणानाहपामा वातलिङ्गानि, ज्वरतृष्णादाहमोहमदप्रलापाः पित्तलिङ्गानि, शैत्यपैच्छिल्यबहुक्लेदारुचिस्तैमित्यानि कफलिङ्गानि, सर्वैः समदोषत्वम्, अन्यत्रापि च व्रणे पूर्वोक्तानि च लक्षणानि।।
बालकों को अपने शरीर के दोष से अथवा अपने ही दोष के कारण आठ पिडकाऐं हो जाती हैं। उनके निदान तथा लक्षण पहले कहे जा चुके हैं। अब हम उनके नाम, स्वरूप, तथा चिकित्सा कहेंगे। इनमें शराविका, कच्छपिका, तथा जालिनी—ये तीन कफ की अधिकता वाली, सर्षपिका, अलजी तथा विद्रधि-ये तीन पित्त की अधिकता वाली, विनता वात की अधिकता वाली तथा अरूंषिका त्रिदोषज होती है। चरक सू. अ. १७ में अरूंषिका को छोड़कर शेष ७ पिडकाऐं दी हैं जो कि प्रमेह पिडकाऐं कहलाती हैं। ये मधुमेह की उपेक्षा से हो जाती हैं। सुश्रुत नि. अ. ६ में १० पिडकाओं का उल्लेख किया गया है—'तत्र वसामेदोभ्यामभिपन्नशरीरस्य त्रिभिर्दोषैरनुगतधातोः प्रमेहिणो दश पिडकाः जायन्ते। तद्यथा-शराविका सर्षपिका कच्छपिका जालिनी विनता पुत्रिणी मसूरिका अलजी विदारिका विद्रधिका चेति। इन पिडकाओं के लक्षण निम्न हैं। शराविका का लक्षण—बीच में से दबी हुई होती है। चरक सू. अ. १७ में इसका निम्न लक्षण