काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् द्विव्रणीयचिकित्सिताध्यायः ? ]
दिया है—अन्तोन्नता मध्यनिम्ना श्यावाक्लेदरुजान्विता। शराविका स्यात्पिडका शरावाकृतिसंस्थिता।। अर्थात् जिस पिडका के किनारे ऊंचे उठे हुए हों, बीच में से दबी हुई हो, श्याम वर्ण की हो तथा जिसमें क्लेद और वेदना हो उसे शराविका कहते हैं। इसकी आकृति शराव (सकोरे) की तरह होती है। इसी प्रकार सुश्रुत नि. अ. ६ में भी कहा है। कच्छपिका का लक्षण—यह श्लक्ष्ण एवं उन्नत होती है। चरक सू. अ. १७ में कहा है—स्वगाढार्तिनिस्तोदा महावास्तुपरिग्रहा। श्लक्ष्णा कच्छपपृष्ठाभा पिडकाकच्छपीमता ॥ अर्थात् जिस पिडका में अर्ति (पीडा), तोद (सुई चुभने के समान वेदना), हो जिसका आश्रय बहुत बड़ा हो, जो चिकनी तथा कछुए की पीठ के समान उभरी हुई हो उसे कच्छपी कहते हैं। सुश्रुत नि. अ. ६ में भी कहा है—सदाहाकूर्मसंस्थाना ज्ञेया कच्छपिका बुधैः॥ जालिनी के लक्षण-यह शिराओं के जाल से युक्त होती है तथा इसमें छोटे २ छिद्र होते हैं। चरक सू. अ. १७ में कहा है—स्तब्धा शिराजालवती स्निग्धस्त्रावामहाशया। रुजानिस्तोदबहुला सूक्ष्मच्छिद्रा च जालिनी ॥ अर्थात् जो स्तब्ध, शिराओं के जाल से युक्त, स्निग्ध स्त्राव युक्त, बड़े आशय वाली हो, जिसमें पीडा तथा तोद (सूचीवेध वत् पीडा) हो, जिसमें सूक्ष्म छिद्र हों उसे जालिनी कहते हैं। सर्षपिक का लक्षण—जो सरसों के आकार की होती है तथा जो छोटी शीघ्र पकने वाली और संख्या में बहुत सी होती हैं। अर्थात् सरसों के प्रमाण की छोटी २ बहुत सी पिडकाओं के एकत्र मिलने से जो एक पिडका बन जाती है। तथा जो बहुत बड़ी न हो और शीघ्र पक जाती हो उसे सर्षषिका कहते हैं। चरक सू. अ. १७ में कहा है—पिडका नातिमहती क्षिप्रपाका महारुजा। सर्षपी सर्षपाभाभिः पिडकाभिश्चिता भवेत् ॥ इसी प्रकार सुश्रुत नि. अ. ६ में भी कहा है। अलजी का लक्षण जो अनेक उपद्रवों से युक्त हो, शीघ्र पक जाती हो तथा चारों ओर फैलती जाती हो उसे अलजी कहते हैं। चरक सू. अ. १७ में कहा है—दहति त्वचमुत्थाने तृष्णामोहज्वरप्रदा। विसर्पत्यनिशं दुःखाहत्यग्नि रेवालजी ॥ अर्थात् अलजी नामक पिडका के उत्पन्न होने के समय त्वचा में दाह होती है। इसमें प्यास, मोह तथा ज्वर भी हो जाता है। यह चारों ओर फैलती जाती है तथा इसमें अग्नि के समान अत्यन्त दारुण दाह होता है। सुश्रुत नि. अ. ६ में कहा है—रक्ता सिता स्फोटवती दारुणा त्वलजी भवेत्। विनता का लक्षण—जो पेट और पीठ पर होती है, जो वर्ण में गहरी नीली हो, तथा जिसमें पीडा होती हो उसे विनता कहते हैं। चरक सू. अ. १७ में कहा है—अवगाढरुजाक्लेदा पृष्ठे वाऽप्युदरेऽपि वा। महती विनता नीला पिडका विनता मता ॥ विद्रधि का लक्षण—इसमें जब मांस का पाक हो जाय तथा पित्त का प्रकोप हो और यह सन्धि एवं मर्मस्थान पर हो तब उसे विद्रधि कहते हैं। यह शीघ्र ही विदाह को प्राप्त हो जाती है तथा अङ्गों को विदीर्ण करती है इसलिये इसका नाम विद्रधि है। विद्रधि दो प्रकार उत्पन्न होती है। १. शरीर के बाहरी भाग में (बाह्य विद्रधि) तथा २. शरीर के अन्तः भाग में (अन्तर्विद्रधि)। बालकों में ये दोनों विद्रधियां कृच्छ्रसाध्य होती हैं। (विद्रधि को Abscess कहते हैं) चरक सू. अ. १७ में इन दोनों प्रकार की विद्रधियों का स्वरूप दिया है—विद्रधिं द्विविधामाहुर्बाह्यामाभ्यन्तरीं तथा ! बाह्य विद्रधि के लक्षण—बाह्या त्वक्स्नायुमांसोत्था कण्डराभा महारुजा। अर्थात् यह शरीर के बाहर त्वचा स्नायु एवं मांस में होती है। यह कण्डरासदृश तथा अतिवेदना युक्त होती है। आगे चरक में अन्तर्विद्रधि के निम्न लक्षण दिये हैं—अन्तः शरीरे मांसासृगाविशन्ति यदा मलाः। तदा संजायते ग्रन्थिर्गम्भीरस्थः सुदारुणः॥ हृदये क्लोम्नि यकृति प्लीह्नि कुक्षौ च वृक्कयोः॥ अर्थात् भिन्न २ कारणों से कुपित हुए दोष जब शरीर के अन्दर मांस तथा रक्त में प्रविष्ट होते हैं तब हृदय, क्लोम, यकृत आदि अवयवों में गम्भीर एवं अत्यन्त कष्टकर ग्रन्थि उत्पन्न हो जाती है। इसमें तीव्र वेदना होती है। अरूंषिका का लक्षण—त्रिदोषज अरूंषिका चार प्रकार की होती है। दोष भेद से एक २ दोष की अधिकता से तीन तथा तीनों दोषों के समान होने से चौथी होती है। अर्थात् त्रिदोषज होने पर भी वात, पित्त तथा कफ की अधिकता होने से तीन तथा चौथी जिसमें तीनों दोष समान मात्रा में बढ़े हुए हों—ये चार होती हैं। अरूंषिका के विषय में सुश्रुत नि. अ. १३ में कहा है—अरूंषि बहुवक्त्राणि बहुक्लेदानि मूर्ध न। कफासृक् कृमिकोपेन नृणां विद्यादरुंषिकाम् ॥ अर्थात् कफ रक्त और कृमियों के प्रकोप से मनुष्यों के शिर में अनेक मुख वाले और स्त्रावयुक्त व्रण हो जाते हैं उन्हें अरुंषिका