काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 547, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्विव्रणीयचिकित्सिताध्यायः १ ] चिकित्सास्थानम् १८९
कहते हैं। इसे Eczema of the Scalp समझना चाहिये। वातिक अरूषिका के लक्षण—शूल, तोद (सूचीव्यधवत् पीडा), आटोप, स्फुरण (फड़कना), आनाह तथा पामा ये वातिक अरूंषिका के लक्षण हैं। पैत्तिक अरूषिका के लक्षण—ज्वर, तृष्णा, दाह, मोह, मद तथा प्रलाप ये पैत्तिक अरूंषिका के लक्षण हैं। श्लैष्मिक अरूंषिका के लक्षण—शीत, पिच्छिलता (चिपचिपापन), बहुत क्लेद (गीलापन), अरुचि तथा स्तिमितता ये श्लैष्मिक अरूंषिका के लक्षण हैं। समदोषज अरूषिका के लक्षण—समदोषज अरूंषिका में उपर्युक्त सब लक्षण होते हैं। अन्यत्र व्रणों के जो पहले लक्षण कहे हैं वे लक्षण भी इनमें होते हैं॥
तत्र श्लोकाः—
पूर्वं सराविकाद्यासु सुस्निग्धस्य विरेचनम्। शस्यते च भिषक् ! तासु व्रणकर्म यथोचितम् ।।
**चिकित्सा—**सर्व प्रथम शराविका आदि पिडकाओं में अच्छी प्रकार स्नेहन करके विरेचन देना चाहिये। तदुपरान्त उनमें यथोचित व्रणकर्म (व्रणचिकित्सा) करना चाहिये। सुश्रुत चि. अ. १२ में भी कहा है—तत्र शस्त्रप्रणिधानमुक्तं व्रण क्रियोपसेवा च। अर्थात् शस्त्र द्वारा आवश्यकतानुसार छेदन भेदन आदि करके व्रणों की जो चिकित्सा है वह करनी चाहिये॥
निवर्तनमपक्वासु पिडकासु प्रयोजयेत्। परिषेकैः प्रलेपैश्च घृतपानैर्हिताशनैः ।।
अपक्व पिडकाओं में परिषेक प्रलेप, घृतपान तथा हितकर अन्न द्वारा उनको शान्त करने का प्रयत्न करना चाहिये। सुश्रुत चि. अ. १२ में कहा है—“अपक्वानां पिडकानां शोफवत् प्रतीकारः''। सुश्रुत चि. अ. २३ में शोफ की सामान्य चिकित्सा का वर्णन है॥
अरूंषिकासु सततं शिरसो मुण्डनं हितम्। स्नापनं प्रक्षणं चैव व्रणतैलैरनेकंशः ।।
**अरूंषिका की चिकित्सा—**अरूंषिका (Eczema of the Scalp) में सिर का मुण्डन करवाकर अच्छी प्रकार स्नान कराये तथा व्रण तैलों के द्वारा बार २ सिर की मालिश करनी चाहिये॥
द्वे हरिद्रे त्रिकटुकं सैन्धवं वा (च) मनःशिला। सुवर्णजो जपा जातिर्वचा कुष्ठं रसक्रिया ।।
अश्वघ्नमूलोदकणादशमूलं फलत्रयम्। एतैर्गोमूत्रसंयुक्तैः प्रमृद्रीयादरुंषिकाम् ।।
एतैरेव पचेत्तैलं हन्ति तच्चाप्यरुंषिकाम् ।
हरिद्रा, दारुहरिद्रा, त्रिकटु, सैन्धव, मनःशिला, सुवर्ण के वर्ण वाला जपा (जवाकुसुम), जाति (जायफल) वच तथा कूठ—इनकी रसक्रिया, कनेर की जड़, जल पिप्पली, दशमूल, त्रिफला—इनके चूर्णों को गोमूत्र में मिलाकर अरूंषिका का मर्दन करना चाहिये। तथा इन्हीं उपर्युक्त ओषधियों द्वारा बनाया हुआ तैल भी अरूंषिका को नष्ट करता है॥
अथ चेद्वेदनां दद्यात्तैलैरुद्वर्तयेत्ततः ।।
स्वादुना व्रणतैलेन नवनीतेन वा दिहेत् ।
यदि इन अरूंषिकाओं में वेदना होती हो तो तिलों के द्वारा उनका उद्धर्तन (उबटन) करना चाहिये। अथवा उस पर स्वाद व्रण तेल या मक्खन का लेप करना चाहिये॥
अथो सलोहितां छिन्नां क्षुरेणारुषिकां भिषक् ।।
तुल्याभ्यां क्षीरमूत्राभ्यां सिद्धोष्णाभ्यां प्रलेपयेत् ।