भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 548

१९० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् द्विव्रणीयचिकित्सिताध्यायः ? ]

यदि अरूंषिका रक्तपूर्ण हों तो वैद्य को चाहिये कि उसे उस्तरे के द्वारा काट करके उन पर समान मात्रा में गोदुग्ध एवं गोमूत्र पकाकर गरम २ ही उनका लेप करना चाहिये ॥

न चेदेवं निवर्तेरन् स्रावणं तु ततः परम् ।।

उपर्युक्त चिकित्सा के द्वारा भी यदि वे ठीक न हों तो उनका स्रावण करना चाहिये । सुश्रुत चि. अ. २० में इनकी निम्न चिकित्सा दी है—अरूंषिकां हृते रक्ते सेचयेन्निम्बवारिणा । ....... इत्यादि । अर्थात् रक्तमोक्षण तथा नीम के पानी से सेचन करके अश्वपुरीष रस से युक्त लवण का अथवा हरताल आदि का लेप करना चाहिये ॥

यदा पक्वेष्टकाचूर्णैरभीक्ष्णं गुण्ड्यते शिशुः । त्रपुसैर्वारुबीजं वा खादतोऽङ्गेषु शुष्यति ।। मेदोऽभिवर्धनं चान्नं दिवास्वप्नं च सेवते । तस्य भेदः प्रकुपितं वायुना त्वचमाहृतम् ।। मेदःपूर्णत्वचान्बद्धा जनयत्यरकीलिकाम्¹ । लवकर्तन(तश्चैता)दृश्यन्ते च क्वचित् क्वचित् ।। कर्कन्धुगोस्तनप्रख्या वर्धमाना भवन्ति च ।

अरकीलिका (शलाकाकार कील) का निदान एवं सम्प्राप्ति—जब बालक के शरीर पर निरन्तर पकी हुई ईंट का चूर्ण लगता रहे । खीरे या ककड़ी के बीज खाने से जिसके अङ्ग (अवयव) सूख जाय । जो मेदवर्धक अन्न का सेवन करता हो तथा दिन में सोता हो । उसका मेद प्रकुपित होकर वायु के द्वारा त्वचा में पहुंच जाता है । तथा त्वचा के मेद से पूर्ण (युक्त) हो जाने पर अरकीलिका उत्पन्न हो जाती है । प्रारंभ में ये छोटे २ उभार से कहीं २ दिखाई देते हैं तथा धीरे २ बढ़कर कर्कन्धु (ककरौंदे) और मुनक्के के समान बड़े हो जाते हैं । अन्य ग्रन्थों में इनका चर्मकील के रूप में वर्णन किया गया है । सुश्रुत नि. अ. २ में कहा है—व्यानस्तु प्रकुपितः श्लेष्माणं परिगृह्य बहिः स्थिराणि कीलवदर्शांसि निर्वर्तयति, तानि चर्मकीलान्यर्शांसीत्याचक्षते । अर्थात् क्षुब्ध व्यान वायु कफ को ग्रहण करके बाह्य त्वचा पर न बढ़ने वाले कील के समान मस्से उत्पन्न करते हैं । अष्टाङ्गहृदय में इसे मसों का ही एक रूप कहा है—मषेभ्यस्तून्नततरान् चर्मकीलान् सितासितान् ॥

तासां दहनमेवाग्रे तप्तैः स्नेहैर्गुडेन वा ।। एकैकशो हितं जन्तोश्छित्वा वा क्षारसारणम् । बन्धनं क्षारसूत्रैर्वा व्रणकर्म ततः परम् ।।

अरकीलिका की चिकित्सा—सर्व प्रथम उष्ण स्नेह अथवा गुडों के द्वारा इनका दहन (Canterisation) करना चाहिये । अथवा एक २ कीलिका को काटकर उन पर क्षार का प्रतिसारण करना चाहिये । अथवा क्षार सूत्रों के द्वारा इन्हें बांध देना चाहिये । तथा उसके बाद व्रण में उपयोगी कर्म करना चाहिये अर्थात् फिर उसकी व्रण के अनुसार चिकित्सा करनी चाहिये ।

विरुद्धान्ध्यशनपूतिपर्युषितात्युष्णाविषमाशनात्तुर ........ णादवलङ्घनादवधूननाद्बीजानां कोद्रवण-बीजमूलकातसीकार्पासानां तुवरीकुलत्यादीनां दह्यमानानां गन्धाघ्राणात् तथा वस्त्रावकर्तनालभल्लातकास्थि .................................

उपर्युक्त गद्यांश बीच में ही खण्डित हो जाने से यह कहना कठिन है कि प्रस्तुत वाक्य किस विषय में कहे जा रहे हैं । फिर भी यह तो कहा ही जा सकता है कि ये किसी त्वग्रोग के ही निदान प्रतीत होते हैं—विरुद्ध भोजन, अध्यशन, पूति (दुर्गन्धयुक्त), पर्युषित (बासी) अत्यन्त उष्ण, एवं विषमाशन .......... लङ्घन, बीज आदि के अवधूनन तथा जलते


१. अरशलाकाकाराः कीलिका इत्यर्थः ।