काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्विव्रणीयचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १९१
हुएं कोदों, शणबीज, मूली, अलसी, कपास, तुवरी, तथा कुलत्थ आदि की गन्ध के सूंघने से और वस्त्रों के द्वारा काटने, आल (हरताल) भल्लातक और अस्थि ............... आदि से यह रोग हो जाता है ॥ .................................................. (इति ताडपत्रपुस्तके १२८ तमं पत्रम्१)
.................................................. .................................................. ................................ शालिपिष्टकसाधितम् । शीतं सशर्करक्षौद्रनवनीतं ................... ....... लेहयेन्नवनीतं वा लेहयेद्वा तपश्चितम् (?) । दीप्ताग्निमवसन्नाग्निं स्तन्येनैव तु धारयेत् ।
यह प्रसङ्ग भी ऊपर खण्डित है अतः निश्चित रूप से इसके विषय में भी कुछ कहना कठिन है। यह किसी रोग के लिये कोई अवलेह दिया हुआ प्रतीत होता है—दीप्त अग्नि वाले बालकों को ....... को शालि चावलों की पिष्टि से सिद्ध करे, ठण्डा होने पर उसमें शर्करा, मधु तथा मक्खन मिलाकर चटाये अथवा उसे नवनीत (मक्खन) और तपश्चित (मलाई) चटाये । परन्तु मन्द अग्नि वाले बालकों को केवल दूध ही देना चाहिये ॥
चपलानां तु बालानां सर्पतां वा तथा भृशम् ।। तृष्णाकाष्ठेष्टकाशस्त्रैरन्यैर्वाऽपि क्षतं भवेत् । आमच्छेदवदे (वेदं) दारुणस्तस्य चात्ययः ।।
चपल एवं बहुत अधिक सर्पण करने वाले (इधर उधर चलने फिरने वाले) बालकों को तृण, काष्ठ (लकड़ी) ईंट, शस्त्र अथवा अन्य किसी वस्तु से क्षत (Inqury) हो जाता है। यह उसके लिये आमच्छेद (कच्चा छेदन-कटना) की तरह भयंकर रोग हो जाता है ॥
संदध्यात्तं विनिर्मृज्य सिञ्चेदुष्णोदकेन च । अथातिरुधिरस्त्रावे संस्तम्भयः शीतवारिणा ।।
अच्छी तरह साफ करके उष्ण जल से उसका परिषेचन करे। यदि रक्तस्त्राव (Bleeding) अधिक हो तो शीतल जल के द्वारा उसका स्तम्भन करना चाहिये ॥
स्वेदयेद्वा प्रसङ्गे तु दहनं क्षारमेव वा । सहितं मधुसर्पिर्भ्यां बध्नीयात् पथ्यभोजिनः ।। उभयोर्घृतपानं च विदध्याद् व्रणवत् क्रियाम् ।
आवश्यकता के अनुसार उसका स्वेदन, दहन (Cauterisation) एवं क्षारकर्म करके मधु एवं घी के द्वारा उसे बांध दे तथा पथ्य का सेवन करे। इन दोनों को घृत का पान कराना चाहिये। तथा व्रण की तरह क्रिया (उपचार) करनी चाहिये ॥
शीतकालेषु भूयिष्ठं बालानां कुक्षिशायिनाम् ।। स्वमूत्रोपहताङ्गानां मूत्रसंक्लिन्नवाससाम् । तृणेषु वा शयानानां स्नानोद्वर्तनवजिनाम् ।। कृमिमत्कुणयूकानां संभवात्तैश्च भक्षणात् । गात्रं दद्रुलतां याति कटिदेशे विशेषतः ।।
१. अस्याग्रे पत्रत्रयात्मको ग्रन्थः खण्डितस्ताडपत्रपुस्तके।
३५ का.सं.