काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 550, कुल 942 में से
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शीतकाल में प्रायः कुक्षि (गोद) में शयन करने वाले, अपने ही मूत्र के द्वारा भीगे हुए अङ्गों वाले, मूत्र के द्वारा गीले वस्त्रों वाले, तिनकों (घास-फूस) पर सोने वाले, स्नान एवं उबटन से रहित (अर्थात् जिन्हें स्नान नहीं कराया जाता तथा उबटन नहीं लगाया जाता), कृमि, खटमल एवं जूं के हो जाने से तथा उनके द्वारा काटा जाने से बालक का शरीर विशेषकर कटिप्रदेश दद्र (दाद) युक्त हो जाता है ।।
प्रक्षणोद्वर्तनस्नानं गन्धधूपनिषेवणम् । बालानां शस्यते तत्र शय्यायाश्च विकल्पनम् ।।
नित्यमेव तु बालानां निशि स्नेहविमर्दनम् । हितं निद्राकरं बल्यं वर्धनं श्रमनाशनम् ।।
तस्माच्च शस्यते नित्यं बालानां परिमर्दनम् ।
इनका उपचार—इस अवस्था में बालक को मालिश, उबटन एवं स्नान कराना चाहिये तथा गन्ध एवं धूप का प्रयोग करना चाहिये । तथा शय्या को बदल देना चाहिये । रात्रि को प्रतिदिन बालकों को तेल की मालिश करनी चाहिये । तेल की मालिश से बालक को नींद आ जाती है । यह बल्य, वृद्धि, कास एवं श्रमनाशक है इसलिये बालकों को नित्य तैल का मर्दन करना चाहिये ।।
महासेनस्य तुष्ट्यर्थं सृष्टः शक्रेण धीमता ।।
कुञ्जरो दुस्सहो नाम ऐरावण(त)बलद्युतिः । स स्कन्देनोपवाह्याश्च कृतः शाखविशाखयोः ।।
आभ्यां परमतुष्टाभ्यां ग्रामपोऽस्त्यश्मभिः कृतः ।।
उपग्रहाणां सर्वेषामाधिपत्यं च लम्भितः ।
महासेन को तुष्ट करने के लिये बुद्धिमान् इन्द्र ने ऐरावत के समान बलवाले दुस्सह नाम के हाथी को उत्पन्न किया । वह स्कन्द के द्वारा वहन किया जाने योग्य होने से शाख एवं विशाख ग्रहों में उत्पन्न किया गया । अत्यन्त सन्तुष्ट हुए इन शाख और विशाख के द्वारा वह दुस्सह नामक हाथी ग्राम का अधिपति बना दिया गया । इसको सब उपग्रहों का आधिपत्य मिल गया अर्थात् यह सब उपग्रहों का अधिपति हो गया ।।
स यदा क्रुध्यते जन्तोः पूजाकालेष्वपूजितः ।।
पक्षच्छिद्रेषु संध्यासु समाजेषूत्सवेषु च । स्वप्ने त्रासयते बालं चतुर्दंष्ट्रो महागर्जः ।।
सुबुद्ध्यते त्रास्यमानः सहसा वित्रसन् द्रुतम् ।।
जब यह पक्ष, छिद्र, सन्ध्या, समाज, एवं उत्सव आदि पूजा कालों में पूजा न किया जाने पर क्रुद्ध होता है तब यह चार दंष्ट्राओं वाला महागर्ज बालक को स्वप्न में डराता है । बालक डरकर सहसा शीघ्र ही जाग जाता है ।।
यत्रैतमङ्गं स्पृशति गण्डस्तत्रास्य जायते । मेदोलसीकापूर्णानि प्रसज्यन्ते बहून्यपि ।।
पच्यन्ते कानिचित्तेषां निरायान्त्यपराण्यपि । दुःसहं पूजयेत्तत्र पञ्चम्यां नागसत्तमम् ।।
कुलोचितेन न्यायेन तथा नश्येन्ति तान्यपि ।
बालक के जिस अङ्ग का यह स्पर्श करता है उसके उस स्थान पर फोड़े बन जाते हैं । इनमें से बहुत से मेद एवं लसीका से पूर्ण होते हैं इनमें से कुछ पक जाते हैं तथा कुछ शान्त हो जाते हैं । अपनी कुलोचित मर्यादा के अनुसार उस दुःसह नामक विशाल हाथी की पञ्चमी तिथी में पूजा करनी चाहिये । इससे वे गण्ड (फोड़े) नष्ट हो जाते हैं ।।
घृतक्षीराशिनो नित्यं श्लैष्मिकस्यातिभोजिनः ।।
स्वपतो मांसमेदोऽसृग्वृद्धः संवर्तते गदः ।