भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 551

प्रतिश्यायचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १९३

जो सदा घृत एवं दूध का सेवन करते हों, श्लेष्म प्रकृति वाले हों, अधिक भोजन करते हों तथा जो अधिक सोते हों या दिन में सोते हों उनके मांस, मेद एवं रक्त में वृद्धि होती है तथा रोग भी बढ़ जाता है ॥

तस्मान्मातासुतौ चात्र वमनेनोपपादयेत् ।।
शाल्यन्नमुद्गमण्डांस्तु सप्ताहं चोपचारयेत् ।

इसलिये माता एवं पुत्र दोनों को वमन कराकर एक सप्ताह तक शालि अन्न, मूंग की दाल तथा मण्ड का सेवन कराना चाहिये ॥

अशाम्यत्सु विवर्धत्सु शरदाहोऽपि शस्यते ।।
तथैषां छिद्यते मूलं पक्वेषु व्रणवत् क्रिया ।

इस प्रकार यदि यह रोग शान्त न हो तथा बढ़ता चला जाय तो शलाका के द्वारा इसका दाह (Cauterisation) करना चाहिये । इससे इनकी मूल (जड़) नष्ट हो जाती है तथा यदि ये पक जांय तो व्रण की तरह क्रिया करनी चाहिये ॥

इति विविधरोगभेषजं मुनिः शिशुजनहिताय कश्यपोऽब्रवीत् ।
तदिदमुपलक्ष्य पण्डितो भिषक्च्छिशुजनहिताय धारयेत् सदा ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।

इति (चिकित्सास्थाने) द्विव्रणीयोऽध्यायः ।।

इस प्रकार कश्यप मुनि ने बालकों के हित के लिये विविध रोगों की चिकित्सा का उपदेश किया । इसे देखकर विद्वान् वैद्य को चाहिये कि वह बालकों के हित के लिये इसका सदा धारण करे । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥

इति (चिकित्सास्थाने) द्विव्रणीयोऽध्यायः ।।


प्रतिश्यायचिकित्सिताध्यायः ।

अथातः प्रतिश्यायचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ।। १ ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। २ ।।

जब हम प्रतिश्याय चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥

गुरुमधुरशीतरूक्षाभ्यवहारात् संततं द्विविधं वा स्तन्यं पीत्वा पीत्वा स्वपतो नित्यं गुरुत्वाजीर्णयोश्च स्नानात् सश्लेष्मणश्च शीतोदकपानादवगाहनाच्च भुक्ते चातिपिबतो वेगविधारणाच्च सततं संरुद्धवेगस्याभ्यवहाराच्च नित्यं चानुपहितशायिनोऽतिपार्श्वशयनशायिनोऽपावृतमुखशायिनोऽचैश्च निदानैर्मेन्दाग्नेर्विषमाशिनो वातः प्रकुपित ऊर्ध्वकफाशयं प्रदूष्य स्त्रोतांसि प्रतिश्याययति; स यदा मुखस्त्रोतांसि दूषयति तदा मुखरोगाजायन्ते, यदा श्रोत्रं तदा कर्णरोगाः, यदा नासिकामूलं प्रति कफं पित्तमसृग्वा श्याययति तदा प्रतिश्यायइत्युच्यते ।। ३ ।।

प्रतिश्याय का निदान तथा सम्प्राप्ति-गुरु, मधुर, शीत एवं रूक्ष पदार्थों के सेवन से, लगातार दो प्रकार के दूध (मां का तथा ऊपर का दूध) को बार २ पीकर सोने से, प्रतिदिन गुरु पदार्थ खाकर तथा अजीर्ण में स्नान करने से, श्लेष्मा से युक्त व्यक्ति के ठण्डे पानी के पीने तथा ठण्डे पानी में ही अवगाहन (डुबकी लगाना) करने से, खाने के बाद द्रव पदार्थों