काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१९४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् प्रतिश्यायचिकित्सिताध्यायः ? ]
को बहुत अधिक पीने से, वेगों को रोकने से, निरन्तर वेगों के रुके रहने से, सदा ठीक ढंग से न सोने से, लगातार एक ही करवट से सोने से, मुख ढककर सोने से तथा अन्य कारणों से मन्द अग्नि वाले तथा विषम भोजन करने वाले व्यक्ति का कुपित हुआ वायु ऊर्ध्व कफाशय (मूर्धा) को दूषित कर के स्रोतों के प्रति गमन करता है। वह दूषित हुआ वायु जब मुख के स्रोतों को दूषित करता है तब मुखरोग हो जाते हैं। जब कानों के स्रोतों को दूषित करता है तब कर्णरोग और जब नासिका मूल में स्थित कफ, पित्त या रक्त के प्रति गमन करता है तब वह प्रतिश्याय कहलाता है। सुश्रुत उ. अ. २४ में प्रतिश्याय का निदान एवं संप्राप्ति निम्न प्रकार से कही है—नारीप्रसङ्गः शिरसोऽभितापो धूमो रजः शीतमतिप्रतापः। संधारणं मूत्रपुरीषयोश्च सद्यः प्रतिश्यायनिदानमुक्तम्। चयं गता मूर्धनि मारुतादयः पृथक् समस्ताश्च तथैव शोणितम्। प्रकोष्यमाणा विविधैः प्रकोपणैर्नृणां प्रतिश्यायकरा भवन्ति हि।। चरक चि. अ. २६ में कहा है—सन्धारणाजीर्णरजोऽतिभाष्यक्रोधार्तुवैषम्यशिरोऽभितापैः। प्रजागरातिस्वपनाम्बुशीतै रवश्यया मैथुनबाष्पधूमैः।। संस्त्यानदोषे शिरसि प्रवृद्धो वायुः प्रतिश्यायमुदीरयेत् ।।
तस्य प्रतिनद्धा इव शिरोमुखनासिका भवन्तीष्टानिष्ठाव्यक्ताश्च ठा(न्थाः) ..... ते तस्य वातात् प्रतिबन्धः, कफाद्वैशद्यं, रक्तात् परिक्लेदः, पित्ताद्दौर्गन्ध्यं स्रोतसउपजायते ।।४।।
उसका शिर, मुख एवं नासिका वायु से पूर्ण होकर मानों रुक से जाते हैं इसलिये उसे इष्ट अथवा अनिष्ट गन्धें अव्यक्त हो जाती हैं अर्थात् उसे किसी भी प्रकार की गन्धों का ज्ञान नहीं होता। उसमें वायु से स्रोतों का प्रतिबन्ध (रुकावट), कफ से विशदता का अभाव, रक्त से परिक्लेद तथा पित्त से दुर्गन्धि हो जाती है ॥४॥
स एतदवस्थो जाड्यारोचकहल्लासप्रतिघातार्थं भृशोष्णतीक्ष्णाम्ललवणेषु प्रसज्यते, ततोऽस्य पित्तं प्रकुप्यति। बलाभिवर्धनात्तस्य ज्वरं तृष्णामन्तर्दाहमरति ......... नी स्रोतसां वैगन्ध्यं पाकं च दिवाकरावर्तं चोत्पादयति ।।५।।
इस अवस्था में वह जड़ता, अरुचि तथा हल्लास (जीमचलाना) को दूर करने के लिये अत्यन्त उष्ण, तीक्ष्ण, अम्ल एवं लवण पदार्थों का सेवन करता है। इससे उसका पित्त प्रकुपित हो जाता है। पित्त के अधिक बलवान् होने से उसे ज्वर, तृष्णा, अन्तर्दाह, अरति (ग्लानि), स्रोतों में दुर्गन्धि, पाक तथा सूर्यावर्त हो जाते हैं।
वक्तव्य—सूर्यावर्त–यह एक प्रकार का शिरःशूल होता है–जिसमें सूर्य के उदय होने के साथ २ सिर में वेदना बढ़ती जाती है तथा सूर्यास्त के साथ ही वेदना की भी शान्ति हो जाती है। सुश्रुत उ. अ. २५ में इसका स्वरूप निम्न प्रकार दिया है—सूर्योदयं या प्रति मन्दमन्दमक्षिध्रुवं रुक् समुपैति गाढम्। विवर्धते चांशुमता सहैव सूर्यापवृत्तौ विनिवर्तते च ।। शीतेन शान्तिं लभते कदाचिदुष्णेन जन्तुः सुखमाप्नुयाच्च। तं भास्करावर्तमुदाहरन्ति सर्वात्मकं कष्टतमं विकारम् ।।
अतश्चैनं चतुर्विधमृषयो वदन्ति–वातिकः, पैत्तिकः, श्लैष्मिकः, सान्निपातिक इति। तद्यथा–यो रौति न रमते जागर्त्यभीक्ष्णं क्षौति नासिका चोत्ताानस्यापि तनुश्लेष्म .....................................
(इति ताडपत्रपुस्तके १३२ तमं पत्रम्।)
.................................................................... र्भवति स्निग्धोष्णलवणाम्लोपशयि चेतं प्रतिश्यायं वातिकं विद्यात्; ज्वरदाहपिपासाप्रलापितातालुशोषमुखनासिकाक्षिपाकैराशुकफसंपाकैः ........................ ....................... (पैत्ति)कं विद्यात्; चिरकारित्वारोचकहल्लासशिरोगौरवातिस्त्रावमन्दक्षवथुमन्याग्रहहृदय-प्रलेपविपाकैरूष्णकटुकषायरूक्षणोपशयैः प्रतिश्यायं कफजं विद्यात्, सर्वरूपं स्रोतोवैगन्ध्यकृमि ............ (सान्निपातिकं विद्यात्) ।।६।।