भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 553

प्रतिश्यायचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १९५

ऋषियों ने चार प्रकार का प्रतिश्याय माना है। १ वातिक २ पैत्तिक ३ श्लैष्मिक ४ सान्निपातिक। वातिक प्रतिश्याय के लक्षण—जो रोता रहता है, प्रसन्न नहीं होता, निरन्तर जागता रहता है, छींकता है, सीधा लेटने या सोने पर भी उसकी नासिका में पतली श्लेष्मा का स्राव होता रहता है तथा यदि उसे स्निग्ध, उष्ण एवं लवण युक्त द्रव्यों से आराम हो जाता हो तो उस प्रतिश्याय को वातिक जाने। चरक चि. अ. २६ में कहा है—घ्राणार्तितोदैः क्षवथुर्जलाभः स्रावोऽनिलात्स्वस्वरमूर्धरोगः। अर्थात् इसमें नासिका में वेदना और तोद, छींक, जल के सदृश स्राव का बहना तथा स्वरभेद और सिर में पीडा होती है। पैत्तिक प्रतिश्याय के लक्षण—ज्वर, दाह, पिपासा, प्रलाप, तालुशोष, मुख, आंखों तथा नासिका का पकना और कफ के शीघ्र पक जाने से प्रतिश्याय को पैत्तिक जाने। चरक चि. अ. २६ में कहा है—नासाग्रपाकज्वरवक्त्रशोषतृष्णोष्णपीतस्रवणानि पित्तात् ।। श्लैष्मिक प्रतिश्याय के लक्षण—उसे चिरकारिता (बहुत देर में अच्छा होना), अरुचि, हल्लास (जीमचलाना), सिर का भारी होना, अत्यन्त स्राव, हलकी २ छीकें आना, मन्याग्रह, हृदय प्रलेप (हृदय का कफ के द्वारा लिप्त सा रहना), अविपाक (भोजन का न पचना) होते हैं तथा उसे उष्ण, कटु, कषाय एवं रूक्ष द्रव्यों के सेवन से आराम हो जाता हो तो उसे श्लैष्मिक प्रतिश्याय जाने। चरक चि. अ. २६ में कहा है—कासारुचिस्त्रावघनप्रसेकाः कफाद् गुरुः स्रोतसि चापि कण्डूः। सान्निपातिक प्रतिश्याय के लक्षण—इसमें उपर्युक्त सब लक्षण विद्यमान होते हैं, तथा स्रोतों में दुर्गन्धि एवं कृमि आदि कों की उपस्थिति से प्रतिश्याय को सान्निपातिक जाने। चरक चि. अ. २६ में कहा है—सर्वाणि रूपाणि तु सन्निपातात्स्युः पीनसे तीव्ररुजेऽतिदुःखे ॥६॥

(तत्र) श्लोकाः—

वातश्लेष्मोत्तरः प्रायः प्रतिश्यायस्त्रिदोषजः । बलाग्निवर्णशमनो निहन्ता चाप्युपेक्षितः ।।७।।

वात एवं श्लेष्मा की अधिकता वाला प्रतिश्याय प्रायः त्रिदोषज होता है अर्थात् प्रतिश्याय में यद्यपि वात एवं श्लेष्मा की प्रधानता होती है तथापि वह साधारणतया त्रिदोषज ही होता है। वह बल, जठराग्नि एवं वर्ण को कम करता है तथा उपेक्षा किया हुआ वह मनुष्य को मार डालता है।

तस्मात् प्रथमतस्तस्मिन्नुपवासः प्रशस्यते । सुखोष्णं दीपनीयाम्बु पिबेद्वा पाञ्चमूलिकम् ।।८।।

इसलिये इसमें प्रारम्भ से ही उपवास कराना चाहिये। अथवा पञ्चमूल का दीपनीय (अग्नि को दीप्त करने वाला) एवं सुखोष्ण क्वाथ पिलाना चाहिये।।

यथाशक्त्य ......................। .................... दकेऽपि वा ।।
यवागूं रक्तशालीनामुष्णां त्रिलवणान्विताम् । पिबेद्यवानांमथवा दृष्ट्वा दोषबलाबलम् ।।

दोष और बल के अनुसार रक्त शालि चावलों की उष्ण यवागू में तीनों नमक (सैन्धव, सौवर्चल एवं विड्) मिला कर पिलायें अथवा जौ की यवागू पिलायें ।।

अग्निप्रावरणोपेतो निवातशयनासनः । लघ्वन्नमुष्णं भुञ्जानो मुच्यते नातिसंपिबेत् ।।
वेष्टनं धूमपानं च ..................... । .................... गुडहरीतकीम् ।

जिस व्यक्ति के सोने एवं बैठने का स्थान अग्नि एवं उष्ण वस्त्रों से युक्त हो तथा ऐसे स्थान पर हो जहां सीधी हवा न आती हो, जो लघु एवं उष्ण अन्न का ही सेवन करता हो वह व्यक्ति प्रतिश्याय से मुक्त हो जाता है। उस व्यक्ति को बहुत अधिक जल नहीं पीना चाहिये। उसे वेष्टन (उष्णीय) धारण करना चाहिये तथा धूम्रपान और गुडहरीतकी का सेवन करना चाहिये। सुश्रुत उ. अ. २४ में निम्न पथ्य का सेवन बताया है—निवातशय्यासनवेष्टनानि मूर्ध्नो गुरूष्णं च तथैव वासः। तीक्ष्णा विरेकाः शिरसः सधूमा रूक्षं यवान्नं विजया च सेव्या ।। विजया से अभिप्राय हरीतकी से है ।।