काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१९६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् प्रतिश्यायचिकित्सिताध्यायः ? ]
जीर्णे च सर्पिषः पानं निशि भुक्त्वा प्रशस्यते ।।
अशाम्यमाने तेनापि पुराणं पाययेद्घृतम् । षट्पलं पञ्चगव्यं वा कल्याणकमथाभयम् ।।
यवान्नं च सदाऽत्युष्णं लवणस्नेहव(र्धि)तम् ।
पिप्प ...................
............. सं पिबेद्वा मरिचान्वितम् ।।
जीर्ण प्रतिश्याय में रात्रि को भोजन करके घी पीना चाहिये । यदि इसके भी यह शान्त न हो तो उसे पुराना षट्पल, पञ्चगव्य, कल्याणक तथा अभय घृत का सेवन करना चाहिये तथा सदा लवण एवं स्नेह (घृत) से युक्त यवान्न (जौ का भात) खिलाना चाहिये तथा मरिच से युक्त पिप्पली आदि के क्वाथ का पान कराना चाहिये ।।
मरिचानि मुखे नित्यं धारयेदापरिक्षयम् । सैन्धवोष्णोदकोपेतां पिबेच्छुण्ठीं विमुच्यते ।।
रोग के नष्ट होने तक मुख में सदा मरिच को धारण करना चाहिये । अर्थात् मरिचों को मुख में रख कर सदा चूसते रहना चाहिये । तथा सेन्धा नमक एवं उष्ण जल के साथ सोंठ का सेवन करना चाहिये ।।
पिप्पलीवर्धनमानं वा युञ्जानो वा गुडाभयाम् । पथ्याशी रोगतत्त्वज्ञः सात्म्यज्ञश्च विमुच्यते ।।
रोग के तत्त्व एवं सात्म्य को जानने वाला व्यक्ति पथ्य सेवन पूर्वक वर्धमान पिप्पली तथा अभयागुड का सेवन करने से रोग से मुक्त हो जाता है ।।
पटोलपत्रत्रिफला .............................. प्रतिश्यायाद्विमुच्यते ।
पटोलपत्र, त्रिफला ........... आदि का सेवन करने से प्रतिश्याय से मुक्ति (छुटकारा) हो जाती है ।
अपानं सर्पिषाऽभ्यज्य निवाते स्वेदयेत् सदा ।।
विष्टम्भिगुरुशीतान्नं दिवास्वप्नं च वर्जयेत् ।
प्रतिश्याय के रोगी को जल का त्याग कर देना चाहिये तथा उसे शरीर पर घी की मालिश करके निवातस्थान में स्वेदन करना चाहिये । तथा उसे विष्टम्भि, गुरु एवं शीतल अन्न तथा दिवास्वप्न का त्याग कर देना चाहिये । सुश्रुत उ. अ. २४ में निम्न परिहार बताया है—शीताम्बुयोषिच्छिशिरावगाह-चिन्तातिरूर्क्षाशनवेगरोधान् । शोकं च मद्यानि नवानि चैव विवर्जयेत् पीनसरोगजुष्टः ।।
प्रतिश्यायस्य यत् प्रोक्तमेतत् सर्वं चिकित्सितम् ।।
अतिबालस्य तत् सर्वं धात्री कुर्यादशङ्किता । इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।
(इति चिकित्सास्थाने प्रतिश्यायचिकित्सितम् ।)
प्रतिश्याय की यह जो कुछ भी चिकित्सा कही है । अत्यन्त छोटे बालकों के लिये, धात्री उस सबको निःशंक होकर कर सकती है । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था '!
(इति चिकित्सास्थाने प्रतिश्यायचिकित्सितम्) ।