भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उरोघातचिकित्सिताध्यायः ? ]चिकित्सास्थानम्१९७

उरोघातचिकित्सिताध्यायः ।

(अथात उरोघात)चिकित्सितं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।

अब हम उरोघात चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।

वक्तव्य—उरोघात से अभिप्राय उरःक्षत से है । चरक तथा सुश्रुत में उरोघात शब्द नहीं आया है । वहां उरःक्षत ही दिया है । यह क्षय अथवा राजयक्ष्मा रोग का अगला रूप है जिसमें फुफ्फुस में (Cavities) बन जाती हैं तथा उसमें स्थान २ पर घनीभाव (Consolidation) हो जाते हैं ।।

स्वहेतुकुपिता दोषा उरोघातं चतुर्विधम् । कुर्वन्ति सेवमानानां लौल्यमध्यशनादि च ।।३।।

उरोघात का हेतु—जिह्वालौल्य एवं अध्यशन आदि का सेवन करने वाले व्यक्तियों को अपने २ कारणों से कुपित वातादि दोष चार प्रकार का उरोघात कर देते हैं । चरक चि. अ. ११ में इसका निम्न निदान दिया है–धनुषाऽऽयस्यतोऽत्यर्थं भारमुद्वहतो गुरुम् । ........ इत्यादि । अर्थात् नानाप्रकार के अति परिश्रम युक्त कर्मों को करने से छाती (फुफ्फुस) में क्षत हो जाता है जिससे यह रोग प्रारंभ हो जाता है । इसमें छाती विदीर्ण हो जाती है तथा उसमें विदाह उत्पन्न हो जाता है उसके बाद पार्श्वों में पीडा होने लगती है तथा अङ्ग सूखने लगता है । धीरे २ वीर्य, बल, वर्ण, रुचि और अग्नि हीन हो जाती है । ज्वर, वेदना, मानसिक दीनता, अतिसार, जाठराग्निनाश ये लक्षण उपस्थित होते हैं । उसके खांसने पर दूषित श्यामवर्ण का, पीला, दुर्गन्धित तथा अत्यन्त गाढ़ा एवं रक्त मिश्रित कफ निकलता है । वह रोगी शुक्र एवं ओज के क्षीण होने से अत्यन्त क्षीण हो जाता है ।।

शीतज्वरः प्रतिश्यायः कण्ठः शूकैरिवावृतः । उत्कासिक(का)मन्दक ............ ।।

इस रोग में शीतज्वर तथा प्रतिश्याय होता है और कण्ठ ऐसा प्रतीत होता है मानों शूक़ों (धान या गेहूँ की बालियों) से युक्त हो । तथा उसे कास एवं मन्दक रोग हो जाते हैं । चरक चि. अ. ११ में कहा है—उरोरुक् शोणितच्छर्दिः कासो वैशेषिकः क्षते । क्षीणे सरक्तमूत्रत्वं पार्श्वपृष्ठकटिग्रहः ।।

........................................................

........ समेति समाख्याता सर्वरोगविनाशिनी ।।
एषैव व्योषसहिता हन्त्युरोघातमुद्धलम् ।।

...... इत्यादि द्रव्य मिलाकर प्रयोग करने से सब रोग नष्ट होते हैं । इसी उपर्युक्त योग के साथ त्रिकटु (सोंठ, मरिच, पीपल) मिलाकर देने से यह भयंकर उरोघात को नष्ट करता है ।।

कफाधिके तु सक्षौद्रा लीढाऽऽरोग्याय कल्पते ।

कफाधिक उरोघात के उपर्युक्त योग को मधु के साथ चटा देने से रोगी आरोग्य को प्राप्त करता है ।।

पित्तश्लेष्मोत्तरो व्याधिरुरोघातस्त्रिदोषजः ।।
तस्मात् पित्तकफघ्नानि धात्री (नित्यं समाचरेत्) ।
(इति चिकित्सास्थाने उ) रोघातचिकित्सितम् ।।

त्रिदोषज उरोघात—पित्त एवं श्लेष्मा की अधिकता (प्रधानता) वाला होता है इसलिये धात्री को नित्य पित्त एवं कफनाशक द्रव्यों का प्रयोग करना चाहिये । चरक चि अ. ११ में इसका निम्न चिकित्सा सूत्र दिया है—उरो मत्वा क्षतं