काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 556, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| १९८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | शोफचिकित्सिताध्यायः ? ] |
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लाक्षां पयसा मधुसंयुताम् । सद्य एव पिबेज्जीर्णे पयसाऽघात्स शर्करम् ॥ अर्थात् उरोघात रोग में लाक्षाचूर्ण विशेष स्थान रखता है। इसके अतिरिक्त एलादिगुटिका, यष्ट्याह्रादि घृत, अमृतप्राशघृत तथा अनेक प्रकार के सर्पिर्गुडों का प्रयोग प्रशस्त माना गया है ।।
इति चिकित्सितस्थाने उरोघातचिकित्सितम् ।।
(अथ शोफचिकित्सिताध्यायः ।)
अथातः शोफचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥
अब हम शोफचिकित्सा का व्याख्यान करेंगे । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥
वमनविरेचनोपवासव्याधिकर्शनापथ्याजीर्णेषु यः सदाऽत्यर्थलवणाम्लकटुक्षारोष्णोपसेवी भ(वति) ............ यनान्ते वा लवणादिषु प्रसज्यते, यथेष्टं च शीतोदकस्नानपानशयनव्यवायव्यायामादिभिर्व्यभिचरति तथा तद्गुणक्षीरा वा भवति, तस्याः श्वयथुर्नाम रोग उत्पद्यते दारुणश्चतुर्विधः । दोषा ह्यस्याः .................................................... पथः कृष्णारुणवर्णोऽल्पो रूक्षः पिपीलिकापूर्ण इव संवेदनः पीडितश्च निम्नो भवत्यनिमित्त (रुज) श्चोष्णास्नेहाभ्यां प्रशाम्यति तं वातिकं विद्यात्; नीललोहितपीत ........................................................................
(इति ताडपत्रपुस्तके¹ १३३ तमं पत्रम्² ।)
**श्वयथु का निदान—**जिन बालकों का वमन, विरेचन, उपवास तथा व्याधि से अत्यन्त कर्षण हो चुका हो अर्थात् जो अत्यन्त कृश हो गये हों उनमें, तथा अपथ्य एवं अजीर्ण रोग में जो सदा अत्यधिक लवण, अम्ल, कटु, क्षार एवं उष्ण पदार्थों का सेवन करते हैं .......... जो लवणयुक्त पदार्थों में अत्यधिक आसक्त रहता है । तथा जो धात्री यथेष्ट शीतल जल का स्नान एवं पान, शयन, व्यवाय (मैथुन) तथा व्यायाम आदि करती हो, अथवा उसी गुण वाला उसका दूध हो गया हो । उन्हें चार प्रकार का श्वयथु (शोथ या शोफ) नामक भयंकर रोग हो जाता है । .......... (चरक चि. अ. १२ में साधारणतया तीन प्रकार का शोफ दिया है। १. वातिक २. पैत्तिक ३. श्लैष्मिक । तथा इन्हीं के पुनः निज और आगन्तु भेद दिये हैं । निज (वातिक, पैत्तिक तथा श्लैष्मिक) शोथ के साथ आगन्तु शोथ को मिला देने से ४ भेद हो सकते हैं । सुश्रुत चि. अ. २३ में ५ प्रकार का शोथ दिया है। १. वातिक २. पैत्तिक ३. श्लैष्मिक ४. सन्निपातिक ५. विषज । इनमें प्रथम चार को निज तथा अन्तिम को आगन्तु शोथ कह सकते हैं । अन्य ग्रन्थों में शोथ के ९ भेद दिये हैं—एक दोषज ३+द्विदोषज ३+त्रिदोषज १+अभिघातज १+विषज १=९ इनमें से अभिघातज एवं विषज आगन्तु के भेद हैं । तथा द्वन्द्वज एवं त्रिदोष को पृथक् पढ़ने का विशेष प्रयोजन नहीं होता है । इस प्रकार एकदोषज ३ (वातिक, पैत्तिक एवं श्लैष्मिक) तथा आगन्तु—ये मिलाकर मुख्यरूप से ४ ही शोथ होते हैं । इन्हीं चार का ही यहां निर्देश किया गया प्रतीत
१. मूलताडपत्रपुस्तके अस्मिन् १३३ तमे पत्रे अग्रेतनेषु १३८ तमपत्रतः १५० तमपत्रपर्यन्तपत्रेष्वपि एकपार्श्वे विशेषतो मूषकदंशात् किल शकलापगमनेन प्रायः प्रतिपङ्क्तिन्यूनाधिकभावेन ग्रन्थावयवा विलुप्ताः सन्ति, तेनेत्थं बिन्दुमालाः पुनः पुनर्निवाशिताः ।
२. अस्याग्रे पत्रद्वयात्मको ग्रन्थो लुप्तस्ताडपत्रपुस्तके ।