काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंशोफचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १९९
होता है। तथा यहां मुख्य रूप से होने के कारण निज शोथ का ही निदान दिया गया प्रतीत होता है। इसमें आगन्तु का निदान नहीं दिया है। चरक चि. १२ में निज शोथ का निम्न निदान दिया है—शुद्ध्यामयाभक्तकृशाबलानां क्षाराम्लतीक्ष्णोष्णगुरूपसेवा। दध्याममृच्छकाकविरोधिदुष्टगरोपसृष्टान्न निषेवणं च ।। अर्शांस्य चेष्टा न च देहशुद्धिर्मर्मोपघातो विषमा प्रसूतिः । मिथ्योपचारः प्रतिकर्मणां च निजस्य हेतुः श्वयथोः प्रदिष्टः ।। इसी प्रकार चरक सू. अ. १८ में और सुश्रुत चि. अ. २३ में भी कहा है। वातिक शोथ के लक्षण—जो कृष्ण एवं अरुण (लाल) वर्ण का होता है, अल्प (थोड़ा) एवं रूक्ष होता है तथा ऐसा प्रतीत होता है मानो शोथ प्रदेश पिपीलिकाओं (चिउंटियों) से पूर्ण हो, जो वेदना एवं पीडा से युक्त होता है, निम्न (नीचे झुका हुआ) होता है, जो बिना किसी कारण के ही हो जाता है तथा जो उष्ण द्रव्यों एवं स्नेह के प्रयोग से शान्त हो जाय उसे वातिक शोथ समझना चाहिये। चरक चि. अ. १२ में कहा है—चलस्तनुत्वक्परुषोऽरुणोऽसितः प्रसुप्तिहर्षार्तियुतोऽनिमित्ततः । प्रशाम्यति प्रोन्नमति प्रपीडितो दिवाबली च श्वयथुः समीरणात् ।। पैत्तिक शोथ के लक्षण—यह नील, लोहित एवं पीत वर्ण का ......... (होता है) ........ ।
वक्तव्य—यह अध्याय यहीं खण्डितं हो गया है। अगले खण्डित अंश में पैत्तिक, श्लैष्मिक एवं आगन्तु शोथ के लक्षण उनकी साध्यासाध्यता एवं चिकित्सा आदि का वर्णन होना चाहिये। पाठकों के ज्ञान के लिये उन्हें हम अन्य आर्षग्रन्थों से उद्धृत करते हैं।
पैत्तिक शोथ का लक्षण—चरक चि. अ. १२ में कहा है—मृदुः सुगन्धोऽसितपीतरागवान्भ्रमज्वरस्वेदतृषामदान्वितः । यदुष्यते स्पर्शरुगक्षिरागकृत्स पित्तशोथो भृशदाहपाकवान् ।। अर्थात् जो शोथ मृदु, गन्धयुक्त, काले एवं पीले वर्ण वाला हो जिसमें रोगी भ्रम, ज्वर, स्वेद, प्यास एवं मद से युक्त हो। जिसमें दाह हो, छूने से ही वेदना होती हो तथा जिसमें रोगी की आंखें रक्तवर्ण की हों, जिसमें अत्यन्त दाह हो तथा जो पक जाता हो वह शोथ पैत्तिक होता है। चरक सू. अ. १८ में कहा है—स क्षिप्रोत्थानप्रशमो भवति कृष्णपीतनीलताम्रावभास उष्णो मृदुः कपिलताम्रलोमा उष्यते दूष्यते दह्यते धूप्यते ऊष्मायते स्विद्यति क्लिद्यते न च स्पर्शमुष्णं वा सह्यत इति पित्तशोथः। इसी प्रकार सुश्रुत चि. अ. २३ में कहा है—‘‘पित्तश्वयथुः पीतो रक्तो वा शीघ्रानुसार्योषचोषदाद्यश्चात्र वेदनाविशेषाः’’। अष्टाङ्ग संग्रह में भी कहा है—पीतरक्तासिताभासः पित्तादाताम्ररोमकृत् । शीघ्रानुसारप्रशमो मध्ये प्राग्जायते तनोः ।। सतृड्दाहज्वरस्वेददवकलेदमदभ्रमः । शीताभिलाषी विड्भेदी गन्धी स्पर्शासहो मृदुः ।।
श्लैष्मिकशोथ का लक्षण—चरक चि. अ. १२ में कहा है—गुरुः स्थिरः पाण्डुररोचकान्वितः-प्रसेकनिद्रावमिवह्निमान्द्यकृत् । स कृच्छ्रजन्मप्रशमो निपीडितो-न चोन्नमेद्रात्रिबली कफात्मकः ।। अर्थात् श्लैष्मिक शोथ—गुरु, स्थिर एवं पाण्डु वर्ण होता है। इसमें अरुचि, लालास्राव, निद्रा, वमन तथा अग्निमान्द्य होता है। यह शोथ देर में ही उत्पन्न होता है तथा देर में ही शान्त होता है तथा शोथ को दबाने पर पुनः उन्नत नहीं होता (Pitting on Pressure) तथा यह रात्रि को अधिक होता है। चरक सू. अ. १८ में कहा है—सं कृच्छ्रोत्थानप्रशमो भवति, पाण्डुः श्वेतावभासः स्निग्धः श्लक्ष्णो गुरुः स्थिरः स्त्यानः शुक्लाग्ररोमा स्पर्शोष्णसहश्चेति । श्लेष्मशोथः । इसी प्रकार सुश्रुत चि. अ. २३ में भी कहा है—‘श्लेष्मश्वयथुः पाण्डुः शुक्लो वा स्निग्धः कठिनः शीतो मन्दानुसारी कण्ड्वादयश्चात्र वेदनाविशेषाः’’। अष्टाङ्गसंग्रह में भी कहा है—कण्डूमान् पाण्डुरोमत्वक्कठिनः शीतलो गुरुः । स्निग्धः श्लक्ष्णः स्थिरः स्त्यानो निद्राच्छर्द्यग्निसादकृत् ।। आक्रान्तो नोन्नमेत् कृच्छ्रशामजन्मा निशाबलः । स्रवेन्नासृक् चिरात्पिच्छां कुशशस्त्रादिविक्षतः ।। स्पर्शोष्णाकाङ्क्षी च कफाद् ।। शोथों की साध्यासाध्यता—जिसका मांस क्षीण नहीं है ऐसे पुरुष को हुआ एकदोषज, नवीन और बलरहित शोथ ‘सुखसाध्य’ होता है तथा जो शोथ कृश एवं दुर्बल व्यक्ति को हो, जो वमन आदि उपद्रवों से युक्त हो, मर्मदेश में पहुंच गया हो तथा जो सर्वाङ्ग में फैला हुआ हो वह शोथ असाध्य होता है।