काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् कृमिचिकित्सिताध्यायः ? ]
शोथों का चिकित्साक्रम—साध्य शोथ का निदान, दोष एवं ऋतु-विपरीत चिकित्सा करनी चाहिये। चरक चि. अ. १२ में कहा है—अथामजं लङ्घनपाचनक्रमैर्विशोधनैर्बह्वल्पदोषमादितः। शिरोगतं शीर्षविरेचनैरधोविरेचनैरूर्ध्वमधस्तयोर्ध्वगम् उपचारेत् स्नेहकृतं विरूक्षणैः प्रकल्पयेत्स्नेहविधिं च रूक्षजे ।। अर्थात् आम दोष से उत्पन्न शोथ में प्रारम्भ में लङ्घन तथा पाचन कराना चाहिये। यदि दोष अत्यन्त प्रवृद्ध हो तो दोषों के अनुसार प्रारम्भ में वमनविरेचन द्वारा संशोधन कराये। यदि शोथ शिरोगत हो तो नस्य द्वारा तथा यदि शरीर के अधोभाग में हो तो अधोविरेचन तथा ऊर्ध्वभाग में स्थित हो तो वमन द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये। यदि शोथ अधिक स्निग्ध द्रव्यों के सेवन से उत्पन्न हुआ हो तो रोगी का रूक्षण करना चाहिये तथा यदि शोथ रूक्ष पदार्थों के अधिक सेवन से उत्पन्न हुआ हो तो स्निग्ध पदार्थों द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये। अष्टाङ्गसंग्रह में भी कहा है—श्वयथुषु दोषजेषु सर्वेषु सर्वसरेष्वामानुबद्धेषु लङ्घनपाचनशोधनान्यादौ योजयेत्। स्नेहजेषु विरूक्षणान्यौषधानि। विरूक्षणोत्थेषु स्नेहनानि। तदुपरान्त भिन्न २ दोषों के लिये भिन्न २ चिकित्सा का विधान दिया गया है। सुश्रुत चि. अ. २३ में कहा है—तत्र वातश्वयथौ त्रैवृतमेरण्डतैलं वा मासमर्धमासं वा पाययेत्, न्यग्रोधादिककषायसिद्धं सर्पिः पित्तश्वयथौ, आरग्वधादिसिद्धं श्लेष्मश्वयथौ, सन्निपातश्वयथौ स्नुहीक्षीरपात्रं द्वादशभिरम्लपात्रैः प्रतिसंसृष्टं दन्तीप्रतीवापं सर्पिः पाचायित्वा पाययेत्। इसके अतिरिक्त सब शोथों में गण्डीराद्यरिष्ट, पुनर्नवासव, फलत्रिकाद्यरिष्ट, गुडार्द्रकप्रयोग, शिलाजतु प्रयोग, कंसहरीतकी आदि का प्रयोग करना चाहिये। इन आभ्यन्तर प्रयोगों के अतिरिक्त दोषों के अनुसार भिन्न २ बाह्य प्रलेप, प्रदेह एवं परिषेक आदि का भी प्रयोग करना चाहिये ॥३॥
कृमिचिकित्सिताध्यायः ।
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............ च लाभतः समुपानयेत् । पादशेषे जलद्रोणे शृते सर्पिर्विपाचयेत् ।।
प्रस्थं सैन्धवसंयुक्तं तत् परं कृमिनाशनम् । विडङ्गघृतमित्येतल्लेह्यं शर्करया सह ।।
सर्वकृमीन् प्रणुदति वज्रो मुक्त इवासुरान् ।
**वक्तव्य—**इस अध्याय में उदरकृमियों की चिकित्सा कही जायगी। यह अध्याय प्रारम्भ में खण्डित है। उस खण्डित अंश में सम्भवतः कृमियों के भेद, उनका निदान तथा लक्षण आदि का वर्णन होना चाहिये। अन्य ग्रंथों के आधार पर इन उपर्युक्त विषयों को हम अध्याय के अन्त में पाठकों के ज्ञान के लिये देंगे।
विडङ्गघृत—(विडङ्ग आदि) ............. में से जो २ ओषधियां मिल जायें उन्हें लेकर एक द्रोण पानी में पकाकर चतुर्थांश शेष रखे। उसमें एक प्रस्थ घृत डालकर सिद्ध करे। इस घृत में थोड़ा नमक मिला दे। यह घृत अत्यन्त कृमि नाशक है। इसे 'विडङ्ग घृत' कहते हैं। जिस प्रकार वज्र छोड़ा जाने पर असुरों को नष्ट कर देता है। उसी प्रकार शर्करा के साथ इसका लेहन (चाटना) करने पर यह सब प्रकार के कृमियों को नष्ट कर देता है।
वक्तव्य—'वृन्दमाधव' तथा 'चक्रदत्त' आदि में कृमिरोग अधिकार में 'विडङ्ग घृत' का निम्न योग दिया हुआ है—
त्रिफला यास्त्रयः प्रस्था विडङ्गप्रस्थ एव च। द्विपलं दशमूलञ्च लाभतः समुपाचरेत् ।। पादशेषे जलद्रोणे शृतं सर्पिर्विपाचयेत्। प्रस्थोन्मितं सिन्धुयुतं तत्परं कृमिनाशनम् ।। विडङ्गघृतमेतच्च लेह्यं शर्करया सह। सर्वान् कृमीन् प्रणुदति वज्रं मुक्तमिवासुरान् ।।
उपर्युक्त खण्डित भाग वाला यही योग प्रतीत होता है। विडङ्ग का कृमिनाशन के लिए अन्य रूपों में भी प्रयोग चरक-सुश्रुत आदि में अनेक स्थानों पर किया गया है॥