काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकृमिचिकित्सिताध्यायः ? ] | चिकित्सास्थानम् | २०१
तिक्तोष्णकटुरूक्षाणां मूत्राणां लवणस्य च ।।
स्नेहस्वेदोपसेवा च पथ्यं च कृमिनाशने ।
कृमियों के नाश के लिये तिक्त, उष्ण, कटु, एवं रूक्ष पदार्थ, गोमूत्र, सैन्धव तथा स्नेहन एवं स्वेदन का प्रयोग पथ्य माना गया है ।।
बहिःकृमीणां स्नानाद्यं द्विव्रणीये प्रकीर्तितम् ।।
अतिबालस्य तु शिशोर्धात्री सर्वं समाचरेत् ।
द्विव्रणीय अध्याय में बाह्य कृमियों के लिये स्नान आदि (बाह्य शुद्धि) का निर्देश किया गया है । अत्यन्त छोटे शिशु के लिये धात्री यह उपर्युक्त सम्पूर्ण चिकित्सा करे ।।
संशोधनैर्विशुद्धं च पथ्यान्नैश्च लघूकृतम् ।।
भावितं चौषधैः क्षीरममृतत्वाय कल्पते ।
वमन विरेचन आदि संशोधनों से शुद्ध हुए तथा पथ्य आहार के द्वारा लघु (हलके) हुए रोगी के लिए भिन्न २ ओषधियों से सिद्ध किया हुआ दूध अमृत के समान माना जाता है ।।
अ(ना)त्युष्णं कटुतैलं तु गुदे दत्त्वा ससैन्धवम् ।।
स्वेदयेद् गुदमङ्गुल्या तथाऽऽशु लभते सुखम् ।
जो बहुत अधिक गरम नहीं है ऐसे कड़वे तेल (सरसों के तेल) को सैन्धव सहित गुदा में लगाकर गुदा का अङ्गुलि के द्वारा स्वेदन करे (अर्थात् उँगली से रगड़कर स्वेदन करे) इससे रोगी शीघ्र ही सुख (आरोग्य) को प्राप्त करता है ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।
इति चिकित्सास्थाने कृमिचिकित्सितम् ।।
ऐसे भगवान् कश्यप ने कहा था ।
वक्तव्य—चरक तथा सुश्रुत में कृमियों की २० जातियां दी गई हैं । उत्पत्ति की दृष्टि से चरक वि. अ. ७ में इन्हें चार प्रकार का माना है । १. पुरीषज, २. श्लेष्मज, ३. रक्तज, ४. मलज (बाह्यमलज) 'परन्तु सुश्रुत उ. अ. ५४ में ये तीन प्रकार के ही दिये हैं—विंशतेः कृमिजातीनां त्रिविधः संभवः स्मृतः । पुरीषकफरक्तानि ।। अर्थात् इसमें मलज कृमियों को नहीं दिया गया है । कृमियों का सामान्य निदान सुश्रुत उ. अ. ५४ में कहा है—प्रजीर्णाध्यशनासात्म्यविरुद्धमलिनाशनैः । अव्यायामदिवास्वप्नगुर्वतिस्निग्धशीतलैः ।। माषपिष्टान्नविदल बिसशालूकसेरुकैः । पर्णशाकसुराशुक्तदधिक्षीरगुडेक्षुभिः ।। पललानूपपिशितपिण्याकपृथुकादिभिः । स्वाद्वम्लद्रवपानैश्च श्लेष्मा पित्तं च कुप्यति ।। कृमीन् बहुविधाकारान् करोति विविधाश्रयान् । आमपक्वाशये तेषां कफविङ्जन्मनां पुनः ।। धमन्यां रक्तजानां च प्रसवः प्रायशः स्मृतः । इस सामान्य निदान के अतिरिक्त सुश्रुत में प्रत्येक का पृथक् २ विशेष निदान एवं सामान्य लक्षण निम्न प्रकार दिया है—माषपिष्टान्नविदलपर्णशाकैः पुरीषजाः । मांसमाषगुडक्षीरदधितैलैः कफोद्भवाः ।। विरुद्धार्जीर्णशाकाद्यैः शोणितोत्था भवन्ति हि । ज्वरो विवर्णता शूलं हृद्रोगः सदनं भ्रमः । भक्तद्वेषोऽतिसारश्च संजातकृमिलक्षणम् ।। चिकित्सा चरक वि. अ. ७ में कहा है—तत्र सर्वकृमीणामपकर्षणमेवादितः कार्यम्, ततः प्रकृतिविघातः, अनन्तरं निदानोक्तानां भावानामनुपसेवनम् । अर्थात् सबसे पूर्व कृमियों का अपकर्षण करना चाहिये । ये हाथ से पकड़कर निकाले जा सकते हैं अथवा आमाशय एवं पक्वाशय में ही