काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् मदात्ययचिकित्सिताध्यायः ? ]
स्थित होने पर वमन, विरेचन, शिरोविरेचन, आस्थापन आदि से निकालें। इसके पश्चात् उनके उत्पत्ति कारण का नाश करना चाहिये। यह कटु, तिक्त, कषाय, क्षार तथा उष्ण पदार्थों के सेवन से होता है। तथा अन्त में उन्हें पुनः उत्पन्न न होने देने के लिये निदान परिवर्जन करना चाहिये अर्थात् निदानोक्त पदार्थों का त्याग करना चाहिये। इनका विस्तृत विवरण चरक वि. अ. ७ तथा सुश्रुत उ. अ. ५४ में देखना चाहिये।
इति चिकित्सास्थाने कृमिचिकित्सितम् ॥
मदात्ययचिकित्सिताध्यायः ।
अथातः पानात्ययचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।
अब हम पानात्यय (मदात्यय) चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।।१-२।।
मद्यप्रवृत्तौ रोगस्तु प्रोच्यते त्रिविधो नृणाम्। पानात्ययो विभ्रमश्च पानापक्रम एव च ।।३।।
मद्य की प्रवृत्ति में मनुष्य को तीन प्रकार के रोग हो जाते हैं। १. पानात्यय २. विभ्रम (पानविभ्रम) ३. पानापक्रम ।।
तत्र योऽध्युषिते पाने त्वजीर्णे पिबते नरः।
तत् पानमत्ययं याति तस्मात् पानात्ययो मतः ।।४।।
पानात्यय का हेतु—जो व्यक्ति पहले पीये हुए मद्य के ऊपर अथवा उसके जीर्ण न होने पर पुनः मद्य पी लेता है—उसका पीया हुआ वह मद्य अत्यय (रोग) को प्राप्त हो जाता इसलिये इसे पानात्यय (मदात्यय) कहते हैं ।।४।।
विभ्रान्तानां तु पानानां सेवनात्(पानविभ्रमः) । सहसा पानविच्छेदः पानापक्रम उच्यते ।।५।।
पानविभ्रम का हेतु—विभ्रान्त मद्य के सेवन से पानविभ्रम हो जाता है। (मद्य के कारण चित्तवृत्तियों की अनवस्थिति या अस्थिरता को पानविभ्रम कहते हैं ।) पानापक्रम का हेतुमद्य का सहसा विच्छेद (न मिलना) हो जाने से पानापक्रम कहाता है। अर्थात् जो व्यक्ति सदा मद्यपान करता हो उसे सहसा यदि मद्य न मिले तो उस अवस्था को पानापक्रम कहते हैं ।।५।।
दीपनं रोचनं वृष्यं रतिवैशद्यकारकम्। कार्श्यचित्तश्रमहरं हर्षणं बलवर्धनम् ।।६।।
युक्तोपसेवितं मद्यं सात्त्विकानां विशेषतः। प्रमोदारोग्यपुष्टीनां तन्मूलं चान्नभोजनम् ।।७।।
युक्तिपूर्वक सेवन किये हुए मद्य के गुण—सात्विक पुरुषों में युक्तिपूर्वक सेवन किया गया मद्य दीपक, रोचक (भोजन में रुचि को बढ़ाने वाला), वृष्य, रति (मैथुन शक्ति) को विशद करने वाला अर्थात् मैथुन शक्ति को बढ़ानेवाला, कृशता एवं चित्त की थकावट को दूर करने वाला, तथा हर्ष एवं बल को बढ़ाने वाला होता है। यह प्रमोद (आनन्द) एवं आरोग्य (स्वास्थ्य) का मूल (कारण) है तथा यह अन्न एवं भोजन है। चरक चि. अ. २४ में कहा है—'किन्तु मद्यं स्वभावेन यथैवान्नं तथा स्मृतम्' । अर्थात् मद्य में भोजन के गुण विद्यमान हैं। इसी को प्रकट करने के लिये चरक में 'पानान्नगुणदर्शकः' शब्द भी दिया हुआ है। घोष की मैटेरिया मैडिका में भी लिखा है कि—"The question whether alcohal is a food has been much discussed, and the chief point is whether it can be regarded as a protain sparer. It possesses the power of lessening nitrogenous waste, though inferior to carbohydrate and fat. It is chemically allied to sugar and