भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 594

२३६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् [ वमनविरेचनीया सिद्धिः ३ ]

(भ्रम), दाह, ओष्ठसंवेष्ट (गुदौष्ठ Shhincter aiumuscles में ऐंठन होना), अग्निमांद्य तथा यक्ष्मारोग हो जाते हैं। वेगों को रोकने से तीनों दोषों का प्रकोप, थोड़ा जीवरक्त (शुद्ध रक्त) का निकलना, उन्माद तथा भ्रमरोग हो जाते हैं। अच्छी प्रकार स्नेहन तथा स्वेदन किये हुए भी मृदुकोष्ठ व्यक्ति को अधिक औषध का सेवन कराने से रोगी का जीवरक्त निकलने लगता है, गुण की वृद्धि होती है तथा वायु प्रकुपित हो जाता है, वह प्रकुपित हुआ वायु, प्रलाप, उन्माद हिक्का, श्वास, कास, तालुशोष, तृष्णा, शूल, बधिरता, वाग्ग्रह (वाणी का जकड़ा जाना), बीजोपघात (वीर्य का दूषित होना), तिमिर (नेत्ररोग) तथा पुष्पोपघात (आर्तव दृष्टि) आदि रोग उत्पन्न कर देता है। जब वमन के लिये प्रयुक्त की हुई अत्यन्त लवण एवं अत्यन्त कषाय रसयुक्त, लगातार बहुत समय तक प्रयुक्त की हुई, अनुदीरित तथा अवशिष्ट (बची हुई) ओषधि विरेचन कराती है, तथा जब विरेचन के लिये प्रयुक्त की हुई ओषधि अजीर्ण तथा श्लेष्मा की अधिकता में प्रयुक्त कराने और अत्यन्त द्रव तथा शीत होने से वमन कराये तब उसे औषध विपर्यथ अथवा ओषधि का अतियोग कहा जाता है। स्नेहन (अनुवासन स्नेह) तथा निरूह (आस्थापन बस्ति) के ऊर्ध्वभाव होने पर अर्थात् लौटकर नीचे न आने से दोषों की प्रवृत्ति मन्द होती है उसे औषध का दुर्योंग, अप्रवृत्ति अथवा अयोग कहते हैं। उन दोनों में (अर्थात् औषध के अतियोग तथा अयोग में) रोगी का शोधन कराना चाहिये अथवा निरूह बस्ति देनी चाहिये। इससे उसके परिकर्तिका, आध्मान, परिस्राव (गुदा से स्राव होना), आटोप, शूल, निद्रा, अतिविषाद आदि रोगों की शान्ति हो जाती है। उसे त्रिफला, चित्रक, उरुपूग (एरण्ड), दन्ती तथा त्रिवृत् से सिद्ध घृत का प्रयोग के अनुसार सेवन कराये (अथवा विबन्ध आटोप, शूल, परिस्राव, प्रवाहिका तथा वायु की शान्ति के लिये उसे जीवनीक ओषधियों से सिद्ध घृत, तैल अथवा दूध का बस्ति के द्वारा प्रयोग कराये) ....... अथवा त्रिफला, गंभारी, मुनक्का तथा गन्धपाषाण—आदि की त्वचा एवं मूलों से सिद्ध दूध का विबंध तथा परिस्राव में बस्ति के रूप में प्रयोग करे। सम्पूर्ण वात रोगों की शान्ति के लिये रोगी को अनुवासन के लिये गन्धर्व (एरण्ड) कषाय से सिद्ध गन्धर्व तैल (एरण्ड तैल) का प्रयोग कराना चाहिये। हींग, दारुहरिद्रा ....... देवदारु, बिल्वशलाटु (कच्चा बिल्व), पथ्या (हरड़) तथा पूतिक (लताकरञ्ज) के कल्क एवं खट्टी कांजी से सिद्ध तैल का पूर्ववत् अनुवासन सब उपद्रवों को शान्त करता है। यह गन्धर्व तैल कहलाता है इसका अनुवासन करना चाहिये॥

तत्र श्लोकाः—

................... । ............ मानस्य तथाऽतिमात्रं शीताम्भसा लेहनमेव पथ्यम् ।।
तथोभयोः शीतकषायपान .............. घृतेन चैन सशिरस्कमाशु दिग्थं सुशीतेन जलेन सिञ्चेत् ।।
पादौ च धाव्यौ शिशिरो(दकेन) ........................ ष्टः ।

दोनों में अर्थात् वेगों के अतियोग तथा उपयोग में अत्यन्त शीतल जल के साथ उपर्युक्त औषधियों का लेहन कराना चाहिये और शीतल कषाय का पान कराना चाहिये । ........सिर सहित सम्पूर्ण शरीर पर घृत की मालिश कर के उसे शीतल जल का सिञ्चन (परिषेचन) कराये तथा शीतल जल से पैरों को धोये ।।

सकट्फलं पद्मयवासमोचं सकैशरोशीरसमङ्गयुक्तम् ।। एतैः सुपिष्टैः शिशिराम्बुयुक्तैः कल्कैस्तथा
शीतपयोद्रुमाणाम् प्रलिप्यमानं सशिरस्कपादं सं ........... ।। ............ श्व शय्याशनपानभोज्यैः ।
संस्थापयेदत्यमाशु विद्वान् गृह यथा प्रज्वलितैकदेशम् ।।

कट्फल, पद्म (कमल), यवासा, मोचरस, केशर (नागकेसर), खस तथा मंजीत इत्यादि को शीतल जल से पीसकर अथवा शीतल दूध वाले वृक्षों के कल्कों के सहित रोगी के सिर से लेकर पैर तक लेप करना चाहिये । तथा ..... शीतल शय्या (सोने का स्थान), शीतल आसन (बैठने का स्थान), शीतल पान (पीने की वस्तु) तथा शीतल भोजनों