काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंवमनविरेचनीया सिद्धिः ३ ] सिद्धिस्थानम् २३७
के द्वारा, जिस प्रकार एक भाग जले हुए घर की रक्षा की जाती है उसी प्रकार विद्वान् वैद्य को चाहिये कि उस रोग को भी शीघ्र ही शान्त करे ।।
द्रव्यैस्तु तैरेव यथोपपत्त्या शृते जले छागपयोऽर्धमिश्रे ।
संस्कृत्य शाल्युत्तमलाजपेयां ........................... ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके १४८ तमं पत्रम् ।।
........................... द्रुते च्छर्दिरुदीर्यते हि ।
अल्पाल्पकं चैव विलम्बितं च शीतं कषायं तु पिबेद्धरिष्ठम् ।।
वमन के अयोग में उपर्युक्त द्रव्यों के साथ ही जल को पकाकर उसमें आधे परिमाण में बकरी का दूध डालकर उसके द्वारा शालि तथा उत्तम लाज (चावलों) की पेया सिद्ध करके ....... रोगी को देने से वमन की शीघ्र ही प्रवृत्ति हो जाती है । यदि वमन का वेग बहुत थोड़ा २ तथा धीरे २ हो तो उसे शीतल कषाय पिलाना चाहिये ।।
फलाम्लवल्कश्च रसाञ्जनं च लोध्रं च तत्तण्डुलवारियुक्तम् ।
पिबेद्विरेके वमनेन वृद्धे तेनाशुशान्तिं लभते (हि बालः) ।।
वमन के द्वारा प्रवृद्ध विरेचन में अर्थात् वमन के अतियोग में जब विरेचन प्रारंभ हो जाय तब खट्टे फलों के छिलके, रसाञ्जन तथा लोध्र को चावलों के पानी के साथ पीसकर पिलाना चाहिये । इससे बालक को शीघ्र ही शान्ति प्राप्त हो जाती है ।
.................................................. नाम् ।
तत् स्थापनं श्रेष्ठमुदाहरन्ति कपित्थसिद्धश्च रसश्च मध्वा ।।
......... इत्यादि औषधियां प्रवृत्त प्रवृत्त हुए २ वमन को रोकने में श्रेष्ठ मानी गई हैं अथवा कपित्थ का सिद्ध किया हुआ रस मधु के साथ देने से भी वमन का स्थापन (शमन) होता है ।।
जम्ब्वाम्रवेतसपयोद्रुमाग्रैस्तोयं विपक्वमथ दुग्धमिश्रम् ।
भूयःशृतं प्रवरमाहुरेतत् पाने तथा बस्ति (विधौ प्रयुक्तम्) ।।
जामुन, आम, जलवेतस तथा क्षीरीवृक्षों के अग्रभाग द्वारा जल को पकाकर उसमें दूध मिलाकर पुनः पकाना चाहिये । यह पीने तथा बस्ति के द्वारा प्रयुक्त किया हुआ वमन के अतियोग में श्रेष्ठ माना गया है ।।
................ घ्नमोचौ । धातक्यथैतैरुदकं पयो वा शृतं यवागूश्च हिताऽतियोगे ? मांसानि मुख्यानि च जाङ्ग्लानि संस्कृत्य यूषाग्रसकापयश्च साज्ये विदद्ध्यादतियोगशान्त्यै ............. ।।
................ वमन के अतियोग में घ्न (ग्रहघ्न-गौरसर्षप), मोचरस, धातकी (धाय के फूल अथवा हरीतकी) इत्यादि के द्वारा जल, दूध अथवा यवागू सिद्ध करके देनी चाहिये । तथा मुख्य जांगल पशुपक्षियों के मांस, यूष आम्रसका (?) तथा दूध सिद्ध करके तथा उसमें घी डालकर अतियोग की शान्ति के लिये देने चाहिये ...... ।।
..................................... सी विरेको गुदशूलपाकौ ।
उपद्रवाश्चापि न कीर्तिता ये सर्वे शमं यान्ति भवत्यरोगः ।।
...... उपर्युक्त उपचार के द्वारा विरेचन, गुदशूल, गुदपाद आदि तथा अन्य भी जिनका उल्लेख नहीं किया गया हैं वे सब उपद्रव शान्त हो जाते हैं तथा रोगी रोगरहित हो जाता है ।।