भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 597

नस्तः कर्मीया सिद्धिः ४ ] सिद्धस्थानम् २३९

कफ तथा वायु की अधिकता में ....... वृश्चीका (पृश्निपर्णी), पिप्पली, इक्ष्वाकु (कटुतुम्बी फल), क्षवक (नकछिकनी), प्रवरक (अगरुकाष्ठ), सहिजने के बीज, शिरीष के बीज, अपामार्ग के बीज, अमलतास के बीज, लहसन के बीज, मयूरक (अपामार्ग), सैन्धव, सोंचल नमक, वराङ्ग (अम्लवेतस्), दालचीनी, ज्योतिष्मती (मालकंगनी) तथा विश्वभेषज (सोंठ) इत्यादि में से जो दो या तीन ओषधियां मिल....जांय उन्हें पानी से धोये हुए पत्थर पर पीसकर बिजोरे के रस अथवा आर्द्रक स्वरस में से किसी एक के साथ मूर्च्छित करके मधु तथा मुनक्के के साथ मिलाकर एक शंखाकृति पात्र में रखकर थोड़ा गरम कर लें। तब रोगी को पूर्व दिशा की ओर सिर करके तथा नासिका ऊपर करके लिटा दें। अब रोगी के गले के धमनियों के मुख, ललाट, नासिका, सिर, श्मश्रु (दाढ़ी मूंछ), मुख तथा मन्या प्रदेश को आवश्यकतानुसार स्वेदन करके वैद्य अथवा वैद्य से अनुमति प्राप्त कोई अन्य व्यक्ति बायें हाथ के अंगूठे से नासिका के अग्रभाग को सिर से थोड़ा झुकाकर दायें हाथ से पिचकारी के द्वारा ....... थोड़ा २ करके स्नेह नासिका में डाले तथा श्लेष्मा को निरन्तर बाहर निकालता जाय। इसके बाद बचे हुए श्लेष्मा का सेचन करने के लिये हृदय आदि अङ्गों का बार २ स्वेदन करे तथा धीरे २ मर्दन करे। इस प्रकार तीन, चार, पांच बार करे। ...... उसके बाद वस्त्र की पोटली में बंधे हुए ओषधियों के शुष्क चूर्ण का प्रधमन नस्य देवे। उन्हीं में मधु मिलाकर अवपीड नस्य देना चाहिये। इनसे मुख एवं नासिका में स्थित कफ नष्ट हो जाता है। ऐसा विद्वानों का कथन है।

**वक्तव्य—**प्रधमन नस्य के विषय में चरक सि. अ. ९ में कहा है—'चूर्णस्य ध्मापनं नाम देहस्रोतोविशोधनम्'। अर्थात् चूर्ण का मुख की वायु अथवा यन्त्र आदि की सहायता से नासिका में फूंकना (Insufzation) प्रधमन या ध्मापन कहलाता है। यह देह के स्रोतों का शोधन करता है। अवपीड के लिये चरक सि. अ. ९ में कहा है—'अवपीडश्च यन्त्र कल्कादीनि दीयन्ते इत्यवपीडः'। अष्टाङ्गसंग्रह सू. अ. २९ में कहा है—'कल्कीकृतादौषधादवपीडितः स्रुतो रसोऽवपीड इत्यपरेषाम्'। अर्थात् ओषधियों के कल्क का अवपीडन करके जो नस्य दिया जाता है उसे अवपीड नस्य कहते हैं॥

तैरेव कटुतैलमज्जामूत्रसिद्ध ............. ।
(इति ताडपत्रपुस्तके १४९ तमं पत्रम् ।)

बालाय धात्र्यङ्कगताय बलादुपगृह्य देयं; व्याधिर्ह्युपेक्ष्यमाणो विषवत् परिणमति, तस्मान्नातिद्रुतं नातिविलम्बितं नातिघनं नातितनुं नात्युष्णं नातिशीतं ........... द्वा पिपासतः पीतवतो वा नापक्वे प्रतिश्याये नाजीर्णे न वातशिरोरोगज्वरयोर्न श्रमे न शिरःस्नातुकामस्य न सद्यःशिर स्नातस्य न रजस्वलायाः ..................... कर्म विदध्यादन्यत्रात्ययात् । तस्यातिद्रुतं दत्तमौषधं प्राणानुपरुणद्धि, खानि चास्योपतप्यन्ते, श्वासकासहिक्कालालास्त्राववाग्रहायासाश्चोत्पद्यन्ते । .......... वाऽत्युष्णं दाहं व्रणान् दिवाकरावर्तं चोत्पादयति । अतिशीतं विष्टम्भयति । अतिबहु सकृदाशु प्रत्यागच्छति । अल्पं शश्वदावेजयति । अतिबहुशो वातप्रको ........... (अ)तितीक्ष्णमजस्रं स्मृतिभ्रंशोन्मादवातादीन् प्रकोपयति । एतेनैवोपचारो व्याख्यातः ।।

उपर्युक्त ओषधियों को ही कटुतैल, मज्जा तथा गोमूत्र आदि में सिद्ध करके ..... उसका नस्य बालक को धात्री की गोद में बिठाकर उसे बलपूर्वक पकड़कर देना चाहिये। व्याधि की उपेक्षा करने पर उसका विष की तरह परिणाम होता है अर्थात् वह विष की तरह घातक सिद्ध होती है। इसलिये बालक को न अत्यन्त शीघ्रतापूर्वक, न बहुत धीरे २, न अत्यन्त घना (सान्द्र–Consentrated), न अत्यन्त पतला, न अत्यन्त उष्ण तथा न अत्यन्त शीतल नस्य देना चाहिये।

३८ का.सं.