भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 598
२४०काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्नस्तः कर्मीया सिद्धिः ४ ]

...... तथा यह नस्य कर्म अत्यन्त आत्ययिक अवस्था (Emergecy) को छोड़कर साधारणतया प्यास होने पर, पानी पीने के बाद, अपक्व (नवीन) प्रतिश्याय में, अजीर्ण, वातरोग, शिरोरोग, ज्वर तथा श्रम में, शिरसहित स्नान करने की इच्छा वाले, जिसने अभी शिरसहित स्नान किया है तथा रजस्वला ...... को नहीं कराना चाहिये । चरक सि. अ. ९ में भी कहा है-अजीर्णे भुक्तभक्ते च तोयपीतेऽथ दुर्दिने । प्रतिश्याये नवेस्नाने स्नेहपानेऽनुवासने ॥ नावनं स्नेहनं रोगान्करोति श्लैष्मिकान्बहून् । रोगी को बहुत शीघ्रता से दी गई औषध उसके प्राणों का रोध कर देती है तथा उसके स्रोतों को पीडित करती है । उसे श्वास, कास, हिक्का, लालास्राव, वाग्ग्रह तथा आयास (परिश्रम-थकावट) आदि उत्पन्न हो जाते हैं ।
....... अत्यन्त उष्ण नस्य से दाह, व्रण तथा सूर्यावर्त हो जाते हैं । अत्यन्त शीत से विष्टम्भ हो जाता है । एक साथ बहुत मात्रा में दिया गया नस्य शीघ्र ही वापिस आ जाता है । अल्पमात्रा में दिया गया नस्य निरन्तर क्लेश पहुंचाता है । बार २ दिया जाने से वायु प्रकुपित हो जाता है । ....... अत्यन्त तीक्ष्ण नस्य से निरन्तर स्मृतिभ्रंश, उन्माद तथा वात आदि प्रकुपित हो जाते हैं । इन्हीं के द्वारा इनका उपचार कह दिया गया है ।

अथ पीतवतो नस्यकर्मणा नासास्त्रावशिरोरोगगौरवकफप्रसेका ....... पक्वे प्रतिश्याये घ्राणोपघातपूति-नाससोर्मीर(मिन्मिन ?) नासार्शांसि । अजीर्णप्रतिश्याये पार्श्वोपरोधकण्ठोद्ध्वंसकासश्वासच्छर्दिज्वरा-रोचकारतयः । शिरःस्नातस्य ....... (ऽर्धा)वभेदकज्वराग्निनाशाः । वातज्वरादिषु तानेव रोगान् संतनोति । रजस्वलाया ऋतुर्व्यापद्यते । शुद्धस्नाताया योनिरुपशुष्यति । गर्भिण्या हीनाङ्गस्य .......... पघातारोचकौ । बुभुक्षितस्यक्लमारुची । तृषितस्य कासश्वासकफच्छर्दयः । अथ खल्वेषां यथार्थमौषधमुपदेक्ष्यामः-रूक्षं स्निग्धं वोभयं हि नस्तःकर्म .......... (ते) षां स्वं स्वं चिकित्सितमविरुद्धम् । अयं चात्र विशेषः-मृद्वीकादाडिमजम्ब्वाम्रमस्तशृतं कषायं शीतं स्रुतं पूतं सक्षौद्रशर्करं पाययेच्छर्द्याम् । पूर्ववच्च ............... प्रशस्यते । रक्तशालिमुद्गमण्डसैन्धवोषणाभोजनं च स्वेदलङ्घनकवलग्रहावपीडच्छीव-नानि च धूपनधूमपाने च प्रतिश्याये लङ्घनमिति परिषत् ।।
जीर्णे .....................................................
(इति ताडपत्रपुस्तके १०५ तमं पत्रम्)

जल पीने के बाद नस्य कर्म करने से नासास्त्राव, शिरोरोग, शरीर का भारीपन, कफप्रसेक इत्यादि हो जाते हैं । ...... पके हुए प्रतिश्याय में नस्य कर्म से घ्राण शक्ति का नाश, नासिका से दुर्गन्ध आना, सोर्मीर (?), मिन्मिन (मिनमिनाना) तथा नासार्श आदि हो जाते हैं । नवीन प्रतिश्याय में नस्य कर्म से पार्श्वोपरोध, कण्ठोद्ध्वंस, कास, श्वास, छर्दि, ज्वर, अरुचि तथा अरति (किसी चीज में मन न लगना) आदि हो जाते हैं । शिरसहित स्नान किये हुए में नस्यकर्म करने से ..... अर्धभेदक (आधा सीसी-Hemicrania) ज्वर तथा अग्निनाश हो जाते हैं । वातज्वर आदि में नस्य कर्म करने से वे ही रोग बढ़ जाते हैं । रजस्वला को नस्य कर्म कराने से ऋतु (आर्तव) संबन्धी रोग हो जाते हैं । स्नान द्वारा शुद्ध होने के बाद नस्य कर्म से योनि का शोषण हो जाता है । गर्भिणी को नस्य का प्रयोग कराने से उत्पन्न बालक अङ्गहीन हो जाता है ..... तथा उसे अरुचि उत्पन्न हो जाती है । भूखे होने पर नस्य कर्म करने से क्लम (थकावट) तथा अरुचि उत्पन्न हो जाती है । प्यासे होने पर नस्य कर्म करने के कास, श्वास तथा कफ की वमन हो जाती है । अब हम इनकी यथार्थ औषधि का उपदेश करेंगे । नस्यकर्म (शिरोविरेचन) रूक्ष तथा स्निग्ध अथवा दोनों प्रकार का किया जाता है । ..... उनकी अपनी २ अविरुद्ध चिकित्सा की जाती है । तथा इसमें निम्न विशेषता होती है-छर्दि (वमन) में मुनक्का, अनारदाना, जामुन तथा आम की गुठली और नागरमोथा इत्यादि ओषधियों से सिद्ध कषाय को शीतल, तिर्यक्पातित तथा छानकर उसमें मधु एवं शर्करा मिलाकर पिलाना चाहिये । ..... प्रतिश्याय में रक्तशालि, मूंग का मण्ड, सैन्धव युक्त तथा उष्ण